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राजनीतिः वेतन असमानता की बढ़ती खाई

भारत में उदारीकरण के पिछले सत्ताईस वर्षों में निजी क्षेत्र में उच्च प्रबंधकों और सामान्य कर्मचारियों के बीच वेतन-विषमता बढ़ कर सीधे दोगुनी हो गई है, वहीं भारत की तरह आर्थिक-सामाजिक प्रवृत्तियां रखने वाले तीन देशों चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका में वेतन विषमता पिछले सत्ताईस साल के दौरान घटी है। हालांकि भारत के बाजार नियामक सेबी ने भी देश की सूचीबद्ध कंपनियों के सीईओ को इस समय दिए जा रहे भारी-भरकम वेतन को गैर वाजिब बताया है। लेकिन वेतन को न्यायसंगत मूल्यांकित करने और उससे संबंधित निर्देश देने का कोई अधिकार सेबी के पास नहीं है।

Author September 17, 2018 4:47 AM
जहां पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न कंपनियों के सीईओ को कंपनी के मुनाफे की तुलना में कहीं ज्यादा वेतन बढ़ोतरी मिली है, वहीं इसके ठीक विपरीत मध्यवर्ती एवं निम्नवर्ती कर्मचारियों का वेतन पिछले कुछ वर्षों के दौरान काफी कम रफ्तार से बढ़ा है।

जयंतीलाल भंडारी

यकीनन देश में वेतन असमानता का चिंताजनक परिदृश्य दिखाई दे रहा है। राष्ट्रीय रोजगार और बेरोजगारी सर्वेक्षण और राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय के आंकड़ों पर आधारित इंडिया वेज रिपोर्ट-2018 के अनुसार वर्ष 1993-94 से 2011-12 के बीच देश में जीडीपी चार गुना हुई है, जबकि लोगों का वेतन लगभग दोगुना ही बढ़ा है। भारत में संगठित क्षेत्र की तुलना में कारपोरेट क्षेत्र में उच्च प्रबंधन वर्ग और मध्यम प्रबंधन वर्ग और मध्यम प्रबंधन वर्ग व सामान्य कर्मचारियों के वेतन में असमानता तेजी से बढ़ी है। भारत में वेतन असमानता की यह खाई दुनिया के विकासशील देशों की तुलना में सबसे ज्यादा है।

पिछले दिनों देश के प्रमुख शेयर बाजार नेशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) में शामिल कई बड़ी कंपनियों की वित्त वर्ष 2017-18 की सालाना रिपोर्ट इस बात का खुलासा करती हैं कि इन कंपनियों के प्रमुख जैसे- मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ), अध्यक्ष सह प्रबंध निदेशक (सीएमडी) जैसे उच्च पदाधिकारियों के वेतन और वहां के अन्य कर्मचारियों के वेतन में भारी असमानता है। रिपोर्ट के अनुसार उच्च प्रबंधन वर्ग के वेतन पिछले कुछ वर्षों में छलांगे लगाते हुए बढ़े हैं। कुछ कंपनियों में तो सामान्य कर्मचारियों की तुलना में सीईओ के वेतन पैकेज बारह सौ गुना तक ज्यादा हो चुके हैं। जहां कारपोरेट हस्तियां अपने घर ज्यादा से ज्यादा वेतन ले जाकर धन कुबेर का प्रतीक बन रही हैं, वहीं कॉरपोरेट कंपनियों के बाकी कर्मचारियों का वेतन असंतोषजनक अनुभव किया जा रहा है। कारपोरेट क्षेत्र के लिए चिंता का ऐसा विषय है, जिस पर गंभीरता के साथ मंथन किए जाने की आवश्यकता है।

जहां पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न कंपनियों के सीईओ को कंपनी के मुनाफे की तुलना में कहीं ज्यादा वेतन बढ़ोतरी मिली है, वहीं इसके ठीक विपरीत मध्यवर्ती एवं निम्नवर्ती कर्मचारियों का वेतन पिछले कुछ वर्षों के दौरान काफी कम रफ्तार से बढ़ा है। हालांकि विभिन्न कंपनियों में किसको कितना वेतन दिया जाए और वेतन में कितना इजाफा किया जाए, इस बारे में कोई नियम तय नहीं हैं। इसके अलावा कंपनियों पर ऐसी कोई पाबंदी भी नहीं है कि उन्हें निश्चित रूप से कब और कितना वेतन बढ़ाना है। लेकिन सेबी के नियमों के तहत एनएसई में सूचीबद्ध कंपनियों के लिए हर साल दिए गए वेतन का खुलासा जरूरी है, ताकि निवेशकों को कंपनी के वेतन ढांचे के बारे में पता चल सके।

पिछले वर्ष 2017-18 में एनएसई में दर्ज कंपनियों के मुनाफे में औसतन 4.65 फीसद की ही वृद्धि दर्ज की गई है, जबकि कंपनियों के सीईओ के वेतन में औसतन 31.02 फीसद की बढ़ोतरी की गई है। वेतन के मामले में ऑटो कंपनियों के प्रमुख सबसे आगे रहे हैं। वर्ष 2017-18 में हीरो मोटोकॉर्प के सीएमडी को 75.44 करोड़ रुपए का वेतन पैकेज मिला। उनके वेतन में छब्बीस फीसद बढ़ोतरी हुई। जबकि कंपनी के मुनाफे में 9.4 फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई। हीरो मोटोकॉर्प के सीएमडी का वेतन देश के सबसे अमीर शख्स और रिलायंस के चेयरमैन मुकेश अंबानी के वेतन पैकेज से बहुत ज्यादा है। रिलायंस प्रमुख का वेतन पिछले वित्त वर्ष में पंद्रह करोड़ रुपए रहा था। इसी तरह और भी बड़ा कंपनियां हैं जहां इस तरह की भारी वेतन विसंगति है।

