भारत का नया रक्षा कवच

यह सतह से हवा में मार करने वाली दुनिया की सबसे आधुनिक और प्रभावी मिसाइल प्रणाली है।

रंजना मिश्रा

यह सतह से हवा में मार करने वाली दुनिया की सबसे आधुनिक और प्रभावी मिसाइल प्रणाली है। अगर भारत इसे कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर तैनात कर देता है, तो पाकिस्तान चाह कर भी कोई हवाई हमला हमारी सीमा के अंदर नहीं कर पाएगा। अगर उसने हमला किया भी तो यह एक बार में उसके बत्तीस विमानों को मार कर गिरा सकती है। मगर अमेरिका नहीं चाहता था कि भारत रूस से यह मिसाइल रक्षा प्रणाली खरीदे।

अमेरिका दुनिया का सबसे ताकतवर देश है, मगर वह भी एक ब्रह्मास्त्र से खौफ खाता है। वह है रूस का एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली। भारत ने रूस से इसका सौदा किया तो अमेरिका का पारा चढ़ गया। असल में एस-400 की तैनाती का मतलब है, देश की सुरक्षा की गारंटी और इस मिसाइल के प्रहार का मतलब है, आसमान में अभेद्य कवच। दुश्मन के पास कितनी भी ताकतवर मिसाइल हो, कैसा भी लड़ाकू विमान हो, गुप्त तरीके से घुसपैठ करने वाला ड्रोन हो, एस-400 के रहते वह सरहद पार नहीं कर सकता।

रूस ने भारत को एस-400 की आपूर्ति शुरू कर दी है। यह दुनिया की सबसे खतरनाक मिसाइलरोधी प्रणाली है। यह एक साथ कई खतरों से निपट सकती है। यह सैकड़ों किलोमीटर दूर से ही दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रख सकती और पलक झपकते ही उसके मंसूबों पर पानी फेर देती है। यह मिसाइल प्रणाली एक साथ छत्तीस ठिकानों पर तबाही मचा सकती है। यह चार तरह की मिसाइलों से लैस है और चालीस से चार सौ किलोमीटर दूरी तक घातक प्रहार कर दुश्मन को ढेर कर सकती है।

यानी अगर इसकी तैनाती दिल्ली में की जाए तो दुश्मन के किसी विमान या मिसाइल को आगरा पहुंचने से पहले ही बर्बाद कर देगी। इसमें एक मिसाइल लांग रेंज की है, जो चार सौ किलोमीटर तक मार कर सकती है। दूसरी मिसाइल मीडियम रेंज की है, जो ढाई सौ किलोमीटर तक प्रहार कर सकती है। तीसरी मिसाइल मीडियम-शार्ट रेंज की है, जो एक सौ बीस किलोमीटर तक हमला कर सकती है और चौथी मिसाइल शार्ट रेंज की है, जो चालीस किलोमीटर के दायरे में दुश्मन को तबाह कर सकती है।

यह रक्षा प्रणाली सबसे उन्नत रडारों से लैस है, जिससे यह छह सौ किलोमीटर की दूरी तक अपने तीन सौ लक्ष्यों का पता लगा और कुछ ही मिनटों में उन्हें ध्वस्त कर सकती है। इसे बड़ी आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता और सिर्फ पांच मिनट के अंदर हमले के लिए तैनात किया जा सकता है। भारत को यह मिसाइल प्रणाली मिलने के बाद भारतीय वायु सेना की ताकत कई गुना बढ़ जाएगी।

एस-400 रक्षा मिसाइल प्रणाली स्टील्थ मोड के पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान तक को गिरा सकती है। अमेरिका के सबसे उन्नत एफ-35 फाइटर जेट भी इससे बच नहीं सकते हैं। इस रक्षा प्रणाली के मुख्य रूप से तीन हिस्से हैं। पहला हिस्सा है, लक्ष्य प्रबंधन रडार प्रणाली, जो दुश्मन की दूरी तय करता है। इसके बाद है कमांड सेंटर, जो दुश्मन के हमले की दूरी तय करके मिसाइल लांचर को हमले का निर्देश देता है और तीसरा हिस्सा है मिसाइल लांचर, जिसमें से मिसाइल अपने लक्ष्य पर हमला करने के लिए निकल पड़ती है।

यह सतह से हवा में मार करने वाली दुनिया की सबसे आधुनिक और प्रभावी मिसाइल प्रणाली है। अगर भारत इस मिसाइल रक्षा प्रणाली को कश्मीर में नियंत्रण रेखा पर तैनात कर देता है, तो पाकिस्तान चाह कर भी कोई हवाई हमला हमारी सीमा के अंदर नहीं कर पाएगा। अगर उसने हमला किया भी तो यह एक बार में उसके बत्तीस विमानों को मार कर गिरा सकता है। इस रक्षा प्रणाली का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष है सीमा पर इस रक्षा प्रणाली की तैनाती से चीन और पाकिस्तान पर होने वाला असर, क्योंकि यही दो हमारे दुश्मन देश हैं। मगर अमेरिका नहीं चाहता था कि भारत रूस से यह मिसाइल रक्षा प्रणाली खरीदे। इस संबंध में अमेरिका में 2017 में एक कानून लाया गया था, ताकि अगर कोई देश विरोध के बावजूद रूस से कोई रक्षा सौदा करता है तो उस पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा। सवाल है कि क्या अमेरिका अब भारत पर भी प्रतिबंध लगाएगा?

