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राजनीतिः कचरे के निपटारे की चुनौती

देश के अधिकतर शहरों में खड़े हो रहे ये कूड़े के पहाड़ स्वास्थ्य और सुरक्षा की दृष्टि से गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं। महानगरों में तो करीब चालीस फीसद आबादी कूड़े के पहाड़ों के आसपास मलिन बस्तियों में ही जिंदगी बसर करती है, जो अनगिनत बीमारियों के फैलने की मुफीद जगह है। आसपास फैले कचरे के कारण लोगों को न साफ पानी मिलता है न शुद्ध हवा मिलती है। नतीजतन, बेहतर जिंदगी की चाह में बड़े शहरों में आए लोगों की जिंदगी तकलीफदेह बन जाती है।
सार्वजनिक स्वच्छता हमारे आरोग्य से जुड़ा अहम पहलू है। इसीलिए हर नागरिक को यह जिम्मेदारी लेनी होगी कि वह कम से कम कचरा उत्पन्न करे।

एक हालिया अध्ययन के मुताबिक वर्ष 2047 तक भारत में कूड़े का ‘उत्पादन’ पांच गुना बढ़ जाएगा। इसका अर्थ है कि हमारा देश दुनिया भर में कूड़े का सबसे बड़ा उत्पादक बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है। यह बहुत चिंताजनक है, एक ऐसे देश में, जहां कूड़ा प्रबंधन पहले से ही बहुत बड़ी समस्या है। इतना ही नहीं, हमारे यहां पारंपरिक तरल और ठोस कूड़े के अलावा प्लास्टिक कचरा और ई-कचरा भी बड़ी समस्या बन चुका है। हमारे यहां न केवल घरेलू कचरा बल्कि उद्योगों से निकलने वाला अपशिष्ट भी एक व्यापक समस्या है। देश के महानगरों में ही नहीं, छोटे-छोटे कस्बों में भी कूड़े के पहाड़ खड़े हो रहे हैं। तरल कूड़ा जल-स्रोतों को दूषित कर रहा है तो ठोस अपशिष्ट बीमारियों और दुर्घटनाओं को न्योता देने वाला है।

कचरा प्रबंधन की असंतोषजनक स्थिति को चार साल पहले केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों ने भी सामने रखा था। इन आंकड़ों के मुताबिक भारत हर साल छह करोड़ टन से ज्यादा कचरे का उत्पादन कर रहा है। साथ ही, दिनोंदिन यह मात्रा बढ़ती जा रही है। विशेषकर देश के महानगरों में कचरे का उत्पादन अत्यधिक मात्रा में हो रहा है। इस छह करोड़ टन कचरे में से एक करोड़ टन कचरा तो केवल दिल्ली, मुंबई, चेन्नई, हैदराबाद, कोलकाता और बेंगलुरु जैसे महानगरों में पैदा होता है। देश की आर्थिक राजधानी मुंबई तो कचरा उत्पादन में सबसे अव्वल है। तकरीबन 6,500 मीट्रिक टन कचरा रोज पैदा करती है मुंबई। राजधानी दिल्ली तो प्रतिदिन 9000 मीट्रिक टन कचरा उत्पादन करती है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के आंकड़ों के मुताबिक हर साल चेन्नई शहर 16 लाख टन और कोलकाता 11 लाख टन कचरे का उत्पादन करते हैं। वहीं हैदराबाद 14 लाख टन कचरा हर साल पैदा कर रहा है। ये आंकड़े चिंतित करने वाले हैं। खासकर तब जब हमारे देश में आज भी कचरा निस्तारण की समुचित व्यवस्था नहीं है। सफाई के प्रति लोगों में जागरूकता और जिम्मेदारी का भाव नदारद है। ऐसे में देश के अधिकतर शहरों में खड़े हो रहे ये कूड़े के पहाड़ स्वास्थ्य और सुरक्षा की दृष्टि से गंभीर खतरा बनते जा रहे हैं।

भारत जैसे विकासशील देश में कचरे का निस्तारण एक बड़ी समस्या है। यही वजह है कि हमारे यहां सफाई करने से कहीं अधिक जरूरी काम कचरा उत्पादन में कमी लाने का है। लेकिन बदलती जीवनशैली में कचरा उत्पादन बढ़ ही रहा है। देखने में आ रहा है कि बीते कुछ सालों में प्लास्टिक का इस्तेमाल आम जीवन में भी काफी बढ़ा है। परंपरागत सामाजिक समारोहों के समापन के पीछे छूटा प्लास्टिक के सामानों का ढेर बताता है कि रहन-सहन के बदलाव ने भी कचरा उत्पादन में जमकर वृद्धि की है। ऐसे में हर स्तर पर बढ़ते कूड़े के उत्पादन के आंकड़े बताते हैं देश को स्वच्छ बनाने के लिए कचरे का सही निस्तारण किए जाने के साथ ही कचरे के उत्पादन को कम करना भी आवश्यक है। इसके लिए आमजन का सचेत होना भी जरूरी है और प्रशासन की सार्थक भागीदारी भी।
निस्संदेह यह चिंतनीय है कि भारत के सभी बड़े शहर आज कचरे के ढेर पर बैठे हैं। इसके चलते अनगिनत स्वास्थ्य समस्याएं जन्म ले रही हैं। अकेले उत्तर प्रदेश में ही प्रतिवर्ष 42 लाख टन कूड़े का उत्पादन हो रहा है। वर्ष 2014-15 में देश में 514 लाख टन ठोस कूड़ा निकला था, जिसमें से एकत्रित 91 प्रतिशत कूड़े में से मात्र 27 प्रतिशत का ही निपटारा किया जा सका, शेष 73 प्रतिशत को डम्पिंग साइट्स में दबा दिया गया। यह कचरे के निपटारे की उचित व्यवस्था नहीं है, क्योंकि इस तरह जमीन के नीचे पालीथीन कचरे को दबाना न केवल जमीन की उपजाऊ शक्तिको प्रभावित करता है बल्कि प्रदूषण का भी बड़ा कारण है। कचरे के ढेरों में जब-तब लगने वाली आग भी सेहत और सुरक्षा की दृष्टि से एक बड़ा खतरा बनती जा रही है।

