बेहतर सेवाएं देने की चुनौती

भारत की दो सौ से अधिक आइटी कंपनियां दुनिया के अस्सी से ज्यादा देशों में काम कर रही हैं। इस समय भारतीय आइटी उद्योग में रोजगार के अवसर भी तेजी से बढ़ रहे हैं। दूरसंचार मंत्रालय के मुताबिक भारत में बीपीओ क्षेत्र में करीब चौदह लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है।

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सांकेतिक फोटो।

जयंतीलाल भंडारी

भारत दुनिया के पसंदीदा वैश्विक सेवा प्रदाता केंद्र के रूप में उभरा है। कई क्षेत्रों में दूसरे देश भारत से सेवाएं ले रहे हैं, खासतौर से सूचना तकनीक (आइटी) और विनिर्माण के क्षेत्र में दूसरे देशों द्वारा भारत में काम करवाने (आउटसोर्स) का कारोबार तेजी से बढ़ा है। सरकार ने भी देश को वैश्विक सेवा प्रदाता केंद्र बनाने के लिए नीतिगत प्रोत्साहनों की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। लेकिन अभी इस दिशा में कई चुनौतियां हैं। पहली तो यह कि देश में सेवा प्रदाता उद्योग का बुनियादी ढांचा कमजोर है। दूसरा, इस उद्योग के लिए कृषि, स्वास्थ्य, शिक्षा, कौशल, फोन व अन्य दूरसंचार माध्यमों के जरिए चिकित्सा एवं अन्य नए तकनीकी समाधानों की कमी है। तीसरी चुनौती सेवा प्रदाता उद्योग के लिए जरूरी नई प्रौद्योगिकी, कृत्रिम मेधा, मशीनी मानव और आभासी तकनीकी आदि से सुसज्जित प्रतिभाओं की कमी है। कोसेर्रा ने अपनी रिपोर्ट ‘ग्लोबल स्किल्स रिपोर्ट 2021’ में बताया है कि भारत वैश्विक स्तर पर कौशल में बहुत पीछे यानी सड़सठवें स्थान पर है। चौथी चुनौती चीन से मुकाबले की है जो वैश्विक सेवा प्रदाता कीरोबार में भारत को पीछे करने के लक्ष्य के साथ तेजी से आगे बढ़ रहा है।

गौरतलब है कि इस साल 23 जून को सरकार ने भारत के बीपीओ (बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग) उद्योग को बढ़ावा देने के मकसद से महत्त्वपूर्ण फैसले किए। सरकार ने बीपीओ यानी टेलीफोन के जरिए ग्राहकों को सेवा देने वाले क्षेत्रों के लिए दिशानिर्देश को सरल, स्पष्ट और उदार बनाया है। इसके तहत घरेलू और अंतरराष्ट्रीय इकाइयों के बीच अंतर को समाप्त कर दिया गया है और अन्य सेवा प्रदाताओं (ओएसपी) के बीच जुड़ाव की अनुमति सहित कई विशेष रियायतें दी हैं। ओएसपी से आशय ऐसी कंपनियों या इकाइयों से हैं जो दूरसंचार संसाधनों का उपयोग कर आइटी युक्त सेवाएं, कॉल सेंटर या अन्य प्रकार की सेवाएं दे रही हैं। इसमें फोन से मार्केटिंग, टेलीमेडिसिन आदि सेवाएं शामिल हैं। ऐसे नए दिशानिदेर्शों से बीपीओ के तहत ज्यादा कारोबार सुगमता सुनिश्चित हो सकेगी, नियामकीय स्पष्टता आएगी, लागत कम होगी और संसाधनों का बेहतर उपयोग हो सकेगा।

आउटसोर्सिंग का मतलब रिसी भी काम को उद्योग-कारोबार संस्थान के परिसर के बाहर देश या विदेश में कहीं भी किफायती दरों पर संपन्न करवाने से है। यह सूचना प्रौद्योगिकी के विकास से ही संभव हो सका है। यह माना जा रहा है कि अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा सहित दुनिया के कई देश आइटी, वित्त, चिकित्सा, बीमा, बैंकिंग, शिक्षा आदि ऐसे कई क्षेत्रों में भारी मात्रा में बचत राशि हासिल करने में सिर्फ इसलिए कामयाब हुए हैं क्योंकि वे अपना ज्यादातर कामकाज भारत सहित कुछ दूसरे देशों से करवा रहे हैं। दरअसल, पश्चिमी और यूरोपीय देशों में श्रम लागत भारत की तुलना में कई गुना महंगी है। इससे किसी भी सेवा की लागत बढ़ जाती है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय एजेंसियों की रिपोर्टों में भी यह बात उभर कर आई है कि कोविड-19 के मद्देनजर अमेरिका सहित विकसित देशों की अर्थव्यवस्था के विकास में उद्योगों की उत्पादन लागत घटाने के लिए बाहर से ही काम करवाना फायदेमंद माना जा रहा है।

