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राजनीति: शिक्षा का लक्ष्य और हासिल

आजाद भारत में हमने ढेरों शैक्षिक समितियां बनार्इं, राष्ट्रीय नीतियां बनार्इं, राष्ट्रीय शैक्षिक आयोग की स्थापनाएं कीं। लेकिन जो नहीं कर पाए वह यह है कि उन तमाम समितियों, आयोगों की सिफारिशों को अमल में नहीं ला पाए। यह वाकई त्रासद है कि ज्यादातर आयोगों और समितियों की रिपोर्टें और सिफारिशें रद्दी की टोकरी में डाल दी गईं। और इसकी वजह यही थी कि शिक्षा हमारी प्राथमिकता में कहीं नहीं है।

तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीकात्मक तौर पर किया गया है। (फाइल फोटो)

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति बने और उस पर शिद्दत से काम हो, इसे लेकर किसी किस्म की कोताही की गुंजाइश नहीं है। इससे भी किसी को कोई गुरेज नहीं होगा कि वर्तमान चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए पुरानी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में रद्दोबदल किया जाना चाहिए। जब पुरानी राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनी थी, तब की सांस्कृतिक, राजनीतिक, सामाजिक बुनावट और मांगे कुछ और थीं। जब हम 2018 में शिक्षा से उम्मीद और अपेक्षा की बात करते हैं, तब हमें पुरानी राष्ट्रीय शिक्षा नीति में परिवर्तन तो करने होंगे। गौरतलब हो कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनपीई) बनाने की घोषणा 2014-15 में ही की गई थी। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की मसविदा समिति की संस्तुतियां दो साल पहले सौंपी भी गई। लेकिन यह आश्चर्य है कि कैसे इसके पचास पन्ने मीडिया के माध्यम से शिक्षा समाज के हाथ लगे और आधी-अधूरी बहसें शुरू हो गर्इं। अब हर साल इसकी समय सीमा को टाला जा रहा है। इस माह से उस माह, इस साल से अगले साल का खेल बतौर जारी है।

शिक्षा को और शिक्षा की बेहतरी के लिए नसीहतें और राय देने वाले लाखों हैं। लेकिन उसके प्रति प्रतिबद्धता की खासी कमी भी रेखांकित है। समस्या यह है कि कोई भी शिक्षा से चुहल करने से बाज नहीं आता। शिक्षा पर बात हो और कोई अपनी राय और नसीहत न दे, यह कैसे हो सकता है। शिक्षा में यह कमी है, शिक्षा में यह नहीं हो रहा है, बच्चे पढ़ना लिखना नहीं सीख रहे हैं, शिक्षक ठीक से अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाते आदि-आदि। शिक्षा पर इस प्रकार की और ऐसी ही अन्य नसीहतें मिलती हैं और शिक्षा के माथे पर ऐसी नसीहतों की बिंदी जिसे जब मौका मिलता है, वह चेप देता है। बिंदी से एक कदम आगे बढ़ कर कहा जाए तो शिक्षा के माथे पर टिकुली लगाने वाली राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय एजंसियां भी बिलबलाई रहती हैं। सवाल यह उठ सकता है कि क्या इन कमियों में शिक्षा का कोई हाथ है? क्या शिक्षा अपनी प्रकृति के अनुसार ऐसी कुछ हरकतें कर सकती है? या फिर शिक्षा के कंधे पर सवार होकर कोई और अपने एजेंडा साधा करते हैं। संभावना इस बात की भी है कि शिक्षा पर होने वाले खर्च, उसके प्रबंधन, मानव श्रम और संसाधन की बेहतर उपयोगिता की दक्षता की कमी कहीं न कहीं शिक्षा और बच्चों को ही चुकानी पड़ती है। यदि आजादी के सत्तर सालों के बाद भी हमारी शिक्षा विकास और प्रगति के राह पर नहीं आ पाई, तो इसके लिए हम ही दोषी हैं। आजाद भारत में हमने ढेरों शैक्षिक समितियां बनार्इं, राष्ट्रीय नीतियां बनार्इं, राष्ट्रीय शैक्षिक आयोग की स्थापनाएं कीं। लेकिन जो नहीं कर पाए वह यह है कि उन तमाम समितियों, आयोगों की सिफारिशों को अमल में नहीं ला पाए। यह वाकई त्रासद है कि ज्यादातर आयोगों और समितियों की रिपोर्टें और सिफारिशें रद्दी की टोकरी में डाल दी गर्इं। और इसकी वजह यही थी कि शिक्षा हमारी प्राथमिकता में कहीं नहीं है।

शिक्षा के क्षेत्र में राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हमने कई समझौते किए। 1990, 2000, 2015 आदि में घोषणाएं कीं कि आने वाले वर्षों में हम अपने देश में सभी बच्चों को बुनियादी शिक्षा मुहैया करा देंगे। ऐसी घोषणाओं की लंबी कतार है जिनमें हम लगातार पिछड़ते ही जा रहे हैं। सन 1990 से लेकर 2000, 2015 तक वक्त में हमें अगली तारीख मुकर्रर करने के पहले अपनी कार्यप्रणाली पर मंथन करना चाहिए था। हमें हमारी रणनीतियों, नीतियों और उन पर अमल की गति की पहचान कर उन अड़चनों को दूर किया जाना था जिनकी वजह से पिछले सालों में हम शिक्षा के उद्देश्यों और घोषणाओं को पूरा नहीं कर पाए। अपनी असफलताओं से हमें कुछ सीखना भी था। उस ऐतिहासिक सीख से आगामी योजनाओं और नीतियों को अमल में लाया जाना था। लेकिन अफसोसनाक तल्ख हकीकत यही है कि घोषणाएं करने और मंचों पर तालियां बटोरने के अलावा हमने ठोस काम कुछ नहीं किया।

