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एड्स का हौवा और हकीकत

अब लगातार एड्स के रोगियों के कम होने की खबरें आ रही हैं। बीती शताब्दी में एड्स को कुछ इस तरह से प्रचारित किया गया था कि महामारी का रूप लेकर एड्स दुनिया..

एड्स का हौवा और हकीकत
वर्ष 2005 में 18 लाख लोग एचआईवी बीमारी से मर गए थे, पिछले साल ऐसे लोगों की संख्या 12 लाख थी।

अब लगातार एड्स के रोगियों के कम होने की खबरें आ रही हैं। बीती शताब्दी में एड्स को कुछ इस तरह से प्रचारित किया गया था कि महामारी का रूप लेकर एड्स दुनिया को खत्म कर देगा। इसे भय का बड़ा पर्याय मान कर दिखाया जा रहा था। एड्स उन्मूलन के लिए अभियान चलाने वाले संगठनों की मानें तो पिछले दशक में हर साल बाईस लाख लोग एड्स की चपेट में आकर दम तोड़ रहे थे, पर अब यह संख्या घट कर पंद्रह लाख रह गई है। वर्ष 1997 की तुलना में एड्स के नए मरीजों की संख्या में अठारह फीसद की कमी आई है। कहा जा रहा है कि यदि इस गति से एड्स नियंत्रण पर काम चलता रहा तो दुनिया जल्दी ही एड्स-मुक्त हो जाएगी।

एड्स ने दुनिया पर गहरा प्रभाव डाला है, बीमारी के रूप में भी और इसके पीड़ितों पर एक लांछन के रूप में भी। आर्थिक रूप से भी पिछले तीन-साढ़े तीन दशक से इसका प्रभाव देखा जा सकता है, क्योंकि इससे निपटने के नाम पर काफी संसाधन लगाए गए और अनुदान आबंटित होते रहे। 1988 से एक दिसंबर को एड्स दिवस मनाने की शुरुआत हुई। वर्ष 1997 में संयुक्त राष्ट्र ने एड्स के खिलाफ एक बड़ा कार्यक्रम शुरू किया। इन अभियानों के बरक्स समय-समय पर एड्स को लेकर विवाद भी उभरते रहे हैं, कभी इसके कारणों को लेकर तो कभी एचआईवी-पीड़ितों की संख्या को लेकर।

यहां हैरतअंगेज पहलू यह है कि एड्स के जब सभी मरीजों को उपचार मिल नहीं पा रहा है तो यह बीमारी एकाएक घटने क्यों लगी? दरअसल, एड्स को लेकर एक अवधारणा तो पहले से ही चली आ रही थी कि एड्स कोई ऐसी बीमारी है, जो लाइलाज होने के साथ केवल यौन संक्रमण से फैलती है। इस कारण इसे सुरक्षित यौन उपायों और दवाओं के कारोबार का आधार भी माना जा रहा था। दुनिया में आई आर्थिक मंदी ने भी एड्स की भयावहता को कम करने का सकारात्मक काम किया है। अब तक एड्स पर प्रतिवर्ष बाईस सौ करोड़ डॉलर खर्च किए जा रहे थे, लेकिन अब बमुश्किल बारह सौ करोड़ डॉलर खर्च के लिए मिल पा रहे हैं। इस कारण स्वयंसेवी संगठनों को जागरूकता के लिए धनराशि मिलना कम हुआ तो एड्स रोगियों की भी संख्या घटनी शुरू हो गई? यदि इन संगठनों को धन देना बंद कर दिया जाए तो एड्स पूरी तरह नियंत्रित हो जाएगा?

सारी दुनिया में कथित रूप से फैला एड्स एक ऐसा महारोग है, जिसकी पहचान को लेकर अवधारणाएं बदलने के साथ-साथ तमाम देशों के बीच परस्पर जबर्दस्त विरोधाभास भी सामने आते रहे हैं। हाल ही में एड्स से बचाव के लिए जो नई अवधारणा सामने आई है, उसके अनुसार टीबी (क्षय रोग) पर नियंत्रण जरूरी है। यह बात कनाडा के टोरंटो शहर में संपन्न हुए सोलहवें एड्स नियंत्रण सम्मेलन में प्रमुखता से उभरी थी। इस सम्मेलन में यह तथ्य उभर कर सामने आया था कि दुनिया भर में जितने एचआईवी संक्रमित लोग हैं, उनमें से एक तिहाई से भी ज्यादा टीबी से पीड़ित हैं।

