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राजनीतिः विकास की डगर पर चुनौतियां

आने वाले वर्षों के दौरान देश की ऊर्जा संबंधी मांग बहुत तेजी से बढ़ेगी, इसलिए कच्चे तेल के आयात पर इसकी निर्भरता में भी इजाफा होगा। ऐसे में आवश्यकता इस बात की होगी कि सरकार एक एकीकृत ऊर्जा नीति तैयार करे। बिजली से चलने वाले वाहनों पर जोर देना होगा। इलेक्ट्रिक कारों को टैक्स कम करके बढ़ावा देना होगा। साथ ही सार्वजनिक परिवहन सुविधा को सरल और कारगर बनाना होगा।

Author May 22, 2018 4:27 AM
इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में मौजूदा बढ़े हुए स्तर से गिरावट का कोई संकेत नहीं है।

जयंतीलाल भंडारी

यकीनन इन दिनों दुनिया के आर्थिक संगठनों की जो शोध व अध्ययन की रिपोर्टें प्रकाशित हो रही हैं, उनमें भारत की तेज आर्थिक रफ्तार तथा दस-बारह सालों में भारत के तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के निष्कर्ष प्रस्तुत किए जा रहे हैं। लेकिन इन अध्ययन-रिपोर्टों में यह भी कहा जा रहा है कि भारत को विकास की डगर पर दिखाई दे रही कई चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करना होगा। कच्चे तेल की तेजी से बढ़ती कीमतों से अर्थव्यवस्था को बचाने की रणनीति अपनानी होगी। विदेश व्यापार का घाटा कम करना होगा। निर्यात बढ़ाने होंगे। देश में कारोबार के वातावरण में सुधार लाना होगा। इसमें कोई दो मत नहीं कि पूरी दुनिया भारत की आर्थिक संभावनाओं को स्वीकार कर रही है। हाल ही में आठ मई को दुनिया के ख्यात संगठन लोवी इंस्टीट्यूट के द्वारा प्रकाशित एशिया पॉवर इंडेक्स में आर्थिक सहित विभिन्न पैमानों पर एशिया प्रशांत क्षेत्र के पच्चीस देशों की सूची में भारत को चौथी सबसे प्रमुख शक्ति बताया है। साथ ही भारत को भविष्य की विशाल शक्ति भी बताया गया है।

इसी तरह पिछले दिनों एशियाई विकास बैंक ने कहा है कि चालू वित्तवर्ष के दौरान भारत की सात प्रतिशत से अधिक अनुमानित आर्थिक वृद्धि दर आश्चर्यजनक रूप से काफी तेज है और अगर यह गति बनी रहती है तो अर्थव्यवस्था का आकार एक दशक के भीतर ही दोगुना हो जाएगा। हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय विकास केंद्र ने विकास रिपोर्ट 2018 में कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था एक दशक में सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था होगी। भारत की वृद्धि दर चीन और अमेरिका से अधिक रहेगी।

पिछले दिनों अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आइएमएफ) के द्वारा प्रकाशित ‘वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक’ में कहा गया है कि भारत फ्रांस को पीछे छोड़ दुनिया की छठी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के आकार की दृष्टि से भारत 2.6 लाख करोड़ डॉलर मूल्य की अर्थव्यवस्था वाला देश है। रिपोर्ट के मुताबिक पांच अन्य अर्थव्यवस्थाएं जिनके नाम भारत से ऊपर हैं, उनमें अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी और ब्रिटेन हैं। आइएमएफ का कहना है कि यदि भारत आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया को वर्तमान की तरह निरंतर जारी रखता है तो वर्ष 2030 तक वह दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। इसी तरह विश्वविख्यात ब्रिटिश ब्रोकरेज कंपनी हांगकांग एंड शंघाई बैंक कॉरपोरेशन (एचएसबीसी) ने अपनी अध्ययन रिपोर्ट में कहा है कि हालांकि वर्ष 2016-17 में भारत की आर्थिक वृद्धि के रास्ते में बाधा उत्पन्न हुई थी लेकिन अब भारत में आर्थिक सुधारों के कारण अर्थव्यवस्था का प्रभावी रूप दिखाई देगा और वर्ष 2028 तक भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है।

उल्लेखनीय है कि भारत के वित्त मंत्रालय के द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट में कहा गया है कि देश में जिलेवार कृषि-उद्योग के विकास, बुनियादी ढांचे में मजबूती तथा निवेश मांग के निर्माण में यथोचित वृद्धि करने के लिए जो रणनीति बनाई गई उससे 2025 तक भारतीय अर्थव्यवस्था का आकार 5,000 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा, जो कि अभी 2500 अरब डॉलर के करीब है। स्पष्ट है कि दुनिया की विभिन्न आर्थिक अध्ययन रिपोर्टें संकेत दे रही हंै कि आगामी कुछ वर्षों में भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ेगी और दस-बारह वर्ष बाद यह तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकती है। निस्संदेह भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़े कई सकारात्मक पक्ष भी स्पष्ट दिखाई दे रहे हैं। आइएमएफ का कहना है कि 2018 में भारत की विकास दर 7.4 फीसद रहेगी तथा 2019 में 7.8 फीसद हो जाएगी। जबकि चीन में 2018 में विकास दर 6.6 फीसद और 2019 में 6.4 फीसद रहने का अनुमान है। ऐसे में भारत सबसे तेज विकास दर वाला देश दिखाई दे रहा है।

