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राजनीति: डूबते बैंक, तैरते सवाल

निजी और सहकारी बैंकों में आमतौर पर कारोबारी योजनाएं त्रुटिपूर्ण और जोखिमभरी होती हैं। बैंकिंग कामकाज में प्रवर्तकों का जरूरत से ज्यादा बढ़ता हस्तक्षेप कई गंभीर संकटों को जन्म देता है। कई बार प्रवर्तक ही बैंक के प्रबंध निदेशक बन जाते हैं और अपनी मर्जी से बिना निदेशक मंडल की सहमति के बड़े कर्ज अपने परिचितों को दे देते हैं, जिनकी वसूली संदिग्ध होती है।

Author Updated: November 23, 2020 4:29 AM
Bank scamलक्ष्मी विलास बैंक बैठ जाने के बाद भारतीय बैंकिंग प्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में! फाइल फोटो।

सतीश सिंह

हाल में लक्ष्मी विलास बैंक (एलवीबी) बैठ जाने के बाद भारतीय बैंकिंग प्रणाली एक बार फिर सवालों के घेरे में है। पिछले दो साल में जिस तरह से कई बैंकों के ठप होने की घटनाएं सामने आई हैं और इन सबका खमियाजा ग्राहकों और निवेशकों को उठाना पड़ा है, वह गंभीर चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि भारतीय बैंकिंग व्यवस्था को लेकर लोगों के मन में डर बैठ गया है कि आखिर पैसे सुरक्षित रखें तो कहां। लक्ष्मी विलास बैंक की घटना ने कई सवालों को फिर से ताजा कर दिया है। मसलन, बैंक की ऐसी हालत क्यों हुई? इसके लिए जिम्मेदार कौन है? बैंकों के कामकाज की निगरानी करने वाले नियामक क्या कर रहे थे?

भारत में निजी बैंकों का असफल होना कोई बड़ी बात नहीं है। अगर इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो वर्ष 1935 से 1947 तक नौ सौ निजी बैंक असफल हुए थे, जबकि वर्ष 1948 से वर्ष 2020 तक सात सौ अड़तीस निजी बैंक असफल हुए हैं। यस बैंक, पीएमसी और लक्ष्मी विलास बैंक भी इन्हीं में शामिल हैं। सवाल लक्ष्मी विलास बैंक का विलय सिंगापुर के डीबीएस बैंक की भारतीय इकाई के साथ किए जाने के प्रस्ताव को लेकर भी है, क्योंकि इससे वैश्विक स्तर पर देश की बैंकिंग प्रणाली के कमजोर होने का संदेश जाएगा। पूर्व में कई निजी बैंकों का देश के बड़े बैंकों के साथ विलय किया गया था और इस बार भी ऐसा किया जा सकता था।

भारत में चाहे यस बैंक हो या आइडीबीआइ बैंक, सभी को अंतत: बचा लिया गया। भले ही वाणिज्यिक बैंकों को बचाया गया है, लेकिन इस मामले में सहकारी बैंक भाग्यशाली नहीं हैं। पंजाब एंड महाराष्ट्र को-आॅपरेटिव बैंक (पीएमसी) का संकट अभी भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। इस बैंक पर अभी भी निकासी की सीमा लगी हुई है। किसी भी कारोबार का असफल होना एक सामान्य बात है, लेकिन बैंकों में निवेशकों का पैसा लगा होने के कारण इनके असफल होने से आमजन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है, जिसे सामान्य तो कदापि नहीं माना जा सकता।

भारत में निजी बैंकों के असफल होने के एक जैसे कारण हैं। पूर्व के निजी बैंकों की तरह लक्ष्मी विलास बैंक ने भी अपनी बबार्दी की पटकथा खुद ही लिखी। बैंक ने सात सौ बीस करोड़ रुपए रैनबैक्सी के पूर्व प्रवर्तक मलविंदर सिंह और शिविंदर सिंह की कंपनियों में निवेश कर दिए थे और इसके बदले में बैंक ने गारंटी के तौर पर उनसे पैसे जमा करवाए थे। लेकिन मामला अदालत में जाने से बैंक का पैसा फंस गया। त्रुटिपूर्ण कारोबारी योजना, जरूरत से अधिक हस्तक्षेप करने वाले प्रवर्तक के होने, कमजोर निदेशक मंडल और कारोबारी निरंतरता के अभाव में बैंक की वित्तीय स्थिति बिगड़ती चली गई।

इसके अलावा कारपोरेट ऋण का दायरा बढ़ाने, वित्तीय अनियमितता बरतने, खुदरा कारोबार पर ध्यान नहीं देने आदि कारणों से भी बैंक की वित्तीय स्थिति बद से बदतर होती चली गई। इसीलिए पिछले साल सितंबर में रिजर्व बैंक ने इसे प्रांप्ट करेक्टिव एक्शन (पीसीए) या तत्काल वित्तीय सुधार की जरूरत वाले बैंकों की श्रेणी में डाल दिया था। किसी भी बैंक को पीसीए में तब रखा जाता है, जब उसका एनपीए बढ़ जाए, निवेश की गई संपत्ति पर प्रतिफल कम मिलने लगे।

