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राजनीति: बढ़ती आबादी का संकट

आज भारत की आबादी एक सौ तीस करोड़ के लगभग है और चीन की एक सौ चालीस करोड़। अगले दशक के अंत तक भारत डेढ़ सौ करोड़ की आबादी वाला देश हो जाएगा और अगले दो दशकों यानी 2050 तक यह आंकड़ा एक सौ छियासठ करोड़ हो जाएगा। दूसरी ओर, चीन में 2030 तक आबादी स्थिर रहेगी और फिर उसके बाद धीमी गति से कम होना शुरू हो होगी।

Author Published on: July 8, 2020 2:35 AM
Population, Challeges of Countryदेश की बढ़ती आबादी और घटते संसाधन 21 वीं सदी की एक बड़ी चुनौती है।

संजय दुबे
ऐसा अनुमान है कि आज से तकरीबन दस हजार साल पहले धरती पर कुछ लाख लोग ही थे। और अठारहवीं सदी के आखिर में धरती पर इंसान की आबादी सौ करोड़ तक जा पहुंची थी। लेकिन 1920 में यह आंकडा दो सौ करोड़ यानी दो अरब तक जा पहुंचा। धरती पर आबादी बढ़ने का यह एक बड़ा और महत्त्वपूर्ण कालखंड माना जाता है। आज दुनिया की आबादी सात अरब से ज्यादा हो चुकी है और 2050 तक इसके दस अरब तक पहुंच जाने का अनुमान है।

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 1990 से 2010 के बीच दुनिया की आबादी तीस फीसद बढ़ी है। इसमें सबसे बड़ा योगदान भारत और चीन का है। इस अवधि में भारत में पैंतीस करोड़ और चीन में बीस करोड़ लोग बढ़े। हालांकि तेजी से बढ़ती आबादी और इससे होने वाली समस्याओं को लेकर भारत की सरकार अब गंभीर दिख रही है।

राज्य सभा में बीते सत्र में सात फरवरी को शिवसेना के एक सासंद ने संविधान संशोधन का प्रस्ताव रखा था, जिसमें कहा गया कि राज्य को छोटे परिवारों को विशेष रियायत देनी चाहिए। जो परिवार ‘हम दो, हमारे दो’ को मानें उसे कर, रोजगार, शिक्षा जैसी सरकारी सुविधाओं में सहूलियतें मिलनी चाहिए। अगर कोई परिवार इसे नहीं मानें, तब उसकी सरकारी रियायतें वापस ले लेनी चाहिए।

भारत जनसंख्या नियंत्रण को 1951 में राष्ट्रीय अभियान बनाने वाला दुनिया का पहला देश था। लेकिन जिस तेजी से हमारी आबादी बढ़ रही है, उसे देख कर लग रहा है कि इस अभियान में हमें जरा सफलता नहीं मिली। जनसंख्या नियंत्रण का यह अभियान अगर सफल हो जाता तो देश कई गंभीर समस्याओं से पार पा सकता था।

पूरी दुनिया में 1960 के आसपास ही बढ़ती आबादी को गंभीरता से लेना शुरू किया। आज जिन देशों ने जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रम में सफलता हासिल कर ली है और अपने देश की आबादी को नियंत्रित किया है, उसके मूल में बढ़ती जनसंख्या के खतरों की बात थी। इस चेतना का नतीजा आज वैश्विक स्तर पर दिखता भी है, क्योंकि उस समय जन्मदर प्रति महिला चार-पांच बच्चों की थी, वहीं आज यह दो से तीन बच्चे प्रति महिला पर आ चुकी है।

दरअसल माल्थस के सिंद्वात के अनुसार जनसंख्या हर पच्चीस वर्ष में लगभग दुगुनी हो जाती है। जिसकी वजह से एक से दो, दो से चार और चार से फिर आठ के अनुपात में वृद्वि होना है। जबकि इसके सापेक्ष विकास दर क्रमश: एक से दो, दो से तीन और फिर तीन से चार प्रतिशत होती है। हालांकि इस तर्क से ज्यादातर विद्वान सहमत नहीं हैं। फिर भी यह सच है कि जनसंख्या, हमेशा आर्थिक वृद्वि की दर से ज्यादा होती है। आॅस्ट्रेलिया के एडिलेड विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के मुताबिक अगर दो अरब लोगों की एक साथ मौत हो या सभी चीन की एक संतान नीति पर चलें, तब भी दुनिया की आबादी 2100 के आते-आते ग्यारह अरब हो ही जाएगी।

जनसंख्या को नियंत्रित करने में सबसे बड़ी भूमिका प्रजनन दर की होती है। इसका 2.1 के आसपास होने का मतलब होता है कि आबादी स्थिर रहेगी। इससे ज्यादा होना इसके बढ़ने का संकेत है। इसका सीधा संबंध महिला शिक्षा से भी है। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक दुनिया की पैंतीस फीसद महिलाओं ने अपनी आखिरी संतान को नहीं चाहा था।

भारत के दक्षिणी राज्य जो उत्तर-पूर्वी हिस्से से ज्यादा शिक्षा में आगे हैं, वहां की प्रजनन दर इसी के आसपास है। जबकि बिहार, उत्तर प्रदेश, ओड़िशा में यह चार से भी ज्यादा है। मतलब साफ है कि अगर हमने जनसंख्या नियंत्रण पर अब नहीं सोचा तो काफी देर हो जाएगी और कई तरह के गंभीर संकटों का सामना करना पड़ेगा।