भारत का निर्यात वर्ष 2017-18 में लक्ष्य के अनुरूप 300 अरब डॉलर के ऊपर पहुंचा है। भारत का शेयर बाजार, भारत का विदेशी मुद्रा भंडार और भारतीय रुपया अच्छी स्थिति में हैं। जीडीपी में प्रत्यक्ष कर का योगदान बढ़ा है। इसी प्रकार आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था को चमकाने में यहां के मध्यवर्ग की भी विशेष भूमिका है। देश की विकास दर के साथ-साथ शहरीकरण की ऊंची वृद्धि दर के बलबूते भारत में मध्यवर्ग के लोगों की आर्थिक ताकत तेजी से बढ़ी है और यह वर्ग लंबे समय तक देश में अधिक उत्पादन, अधिक बिक्री और अधिक मुनाफे का स्रोत बना रहेगा।
अर्थव्यवस्था की चमकीली संभावनाओं को साकार करने के लिए कई चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना करना होगा। अब देश की अर्थव्यवस्था को ऊंचाई देने के लिए मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर की अहम भूमिका बनानी होगी। मेक इन इंडिया योजना को गतिशील करना होगा। उन ढांचागत सुधारों पर भी जोर देना होगा, जिनसे निर्यातोन्मुखी विनिर्माण क्षेत्र को गति मिल सके। ऐसा किए जाने से भारत में आर्थिक व औद्योगिक विकास की नई संभावनाएं आकार ग्रहण कर सकती हैं। पिछले दिनों प्रकाशित विश्व बैंक की रिपोर्ट में कहा गया है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर को बढ़ावा देकर भारत चीन और पश्चिमी देशों को पीछे छोड़ दुनिया का नया कारखाना बन सकता है।

हालांकि इस समय दुनिया के कुल उत्पादन का 18.6 फीसद अकेला चीन करता है। लेकिन कुछ वर्षों से चीन में आई लगातार सुस्ती और युवा कार्यशील आबादी में कमी व बढ़ती श्रम-लागत के कारण चीन में औद्योगिक उत्पादन में मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। ऐसे में उत्पादन गुणवत्ता के मामले में चीन से आगे चल रहे भारत के मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में आगे बढ़ने की अच्छी संभावनाएं मानी जा रही हैं। ख्यात वैश्विक शोध संगठन स्टैटिस्टा और डालिया रिसर्च के द्वारा मेड इन कंट्री इंडेक्स 2016 में उत्पादों की साख के अध्ययन के आधार पर कहा गया है कि गुणवत्ता के मामले में ‘मेड इन इंडिया’, ‘मेड इन चाइना’ से आगे है। न केवल देश में मेक इन इंडिया की सफलता के लिए कौशल प्रशिक्षित युवाओं की कमी को पूरा करना होगा, बल्कि दुनिया के बाजार में भारत के कौशल प्रशिक्षित युवाओं की मांग को पूरा करने के लिए भी कौशल प्रशिक्षण के रणनीतिक प्रयास जरूरी होंगे। देश के उद्योग-व्यवसाय में कौशल प्रशिक्षित लोगों की मांग और आपूर्ति में लगातार बढ़ता अंतर दूर करना होगा। भारत में करीब बीस फीसद लोग ही कौशल प्रशिक्षण पाए हुए हैं, जबकि चीन में ऐसे लोगों की संख्या 91 प्रतिशत है।

इस समय अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों में मौजूदा बढ़े हुए स्तर से गिरावट का कोई संकेत नहीं है। ऐसे में तेल की कीमतों में वृद्धि से होने वाली मुश्किलों के मद््देनजर तेल कीमतों पर नियंत्रण जरूरी है। वैश्विक स्तर पर बढ़ती हुई तेल कीमतों का सामना करने के लिए भारत ने चीन के साथ मिलकर तेल उत्पादक देशों पर दबाव बनाने की जो रणनीति बनाई है, उसे सफलतापूर्वक कार्यान्वित करना होगा। जरूरी है कि सरकार पूरा ध्यान अपनी ऊर्जा नीति को नए सिरे से तैयार करने पर केंद्रित करे ताकि मौजूदा हालात के लिहाज से बेहतरीन ऊर्जा नीति तैयार की जा सके और पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से होने वाली आर्थिक मुश्किलों को कम किया जा सके। चूंकि देश तेजी से विकास कर रहा है और 2030 तक आने वाले वर्षों के दौरान देश की ऊर्जा संबंधी मांग बहुत तेजी से बढ़ेगी, इसलिए कच्चे तेल के आयात पर इसकी निर्भरता में भी इजाफा होगा। ऐसे में आवश्यकता इस बात की होगी कि सरकार एक एकीकृत ऊर्जा नीति तैयार करे। बिजली से चलने वाले वाहनों पर जोर देना होगा। इलेक्ट्रिक कारों को टैक्स कम करके बढ़ावा देना होगा। साथ ही सार्वजनिक परिवहन सुविधा को सरल और कारगर बनाना होगा।

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