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स्त्री-सुरक्षा की शर्तें

पितृसत्ता की संस्कृति को संदर्भित करते लेस्ली उडविन के वृत्तचित्र ‘इंडियाज डॉटर’ पर रोक लगा कर भारतीय राज्य ने स्त्री-सुरक्षा का हल कानून-व्यवस्था की परिधि में ही निकालने के अपने नियमित फॉर्मूले को पुन: इस्तेमाल किया है, जहां स्वाभाविक रूप से इस रोक के पक्ष में मर्दवादी राजनीति ही नहीं बहुतेरे मीडिया प्रतिष्ठानों की भी […]

Author Published on: March 18, 2015 10:00 PM

पितृसत्ता की संस्कृति को संदर्भित करते लेस्ली उडविन के वृत्तचित्र ‘इंडियाज डॉटर’ पर रोक लगा कर भारतीय राज्य ने स्त्री-सुरक्षा का हल कानून-व्यवस्था की परिधि में ही निकालने के अपने नियमित फॉर्मूले को पुन: इस्तेमाल किया है, जहां स्वाभाविक रूप से इस रोक के पक्ष में मर्दवादी राजनीति ही नहीं बहुतेरे मीडिया प्रतिष्ठानों की भी व्यापक सहमति देखी जा सकती है। रोक के विरोधियों का दायरा मुख्यत: समाज की मानसिकता की छानबीन तक केंद्रित रहा है।

दरअसल, स्त्री के नजरिये से वृत्तचित्र का राजनीतिक पाठ बताता है कि स्त्री-सुरक्षा की दिशा में कानून-व्यवस्था पर निर्भरता एक बेहद सीमित उपाय सिद्ध हुआ है, और पुरुष मानसिकता में अपेक्षित बदलाव की आशा फिलहाल दूर की कौड़ी ही कही जाएगी।

क्या स्त्री उत्पीड़न के लैंगिक कठघरे में भारतीय सत्ता के मर्दवादी राजनीतिक चरित्र को खड़ा नहीं किया जाना चाहिए, जिसके चलते संसद और विधानसभाओं में स्त्रियों की उपस्थिति नाममात्र से आगे नहीं बढ़ पा रही? इसके बावजूद कि सभी राजनीतिक दल स्त्री-सुरक्षा के नाम पर बढ़-चढ़ कर कानून पास करने की तत्परता दिखाते रहे हैं, विधायिका में स्त्रियों के आरक्षण का मसला ठंडे बस्ते से बाहर लाने में शायद ही किसी की वास्तविक दिलचस्पी हो।

यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि जिस राजनीतिक तंत्र की आमराय वृत्तचित्र में पितृसत्ता के विकृत सामाजिक चेहरे की एक सामान्य झलक बर्दाश्त नहीं कर सकी, उसे दीमापुर जेल से जर्बदस्ती निकाल कर बलात्कार के एक संदिग्ध आरोपी की प्रतिशोध-हत्या का, अपनी कानून-व्यवस्था की सरेआम धज्जियां उड़ाने वाला नजारा देखना पड़ रहा है? यह एक ऐसा तंत्र है जिसे रोजाना स्त्री-तस्करी, एसिड हमलों और सामूहिक बलात्कारों से शर्मसार होना पड़ता है, और भ्रूण-हत्या, कन्या-हत्या, दहेज-हत्या और झूठी शान के नाम पर हत्या का असहनीय अपराध-बोध ढोना पड़ता है!

उडविन का बीबीसी के लिए बनाया गया वृत्तचित्र बेशक कोई राजनीतिक आईना नहीं है। पर उसमें जो दो जाने-पहचाने लैंगिक शोषण के कड़वे आयाम- न्यायिक फजीहत और सामंती मानसिकता- प्रमुखता से उभर कर मुंह चिढ़ाते हैं, उनकी काट राजनीतिक ढांचे में स्त्री की व्यापक उपस्थिति के बिना संभव नहीं लगती। पहले आयाम की काट है, जंग लगी दंड प्रक्रियाओं से संचालित भारतीय न्याय-व्यवस्था में स्त्री के नजरिये से बदलाव लाने की।