अब सच्चाई यह है कि एड्स को लेकर दुनिया के वैज्ञानिक खुले तौर से दो धड़ों में बंट गए हैं। आर्थिक मंदी के चलते अब उन लोगों का पक्ष प्रबल हो गया है, जो एड्स को महामारी नहीं मानते। क्योंकि 1990 के दशक में एड्स का हौवा फैलाने वाले लोगों का दावा था कि पंद्रह-बीस सालों में अफ्रीकी देशों की आबादी पूरी तरह बरबाद हो जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मध्य और दक्षिणी अफ्रीकी देशों की आबादी लगातार बढ़ रही है। उनके नवजात शिशुओं में एड्स के कोई लक्ष्ण भी देखने में नहीं आ रहे हैं। इन निष्कर्षों से साफ है कि एड्स की महामारी का हौवा खड़ा किया गया था।

ब्राजील में हुए एक अध्ययन से पता चला है कि एड्स पर टीबी की दवा असरकारी है। ब्राजील में ‘कंसॉर्शियम टु रिस्पांड इफेक्टवली टु द एड्स-टी.बी. एपिडेमिक’ (क्रिएट) द्वारा ग्यारह हजार लोगों पर एक अध्ययन किया गया। इनमें से कुछ लोगों को सिर्फ एंटीरिट्रोवायरल (एचआईवी-रोधक) दवा दी गई, कुछ लोगों को सिर्फ टीबी की दवा आइसोनिएजिड दी गई, जबकि तीसरे समूह को दोनों तरह की दवाएं दी गर्इं। नतीजतन, एंटीरिट्रोवायरल औषधि से टीबी संक्रमण से इक्यावन प्रतिशत बचाव हुआ। सिर्फ आइसोनिएजिड से बत्तीस प्रतिशत बचाव हुआ। जबकि मिली-जुली दवाएं देने से टीबी संक्रमण का खतरा सड़सठ फीसद तक कम हो गया। इस निष्कर्ष को महत्त्व देते हुए अब विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी एचआईवी संक्रमित रोगियों के लिए मिलीजुली दवा देने की अनुशंसा की है।

फिलहाल यह अलग बात है कि इस सिफारिश का पालन भारत में नहीं किया जा रहा है। क्योंकि भारत सहित दक्षिण अफ्रीका में टीबी की रोकथाम के लिए आइसोनिएजिड के इस्तेमाल पर प्रतिबंध है। यह रोक इस डर से लगाई गई थी कि कहीं आएसोनिएजिड के अत्यधिक इस्तेमाल से टीबी का बैक्टीरिया इसका प्रतिरोधी न बन जाए। मगर वैज्ञानिकों को अब आभास हो रहा है कि सिर्फ एंटीरिट्रोवायरल दवा देने से पूरा फायदा नहीं मिल पाता और मरीज टीबी का शिकार हो जाता है। अब विश्व स्वास्थ्य संगठन का स्पष्ट मत है कि टीबी पर नियंत्रण एड्स से संघर्ष में सबसे प्रमुख लक्ष्य होना चाहिए।

इसके पूर्व एड्स के सिलसिले में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा जो रिपोर्ट जारी की गई थी उसमें यह दर्शाया गया था कि अफ्रीकी देशों में अड़तीस लाख एड्स के रोगी हैं। बाईस रोगियों की एड्स के कारण मौतें भी हुईं हैं। तब दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति और वहां के वैज्ञानिकों ने इस रिपोर्ट को नकारते हुए एड्स के अस्तित्व को ही अस्वीकार कर दिया था। इस रिपोर्ट पर सख्त असहमति जताते हुए दक्षिण अफ्रीका की सरकार ने न तो इस जानलेवा रोग से निजात के लिए दवाएं उपलब्ध करार्इं और न एड्स के विरुद्ध माहौल बनाने के लिए जन-जागृति की मुहिम चलाई। बल्कि इसके उलट अफ्रीका के तत्कालीन राष्ट्रपति थावो मुबेकी ने अंतराष्ट्रीय स्तर पर तैंतीस विशेषज्ञों का पैनल बनाया। इस पैनल की खास बात यह थी कि इसमें सेंटर फॉर मालीक्यूलर एंड सेलुलर बायोलॉजी, पेरिस के निदेशक प्रो लुकमुरनिर भी शामिल थे। प्रो लुकमुरनिर वही वैज्ञानिक हैं, जिन्होंने अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ गैली के साथ मिल कर 1984 में एड्स के वायरस एचआईवी का पता लगाया था। इसके साथ ही इस पैनल में अमेरिका, ब्रिटेन, भारत और अटलांटा के सीडीसी के वैज्ञानिक डॉ आॅन ह्यूमर भी शामिल थे।