आइटीसी के चेयरमैन का कुल वेतन कंपनी के कर्मचारियों के औसत वेतन की तुलना में चार सौ उनतालीस गुना है। रिलायंस इंडस्ट्रीज के चेयरमैन का वेतन रिलायंस इंडस्ट्रीज के कर्मचारियों के औसत वेतन की तुलना में दो सौ पांच गुना है। इन्फोसिस के सीईओ का वेतन इन्फोसिस के कर्मचारियों के औसत वेतन की तुलना में एक सौ सोलह गुना है। आइसीआइसीआइ बैंक के सीईओ का वेतन बैंक के कर्मचारियों के औसत वेतन की तुलना में संतानबे गुना ज्यादा है। एचडीएफसी के सीईओ का वेतन एचडीएफसी कर्मचारियों के औसत वेतन की तुलना में तिरासी गुना ज्यादा है। एक्सिस बैंक के एमडी का वेतन एक्सिस बैंक के कर्मचारियों के औसत वेतन की तुलना में चौहत्तर गुना है।

स्थिति यह भी है कि देश की प्रमुख कंपनियों के सीईओ के वर्तमान वेतन का औसत उन्हें पांच वर्ष पहले दिए गए औसत वेतन की तुलना में लगभग दोगुना हो गया है। इतना ही नहीं, चौंकाने वाली बात यह भी है कि कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां समान क्षेत्र में काम करने वाली भारतीय कंपनियों के मुकाबले अपने सीईओ को करीब पचास फीसद कम वेतन का भुगतान करते हुए दिखाई दे रही हैं। सरकारी क्षेत्र में शासन की नीतियों को कार्यान्वित करने की महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाने वाले सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी सरकार के मुख्य सचिव और सरकार के तृतीय श्रेणी कर्मचारी के वेतन में निजी क्षेत्र की तरह वेतन की भारी विषमताएं नहीं हैं। मोटे तौर पर शासन के उच्चतम अधिकारी एवं तृतीय श्रेणी कर्मचारी के वेतन के बीच यह अंतर दस गुना से भी कम है।

ऐसे में देश में बढ़ती हुई वेतन विषमता और आर्थिक असमानता के कारण सामान्य कर्मचारी और आम आदमी कम वेतन और कम आय के कारण विकास के लाभों की खुशियों से वंचित हैं। गौरतलब है कि दुनिया के प्रमुख संगठन ऑर्गनाइजेशन ऑफ इकोनॉमिक कोआॅपरेशन एंड डवलपमेंट (आइसीडी) के द्वारा जारी रिपोर्ट में बताया गया है कि जहां भारत में उदारीकरण के पिछले सत्ताईस वर्षों में निजी क्षेत्र में उच्च प्रबंधकों और सामान्य कर्मचारियों के बीच वेतन-विषमता बढ़ कर सीधे दोगुनी हो गई है, वहीं भारत की तरह आर्थिक-सामाजिक प्रवृत्तियां रखने वाले तीन देशों चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका में वेतन विषमता पिछले सत्ताईस साल के दौरान घटी है।

हालांकि भारत के बाजार नियामक सेबी ने भी देश की सूचीबद्ध कंपनियों के सीईओ को इस समय दिए जा रहे भारी-भरकम वेतन को गैर वाजिब बताया है। लेकिन वेतन को न्यायसंगत मूल्यांकित करने और उससे संबंधित निर्देश देने का कोई अधिकार सेबी के पास नहीं है। देश और दुनिया की वेतन संबंधी विभिन्न अध्ययन रिपोर्टों में कहा गया है कि भारतीय कंपनियां वेतन पैकेज के मामले में अपने चहेतों को तरजीह देती हैं। एक सर्वे में नब्बे फीसद कर्मचारियों ने कहा है कि जहां देश की बड़ी कंपनियों में उच्च प्रबंधन की वेतन वृद्धि में कोई नियम कायदे नहीं हैं, वहीं उनके एक ही भूमिका और स्तर के लिए वेतन में भी कोई समानता नहीं है।

निसंदेह अब सरकार को निजी क्षेत्र में काम करने वाले सीईओ और अन्य कर्मचारियों की वेतन असमानता को कम करने की दिशा में विशेष ध्यान देना होगा। निजी क्षेत्र में वेतन की असमानताएं कम करने की जरूरत है। वेतन में असमानता का सीधा असर कामकाज, उत्पादकता और कंपनी के प्रति लगाव पर पड़ता है। कंपनियों के लिए यह जरूरी है कि वे वेतन मानक सर्वे कराएं और अपने कार्यबल के बीच वेतन पैकेज में जो असमानता है, उसे दूर करें। इससे कर्मचारियों व अधिकारियों के कामकाज और प्रेरणा के स्तर में सुधार होगा और वे नियोक्ता की उम्मीदों के अनुरूप और अच्छा प्रदर्शन कर सकेंगे।

भारत में वेतन की असमानता कम करने के लिए चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की न्याय संगत वेतन नीतियों की तरह कारगर उपाय करने पड़ेंगे। ऐसा होने पर ही निजी क्षेत्र के कम वेतन वाले लाखों कर्मचारियों को संतोषजनक वेतन की खुशहाली मिल सकेगी। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने अपनी रिपोर्ट में सुझाव दिया है कि भारत में वेतन असमानता को दूर करने के लिए वेतन कानून को मजबूती से लागू किया जाना चाहिए, और साथ ही न्यूनतम वेतन का ढांचा तय करने के लिए प्रभावी कदम उठाए जाएं।

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