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राजनीतिः समावेशी राष्ट्रवाद बनाम प्रतीकवाद

आज प्रतीक-पूजा में राष्ट्रवाद संकुचित हो रहा है। राष्ट्र की मूल संकल्पना अपने लोगों से लगाव की संकल्पना से जुड़ी है, साझे हितों और साझी संस्कृति के तत्त्वों से जुड़ी है। पश्चिम में साझे आर्थिक क्षेत्र को राष्ट्र की संकल्पना में सबसे ऊपर रखा गया और वहां साम्राज्यवाद पैदा हुआ। नतीजतन‘हम’ और ‘अन्य’ में बांट कर दुनिया को देखा गया।

Author March 14, 2016 2:29 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

सुधा सिंह

आज राष्ट्रवाद का प्रश्न नए सिरे से बहस के केंद्र में है। राष्ट्र की पहचान के विविध रूपों में से केवल राष्ट्र के प्रतीकात्मक रूपों को चुन कर उस पर बहस हो रही है। जो लोग इन प्रतीकों से बाहर के दायरे में आते हैं उन्हें राष्ट्र की परिसीमा से बाहर का माने जाने पर जोर दिया जा रहा है। यह एक अजीब उलझन भरी स्थिति है। राष्ट्र और राष्ट्रवाद की बहस आज की नहीं है और न ही राष्ट्र के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण का विकास ही आज का सवाल है। राष्ट्र की अवधारणा अपने आरंभ से ही विभिन्न किस्म की आलोचना को जन्म देती रही है। बहुत-से लोग तब भी राष्ट्र की प्रचलित परिभाषा से बाहर पड़ते थे और आज भी बहुतों को इसकी एक सर्वसम्मत परिभाषा से इनकार है।

राष्ट्र की प्रचलित अवधारणा एक बुर्जुआ अवधारणा है, जिसमें कुछ प्रतीकों को राष्ट्र का स्थानापन्न बना दिया गया है। आज प्रतीक-पूजा में राष्ट्रवाद का अर्थ संकुचित हो रहा है। राष्ट्र की मूल संकल्पना अपने लोगों से लगाव की संकल्पना से जुड़ी है, साझे हितों और साझी संस्कृति के तत्त्वों से जुड़ी है। इसमें साझा आर्थिक क्षेत्र सबसे बाद में आता है। पश्चिम में साझे आर्थिक क्षेत्र को राष्ट्र की संकल्पना में सबसे ऊपर रखा गया और वहां साम्राज्यवाद का जन्म हुआ। नतीजतन‘हम’ और ‘अन्य’ में बांट कर दुनिया को देखा गया। ‘हम’ के लिए अलग सरोकार और अन्य के लिए अलग सरोकार तय किए गए। प्राय: ‘अन्य’ के साथ अधिकारवादी और अमानवीय व्यवहार किया गया और इसे नाम दिया राष्ट्रीयता का। यह आक्रामक राष्ट्रवाद था जो दुनिया के संसाधनों पर जीत के स्वप्न के साथ विकसित हुआ था।

इसी आक्रामक राष्ट्रवाद ने विकसित और अविकसित, अगड़े और पिछड़े का भेद खड़ा किया। यह अगड़ा और पिछड़ा होने की स्थिति तय हो रही थी भौतिक वस्तुओं और जीवनशैली से। जो विकसित या अविकसित कहलाने के पैमाने तय किए गए वे भौतिक वस्तुओं के उपभोग की क्षमता के आधार पर तय किए गए। यानी उनका निर्धारण आर्थिक आधार पर किया गया, न कि सांस्कृतिक-मानवीय आधार पर।
पश्चिम की जो राष्ट्रवादी संकल्पना थी वह समावेशी न होकर बहिष्कृतिमूलक थी। वह एक बंद समूह का राष्ट्रवाद था जिसके व्यापारिक हित एक जैसे थे। इस संदर्भ में भारत में जिस राष्ट्र और राष्ट्रवाद की बहस को उन्नीसवीं सदी में पनपता देखते हैं, वह अपनी पहचान की बहस के साथ उभरता है। साम्राज्यवादी औपनिवेशिक ताकतों के बरक्स एक राष्ट्र, एक भाषा, एक जातीयता के रूप में पहचान का सवाल प्रमुख था। एक संगठित आक्रामक राष्ट्रवादी ताकत से लड़ने के लिए इनकी जरूरत थी। उस समय के लगभग सभी राष्ट्रवाद के व्याख्याताओं ने प्राय: उसी ढर्रे पर अपनी बात रखी।