लक्ष्मी विलास बैंक ने 30 जून 2020 को 0.17 प्रतिशत पूंजी पर्याप्तता अनुपात (सीएआर) और 1.83 प्रतिशत नकारात्मक टीयर-1 सीएआर दर्ज किया था। ये दोनों आंकड़े 31 मार्च 2020 को क्रमश: 1.12 प्रतिशत और 0.88 प्रतिशत नकारात्मक रहे थे। जबकि नियामकीय अनुपालन के लिए इसे क्रमश: 10.875 प्रतिशत और 8.875 प्रतिशत तो रहना जरुरी है। इसके अलावा विगत दस तिमाहियों से बैंक को नुकसान हो रहा था। बैंक की जमा राशि में भी कमी आ रही थी और कुल ऋण परिसंपत्तियों में बीस प्रतिशत से अधिक गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) में तब्दील हो चुकी थीं, जबकि मार्च 2017 में इसका एनपीए केवल 2.7 प्रतिशत था।

जिस तरह से निजी बैंक या सहकारी बैंक लगातार असफल हो रहे हैं, उससे नियामक की भूमिका पर भी सवाल उठने स्वाभाविक हैं। इसमें दो राय नहीं है कि बैंकिंग नियामक निजी और सहकारी बैंकों के कामकाज पर पैनी निगरानी रखने में असफल रहा है। निजी बैंक और सहकारी बैंकों में लालच के कारण भी निवेशक पैसा जमा करते हैं, क्योंकि ये बैंक ज्यादा ब्याज देने का वादा करते हैं और इस तरह निवेशक इनमें बारी रकम निवेश कर देते हैं।

अमूमन, ज्यादा ब्याज देने के प्रचार-प्रसार का जिम्मा बैंक नामचीन फिल्मी कलाकारों को देते हैं, जिससे आम निवेशकों का बैंक पर भरोसा अटूट हो जाता है। देश का केंद्रीय बैंक भी इन मामलों में निजी और सहकारी बैंकों पर नकेल नहीं कसता है। अगर बैंकों की निगरानी ठीक से नहीं हो पा रही है तो फिर नए बैंकों को लाइसेंस देने की क्या जरूरत पर भी सवाल खड़े होते हैं। वर्ष 1993 से वर्ष 2004 के बीच रिजर्व बैंक ने बड़ी संख्या में शहरी सहकारी बैंकों को लाइसेंस दिए। बाद में अनेक सहकारी बैंकों का विलय कर दिया गया। अकेले महाराष्ट्र में बहत्तर सहकारी बैंकों का विलय हुआ। वर्ष 2004 में एक हजार नौ सौ छब्बीस शहरी सहकारी बैंक थे, जो वर्ष 2018 में घट कर एक हजार पांच सै इक्यावन रह गए।

भारत में अभी भी बैंकों के असफल होने पर निवेशकों के हितों की रक्षा करने की ठोस व्यवस्था नहीं है। हालांकि पीएमसी घोटाले के बाद सरकार ने बैंक खाताधारकों को उनकी जमा राशि पर मिलने वाली गारंटी की सीमा को एक लाख से बढ़ा कर पांच लाख रुपए कर दिया था। लेकिन इस सीमा को भी पर्याप्त नहीं कहा जा सकता है, क्योंकि इससे सभी निवेशकों के हितों की सुरक्षा मुमकिन नहीं है। मौजूदा व्यवस्था में अगर किसी बैंक में ग्राहक ने दस लाख रुपए जमा किए हैं और किसी कारणवश बैंक डूब जाता है तो ग्राहक को सिर्फ पांच लाख रुपए ही मिलेंगे। ऐसे में बैंक में रखे आमजन के पैसे को सुरक्षित कैसे माना जा सकता है?

देखा जाए तो भारत में निजी और सहकारी बैंकों के विफलता के मामले सामान्य होते जा रहे हैं। इसका कारण देश में बैंक बड़े पैमाने पर थोक निधि के बजाय फंडिंग खुदरा जमाराशियों के जरिये करते हैं, जिसे दूसरे देशों में जोखिम के स्रोत के रूप में जाना जाता है। निजी और सहकारी बैंकों में आमतौर पर कारोबारी योजनाएं त्रुटिपूर्ण और जोखिमभरी होती हैं। बैंकिंग कामकाज में प्रवर्तकों का जरूरत से ज्यादा बढ़ता हस्तक्षेप कई गंभीर संकटों को जन्म देता है।

कई बार प्रवर्तक ही बैंक के प्रबंध निदेशक बन जाते हैं और अपनी मर्जी से बिना निदेशक मंडल की सहमति के बड़े कर्ज अपने परिचितों को दे देते हैं, जिनकी वसूली संदिग्ध होती है। नियामक द्वारा की जाने वाली कार्रवाई से बचने के लिए गलत आंकड़े भी पेश किए जाते हैं। जब बैंक दिए गए कर्ज की वसूली नहीं कर पाता है तो एनपीए में बढ़ोतरी होती है और इसका प्रभाव बैंक सकी बिगड़ती वित्तीय सेहत के रूप में सामने आता है।

अमूमन बैंक ग्राहकों द्वारा जमा राशि का इस्तेमाल कर्ज देने के लिए करते हैं। कर्ज वितरण से बैंक ब्याज कमाता है, लेकिन जब कर्ज एनपीए में तब्दील होने लगते हैं तो ब्याज की कमाई बंद हो जाती है और वह जमा पर ब्याज देने में असमर्थ हो जाता है। कई बार वित्तीय स्थिति के ज्यादा खराब होने से ग्राहकों का मूलधन भी डूब जाता है। बैंकों में जमा पैसों को सुरक्षित मानने के कारण ही आज बैंकों में एक सौ चालीस लाख करोड़ रुपए जमा हैं। लेकिन बैंकों के डूबने से ग्राहकों का विश्वास बैंकों पर से डगमगाने लगा है।

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