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राजनीतिः अमीरी की मार झेलते गरीब

आर्थिक असमानता देश में गरीबी और लोगों की निराशा में वृद्धि करती है। इसके कारण निजीकरण बढ़ने से शोषण को बढ़ावा मिलता है, कम मजदूरी मिलती है, कृषि सुधार लागू कर पाना और धन का पुनर्वितरण संभव नहीं हो पाता है। रोजगार में कमी और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों की अनदेखी होती है। नई बाजार व्यवस्था से सरकार की कल्याणकारी योजनाएं भी गरीबी को कम करने के बजाय उसका दिखावा करने पर केंद्रित हो जाती हैं।

Author Published on: September 20, 2018 3:26 AM
वर्ल्ड इक्वीलिटी लैब के अध्ययन के अनुसार भारत में आर्थिक असमानता 1980 के बाद से लगातार बढ़ रही है।

देवेंद्र जोशी

देश के करीब छह करोड़ छब्बीस लाख से ज्यादा आयकर दाताओं में से सिर्फ दो सौ बहत्तर हैं जिनकी आमदनी पांच सौ करोड़ रुपए सालाना से अधिक होगी। देश में पांच फीसद लोगों की आय शेष पिनच्यानवे फीसद लोगों से ज्यादा है। 1912 में इतालवी अर्थशास्त्री कोरेडजिनी ने आर्थिक असमानता मापने का जो पैमाना बनाया था, उसके अनुसार भारत की गैर-बराबरी 2013 में अड़तालीस अंकों तक थी, जो 2016 में बढ़ कर तिरसठ अंक तक पहुंच गई। हकीकत यह है कि देश में आज भी बड़ी आबादी के पास तन ढंकने के लिए कपड़ा, पेट भरने के लिए रोटी और सर छुपाने के लिए आवास नहीं है। शिक्षा, स्वास्थ्य, मनोरंजन जैसी न्यूनतम व्यवस्था आज भी इस तबके के लिएबड़ा सपना है। आर्थिक विकास दर को देश की प्रगति का पैमाना मानने वालों को समझना होगा कि तेज आर्थिक विकास दर के बावजूद पिछले डेढ़ दशक में देश में गरीबी में उम्मीद से काफी कम गिरावट आई है। इसकी वजह रोजगार विहीन विकास है।

इस साल की ऑक्सफेम रिपोर्ट के आंकड़े भारत की आर्थिक असमानता को दर्शाते हुए बताते हैं कि साल 2017 में एक फीसद अमीरों का देश की कुल अर्जित संपत्ति के तिहत्तर फीसद हिस्से पर कब्जा रहा। आश्चर्य और अफसोस की बात तो यह है कि इन एक फीसद लोगों की आय में एक साल में बीस लाख करोड़ रुपए की बढ़ोतरी हुई, जो देश के 2017-18 के बजट के बराबर है। इससे भी ज्यादा चौंकाने वाली बात यह है कि एक ही साल में इन अमीरों ने देश की कुल सालाना अर्जित संपत्ति में अपना कब्जा जमाने में तेरह फीसद की छलांग लगाई। यानी 2016 में जहां एक फीसद अमीरों का कुल आय के अट्ठावन फीसद हिस्से पर कब्जा था, वह 2017 में बढ़ कर तिहत्तर फीसद हो गया। ये आंकड़े बताते हैं कि भारत में अमीर कितनी तेजी से अमीर और गरीब कितनी तेजी से गरीब बनते जा रहे हैं।

ऐसा नहीं है कि यह अमीरी-गरीबी में असमानता सिर्फ भारत में बढ़ रही है। दुनिया के कई देशों की हालत ऐसी ही है। विश्व की कुल अर्जित संपत्ति के बयासी फीसद हिस्से पर सिर्फ एक फीसद लोगों का कब्जा है। लेकिन भारत में यह स्थिति तब चिंताजनक बन जाती है जब देश की आर्थिक प्रगति का लाभ सबको न मिल कर मुट्ठी भर अमीरों को मिल रहा हो। अमीरों की आय में वृद्धि आर्थिक असमानता की सूचक है। आर्थिक न्याय सामाजिक न्याय की नींव है। आर्थिक न्याय के बिना सामाजिक न्याय की कल्पना संभव नहीं है। आर्थिक असमानता उस घुन की तरह है जो अंदर ही अंदर भारतीय समाज को खोखला बनाती जा रही है। इससे उबरने का एक ही उपाय है, और वह यह कि वंचित वर्ग को अच्छी शिक्षा, अच्छा रोजगार उपलब्ध कराते हुए सुदूरवर्ती गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ना। सवाल है कि आखिर क्यों हम दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बंगलूर, अमदाबाद, पुणे और हैदराबाद की तरह अन्य शहरों, कस्बों और गांवों का विकास करने में असफल हो रहे हैं? संसाधनों की दृष्टि से भारत एक अमीर देश है। आज जहां देश में एक तरफ विलासिता की वस्तुओं पर बेतहाशा पैसा बहाने वाले अमीरों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है, वहीं आज भी आबादी का एक बड़ा फीसद बिजली, पानी, सड़क, स्वास्थ्य जैसी बुनियादी समस्याओं के लिए जूझ रहा है। महानगर अगर दूधिया रोशनी से जगमग हैं तो आबादी का बड़ा हिस्सा ऐसा भी है जो आज भी लालटेन और ढिबरी युग में जीने को मजबूर है।

