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क्यों बढ़ रहे हैं मन के रोगी

देश की छह फीसद से अधिक आबादी किसी न किसी प्रकार के मानसिक असंतुलन की शिकार है। लगभग दो करोड़ लोग सीजोफ्रेनिया (व्यक्तित्व विघटन) की बीमारी से पीड़ित हैं तो पांच करोड़ लोग डिप्रेशन यानी अवसाद से..

देश की छह फीसद से अधिक आबादी किसी न किसी प्रकार के मानसिक असंतुलन की शिकार है। (फाइल फोटो)

अक्सर यह बोल कहीं न कहीं सुनाई देता है कि पागल हो क्या, या पगलाओ मत, आदि। पागल होना तो एक ऐसी अवस्था मानी जाती है, जिसमें व्यक्ति मानसिक संतुलन खो देता है। लेकिन मानसिक स्थिति बहुत प्रकार से अस्वस्थ होती है। इनमें कुछ के बारे में तो पता चलता है, पर कुछ को अस्वस्थ माना भी नहीं जाता, इसलिए उसके इलाज का भी प्रयास नहीं किया जाता है। अगर घर का कोई सदस्य, आत्मीय जन मानसिक रूप से परेशान हो जाए तो बाकी सदस्यों के लिए भी जिंदगी बसर करना दूभर बन जाता है।

इस मानसिक अस्वस्थता के प्रति जहां संवेदनशीलता और सरोकार अत्यंत जरूरी हैं, वहीं समाज में ऐसी सहयोगी जगहें भी जरूरी हैं ताकि सिर्फ घर वाले उसे झेलने, छोड़ने या खुद अस्वस्थ हो जाने के लिए मजबूर न बन जाएं। हमारे देश में ऐसे स्वास्थ्य केंद्रों की भारी कमी है, जहां कम से कम यह पता चल जाए कि यह क्या है और इसका निदान क्या है। जागरूकता की कमी या गैर-जानकारी के कारण कई स्थितियां और बिगड़ जाती हैं।

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने पिछले दिनों संसद को बताया कि देश की छह फीसद से अधिक आबादी किसी न किसी प्रकार के मानसिक असंतुलन की शिकार है। लगभग दो करोड़ लोग सीजोफ्रेनिया (व्यक्तित्व विघटन) की बीमारी से पीड़ित हैं तो पांच करोड़ लोग डिप्रेशन यानी अवसाद से। ध्यान रहे कि यह स्थिति तब है, जबकि हमारे देश में तमाम तरह की मानसिक परेशानी के लिए कोई कहीं इलाज के लिए नहीं जाता और वह किसी प्रकार की गणना में शामिल नहीं होता है। यह छह फीसद का सरकारी आंकड़ा कई गुना बढ़ जाएगा अगर सभी प्रभावित लोगों का अनुमान लगा लिया जाए तो।

खुद पीड़ित व्यक्ति भी यह नहीं समझ पाता है कि उसे कोई परेशानी है। सामाजिक सुरक्षा से लोग वंचित महसूस करते हैं। दरअसल परिस्थितियां कुछ ऐसी निर्मित होती जा रही हैं कि जो कुछ अपने ऊपर बीतता है वह साझा करने के लिए मौका और स्पेस नहीं मिलता है। आत्मीय किस्म के समूहों, मित्रों या आत्मीय जनों का घेरा इन हालात से बाहर निकाल सकता है, लेकिन जिंदगी ऐसी गति से चलती रहती है कि ऐसा घेरा निर्मित करने की जरूरत भी लोग महसूस नहीं करते हैं, न ही जो उपलब्ध है उसे तहेदिल से स्वीकार कर पाते हैं। एक समय तक खुद में मस्त और परिपूर्ण महसूस करते हैं और जब जरूरत का समय आए तो दूसरों का सरोकार नहीं बनता है।

समाज में खाने-कमाने के अलावा जिंदगी में कोई और लक्ष्य या उद््देश्य तय करने की प्रेरणा परिवारों से या शिक्षण संस्थानों से भी नहीं मिलती है। पढ़ाई पर भी अधिकतर जोर होता है, इसलिए कि अच्छी कमाई हो सके। सामाजिक रूप से सक्रिय और चेतनशील इंसान जिसने जीवन के कुछ अन्य उद््देश्य तय किए हों, उसके अवसाद में जाने का खतरा कम होगा, बनिस्बत आत्म-केंद्रित व्यक्ति के।