भारत के शिक्षा जगत की त्रासदी यह है कि हमने अपने विश्वविद्यालयों, कॉलेजों, स्कूलों आदि शैक्षिक संस्थानों को अपनी मौत मरने के लिए छोड़ दिया है। यह सिलसिला 1989 के आसपास शुरू हुआ था, जब हमने शिक्षा और शिक्षण संस्थानों को बाजार के हवाले करने का क्रांतिकारी कदम उठाया था। यही वह साल था जब शिक्षा के द्वार वैश्विक बाजार के लिए खोले गए थे। तब से शिक्षण संस्थानों को स्वायत्त व वित्त पोषित संस्थान बनाने की शुरुआत हुई। तमाम सरकारी शैक्षिक संस्थानों को अपने खर्च स्वयं निकालने के लिए प्रेरित और मजबूर किया गया। और देखते ही देखते विश्वविद्यालयों में प्रबंधन और व्यावसायिक पाठ्यक्रमों के विभाग खुलने लगे। मानविकी विभागों में सीटें खाली होने लगीं। इस प्रबंधन का मकसद सिर्फ और सिर्फ मानवीय श्रम और संसाधनों को प्रबंधित नहीं करना था, बल्कि शिक्षा में मिलने वाले आर्थिक सहयोग और आवंटित बजट को कैसे समझ और विवेक के साथ योजना बना कर खर्च किया जाना है, इसका भी प्रबंधन हमें सीखना था। लेकिन दुर्भाग्य कि इसमें हम पिछड़ते चले गए। हालांकि कोठारी आयोग ने 1964-66 में ही सकल घरेलू उत्पाद का छह फीसद शिक्षा पर देने की वकालत की थी, जो आज भी शिक्षा पर दी जा रही तय राशि से काफी कम है।

न तो नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति अभी तक आ सकी और न स्कूलों से बाहर खड़े करोड़ों बच्चे स्कूली तालीम हासिल कर पाए। हमने सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय शिक्षा अभियान शुरू किए, शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 लागू किया। लेकिन इनसे आखिरकार हासिल क्या हुआ? न तो स्कूली शिक्षा की स्थिति बेहतर हो पाई और न ही स्कूली शिक्षा के स्तर में ही हम गुणात्मक सुधार कर पाए। वैश्विक और राष्ट्रीय स्तर के अध्ययन रिपोर्ट हमें आईना दिखा रहे हैं कि देखिए देश के अधिकांश बच्चे भाषा की बुनियादी दक्षता भी हासिल नहीं कर सके। न उन्हें पढ़ना-लिखना आता है और न ही गणित के सामान्य गुणा-भाग, घटाव ही आते हैं। फिर सोचने वाली बात है कि हमने इतनी समितियां, आयोग, परामर्शमंडल बना कर उनकी सिफारिशों का क्या किया? क्या यह सीधे-सीधे शिक्षा और शिक्षण संस्थानों के साथ एक मजाक नहीं तो और क्या है। हमें तमाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट ताकीद करती हैं कि हमने शिक्षा पर करोड़ों रुपए खर्च किए, लेकिन उसके अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सके। क्या हमने इसके पीछे के कारणों को जानने और उन कमियों, चुनौतियों को दूर करने की कोशिश की? यदि हम इन्हें दूर कर लें तो संभव है आने वाले वर्षों में घोषित और तय शैक्षिक लक्ष्य को हासिल कर सकेंगे।

हमने सहस्राब्दी विकास लक्ष्य 2000 में तय किया था कि हम 2015 तक शिक्षा के मूलभूत मसलों को दूर कर अपने बच्चों को बुनियादी शिक्षा मुहैया करा देंगे। लेकिन यह 2015 भी हमारे हाथ से निकल गया। हमने 2016 में शिक्षा को सतत विकास लक्ष्य में शामिल किया कि 2030 तक हम अपने बच्चों को बुनियादी शिक्षा किसी भी सूरत में हासिल करा देंगे। इसमें हमने यह भी कहा कि कोई भी बच्चा जाति, वर्ण, वर्ग आदि के आधार पर स्कूल से बाहर नहीं रहेगा। लेकिन हम अपनी ही घोषणाओं को धता बताते रहे हैं। सरकारी और गैर सरकारी रिपोर्टें बताती हैं कि अभी भी तीन करोड़ से भी ज्यादा बच्चे स्कूल से बाहर हैं। हमारी गति और दिशा तय करेगी कि हम सतत विकास लक्ष्य को क्या इस बार हासिल करने वाले हैं या फिर इस बार दुबार इस तय समय सीमा को आगे खिसकाने वाले हैं।

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