दूसरे की काट है, स्त्री पर मर्दवादी निगरानी की जकड़न के तिलिस्म को तोड़ने की। जबकि मौजूदा मर्दवादी राजनीतिक संरचना से निकले हल, कैसे भी हल, मूल प्रश्न को ही आंख तरेरते मिलेंगे।

संदर्भ के लिए दिल्ली के हालिया विधानसभा चुनाव को ले सकते हैं जिसमें स्त्री-सुरक्षा का सवाल निर्विवाद रूप से एक शीर्ष मुद््दा रहा। इसमें निर्भया अभियान समेत युवक-युवतियों की एक-समान भागीदारी वाले लोकतांत्रिक आंदोलनों की राजनीतिक उपज ‘आप’ अपने नायक केजरीवाल के नेतृत्व में सारी दिल्ली को पंद्रह लाख सीसीटीवी कैमरों की निगरानी में लाने का वादा कर रही थी। लेकिन इन कैमरों से निगरानी होगी किसकी?

रोज सामने आने वाली यौन-हिंसा के विविध स्रोतों के अध्ययन से संभावित यौन अपराधी या संभावित यौन-अपराधस्थल का कोई स्पष्ट खाका नहीं खींचा जा सकता। लिहाजा, सीसीटीवी निगरानी और कुछ नहीं बल्कि स्त्री-सुरक्षा के नाम पर स्त्री की पारंपरिक निगरानी का ही तकनीकी विस्तार भर होगी। सौ कैमरों पर एक व्यक्ति के हिसाब से पंद्रह हजार पहरेदार चाहिए, और अगर वे तीन पाली में काम करें तो पैंतालीस हजार। इनमें दस प्रतिशत छुट््टी रिजर्व आदि जोड़ें तो पचास हजार की यह निगरानी-फौज स्त्री को औपचारिक रूप से नैतिक पुलिसिंग का शिकार बनाने का उपकरण ही तो होगी।

याद कीजिए कि तेजतर्रार आइपीएस अधिकारी किरण बेदी के दिल्ली चुनाव में भाजपा का नेतृत्व करने से इस मुद्दे को और भी तूल मिला था। उन्होंने महिला पुलिस स्टेशन, पीसीआर और जूडो-कराटे प्रशिक्षण जैसे कानून-व्यवस्था परिपाटी के दिखावटी उपायों के अलावा छह पी (पैरेंट/प्रिंसिपल, पुलिस, प्रॉसिक्यूशन, प्रिजन, पॉलिटिशियन, प्रेस) की सम्मिलित भागीदारी का एजेंडा भी रखा।

पर वास्तविक सशक्तीकरण के लिए असली पी यानी प्रॉपर्टी और पॉलिटिक्स में स्त्री की समान भागीदारी उनके राडार से भी बाहर ही रही। केजरीवाल और किरण की पार्टियों ने सत्तर सदस्यीय विधानसभा के लिए क्रमश: महज छह और आठ महिला उम्मीदवारों को ही टिकट दिए। जाहिर है, दोनों के कानून-व्यवस्था आधारित एजेंडे में स्त्री-सुरक्षा का मुद््दा प्रशासनिक या हद से हद सामाजिक क्रियाकलाप के दायरे में ही रेखांकित हो सकता था, न कि लोकतंत्र पर आधारित समावेशी राजनीतिक कार्यक्रम के रूप में।

व्यवहार में, कानून-व्यवस्था के ही दायरे में स्त्री-सुरक्षा को आंकने का पैमाना यौन-हिंसा पर लगाम कसने के बजाय उसकी अनदेखी का माध्यम बन जाता है। राज्य की कुल-जमा जवाबदेही आंकड़ों की रह जाती है कि स्त्री-हिंसा के मामले कितने बढ़े या घटे, गिरफ्तारियां कितनी जल्दी या देरी से हुर्इं, मुकदमों का निपटारा त्वरित रहा या नहीं, सजाएं कम या ज्यादा दी गर्इं, आदि। राजनीतिक दल ही नहीं, मीडिया वाले भी प्राय: इन्हीं प्रशासनिक आंकड़ों के आलोक में बात करते मिलेंगे। लिहाजा, जोर रहेगा पुलिस का संख्याबल और उसकी मारक क्षमता को बढ़ाने और त्वरित अदालतों के गठन पर।

