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राजनीतिः भूजल संरक्षण और हमारी चेतना

हमारे देश में वर्षा जल संचयन की परंपरा सदियों पुरानी है। राजस्थान में बारिश के पानी को सुरक्षित रखने का काम बिना किसी सरकारी मदद के सामाजिक स्तर पर होता रहा है। मंदिरों के आसपास तालाब, कुएं, बावड़ियां बनवाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। जल संकट से निपटने में सरकार और समाज की गंभीर हिस्सेदारी है। व्यक्तिगत स्तर पर छोटे समूहों को भी जल संरक्षण हेतु आगे आना चाहिए। धरती से हम जितना जल ले रहे हैं, उसकी तुलना में उसे हम कम जल लौटा रहे हैं।

Author June 28, 2018 3:19 AM
जल संकट कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसका समाधान नहीं खोजा जा सके। कई देशों में सरकार और आमजन की भागीदारी से पीने के पानी की उपलब्धता बढ़ी है।

देवेंद्र जोशी

नीति आयोग द्वारा जारी जल प्रबंधन सूचकांक रिपोर्ट के मुताबिक देश इस समय इतिहास के सबसे बड़े जल संकट से गुजर रहा है। लाखों लोगों की जिंदगी खतरे में है। रिपोर्ट के मुताबिक पचहत्तर फीसद घरों में पीने का पानी नहीं है। चौरासी फीसद ग्रामीण घरों में पानी पाइप से नहीं पहुंच रहा है और सत्तर फीसद पानी पीने लायक नहीं है। सरकार का मानना है कि साठ करोड़ लोग पानी की भयंकर कमी से जूझ रहे हैं। साफ पानी नहीं मिलने से हर साल दो लाख लोग मर रहे हैं। पानी की वर्तमान आपूर्ति के मुकाबले वर्ष 2030 तक देश की आबादी को दुगने पानी की आपूर्ति की जरूरत पड़ेगी, जिसके चलते करोड़ों लोगों को पानी की समस्या का सामना करना पड़ेगा। इससे जीडीपी में छह फीसद तक की गिरावट दर्ज की जा सकती है। जल प्रबंधन रिपोर्ट में गुजरात पहले स्थान पर है। उसके बाद मध्यप्रदेश, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र का स्थान है। जबकि उत्तर-पूर्वी राज्यों में त्रिपुरा शीर्ष पर है। वैश्विक जल गुणवत्ता सूचकांक में एक सौ बाईस देशों में भारत एक सौ बीसवें स्थान पर है।

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गिरता भूजल स्तर आज किसी एक देश-प्रदेश की नहीं, अपितु विश्वव्यापी समस्या है। भारत में दुनिया की सत्रह फीसद आबादी निवास करती है, लेकिन जल उपलब्धता चार फीसद ही है। गिरते भूजल स्तर की समस्या से निपटने का एकमात्र उपाय जल संरक्षण है। लेकिन अफसोस इस बात का है कि लगातार भूजल स्तर गिरने के बावजूद भारत में जल संरक्षण की कोई समुचित प्रणाली या व्यवस्था आज तक विकसित नहीं की जा सकी। हर वर्ष अरबों घनमीटर वर्षा से मिलने वाला जल बेकार चला जाता है। प्रति व्यक्ति सालाना जल की उपलब्धता के मामले में भारत चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों से भी पीछे है।

भारत में स्वच्छ पेयजल की समस्या विकराल रूप धारण कर चुकी है। पिछले साल सरकार ने भी माना था कि देश की एक चौथाई आबादी सूखे की चपेट में है। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के मुताबिक विगत वर्षों में भूजल स्तर पैंसठ फीसद गिर गया है। भूजल के दोहन में भारत विश्व में पहले स्थान पर है। यहां अस्सी फीसद से अधिक जल आपूर्ति भूजल से होती है। सरकारी आंकड़ों में भी माना गया है कि भारत में ज्यादातर हिस्से का भूजल इस्तेमाल हो चुका है। विश्व बैंक के चार साल के आंकड़ों के अनुसार घरेलू, कृषि और औद्योगिक उपयोग के लिए प्रतिवर्ष सात सौ इकसठ अरब घनमीटर जल का इस्तेमाल होता है।

पानी की कमी इसलिए भी ज्यादा हो गई है कि आधे से ज्यादा पानी प्रदूषित हो गया है। प्रमुख रूप से उद्योग और सीवेज के साथ ही उर्वरकों के अति प्रयोग से भी हमारा भूजल प्रदूषित हो रहा है। इससे डायरिया, टाइफाइड और वायरल हेपेटाइटिस जैसी बीमारी फैलने का खतरा रहता है। हर साल गंदे पानी की निकासी और पर्याप्त साफ-सफाई के अभाव में तीन लाख से ज्यादा बच्चे असमय काल के गाल में समा जाते हैं। दुनिया भर में कुपोषण के आधे से ज्यादा मामलों की वजह खराब पानी जनित बीमारियां हैं। लगातार बढ़ती आबादी एक अलग खतरे का संकेत है। सन 2030 तक दुनिया की आबादी साढ़े आठ अरब और 2050 तक करीब दस अरब तक पहुंच जाने का अनुमान है। इससे पानी की मांग और बढ़ेगी।

