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रा‍जनीति: विकास में युवाओं की भूमिका

यदि शिक्षा, स्वास्थ्य एवं कौशल विकास में निवेश करके मानव संसाधन को मानव पूंजी में तब्दील कर दिया जाए तो निश्चय ही भविष्य में इसका बेहतर प्रतिफल मिलेगा। यदि मानव संसाधन का उचित दोहन और प्रबंधन नहीं किया जाता तो यही विकास में सबसे बड़ी बाधा भी उत्पन्न करता है।

youthसांकेतिक फोटो।

युवा किसी भी देश और समाज में बदलाव के मुख्य वाहक होते हैं। इतिहास गवाह है कि आज तक दुनिया में जितने भी क्रांतिकारी परिवर्तन हुए हैं, चाहे वे सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और वैज्ञानिक रहे हों, उनके मुख्य आधार युवा ही रहे हैं। भारत में भी युवाओं का एक समृद्धिशाली इतिहास है। प्राचीनकाल में आदिगुरु शंकराचार्य से लेकर गौतम बुद्ध और महावीर स्वामी ने अपनी युवावस्था में ही धर्म एवं समाज सुधार का बीड़ा उठाया था।

आचार्य कौटिल्य ने मगध की जनता को नंद वंश के शासन से मुक्ति दिलाने के लिए एक युवा चंद्रगुप्त मौर्य को अपना प्रमुख साधन बनाया था। पुनर्जागरण काल में राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ विवेकानंद जैसे युवा विचारक ने धर्म एवं समाज सुधार आंदोलन का नेतृत्व किया। स्वामी विवेकानंद ने तो शिकागो धर्म सम्मलेन (1893) में अपनी ओजस्वी भाषण शैली एवं विद्वता के बलबूते भारतीय धर्म-दर्शन की विजय पताका फहरा दी थी। उनके ओजस्वी भाषण के बाद पश्चिमी साम्राज्यवादी देशों के लोग भी भारतीय ज्ञान परंपरा से अचंभित हो गए थे।

आधुनिक काल में टीपू सुल्तान, रानी लक्ष्मीबाई, भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और नेताजी सुभाषचंद्र बोस जैसे युवा क्रांतिकारियों ने अंग्रेजों के दांत खट्टे कर दिए थे। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के आंदोलनों को सफल बनाने एवं उनके नेतृत्व में भारत को आजादी दिलाने में कई युवा नेताओं का भी योगदान रहा है। यदि आजादी से लेकर अब तक के सात दशकीय समकालीन भारत के इतिहास की बात की जाए तो इस काल में भी हुए कई आंदोलनों और परिवर्तनों का नेतृत्व युवाओं ने ही किया है। भारत को खाद्य उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने (हरित क्रांति) से लेकर परमाणु शक्ति संपन्न बनाने तक का जिम्मा युवा कंधों ने उठाया। कंप्यूटर क्रांति व नई आर्थिक नीति भी युवा मस्तिष्क की ही उपज थी।

यदि वर्तमान भारत की बात की जाए तो यह दुनिया का सबसे युवा देश है। जनसंख्या के आंकड़ों के मुताबिक भारत में पच्चीस वर्ष तक की आयु वाले लोग कुल जनसंख्या का पचास फीसद हैं, वहीं पैंतीस वर्ष तक वाले कुल जनसंख्या का पैंसठ फीसद हैं। यही कारण है कि इसे दुनिया भर में उम्मीद की नजरों से देखा जा रहा है और इक्कीसवीं सदी की महाशक्ति होने की भविष्यवाणी की जा रही है। युवा आबादी ही देश की तरक्की को रफ्तार प्रदान कर सकती है। जैसा कि भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था कि हमारे पास युवा संसाधन के रूप में अपार संपदा है और यदि समाज के इस वर्ग को सशक्त बनाए जाए तो हम बहुत जल्द ही महाशक्ति बनने के लक्ष्य को हासिल कर सकते हैं।

यह बात शत-प्रतिशत सत्य है कि बिना खनिज संसाधन के भी किसी देश का विकास हो सकता है, लेकिन बिना मानव संसाधन के देश के विकास के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हम जापान का ले सकते हैं, जिसने खनिज संसाधनों के अभाव के बावजूद अपने मानव संसाधन के दम पर विकास की इबारत लिखी और आज दुनिया की तीन बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। यदि भारत के राज्यों की बात की जाए तो बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओड़िशा जैसे राज्य संसाधनों के बावजूद पिछड़े हुए हैं, जबकि केरल, कर्नाटक जैसे राज्य विकास के मामले में आगे हैं।

यदि शिक्षा, स्वास्थ्य एवं कौशल विकास में निवेश करके मानव संसाधन को मानव पूंजी में तब्दील कर दिया जाए तो निश्चय ही भविष्य में इसका बेहतर प्रतिफल मिलेगा। यदि मानव संसाधन का उचित दोहन और प्रबंधन नहीं किया जाता तो यही विकास में सबसे बड़ी बाधा भी उत्पन्न करता है। उदाहरण के रूप में हम आतंकवाद, नक्सलवाद और उग्रवाद में संलिप्त युवाओं को ले सकते हैं। आतंकवाद, नक्सलवाद और उग्रवाद जैसे नकारात्मक तत्व भी अपने मंसूबों को अंजाम देने के लिए युवाओं को ही अपना माध्यम बनाते हैं।

