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जल संकट की आहट

आज हालत यह है कि महाराष्ट्र के छत्तीस में से छब्बीस जिले सूखे का संकट झेल रहे हैं और इस कारण करीब बयासी लाख किसानों की जान सांसत में है। तमिलनाडु का विलिक्कट जिला जल संकट से जूझ रहा है। स्वर्ण खदानों के लिए प्रसिद्ध कर्नाटक के कोलार जिले में भी हालत अच्छी नहीं है। बंगलुरू खुद भविष्य में एक बड़े जल संकट के कगार पर खड़ा है।

Author April 13, 2019 2:07 AM
गर्मियों का मौसम शुरू होते ही देश के अनेक हिस्सों से जल संकट की खबरें सामने आना शुरू हो गई हैं।

अतुल कनक

गर्मियों का मौसम शुरू होते ही देश के अनेक हिस्सों से जल संकट की खबरें सामने आना शुरू हो गई हैं। पिछले कुछ सालों में जिस तरह से राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना सहित देश के कई हिस्सों में पेयजल की उपलब्धता और प्रबंधन प्रशासन की समस्या बनी हुई है। जल संकट के ही कारण 2017 में गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान वलसाड विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं ने और 2018 में मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव के दौरान जाबेरा विधानसभा क्षेत्र के मतदाताओं ने पानी के प्रबंधन और उपलब्धता को मुद्दा बनाया था। भारतीय गणतंत्र की आवश्यकताओं को देखते हुए यह बात अटपटी लगती है कि जल प्रबंधन के प्रति हम अब भी सचेत और संवेदनशील नहीं हैं। भले ही पानी अभी किसी बड़े युद्ध का कारण बनता प्रतीत नहीं हो रहा हो, लेकिन पानी की उपलब्धता को लेकर दुनिया भर में जताई जा रही चिंताएं और देश के विभिन्न हिस्सों में जब-तब होने वाले संघर्ष स्थिति की गंभीरता को तो रेखांकित करते ही हैं।

पिछले वर्ष शिमला के जल संकट ने सबको चेताया था। शिमला के इस संकट से उत्तराखंड जैसे नदियों वाले राज्य में भी जलसंकट की स्थिति को समझा जा सकता है। स्थिति यह थी कि सरकारी पानी की टंकी के चौकीदार को वाल्व खोलने के लिए भी पुलिस सुरक्षा में जाना पड़ता था। पश्चिमी राजस्थान के मरुस्थलीय इलाकों में तो लंबे समय से पानी की टंकियों को तालों की सुरक्षा में रखा जाता है। पानी की इस सतत किल्लत का एक लाभ यह अवश्य हुआ है कि पश्चिमी राजस्थान की जीवनशैली में जल संरक्षण की परंपराएं खूब फली-फूली हैं। जहां एक मटकी पानी पाने के लिए भी जी-तोड़ मेहनत करनी होती हो, वहां फिर पानी की एक-एक बूंद का महत्त्व सहज ही समझा जा सकता है। जैसलमेर के गढ़सीसर तालाब को रियासती काल में भी वर्षा के पहले श्रमदान के माध्यम से साफ किया जाता था। रियासत काल में तो राजपरिवार के सदस्य भी इस श्रमदान में भाग लेते थे। एक तालाब की सफाई भी किसी संवेदनशील समाज के लिए बड़े उत्सव का कारण कैसे हो जाती है, इसका अनुमान गढ़सीसर तालाब में श्रमदान के समय लोगों के उत्साह को देख कर लगाया जा सकता है। इस तालाब में केवल उस श्रमदान के समय ही लोगों को स्नान करने की अनुमति थी। शेष समय तालाब के संचित जल को समाज की एक पवित्र धरोहर के तौर पर संचित रखा जाता है।

राजस्थान और गुजरात में पसरे मरुस्थल के कारण हालात कितने भयावह होंगे, इसका अनुमान भी सहज ही लगाया जा सकता है। परिवार की प्यास बुझाने लायक पानी जुटाने के लिए महिलाओं को आग बरसाती गर्मी में कई किलोमीटर रोजाना पैदल चलना पड़ता है। दक्षिण-पूर्वी राजस्थान में चंबल, काली सिंध, परवन, पार्वती सहित कई छोटी-छोटी नदियां बहती हैं। लेकिन जल के अंधाधुंध दोहन ने भूजल स्तर को इतना नीचे पहुंचा दिया है कि नदियों के किनारे के गांवों में भी कुंए सूख गए हैं। इस अंचल में ही क्या, देश के अनेक हिस्सों में छोटी-छोटी नदियां या तो नालों की शक्ल ले चुकी हैं या दम तोड़ चुकी हैं। बिहार में कभी ऐसी छह सौ से अधिक जलधाराएं थीं जिन्हें आम बोलचाल की भाषा में छोटी नदी कहा जाता है। ये जलधाराएं बरसात का पानी स्वयं में संचित कर लोगों को वर्षपर्यंत जरूरत का जल उपलब्ध करवाती थीं। लेकिन आज इनमें से अधिकांश जलधाराएं लुप्त हो गई हैं या गंदे नाले में बदल गई हैं। लाखनदेई, नून, बालन, कदाने, सकरी, तिलइया, धाधार, छोटी बागमती सौरा जैसी नदियों को कभी पूरे उफान पर बहते हुए देखने वाली पीढ़ी अभी भी मौजूद है। लेकिन नदियां अब अपना वैभव खो चुकी हैं। गया की फालगु नदी का तो विशिष्ट महत्त्व है। इसके किनारे देश भर के श्रद्धालु अपने पुरखों का पिंडदान करने के लिए जाते हैं। लेकिन यह नदी भी आज अपनी दुर्दशा पर आंसू बहाती प्रतीत होती है।

