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राजनीतिः चीन से व्यापार घाटा कम करने की चुनौती

चीन के साथ व्यापार घाटा कम करने के लिए निर्यातकों को हरसंभव प्रोत्साहन देना होगा। कच्चे माल की तुलना में अधिक विदेशी मुद्रा कमाने वाले उत्पादों के निर्यात को प्राथमिकता देनी होगी। भारत को कम लागत पर गुणवत्तापूर्ण उत्पादन करने वाले देश के रूप में बाजार पहचान बनानी होगी। अकुशलता और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण कर अपनी उत्पादन लागत कम करनी होगी। प्रतिस्पर्द्धा में सतत सुधार तथा वित्तीय मानदंडों के प्रति जवाबदेही पर ध्यान देना होगा।

Author April 27, 2018 03:22 am
चीन के साथ भारत के व्यापार घाटे को कम करने के लिए भारत से निर्यात बढ़ाने के लिए सरकार के द्वारा निर्यातकों को हरसंभव प्रोत्साहन देना होगा।

जयंतीलाल भंडारी

यकीनन भारत-चीन के बीच बढ़ते व्यापारिक असंतुलन को कम करने और चीन को निर्यात बढ़ाने का एक उपयुक्त समय इन दिनों दिखाई दे रहा है। इस वक्त अमेरिका और चीन के बीच व्यापार संबंध दोनों देशों के व्यापार इतिहास के सबसे बुरे दौर में हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार युद्ध की आशंका बढ़ती जा रही है। पिछले दिनों अमेरिका ने चीन के तेरह सौ उत्पादों पर पच्चीस फीसद आयात शुल्क लगाने का निर्णय लिया, वहीं इसके जवाब में चीन ने अमेरिका से बड़ी मात्रा में आयात होने वाले एक सौ अट्ठाईस उत्पादों पर पच्चीस फीसद आयात शुल्क लगाने का निर्णय ले लिया। इन उत्पादों में सोयाबीन, तंबाकू, फल, मक्का, गेहूं, रसायन आदि शामिल हैं। चीन के द्वारा लगाए गए आयात शुल्क के कारण अमेरिका की ये सारी वस्तुएं चीन के बाजारों में महंगी हो जाएंगी।

ऐसे में इन दिनों देश और दुनिया के अर्थविशेषज्ञ यह कह रहे हैं कि जो अमेरिकी वस्तुएं चीन के नए आयात शुल्क के कारण चीन के बाजार में महंगी हो जाएंगी, उनमें से अधिकांश वस्तुएं भारत भी चीन को निर्यात कर रहा है। ऐसे में ये भारतीय वस्तुएं चीन के बाजारों में अमेरिकी वस्तुओं की तुलना में कम कीमत पर मिलने लगेंगी। इससे चीन को भारत के निर्यात बढ़ सकेंगे। चीन को भारत से निर्यात बढ़ने की संभावना और अधिक इसलिए हो गई है कि विगत 26 मार्च को नई दिल्ली में चीन के वाणिज्य मंत्री झोंग शैन तथा भारत के वाणिज्य मंत्री सुरेश प्रभु के साथ-साथ दोनों देशों के उच्च अधिकारियों की संयुक्त आर्थिक समूह बैठक में द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने तथा चीन के साथ भारत के बढ़ते हुए व्यापार घाटे में कमी लाने के मुद्दों पर आधिकारिक रूप से महत्त्वपूर्ण वार्ता आयोजित हुई।

इस बैठक में चीन और भारत ने नए वैश्विक कारोबार परिदृश्य के मद्देनजर आपसी कारोबार बढ़ाने का निर्णय लिया है। सुरेश प्रभु ने कहा कि भारत का बढ़ता हुआ व्यापार घाटा दोनों देशों के आर्थिक और वाणिज्यिक संबंधों की राह में एक चिंताजनक मुद्दा बना हुआ है। खासतौर से भारत की ओर से चीन को निर्यात किए जा रहे कृषि उत्पादों जैसे सरसों, सोयाबीन, बासमती और गैर-बासमती चावल, फल, सब्जियों, चीनी, टैक्सटाइल, दवाइयों और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में आ रही मुश्किलों की ओर ध्यान दिलाया गया। चीन के वाणिज्य मंत्री शैन ने कहा कि भविष्य में चीन की ओर से प्रयास होगा कि भारत-चीन के बीच व्यापार असंतुलन में कमी आए।

गौरतलब है कि भारत-चीन द्विपक्षीय व्यापार के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, साल 2017 में भारत-चीन व्यापार 84.44 अरब डॉलर की ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच गया। 2017 में चीन को भारत का निर्यात 16.34 अरब डॉलर मूल्य का रहा। जबकि चीन से भारत ने 68.10 अरब डॉलर का आयात किया। ऐसे में वर्ष 2017 में द्विपक्षीय व्यापार के तहत भारत का व्यापार घाटा 51.76 अरब डॉलर रहा। वर्ष 2016 में भारत-चीन व्यापार 71.09 अरब डॉलर का रहा। चीन को भारत से 11.76 अरब डॉलर मूल्य के निर्यात किए गए, जबकि चीन से आयात का मूल्य 58.33 अरब डॉलर रहा। व्यापार घाटा 46.57 अरब डॉलर का रहा। गौरतलब है कि वर्ष 2017 में भारत और चीन के बीच व्यापार की ऐतिहासिक ऊंचाई और भारत का सर्वाधिक व्यापार घाटा तब रहा, जब दोनों देशों के बीच डोकलाम विवाद और अन्य मुद्दे मसलन चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा, चीन द्वारा जैश-ए-मोहम्मद के मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंध के भारतीय प्रयास में अड़चन, परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत के प्रवेश पर चीनी बाधाएं मुंह बाए खड़ी रही हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ाने के लिए दोनों देशों की सरकारें तनाव कम करने का प्रयास कर रही हैं।