आज भारत की आबादी एक सौ तीस करोड़ के लगभग है और चीन की एक सौ चालीस करोड़। अगले दशक के अंत तक भारत डेढ़ सौ करोड़ की आबादी वाला देश हो जाएगा और अगले दो दशकों यानी 2050 तक यह आंकड़ा एक सौ छियासठ करोड़ हो जाएगा। दूसरी ओर, चीन में 2030 तक आबादी स्थिर रहेगी और फिर उसके बाद धीमी गति से कम होना शुरू हो होगी।

बादी बढ़ने का सीधा संबध गरीबी से है। गरीब और श्रमिक वर्ग के लिए यह उनकी जीविका का माध्यम भी है, यानी गरीब यह मानकर चलता है कि ‘जितने हाथ, उतनी आमदनी’। एक सीमा तक तो यह सच भी प्रतीत होता है, पर यह अस्थायी होता है। जितनी आय यह परिवार कमा रहा होता है, उससे कहीं ज्यादा खर्च कर रहा होता है।

मसलन शादी, ब्याह, बीमारी, मृत्यु संबंधी संस्कारों और इनसे जुड़ी सामाजिक परंपराओं को निभाने के कारण यह तबका प्राय: कर्ज में डूबा रहता है। ऐसे में कोई गरीब परिवार शिक्षा जैसे बुनियादी मसले पर क्या और कैसे सोचे, यह बड़ा सवाल है। इसका नतीजा यह होता है कि घर के बच्चे शिक्षा तक से महरूम रह जाते हैं और आने वाली पीढ़ी के लिए विकास के दरवाजे बंद हो जाते हैं।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-4 के नतीजों पर गौर करें तो पाएंगे कि गरीबी को बनाए रखने में शिक्षा, स्वास्थ्य की बड़ी भूमिका है। इन सबके बावजूद जनसंख्या का देश के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान भी होता है, बशर्ते उसका समुचित और सही उपयोग हो। हर मनुष्य को कम से कम औसत आयु तक साफ हवा, पानी, अनाज, इलाज, शिक्षा की जरूरत होती है।

ऐसे में किसी भी देश का सबसे बड़ा और पहला उत्तरदायित्व यही है कि वह इन विषयों पर नीतियां बनाए। भारत जैसे देश के लिए यह और महत्त्वपूर्ण इसलिए हो जाता है कि आस्ट्रेलिया जैसे देश की आबादी हर साल भारत में जुड़ जाती है। आबादी के बड़े हिस्से को अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए आज भी कतारबद्व होना पड़ता है। तमाम प्रयास के बावजूद हम हर नागरिक को पहचान संबधी दस्तावेज तक पहुंचाने की स्थिति में नहीं है। हर विकसित देश ने पहले अपनी आबादी के हिसाब से प्राथमिकता तय की और फिर उनकी जरूरतों के अनुरूप वहां आर्थिक सुरक्षा ढांचे का निर्माण किया।

इसके साथ ही गुणवत्तापरक शिक्षा, आवश्यक स्वास्थ्य सेवा ढांचा, सामाजिक सुरक्षा दायित्व, परिवहन और आवास, ऊर्जा उपभोग जैसे बुनियादी तत्वों को देखते हुए नीतियों का निर्माण किया। इसीलिए वहां सुनियोजित विकास हुआ। चीन को ही देखें, पिछले ढाई दशक से वहां की आर्थिक विकास दर की रफ्तार दो अंकों की रही है। इसके पीछे कोई चमत्कार जैसी बात नहीं, ठोस नीतियों का निर्माण है।

देश को अगर बढ़ती आबादी से बचाना है तो हमें कुछ क्षेत्रों में बहुत तेजी से काम करने होंगे। स्थिर जनसंख्या के सिद्वांत को अपनाने के लिए हमें फिलहाल ज्यादा प्रजनन दर वाले राज्यों पर ध्यान केंद्रित करना होगा और प्रजनन दर में कमी लानी होगी। लोगों के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मुहैया करानी होंगी। यहां भी हम पाते हैं कि जिन राज्यों में प्रजनन दर स्थिर है, वहां अस्पताल में उपलब्ध बिस्तरों की संख्या भी पर्याप्त है। जबकि ज्यादा प्रजनन दर वालें राज्यों में ये कम है।

खाद्यान्न उत्पादन भी बढ़ाना होगा। स्वच्छ पेयजल की आपूर्ति सुनिचित करनी होगी। शहरी ढांचे को और बेहतर बनाना होगा। सबको घर उपलब्ध कराना होगा। आबादी पर काबू पाने के लिए देश में कानूनों के साथ ही व्यापक स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने की भी जरूरत है। जनता को शिक्षा, जागरूकता, मनोरंजन के जरिए जनसंख्या वृद्वि के नुकसान बताने की जरूरत है। सिर्फ कानून बना देने से ही इसमें पूरी तरह सफलता नहीं मिलती। इसे हम देश के दक्षिणी राज्यों से भी सीख सकते हैं।

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