अगर हम वर्ष 2010 में निकली स्वास्थ्य सर्वे (हेल्थ प्रोफाइल) रिपोर्ट को देखें तो उसके मुताबिक भी भारत में मानसिक रोगियों की संख्या बढ़ रही है। और अगर हम विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुमानों पर गौर करें तो जहां 2008 में उसने इसे विश्व की चौथी बड़ी बीमारी माना था, वहीं यह संकेत भी दिया था कि 2020 तक दुनिया भर में यह दूसरी बड़ी बीमारी हो जाएगी। विश्व में हर साल पचासी हजार मौतें अवसाद के कारण हो रही हैं।

जहां तक औपचारिक रूप से इलाज करवा कर समस्या से निपटने की बात है, तो ऐसी जगहें जहां सक्षम मनोचिकित्सक से संपर्क हो सके, बहुत कम हैं। देश में केंद्र सरकार द्वारा संचालित तीन और राज्य सरकारों द्वारा संचालित चालीस मानसिक स्वास्थ्य संस्थान हैं। मानसिक बीमारों के बारे में सरकार के अपने आंकड़े हकीकत से बहुत कम हैं, पर जो हैं उनके अनुरूप उपलब्ध सुविधाएं एकदम नाकाफी हैं। दूसरे, इनके बारे में जानकारी के अभाव के साथ जो लोग यहां तक पहुंच पाते हैं, उन्हें भी भीड़ और बुनियादी सुविधा और चिकित्सकों का अभाव सेवा-लाभ लेने से दूर करता है। दूसरी ओर, निजी चिकित्सा सुविधाएं जो उपलब्ध हैं वे बहुत महंगी हैं। कई प्राइवेट चिकित्सकों की फीस हजार से तीन हजार तक बताई जाती है।

कुछ वक्त पहले भारतीय मनोचिकित्सा सोसाइटी के सम्मेलन के लिए देश भर से मनोचिकित्सक दिल्ली में एकत्र हुए थे। मनोचिकित्सकों ने सरकार के सामने समस्या से निपटने के लिए कुछ सुझाव भी रखे थे। चिकित्सकों का कहना था कि देश में पंद्रह करोड़ की आबादी किसी न किसी प्रकार के मनोविकार की शिकार है, लेकिन उनका इलाज करने के लिए महज चार हजार विशेषज्ञ उपलब्ध हैं। इन विशेषज्ञों की संख्या बढ़ाने पर जोर दिया गया था। आयोजकों में शामिल रहे डॉ सुनील मित्तल का कहना था कि देश में मानसिक स्वास्थ्य का क्षेत्र अत्यंत उपेक्षित है। राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम 1982 में शुरू हुआ था जिसके तहत जिला स्तर पर कम से कम एक मनोचिकित्सक होने की बात कही गई थी और राज्य स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य समीक्षा आयोग के गठन का भी निर्णय हुआ था। सोसाइटी के मनोचिकित्सकों ने बताया कि मनोरोगियों के अस्पतालों में न तो एंबुलेंस सेवा होती है न ही उन्हें स्वास्थ्य बीमा के दायरे में रखा जाता है। सरकार इस क्षेत्र में शोध के प्रति भी गंभीर नहीं है।

सम्मेलन में शामिल दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज के एक प्रोफेसर ने सूचित किया था कि ओपीडी यानी बाह्य रोगी विभाग में आने वाले रोगियों में से तीस से चालीस फीसद लोग डिप्रेशन के शिकार के होते हैं। मानसिक बीमारियों में पहले नंबर पर अवसाद (डिप्रेशन), दूसरे नंबर पर बेचैनी (एंक्जाइटी) और तीसरे नंबर पर नशीले पदार्थों की लत है।