हमें चीन के बाजार में भारतीय सामान की पैठ बढ़ाने के लिए उन क्षेत्रों को समझना होगा, जहां चीन को गुणवत्तापूर्ण भारतीय सामान की दरकार है। वस्तुत: गुणवत्तापूर्ण उत्पादों के मामले में भारत चीन से बहुत आगे है। ख्यात वैश्विक शोध संगठन ‘स्टैटिस्टा ऐंड डालिया रिसर्च’ के द्वारा ‘मेड इन कंट्री इंडेक्स’ में उत्पादों की साख के अध्ययन के आधार पर कहा गया है कि गुणवत्ता के मामले में ‘मेड इन इंडिया’, ‘मेड इन चाइना’ से आगे है। इस सूचकांक (इंडेक्स) में उत्पादों की साख के मामले में चीन भारत से सात पायदान पीछे है। चूंकि भारतीय उत्पाद गुणवत्ता में बेहतर और विश्व-स्तर पर प्रतिस्पर्धी होते हैं, इसलिए यहां ऐसा कोई कारण नहीं है कि चीनी उपभोक्ता और कंपनियां इनकी खरीद नहीं कर सकतीं। खासतौर से चीन में प्रदूषण-कानून सख्त होने से कई उद्योगों की इकाइयां बड़ी संख्या में बंद हो गई हैं। ऐसे में भारत चीन के बाजार में ऑटो कम्पोनेंट, स्टेनलेस स्टील, इन्वर्टर, कॉटन यार्न, लेदर सामान आदि वस्तुओं के निर्यात तेजी से बढ़ाने की संभावना रखता है। इतना ही नहीं, भारत अपनी ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था, सूचना प्रौद्योगिकी, बायोटेक्नोलॉजी, फार्मास्युटिकल, इंजीनियरिंग, मेडिकल व विज्ञान क्षेत्रों की विजय पताका चीन में भी फहरा सकता है।

हालांकि भारत और चीन के बीच हुई वाणिज्य मंत्री और उच्च अधिकारी स्तर की बैठक के दौरान चीन ने कहा कि वह कृषि उत्पादों, दवा और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे कई क्षेत्रों में भारत से निर्यात की बाधाओं को कम करने का प्रयास करेगा। लेकिन ऐसी पक्की आशा हम नहीं बांध सकते। ऐसी बात सितंबर 2014 में दोनों देशों के बीच हुए पांचवर्षीय द्विपक्षीय व्यापार संतुलन के समझौते में भी कही गई थी। इसके तहत 2019 तक भारत का व्यापार घाटा कम हो जाने का परिदृश्य उभरना था, लेकिन यह समझौता बाध्यकारी नहीं था, अतएव भारत का व्यापार घाटा कम नहीं हुआ। वर्ष 2014 के बाद भारत का व्यापार घाटा लगातार बढ़ता रहा है। ऐसे में भारत के व्यापार घाटे को कम करने के लिए चीन के द्वारा लिये गए आधिकारिक निर्णय को कार्यान्वित करने का दबाव बनाए रखना होगा। यह भी जरूरी होगा कि हम चीन को निर्यात बढ़ाने की नई रणनीति बनाएं।

चीन के साथ भारत के व्यापार घाटे को कम करने के लिए भारत से निर्यात बढ़ाने के लिए सरकार के द्वारा निर्यातकों को हरसंभव प्रोत्साहन देना होगा। चीन को कच्चे माल की तुलना में अधिक विदेशी मुद्रा कमाने वाले मूल्यवर्धित उत्पादों के निर्यात को प्राथमिकता से प्रोत्साहन देना होगा। चीन से व्यापार में मुकाबला करने के लिए भारत को कम लागत पर गुणवत्तापूर्ण उत्पादन करने वाले देश के रूप में बाजार पहचान बनानी होगी। हमें अपनी बुनियादी संरचना में व्याप्त अकुशलता और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण कर अपने उत्पाद की उत्पादन लागत कम करनी होगी। चीन की तरह भारत को भी गुड गवर्नेन्स की स्थिति बनानी होगी। प्रतिस्पर्द्धा में सतत सुधार तथा वित्तीय मानदंडों के प्रति जवाबदेही पर ध्यान देना होगा।

भारत में श्रम के कौशल प्रशिक्षण और साज-सामान के मोर्चे पर जो दिक्कतें दिखाई दे रही हैं उन्हें दूर करना होगा। हमें मेक इन इंडिया अभियान को कामयाब बनाना होगा। इसके लिए देश में आगामी एक वर्ष में चालीस लाख ऐसे युवाओं की जरूरत होगी जो कौशल-प्रशिक्षण से सुसज्जित हों। इसके लिए उद्योग मंत्रालय और सरकार का सहयोग कर रहे नैस्कॉम संगठन ने पहले चरण में एक वर्ष में चालीस लाख युवाओं को कौशल प्रशिक्षण देने की जो रणनीति बनाई है, उसे धरातल पर कार्यान्वित करना होगा। हम आशा करें कि एक ओर ऐसे प्रयासों से भारत से चीन की ओर निर्यात बढ़ेंगे, साथ ही दूसरी ओर चीन और अमेरिका के बीच शुरू हुई व्यापार तनातनी का भारत को फायदा मिलेगा और भारत से चीन को निर्यात बढ़ेंगे। इन सबके कारण चीन के साथ भारत के व्यापार घाटे में भी कमी आएगी।

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