दिल्ली की ‘आप’ सरकार के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने इस अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के राज्य-समारोह में पुरानी तर्ज पर ही तीव्रगामी पुलिस दस्तों और त्वरित अदालतों की संख्या में और बढ़ोतरी की बात दोहराई।

चुनाव प्रचार में केजरीवाल समेत पार्टी के नेताओं ने पुलिस को कोसा कि दिल्ली में यौन-हिंसा के मामलों में अपूर्व बढ़ोतरी दर्ज हुई है। जबकि निर्भया कांड के बाद आई चौतरफा जागरूकता ने ऐसे मामलों के निर्बाध पंजीकरण का रास्ता खोला, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए था।

स्त्रियों की विधायी अनुपस्थिति में ‘आप’ की राजनीतिक रणनीति उडविन के वृत्तचित्र के ‘मर्द’ सोच से कितना आगे जा सकती है? पार्टी के शीर्ष नेता कुमार विश्वास को आज भी छिछोरी/फूहड़ स्त्री कविताओं से परहेज हो, ऐसा नहीं लगता।
सोचिए, क्या त्वरित से त्वरित अदालत का न्याय भी दीमापुर जेल कांड से ज्यादा त्वरित हो सकता है?

त्वरित अदालत, अपराधी के लिए त्वरित है, न कि अपराध के लिए। त्वरित अदालतों का यौन-अपराधों की रोकथाम पर सतही असर ही पड़ता है; जबकि इस इकतरफा अवधारणा से शिव सेना और विहिप जैसी मर्द मानसिकता की राजनीति को खुराक जरूर मिलती है। निर्भया कांड की बदनामी ढोने वाली दिल्ली पुलिस, जिसके संचालन में केंद्र की भाजपा सरकार और दिल्ली की ‘आप’ सरकार दोनों की जाहिरा दिलचस्पी है, के ताजातरीन बजट का स्वरूप तस्वीर को और भी स्पष्ट कर देगा।

सन 2015-16 के बजट प्रस्तावों के मुताबिक पैंतीस सौ करोड़ से अधिक की राशि दिल्ली पुलिस की बढ़ती जन-शक्ति के वेतन पर और बारह करोड़ से अधिक नए साजो-सामान पर खर्च होगी, जबकि उनके प्रशिक्षण पर सिर्फ तीन करोड़ लगाए जाएंगे। प्रशिक्षण का भी बड़ा भाग हथियारों और कमांडो दक्षता पर लगेगा, जबकि इन पुलिसकर्मियों का (समूची न्याय व्यवस्था का भी) स्त्री के प्रति संवेदीकरण अभियान लीपापोती का बायस ही बना रहेगा।

स्त्री-विरोधी हिंसा का इंकलाबी हल, राजनीतिक संरचना के मर्दवादी दलदल में फंसा हुआ है। यह विधायिका में स्त्रियों की बराबरी की लोकतांत्रिक उपस्थिति से फलीभूत होगा, न कि ‘बेटी बचाओ…’ जैसे जुमलों या ‘निर्भया फंड’ जैसे घिसे-पिटे कदम से। असत भारतीय स्त्री की यौन-उत्पीड़न के सिलसिले की समझ किसी वृत्तचित्र में दर्ज अपराधियों/वकीलों के बलात्कार का औचित्य सिद्ध करते बयानों की मोहताज नहीं है। स्त्री प्राय: जानती है कि उसके दैनिक जीवन में गहरे पैठा हुआ यौनिक हिंसा का सामाजिक खतरा जल्दबाजी में अंतर्ध्यान नहीं होने जा रहा।

वह किसी पूर्ण सुरक्षा की गारंटी दे सकने वाली मरीचिका के पीछे भी नहीं भाग रही, जिसकी झलक समय-समय पर सरकारी योजनाओं, राजनीतिक घोषणाओं या कानूनी कसावों में दिखाई जाती है। हां, निर्भया-वृत्तचित्र जैसे माध्यम से स्त्री की व्यापक राजनीति को मुखरित होने का मौका जरूर मिल जाता है- कृपया बताइए कि उसकी सुरक्षा की दुहाई देते न्याय-केंद्रों से वह आश्वस्त रहना कब शुरू कर पाएगी; उसे सुरक्षा के वातावरण में सांस लेने का मौका कभी मिलेगा भी!