इस समस्या के प्रति हमारे समाज में अभी खुलापन भी नहीं है। मनोचिकित्सक या काउंसलर के पास जाना एक तरह से पागल हो जाने का भय दिखाता है और लोग स्वयं को बचाते हैं कि उन्हें कोई ‘केस’ न मान बैठे। किसी को यह सलाह देना भी खतरे से खाली नहीं होता कि वह किसी मनोचिकित्सक (साइकियाट्रिस्ट) से मिल ले। जहां मनोचिकित्सकों से दूरी बना कर रखने में लोग तत्परता दिखाते हैं, वहीं वे तमाम साधु-महात्माओं, सूफियों की शरण में जाने में संकोच नहीं करते हैं, जिनके काम का बड़ा हिस्सा ‘वास्तविक’ तौर पर किसी न किसी किस्म की कॉउंसलिंग का ही होता है, भले ही वे उसके लिए आध्यात्मिक विमर्श के आवरण का इस्तेमाल करते हों।

अवसाद के कारणों पर भी काफी अध्ययन हुए हैं, लेकिन रोजमर्रा के रहन-सहन के पहलू पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता है और परिस्थितियां भी ऐसी बन जाती हैं कि व्यक्ति अवसाद में चला जाता है। इंडियन साइकियाट्रिस्ट सोसाइटी की वार्षिक रिपोर्ट के मुताबिक एकांत अवसाद का प्रमुख कारण है। दिल्ली के बारे में रिपोर्ट बताती है कि यहां पचपन फीसद लोगों की सामाजिक भागीदारी शून्य है। इंस्टीट्यूट आॅफ ह्यूमन बिहेवियर ऐंड एलाइड साइंस के निदेशक डॉ एनजी देसाई का भी कहना है कि सामाजिक सहभागिता कम होने के कारण लोगों में अवसाद बढ़ रहा है। आमतौर यही देखा जाता है कि लोग कमाने और अपनी गृहस्थी चलाने में व्यस्त होते हैं। किसी न किसी प्रकार से इसी धारणा को मजबूत बनाया गया होता है कि स्वयं से और अपने काम से मतलब रखो। सुबह काम पर जाओ और लौट कर घर देखो। अधिकतर महिलाओं की स्थिति तो और भी बदतर होती है; वे दिन-रात गृहस्थी में ही डूबी रहती हैं। गौरतलब है कि महिलाओं में अवसाद का दायरा पुरुषों की तुलना में अधिक है। जहां पुरुषों में यह 13.9 फीसद है, वहीं महिलाओं में 16.3 फीसद पाया गया है। लेकिन महिलाओं में यह समस्या आंकड़ोंं से कई गुना अधिक हो सकती है, क्योंकि आमतौर पर वे ऐसे ही जिंदगी गुजार देती हैं, बिना चिकित्सकीय मदद के। ऐसे बहुतेरे मामलों में उनके परिवार भी कोई मदद नहीं करते, या नहीं कर पाते, क्योंकि बहुत बार रोग को रोगी के स्वभाव के तौर पर देखा जाता है।

जिस तरह बच्चे ऐसा लक्ष्य-समूह होते हैं जो अपने हित की लड़ाई स्वयं नहीं लड़ सकते, उसी तरह मानसिक बीमारियों से ग्रस्त व्यक्ति संगठित होकर अपनी परेशानी सरकार या समाज के सामने नहीं उठा सकते। ये हमारे समाज के सबसे असहाय लोग है। लिहाजा, सरकार और समाज को स्वयं इस मुद्दे को गंभीरता से लेकर कदम आगे बढ़ाना चाहिए।

अंत में, कुछ साल पहले नोएडा की अनुराधा और सोनाली का मामला बड़ी खबर बन गया था। अनुराधा तो जिंदगी से हार मान गई और मर गई थी और सोनाली की स्थिति गंभीर बनी हुई थी। बगैर कुछ खाए-पिये दोनों ने सात माह से अपने ही घर में खुद को कैद कर रखा था। इसके पहले दिल्ली के ही शालिनी मेहरा और सुमनलता का मामला भी सुर्खियों में था। शालिनी को अपनी मां के मृत शरीर के साथ तीन महीने से बंद कमरे में पाया गया था। जब आसपास बदबू फैलने लगी तब लोगों ने पुलिस को सूचना दी थी। ये सभी मामले गहरे अवसाद के बताए गए हैं। सनसनी के अंदाज में सुर्खियां बनतीं इन खबरों के बहाने यह बात रेखांकित हुई थी कि हमारे यहां अवसाद की ऐसी घटनाएं अपवाद के तौर पर नहीं हैं, बल्कि हकीकत का एक सिरा भर हैं और हकीकत का दायरा बहुत व्यापक है।

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