भारत को एस-400 की कुल पांच रेजीमेंट मिलने वाली हैं, जिनमें पांच मोबाइल कमांड सेंटर, दस रडार और दस लांचर होंगे। यानी पाकिस्तान और चीन भारत पर हवाई हमला करने के बारे में अब शायद सोच भी नहीं पाएंगे। भारत ने रूस से ये पांच रेजीमेंट उनतालीस हजार करोड़ रुपए में खरीदे हैं। पूरा सौदा लगभग चालीस हजार करोड़ रुपए का है। इसकी पहली रेजीमेंट की तैनाती पश्चिमी सीमा के पास हो सकती है, जहां से पाकिस्तान और चीन दोनों को दबाव में रखा जा सकता है। हालांकि चुनौतियां भारत के सामने भी हैं।

पाकिस्तान के पास भले यह मिसाइल रक्षा प्रणाली नहीं है, लेकिन चीन के पास इसी मिसाइल रक्षा प्रणाली की छह रेजीमेंट पहले से मौजूद हैं। इनमें से एक प्रणाली उसने तिब्बत में, अरुणाचल प्रदेश के पास तैनात कर रखा है। दूसरी प्रणाली उसने लद्दाख में तैनात कर रखी है। चीन इस मामले में हमसे आगे चल रहा है। उसने पहली एस-400 मिसाइल 2018 में रूस से खरीदी थी, मगर मिसाइल प्रौद्योगिकी नियंत्रण व्यवस्था नामक संधि का हिस्सा न होने की वजह से उसे इसका नुकसान भी उठाना पड़ा। इस संधि के तहत जो देश इसका सदस्य नहीं है, उसे तीन सौ किलोमीटर से ज्यादा रेंज की कोई मिसाइल नहीं बेची जा सकती। मतलब चीन को रूस से एस-400 मिसाइलें तो मिलीं, लेकिन उनकी मारक क्षमता अधिकतम ढाई सौ किलोमीटर तक है। जबकि भारत को जो रक्षा प्रणाली मिली है, उसकी मारक क्षमता अधिकतम चार सौ किलोमीटर है।

अमेरिका शुरू से ही नहीं चाहता था कि भारत कभी रूस से इस मिसाइल रक्षा प्रणाली को खरीदे। अमेरिका में 2017 में एक कानून आया था कि अगर कोई देश रूस के साथ हथियारों का सौदा करता है तो उसको प्रतिबंधित कर दिया जाएगा। इस कानून को वहां ‘काउंटरिंग अमेरिकाज एडवर्सरीज थ्रू सैंक्शंस एक्ट’ कहते हैं। अमेरिका ने यह कानून हथियारों के निर्यात में रूस को कमजोर करने के लिए बनाया था। अ

भी पूरी दुनिया में हथियारों का सबसे ज्यादा सैंतीस प्रतिशत निर्यात अमेरिका करता है। रूस की हथियारों के बाजार में हिस्सेदारी बीस प्रतिशत के आसपास है। 2018 में जब चीन ने रूस से यही एस-400 मिसाइल रक्षा प्रणाली खरीदी, तो अमेरिका ने चीन पर प्रतिबंध लगा दिए थे। इसी तरह तुर्की ने भी यह प्रणाली खरीदी, तो अमेरिका ने उस पर कई कड़े प्रतिबंध लगा दिए थे। अमेरिका ने उसका निर्यात लाइसेंस रद्द करके उसे काली सूची में डाल और उसकी परिसंपत्तियों को जब्त कर लिया था।

संभव है कि भारत के मामले में भी कुछ समय बाद अमेरिका इसी तरह के कदम उठाए। हालांकि भारत के मामले में अपवाद की स्थिति भी बन सकती है। डोनाल्ड ट्रंप ने संसद में एक कानून पास करवाया था, जिसके तहत अमेरिका ने उन देशों को प्रतिबंध लगाने वाले कानून से छूट दे दी थी, जो पहले से रूस से रक्षा संबंधी लेनदेन कर रहे थे। भारत के संदर्भ में यह कानून लागू होता है, क्योंकि आज भी भारत के पास ज्यादातर हथियार रूस के हैं। 1960 के दशक से ही रूस भारत का सबसे बड़ा रक्षा सहयोगी रहा है।

स्टाकहोम अंतरराष्ट्रीय शांति अनुसंधान संस्थान की एक रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 2012 से 2016 के बीच भारत का अड़सठ प्रतिशत रक्षा आयात रूस के साथ हुआ था। इस आधार पर भारत को प्रतिबंधों से छूट मिल सकती है। दूसरी बात यह है कि चीन से गतिरोध के बाद एशिया में अमेरिका का सबसे भरोसेमंद सहयोगी भारत है। भारत क्वाड का भी सदस्य है। इसलिए भारत पर प्रतिबंध लगाकर अमेरिका खुद को इस क्षेत्र में कमजोर नहीं करना चाहेगा और भारत से भी अपने संबंध खराब नहीं करना चाहेगा।

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