आतंकवाद के लिए जम्मू-कश्मीर का उदहारण ले सकते हैं जहां के युवाओं को बरगला कर आतंकवादी अपने नापाक मंसूबों को अंजाम देते रहे हैं। अस्सी के दशक में पंजाब भी ऐसे ही संकट से जूझ रहा था। पश्चिम बंगाल, छतीसगढ़ और झारखंड जैसे राज्यों में फैला नक्सलवाद भी युवाओं के कंधों पर ही बंदूक रख कर अपना निशाना साध रहा है।

पूर्वोत्तर में यही हाल है। देश में तेजी से फैलता नशाखोरी का जाल भी युवाओं को अपने चपेट में ले रहा है जिसमें पंजाब का उदाहरण प्रमुख है। ऐसी मुश्किल स्थिति में युवाओं को उपयुक्त मार्गदर्शन की अति आवश्यकता है। भारत की युवाशक्ति को सकारात्मक कार्यों में प्रयुक्त करने की जरूरत है। आवश्यकता है ऐसे प्रेरणा स्रोतों एवं पथ-प्रदर्शकों की, जो युवा पीढी को सकारात्मक और बेहतर रास्ता दिखा सकें।

युवाओं के दिग्भ्रमित होने और गलत रास्ते पर जाने का एक कारण लोग बेरोजगारी को मानते हैं। लेकिन युवाओं को अपनी ये मानसिकता बदलनी होगी कि सरकारी नौकरी ही रोजगार का एकमात्र जरिया है। भारतीय समाज में यह आमधारणा है कि सरकारी नौकरी ही जीवन की सफलता का पैमाना है। समाज के लोगों को इस धारणा को बदलना होगा।

उदारीकरण एवं सूचना क्रांति के आधुनिक युग में रोजगार एवं स्वरोजगार की संभावनाओं की कमी नहीं है। इसका उदाहरण अमेरिका और यूरोपीय देशों से ले सकते हैं जहां युवा इन संभावनाओं का भरपूर लाभ ले रहे हैं। भारत में भी गुजरात का उदाहरण ले सकते हैं जहां लोगों ने उद्यमशीलता के बूते स्वयं को और देश के अन्य लोगों को भी रोजगार प्रदान कर सक्षम बनाया है।

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है। इसके बावजूद यहां राजनीति में युवाओं की भागीदारी बेहद कम है। अक्सर देखा गया है कि राजनीति को लेकर युवाओं में नकारात्मकता का भाव होता है, इसलिए वे राजनीति में नहीं आना चाहते। लेकिन उन्हें यह समझना चाहिए कि जब तक वे राजनीति में भागीदारी नहीं करेंगे, तब तक राजनीति से नकारात्मकता दूर नहीं होगी। भारतीय संविधान ने अठारह साल से अधिक उम्र के युवाओं को मतदान का अधिकार दिया हुआ है। ऐसे में युवाओं की भूमिका काफी अहम हो जाती है।

इसके अलावा युवाओं को बेहतर मानव संसाधन में बदलने के लिए शिक्षा व्यवस्था में भी सुधार की जरूरत है। देश के विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में अभी भी परंपरागत तरीके से ही पढ़ाई हो रही है। इस कारण हमारे विश्वविद्यालय वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़े हुए हैं। शिक्षा व्यवस्था का सबसे बड़ा दोष अभी भी यह है कि प्राप्तांकों को बहुत महत्त्व दिया जाता है जिसकी वजह से बच्चों में रटने की प्रवृत्ति हो जाती है और उनमें मौलिकता एवं रचनात्मकता का विकास नहीं हो पाता है। यही कारण है कि हम नवाचार एवं नवोन्मेष में पिछड़े हुए हैं। इसके लिए हमें शिक्षा के प्राथमिक एवं उच्च दोनों ही स्तर पर सुधार के प्रयास करने होंगे।

जहां तक बात है शोध और अनुसंधान के क्षेत्र की, तो इसकी स्थिति भी अच्छी नहीं है। ऐसा नहीं है कि देश में प्रतिभाओं की कमी है। देश के ही युवा जब अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस जैसे देशों में जाते हैं तो वहां अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाते हैं और नोबेल जैसे प्रतिष्ठित पुरस्कार भी पाते हैं।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में तो भारत के युवाओं का डंका पूरी दुनिया में बज रहा है, लेकिन प्रतिभा-पलायन की वजह से हम उनका लाभ नहीं ले पा रहे हैं। हमें यह समझना होगा कि युवाओं की तरक्की से ही देश होगी। जिस दिन राजनीति से लेकर प्रशासन तक, समाज से लेकर विज्ञान तक, खेल से लेकर कारोबार तक युवाओं की भागीदारी बढ़ेगी, उस दिन देश का भविष्य उतना ही उज्ज्वल होगा।
(लेखक उत्तराखंड के पुलिस महानिदेशक हैं।)

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