इस पैनल ने अप्रैल 2001 में अपनी अति महत्त्वपूर्ण रिपोर्ट दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति को सौंपते हुए एड्स के वायरस एचआईवी के अस्तित्व पर तीन सवाल उठाए थे। साथ ही नए सिरे से इस पर अनुसंधान करने की सलाह दी थी। रिपोर्ट का पहला सवाल था कि संभावित एड्स-पीड़ित में रोग प्रतिरोधात्मक क्षमता कम होने की वास्तविकता क्या है, जिससे मौत होती है? दूसरा, एड्स से होने वाली मौत के लिए किस कारण को जिम्मेदार माना जाए? तीसरे, अफ्रीकी देशों में विपरीत सेक्स से एड्स फैलता है, जबकि पाश्चात्य देशों में समलैंगिकता से, यह विरोधाभास क्यों? इस रपट में एड्स-रोधी दवाओं की उपयोगिता पर भी सवाल उठाए गए हैं। दरअसल, इस परिप्रेक्ष्य में दबी जुबान से वैज्ञानिक यह भी मानते हैं कि एड्स-रोधी दवाओं के दुष्प्रभाव से भी रोगी के शरीर में प्रतिरोधात्मक क्षमता कम होती जाती है और नतीजतन रोगी मौत के मुंह में चला जाता है।

दरअसल, एड्स से पीड़ित पांच युवक सबसे पहले जून 1981 में अमेरिका में पाए गए थे, तभी इस तथाकथित महामारी का पता चला था। लेकिन खास तौर से अमेरिकी विशेषज्ञों ने एक अवधारणा गढ़ी कि यह बीमारी 1970 से ही फैल रही थी और इसके वायरस पता चलने से पहले ही दुनिया के सभी देशों में फैल चुके थे। फिर अमेरिका और यूरोपीय देशों के वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने पूरी दुनिया में यह अवधारणा फैलाई कि एड्स के पहले वायरस अफ्रीका में बंदर की एक प्रजाति में पाए गए थे। बंदर से यह पूरे अफ्रीका, अमेरिका और फिर इस वायरस का विस्तार पूरी दुनिया में हो गया। लेकिन कालांतर में इस वायरस पर हुए अनुसंधानों ने एड्स के जन्म के अमेरिकी तथ्य को सर्वथा झुठला दिया। अफ्रीका के बुद्धिजीवियों ने बाद में कहा भी कि नस्ली सोच के चलते श्वेत लोग हर बुराई को अश्वेतों पर लादने के तरीकों की खोज में लगे रहते हैं।

भारत के बुद्धिजीवी भी इस महामारी के संदर्भ में नए सिरे से सोचने लगे हैं। उनका कहना है कि एड्स दुनिया की बीमारियों में एक मात्र ऐसी बीमारी है जो दीन-हीन, लाचार, कमजोर और गरीब लोगों को ही गिरफ्त में लेती है, ऐसा क्यों? एड्स से पीड़ित अभी तक जितने भी मरीज सामने आए हैं, उनमें न कोई उद्योगपति है, न राजनेता, न आला अधिकारी, न डॉक्टर-इंजीनियर, न लेखक-पत्रकार और न ही जनसामान्य में अलग पहचान बनाए रखने वाला कोई व्यक्ति। जबकि अन्य बीमारियों के साथ ऐसा नहीं है। इससे स्पष्ट होता है कि एड्स के मूल में क्या है और उसका उपचार कैसे संभव है? अभी साफ नहीं है। इस पर अभी खुले दिमाग से नए अनुसंधानों की जरूरत है। इस सबके बावजूद यह अच्छी बात है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ऐसे आंकड़े देने लगा है, जो एड्स के रोगियों की तादाद कमी दर्शाते हैं। (प्रमोद भार्गव)

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