दुनिया का हर दसवां प्यासा व्यक्ति भारत के गांवों में निवास करता है। यह हमारे लिए गर्व का नहीं, चिंता का विषय होना चाहिए। ‘नारी सशक्तीकरण’ और ‘बेटी पढ़ाओ-बेटी बचाओ’ की बात करने वाले भारत में यह स्थिति तब और चिंताजनक हो जाती है जब पता चलता है कि ग्रामीण भारत में पानी जुटाने का काम मुख्य रूप से लड़कियां और महिलाएं ही करती हैं। पानी की समस्या उसकी उपलब्धता से कहीं ज्यादा उसके बेहतर प्रबंधन के अभाव में विकराल होती जा रही है। प्रकृति ने तो हमें प्रचुर जल का उपहार दिया है, लेकिन उसकी आपूर्ति के उपयुक्त नेटवर्क के अभाव में हम प्यासे रहने को विवश हैं। उत्तर प्रदेश में नवासी फीसद, बिहार में अठहत्तर फीसद, उत्तराखंड में पचहत्तर फीसद, महाराष्ट्र में चौहत्तर फीसद कुएं जल स्तर घटने की वजह से समस्या बने हुए हैं। वर्ष 1983 में जहां तेंतीस फुट खुदाई पर पानी मिल जाता था, वहीं 2011 तक यह जल स्तर एक सौ बत्तीस फुट नीचे चला गया।

गिरते भूजल स्तर की समस्या से भारत ही नहीं, दुनिया के ज्यादातर देश जूझ रहे हैं। इस समस्या को लेकर कार्य कर रही एक अंतरराष्ट्रीय संस्था का मानना है कि 2050 तक दुनिया की चालीस फीसद आबादी जल संकट की चपेट में होगी। लगातार बढ़ते वैश्विक तापमान के कारण मौसम में तेजी से बदलाव आ रहे हैं और इस वजह से आंधी, तूफान, बाढ़, सूखे जैसी प्राकृतिक आपदाओं की वजह से नदी, तालाब, झरने सूखे रहे हैं। एक अध्ययन के मुताबिक सन 2025 तक भारत जल संकट वाला देश बन जाएगा। परिवारों की आय बढ़ने के साथ-साथ सेवा और उद्योग क्षेत्र के कारण भी पानी की घरेलू और औद्योगिक मांग बढ़ती जा रही है। देश की सिंचाई का करीब सत्तर फीसद और घरेलू जल आपूर्ति का अस्सी फीसद हिस्सा भूजल स्तर से ही पूरा हो रहा है।

पानी की समस्या भयावह होने की एक बड़ी वजह यह भी है कि हमारे देश में पानी का दोहन मनमाने और अविचारित रूप से होता है। साथ ही व्यवसायीकरण और अपव्यय भी जल के कुप्रबंधन की बड़ी वजह है। इसी का नतीजा है कि ‘डार्क जोन’ (ऐसी जगह जहां भूजल निकाल पाना संभव नहीं है) बढ़ते ही जा रहे हैं। पानी के निरंकुश, अविवेकपूर्ण इस्तेमाल की तस्वीरें चारों तरफ बिखरी पड़ी हैं, लेकिन उसके लिए सुविचारित नीति बनाने वाला कोई नहीं है। पानी के संरक्षण के लिए एक तर्क पानी का व्यवसायीकरण करने का भी दिया जाता है, ताकि लोग पानी की कीमत समझें और उसकी बर्बादी से बाज आएं।

जल संकट कोई ऐसी समस्या नहीं है जिसका समाधान नहीं खोजा जा सके। कई देशों में सरकार और आमजन की भागीदारी से पीने के पानी की उपलब्धता बढ़ी है। हमारे देश में वर्षा जल संचयन की परंपरा सदियों पुरानी है। राजस्थान में बारिश के पानी को सुरक्षित रखने का काम बिना किसी सरकारी मदद के सामाजिक स्तर पर होता रहा है। मंदिरों के आसपास तालाब, कुएं, बावड़ियां बनवाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। जल संकट से निपटने में सरकार और समाज की गंभीर हिस्सेदारी है। व्यक्तिगत स्तर पर छोटे समूहों को भी जल संरक्षण के लिए आगे आना चाहिए। धरती से हम जितना जल ले रहे हैं, उसकी तुलना में उसे हम कम जल लौटा रहे हैं। रोजमर्रा की जिंदगी में पानी के अपव्यय को रोक कर भी हम पानी बचा सकते हैं। पानी के प्रति हमें अपना नजरिया बदलना होगा। पानी को प्रकृति का प्रचुर मात्रा में उपलब्ध निशुल्क उपहार मानने के बजाय, उसे अपनी जरूरत की एक सीमित वस्तु के रूप में देखना होगा। जल संरक्षण के लिए राष्ट्र और विश्व स्तर पर एक कठोर योजना की जरूरत है। यह समस्या कानून और सरकार से नहीं, जन-जागरूकता से ही हल हो सकेगी। लोग जितनी जल्दी जल संरक्षण के प्रति जागरूक होंगे, घटते भूजल स्तर की समस्या से दुनिया को उतनी ही जल्दी राहत मिल सकेगी।

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