आग से निकलने वाली जहरीली गैसें भी स्वास्थ्य को भयंकर नुकसान पहुंचाती हैं। यही वजह है कि कूड़ा प्रबंधन को लेकर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी भी आ चुकी है। देश की सर्वोच्च अदालत भी देश में ठोस कूड़ा प्रबंधन संबंधी नियमों को लागू न करने पर घोर आपत्ति व्यक्त करते यह कह चुकी है कि ‘एक दिन भारत कूड़े के ढेरों के नीचे दब जाएगा।’ विडंबना देखिए कि देश के महानगरों में तो करीब चालीस फीसद आबादी कूड़े के पहाड़ों के आसपास मलिन बस्तियों में ही जिंदगी बसर करती है, जो अनगिनत बीमारियों के फैलने की मुफीद जगह है। आसपास फैले कचरे के कारण लोगों को न साफ पानी मिलता है न शुद्ध हवा मिलती है। नतीजतन, बेहतर जिंदगी की चाह में बड़े शहरों में आए लोगों की जिंदगी तकलीफदेह बन जाती है।

हालांकि कचरे का नित बढ़ते जाना और निस्तारण का प्रश्न अब एक वैश्विक समस्या है। पर भारत जैसे विकासशील देश के लिए तो यह और भी बड़ी समस्या है। यह सबसे अधिक प्रहार देश के नागरिकों के स्वास्थ्य पर कर रही है। विचारणीय यह भी है कि हमारे यहां की स्वास्थ्य सुविधाएं भी उतनी प्रभावी नहीं हैं जितनी कि विकसित देशों में हैं। कचरे का उचित निस्तारण न होने के चलते पर्यावरण में हो रहे परिवर्तन के कारण प्राकृतिक प्रकोपों का दंश झेलना भी इंसान की नियति बनता जा रहा है। भारत में जो हालात हैं उन्हें एक बड़े खतरे की घंटी ही कहा जा सकता है। कुछ समय पहले आई विश्व बैंक, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया की विकास एजेंसियों की आकलन रिपोर्टों में भी यह बात कही गई है। इन रिपोर्टों में भारत में साफ-सफाई की माकूल व्यवस्था का अभाव बताया गया था।

गौरतलब है कि कचरे की यह बढ़ती समस्या देश को हर तरह से नुकसान ही पहुंचा रही है। इस परेशानी के कारण भारत को हर साल सकल घरेलू उत्पाद का करीब साढ़े छह फीसद गंवाना पड़ता है। जबकि सही ढंग से सोचा जाए तो पश्चिमी देशों की तरह कूड़ा निस्तारण एक अच्छा रोजगार साबित हो सकता है। इतनी बड़ी धनहानि के साथ ही कचरे की इस व्यापक समस्या के कारण देश को अतुलनीय जनहानि भी होती है। कितने ही लोग कचरे से बढ़ रहे प्रदूषण के चलते होने वाली बीमारियों के कारण असमय मौत के मुंह में जा रहे हैं। इतना ही नहीं, अब ये कूड़े के पहाड़ दुर्घटनाओं का भी कारण बन रहे हैं। बीते साल ही दिल्ली के गाजीपुर के पास धमाके के साथ कूड़े का पहाड़ ढहने से उसके निकट से गुजर रहे दो लोगों की उसके नीचे दब जाने से मृत्यु हो गई थी। इसके बाद कचरे की समस्या पर थोड़ी-बहुत चर्चा हुई और लगने लगा कि इस समस्या से निपटने की कारगर योजना बनाने की कोई ठोस पहल होगी। लेकिन कहीं कुछ नहीं हुआ, सब कुछ बदस्तूर पहले की तरह ही चल रहा है।

सार्वजनिक स्वच्छता हमारे आरोग्य से जुड़ा अहम पहलू है। इसीलिए हर नागरिक को यह जिम्मेदारी लेनी होगी कि वह कम से कम कचरा उत्पन्न करे। गंदगी फैलाने और जमा करने के हमारे रवैये में बड़ा बदलाव आए, ताकि इस धरती को कूड़े के ढेर में बदलने से बचाया जा सके। अपशिष्ट पदार्थों का उत्पादन कम करके ही धरती का प्राकृतिक स्वरूप बचाया जा सकता है। वरना कचरे के पहाड़ आने वाले समय में बड़ी मुसीबत साबित होंगे।

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