दूसरे देशों के काम का ठेका लेने और उन्हें सेवाएं देने के मामले में भारत के अग्रणी रहने के कई कारण हैं। दूरसंचार उद्योग के निजीकरण के बाद नई कंपनियां बाजार में आईं और प्रतिस्पर्धा बढ़ी। इसका परिणाम यह हुआ कि दूरसंचार दरों में भारी गिरावट आई। उच्च कोटि की त्वरित सेवा, आइटी विशेषज्ञ और अंग्रेजी भाषा में पारंगत युवाओं की बड़ी संख्या ऐसे कारण हैं, जिनकी बदौलत भारत पूरे विश्व में सेवाएं देने वाले देश के रूप में स्थापित हो चुका है। महामारी के दौरान घर से काम और स्थानीय तौर पर नियुक्तियों पर जोर दिए जाने से भारत की प्रमुख आइटी कंपनियों का कार्बन उत्सर्जन घटना भी भारत के लिए लाभप्रद हो गया। जहां कार्बन उत्सर्जन में कमी के आधार पर भी सेवा प्रदाता कारोबार में भारी वृद्धि की संभावनाएं बनीं, वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन के सत्ता में आने के बाद भारत को अमेरिकी कंपनियों से काम मिलने की संभावनाएं बढ़ी हैं। अमेरिका का उद्योग-कारोबार कोरोना की चुनौतियों के बाद आगे बढ़ने के लिए भारत से ठेके पर ज्यादा से ज्यादा से काम कराने को उत्सुक दिखाई दे रहा है।

गौरतलब है कि भारत की दो सौ से अधिक आइटी कंपनियां दुनिया के अस्सी से ज्यादा देशों में काम कर रही हैं। इस समय भारतीय आइटी उद्योग में रोजगार के अवसर भी तेजी से बढ़ रहे हैं। दूरसंचार मंत्रालय के मुताबिक भारत में बीपीओ क्षेत्र में करीब चौदह लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिला हुआ है। भारत के बीपीओ उद्योग का आकार 2019-20 में 37.6 अरब डॉलर (करीब 2.8 लाख करोड़ रुपए) का था, जो 2025 तक 55.5 अरब डॉलर (करीब 3.9 लाख करोड़ रुपए) के स्तर पर पहुंचने की उम्मीद है। दूसरे देशों को ठेके पर सेवाएं मुहैया कराने वाला भारत का यह क्षेत्र विदेशी निवेशकों के लिए भी आकर्षण का बड़ा कारण बन गया है। इस कारोबार के बुनियादी आधार कंप्यूटर सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआइ) का प्रवाह तेजी से बढ़ा है। पिछले वित्त वर्ष 2020-21 के पहले नौ महीनों में (अप्रैल-दिसंबर) इस क्षेत्र में एफडीआइ का प्रवाह करीब चार गुना होकर 24.4 अरब डॉलर पर पहुंच गया। इसके पूर्ववर्ती वित्त वर्ष की समान अवधि में इस क्षेत्र में यह सिर्फ 6.4 अरब डॉलर रहा था। यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि वैश्विक स्तर पर इस क्षेत्र में जो बड़ा बदलाव आया है, उसके मद्देनजर देश के सेवा प्रदाता उद्योग को फायदा पहुंचाने के लिए सरकार ने उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजना को आइटी हार्डवेयर तक विस्तारित किया है।

देश को वैश्विक सेवा का बड़ा केंद्र बनाने के लिए संचार के ढांचे को और मजबूत बनाने की जरूरत है। साथ ही हवाई अड्डा, सड़क और बिजली जैसे बुनियादी संसाधनों का भी तेजी से विकास करना होगा। सेवा प्रदाता उद्योग के लिए कृषि, स्वास्थ्य, फोन पर चिकित्सा, शिक्षा और कौशल के क्षेत्र से संबंधित नए तकनीकी समाधान बनाने होंगे। साथ ही इस क्षेत्र को यह रणनीति बनाना होगी कि किस तरह के काम दूसरे स्थानों से किए जा सकते हैं और कौनसे काम कार्यालय से करवाए जा सकते हैं। अब इस सेवा प्रदाता उद्योग को महानगरों की सीमाओं के बाहर छोटे शहरों और कस्बों में भी ले जाने की जरूरत है। भारत के नए छोटे कारोबारों के संस्थापकों को भी वैश्विक स्तर के उत्पाद बनाने पर ध्यान देना होगा, जिससे सेवा क्षेत्र में वैश्विक प्रतिस्पर्धा में जगह बनाई जा सकेगी। सेवा प्रदाता कारोबार को बढ़ाने के लिए प्रतिभा निर्माण पर जोर देना होगा। तकनीकी रूप से दक्ष लोगों की उपलब्धता बनाए रखनी होगी। नई पीढ़ी को आइटी की नए दौर की शिक्षा देने के लिए समुचित निवेश की व्यवस्था करना होगी। नई पीढ़ी को शोध, नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के मापदंडों पर आगे बढ़ाना होगा। कृत्रिम मेधा, रोबोट तकनीक, इंटरनेट, डाटा विश्लेषण, क्लाउड कंप्यूटिंग और ब्लॉक चेन जैसे क्षेत्रों में बड़ी संख्या में युवाओं को कुशल बनाना होगा। तभी अमेरिकी बाजार के साथ-साथ यूरोप और एशिया प्रशांत क्षेत्र के देश अपने काम के लिए भारत की ओर बढ़ेंगे। वैश्विक सेवा प्रदाता बनने से देश में रोजगार बढ़ेंगे और विदेशी मुद्रा की कमाई भी बढ़ेगी और देश की अर्थव्यवस्था नई ऊंचाइयां छू सकती है।

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