वर्ल्ड इक्वीलिटी लैब के अध्ययन के अनुसार भारत में आर्थिक असमानता 1980 के बाद से लगातार बढ़ रही है। 1982-83 में अमीरों की आय में एक फीसद की वृद्धि हुई थी, जो सन 2000 में बढ़ कर पंद्रह फीसद और 2014 में तेईस फीसद हो गई। प्रसिद्ध अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी और लुकास चांसलर की एक रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार भारत में 1922 में जब आयकर लगाया गया था, उसके बाद से वर्तमान में आय की असमानता सबसे उच्चतम स्तर पर है। यानी आज गरीब-अमीर के बीच की खाई जितनी ज्यादा है, उतनी तो अंग्रेजों के जमाने में भी नहीं थी। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जब आय असमानता गंभीर रूप से उच्चतम स्तर पर पहुंच जाती है तो उदार आर्थिक सुधारों के लिए समर्थन कम हो जाता है। वहीं दूसरी ओर यह भी सच है कि तेज आर्थिक विकास के बिना गरीबी से पार पाना संभव नहीं है। ऐसे में आवश्यक है कि आर्थिक सुधारों की रूपरेखा इस तरह तय की जाए की असमानता कम हो। अमीरों के पास संपत्ति बढ़ने का मतलब उनके एक बड़े हिस्से का अनुत्पादक होकर अर्थव्यवस्था से बाहर हो जाना है। यह संपत्ति उपभोग, उत्पादन, रोजगार, विकास दर किसी को बढ़ाने में काम नहीं आती। पूंजी के निर्बाध प्रवाह के बावजूद लाभ सिर्फ अमीरों को पहुंचना अर्थशास्त्रियों के लिए चिंता का विषय है।

आर्थिक असमानता देश में गरीबी और लोगों की निराशा में वृद्धि करती है। इसके कारण निजीकरण बढ़ने से शोषण को बढ़ावा मिलता है, कम मजदूरी मिलती है, कृषि सुधार लागू कर पाना और धन का पुनर्वितरण संभव नहीं हो पाता है। रोजगार में कमी और सामाजिक सुरक्षा कार्यक्रमों की अनदेखी होती है। नई बाजार व्यवस्था से सरकार की कल्याणकारी योजनाएं भी गरीबी को कम करने के बजाय उसका दिखावा करने पर केंद्रित हो जाती हैं। सरकार की प्राथमिकता कमजोर तबके को आत्मनिर्भर बनाने के स्थान पर उसे जीवित रखने तक सीमित होकर रह जाती हैं। यही वजह है कि आर्थिक विषमता को कल्याणकारी राज्य की सबसे बड़ी विडंबना माना गया है।

रूस के बाद भारत दुनिया का सबसे अधिक आर्थिक असमानता वाला देश है। असमानता के मामले में भारत ने अमेरिका को भी पीछे छोड़ दिया है, जहां कुल राष्ट्रीय आय के 37.3 फीसद पर सिर्फ एक फीसद लोगों का कब्जा है। वित्तीय मामलों की कंपनी क्रेडिट सूइस के अनुसार भारत में पिनच्यानवे फीसद लोगों की संपत्ति पांच लाख तीस हजार रुपए या उससे कम है। आंकड़े बताते हैं कि भारत में धन-दौलत तो तेजी से बढ़ रही है, अमीरों और मध्य वर्ग की संख्या भी बढ़ रही है, लेकिन इस विकास में हर कोई हिस्सेदार नहीं है और भारत में गरीबी एक बड़ी समस्या है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक भारत में पिछले डेढ़ दशक में अरबपतियों की संपत्ति में बारह गुना वृद्धि हुई है। यह इतनी संपत्ति है कि इससे भारत की गरीबी दो बार दूर की जा सकती है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि विगत कुछ वर्षों में भारत और चीन में जिस तरह से वित्तीय असमानता बढ़ी है, अगर उसे नहीं रोका गया तो इन देशों में सामाजिक टकराव बढ़ने का खतरा तेजी से बढ़ेगा।

इन रिपोर्टों और अध्ययनों से साफ है कि तीव्र आर्थिक विकास वृद्धि दर के बावजूद देश में दो भारत बने हुए हैं, जिनके बीच खाई लगातार गहरी होती जा रही है। यह उन नव उदारवादी आर्थिक नीतियों के कारण हो रहा है, जिनका सबसे ज्यादा जोर तीव्र आर्थिक वृद्धि दर से पैदा हो रही आय के न्यायपूर्ण बंटवारे के बजाय सिर्फ तीव्र आर्थिक वृद्धि पर है। लेकिन तीव्र आर्थिक वृद्धि के दावों के पीछे इस सच्चाई को लंबे समय तक छुपाया नहीं जा सकता कि भारत तेजी से एक असमान और विषमतापूर्ण राष्ट्र बनता जा रहा है और गरीबों को इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। आर्थिक असमानता से मुक्ति पाने का एक ही उपाय है- गांधीजी के जीवन और आदर्श की ओर लौटना। गांधीजी के अनुसार लोकतंत्र विभिन्न वर्गों के लोगों के लिए सभी भौतिक, आर्थिक और आध्यात्मिक संसाधनों को सार्वजनिक हित में लगाने की कला और विज्ञान है। लेकिन दुर्भाग्य कि गांधीजी के नैतिक मापदंडों का उन्हीं के साथ लोप हो गया।

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