बहरहाल, दूरदराज की छोड़िए, देश की राजधानी तक भी अपनी निर्भयाओं को न्याय का अभय नहीं दे पा रही। एक निर्भया के मां-बाप ने न्याय की विसंगतियों को लेकर जो व्यथा प्रतिबंधित वृत्तचित्र में व्यक्त की है उसे एक अरसे से वे तमाम मंचों से कहते चले आ रहे हैं।

खुद सर्वोच्च न्यायालय के संज्ञान में अगस्त 2014 से ग्वालियर की जिला अदालत के जज के यौन उत्पीड़न का मामला छानबीन पूरी होने की बाट जोह रहा है, जिसमें मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय का जज मुख्य आरोपी है।रोहतक में दो बहनें बसों में आए दिन लड़कियों के साथ होने वाली छेड़खानी के मुकाबले में डट कर खड़ी क्या हो गर्इं कि सारे खाप समाज को उन्हें झूठा और लड़ाका सिद्ध करने पर आमादा होने दिया गया। महीनों बाद भी मामले में न्याय की तहकीकात इस रूप में चलने दी जा रही है मानो लड़ाकी/झूठी बताए जाने से लड़कियों के साथ छेड़छाड़ जायज हो जाती है।

यह कोई पहेली नहीं कि सिविल सोसायटी और मीडिया के निरंतर दबाव और निर्भया कानूनों से लेकर निर्भया फंड तक की तमाम सरकारी कवायदों के बावजूद, स्त्री के लिए यौनिक सुरक्षा का प्रशासनिक/न्यायिक वातावरण घोर हताशा से भरा है। जब महिला सशक्तीकरण के नाम पर शासन में सामंती प्राथमिकताओं का बोलबाला है और स्त्री-सुरक्षा का बजट स्त्री पर निगरानी का पूरक बना हुआ है, निर्भया-वृत्तचित्र पर रोक या आपराधिक मुकदमा एक स्वाभाविक सरकारी अभियान की तरह ही पेश किया जाता रहेगा। हालांकि, क्या इसी ‘नैतिक’ कवायद को आगे बढ़ाते हुए पुलिस को रामायण और महाभारत के प्रदर्शनों पर भी मुकदमा नहीं ठोक देना चाहिए जहां सीता अपहरण और द्रौपदी चीर-हरण जैसे प्रसंगों के वार्तालाप दिखाए जाते हों!

तमाम सामाजिक, सांस्कृतिक और प्रशासनिक मार के बावजूद स्त्री के लिए राजनीतिक संरचना की सच्चाई कहीं ज्यादा कड़वी है। निर्भया-वृत्तचित्र पर रोक की पितृसत्तात्मकता से कई गुना कड़वी; वृत्तचित्र में बिंबित सामाजिक नैतिकता से भी दसियों गुना कड़वी कि बलात्कार के लिए लड़की ही दोषी होती है।

राजनीतिक सच्चाई का सार ही है कि सरकार कोई भी हो, निर्भया-वृत्तचित्र पर रोक लगे न लगे, स्त्री-सुरक्षा का वातावरण बनाने की जवाबदेही राजनीतिक एजेंडे से नदारद ही रहनी है। दिल्ली तब तक रेप कैपिटल कहलाने को अभिशप्त है जब तक दिल्ली विधानसभा के सत्तर विधायकों के चेहरों में पैंतीस स्त्रियों के न हों। फिलहाल, प्रशासनिक फलक पर स्त्री-सुरक्षा के उपायों के जो भी दावे किए जा रहे हों, राजनीतिक गलियारों में स्त्री सशक्तीकरण का मुद्दा चुनावी जुमले से अधिक की हैसियत नहीं रखता।

 
विकास नारायण राय

 

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