गंगा का प्रदूषण बार-बार बड़ा मुद्दा बनता है। लेकिन देश की अन्य नदियों को भी प्रदूषण और उपेक्षा से मुक्त कराने की सामाजिक प्रतिबद्धता हमारे समय की आवश्यकता है। नदियां इसी तरह प्रदूषित होती रहीं तो जीवन के प्रसार को संभालना बहुत मुश्किल हो जाएगा। नदियां ही क्यों, तालाब, कुंए, बावड़ी और कुंड- सभी अपने पुनर्जीवन का महत्त्व रेखांकित कर रहे हैं। लेकिन जमीन की बढ़ती भूख ने प्राचीन जलस्रोतों को दुर्दशा के हवाले कर दिया। तालाबों को पाट कर उन पर बस्तियां बना दी गर्इं या फिर कुंडों, कुंओं, बावड़ियों को नेस्तनाबूद कर उन पर व्यावसायिक प्रतिष्ठान खड़े कर लिए गए। राजस्थान के झालावाड़ जिले के बकानी कस्बे के मुख्य बाजार में स्थित प्राचीन बावड़ी आज भी कायम है। लेकिन इस बावड़ी की सीढ़ियों के ऊपर दुकानें बना कर बावड़ी तक जाने का रास्ता रोक दिया गया है। बावड़ी कचरा संग्रहण केंद्र में तब्दील हो चुकी है और जिम्मेदार लोग हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं। कोचिंग संस्थानों के लिए देश भर में चर्चित रहे कोटा शहर में सन 1326 में राजकुमार धीरदेह ने तेरह तालाब बनवाए थे। अधिकांश तालाबों में या तो नई बस्तियां बसा दी गर्इं या फिर उन्हें पाट दिया गया। आज हालत यह है कि चंबल नदी के किनारे बसे इस शहर की कई बस्तियों में गर्मी शुरू होते ही पानी को लेकर मारामारी शुरू हो जाती है।
पानी किसी एक शहर या किसी एक समुदाय की जरूरत नहीं है। जीवन के लिए पानी सबको चाहिए। शायद इसीलिए रहीम ने कहा था-‘बिन पानी सब सून।’ हालांकि पृथ्वी का दो तिहाई से अधिक हिस्सा पानी से ढंका हुआ है, लेकिन उस हिस्से में पीने योग्य पानी की मात्रा बहुत कम है। मनुष्य ने भले ही पानी का रासायनिक फार्मूला खोज लिया हो, लेकिन अभी भी कृत्रिम तरीके से पेयजल का निर्माण संभव नहीं हो सका है। इसीलिए मनुष्य शुद्ध पानी के लिए प्रकृति पर ही निर्भर है। ऐसे में जरूरत तो यह थी कि उपलब्ध संसाधनों के यथोचित प्रबंधन के प्रति जागरूकता बढ़ाने के व्यापक प्रयास किए जाते। लेकिन हमने जलस्रोतों को उनके हाल पर छोड़ दिया। इसका परिणाम यह हुआ कि साल दर साल जलसंकट गंभीर हेता चला गया। आज हालत यह है कि महाराष्ट्र के छत्तीस में से छब्बीस जिले सूखे का संकट झेल रहे हैं और इस कारण करीब बयासी लाख किसानों की जान सांसत में है। तमिलनाडु का विलिक्कट जिला जल संकट से जूझ रहा है। स्वर्ण खदानों के लिए प्रसिद्ध कर्नाटक के कोलार जिले में भी हालत अच्छी नहीं है।

बंगलुरू खुद भविष्य में एक बड़े जल संकट के कगार पर खड़ा है। हाल ही में भोपाल स्मार्ट सिटी विकास निगम लिमिटेड ने शहर में एक दर्जन से अधिक स्थानों को जल संकट की दृष्टि से अतिसंवेदनशील माना है। यह स्थिति देश के अन्य नगरों में भी प्राय: देखी जा सकती है। ऐसे में आवश्यक है कि हम जल प्रबंधन के प्रति सतर्क हों। सार्थक जल प्रबंधन के लिए जन-सामान्य को भी अपनी भूमिका निभानी होगी। हम यह उम्मीद नहीं कर सकते कि हम तो पानी का निरंतर अपव्यय करते रहें और सरकारें नीति या नियम बना कर जल संकट का समाधान कर दें। पानी यदि सबकी जरूरत है तो उसे बचाना भी हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी के निर्वहन के लिए स्वयं को प्रतिबद्ध करने के लिए गर्मियों के मौसम से अधिक उपयुक्त समय दूसरा कौन-सा होगा?

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