लेकिन भारत जैसे बहुभाषा-भाषी, सांस्कृतिक बहुलतावादी, भिन्न-भिन्न जातीयता वाले समाज में राष्ट्रवाद की यह समझ तत्कालीन जरूरत को तो पूरा करती थी लेकिन बहुत दूर तक केवल इनसे लिपटे रहना भारत जैसे विशाल भौगोलिक, सांस्कृतिक भिन्नता वाले देश के लिए संभव नहीं था। दूसरा महत्त्वपूर्ण कारण स्वयं राष्ट्रवाद की अवधारणा में था। जिस औद्योगिक पूंजीवादी व्यवस्था की यह अवधारणा पैदाइश है वह अपने आप में अंतर्विरोधों से भरी है।

सत्रहवीं शताब्दी में यूरोपीय राष्ट्र और राष्ट्र-राज्य की अवधारणा को भारत के संदर्भ में ज्यों का त्यों लागू करते हुए राष्ट्र के उदय की स्थितियों को भारत में औद्योगिक विकास और अंग्रेजों के आगमन के साथ जोड़ते हुए अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि अंग्रेजों ने इतने बड़े भू-भाग को एकसूत्र में बांधा और एक राष्ट्र का रूप दिया। इसी के बरक्स स्वाधीन भारत में छोटे-बड़े राज्यों को भारत-भूखंड के साथ जोड़ने के नेहरू-पटेल सरकार के प्रयासों को आधुनिक भारत राष्ट्र के उदय के रूप में देखा जाता है।

सवाल उठता है कि अंग्रेजों के आगमन के पहले भारत के विभिन्न भागों में राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक आदान-प्रदान था अथवा नहीं था। शेरशाह सूरी के जमाने में ग्रैंड ट्रंक रोड का निर्माण हुआ था। व्यापार और भाषाई संपर्क भारत में मध्यकाल में मौजूद थे। क्या व्यापार, भाषा, संस्कृति और सुदृढ़ परिवहन व्यवस्था की मौजूदगी राष्ट्र-निर्माण के आवश्यक तत्त्वों को जन्म नहीं दे रही थी? उन्नीसवीं शती के उत्तरार्द्ध में 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम का भारतीय राष्ट्रवाद की अवधारणा के निर्माण में कोई अवदान है, या नहीं? अगर है, तो यह नहीं भूलना चाहिए कि 1857 के संग्राम की चेतना क्या थी। यह संग्राम अपनी मूल चेतना में जनतांत्रिक था। इसमें सभी धर्मों, जातियों और वर्गों ने भागीदारी की थी। यहां तक कि लैंगिक भेद से ऊपर उठ कर यह लड़ाई लड़ी गई थी।

अंग्रेज इस युद्ध में भाग लेने वाली जनता और उसके नायकों को बर्बरतापूर्वक कुचलने में सफल रहे और इस तरह भारतीय राष्ट्रवाद की उभरती जनतांत्रिक चेतना और साझी संस्कृति की जगह विभाजनकारी राष्ट्रवाद की चेतना को उभारने पर लगातार जोर दिया। अंग्रेज शासक अपनी विभिन्न नीतियों के द्वारा यह प्रक्रिया निरंतरता में चलाते रहे। अंग्रेजों ने भाषा, भूगोल, राजनीति और संस्कृति, सभी जगह राष्ट्र और राष्ट्रवाद की बहस को विभाजन और भेद-भाव की नीति पर विकसित करने में मदद की।

राष्ट्रवाद के भारतीय विचारकों के सामने चुनौती थी कि इस विभाजनमूलक राष्ट्रवाद से कैसे निपटें। राष्ट्रवाद की आरंभिक बहसों में हमारे यहां विभिन्नताओं की एकता पर बहस हुई। अनेकता में एकता की बात की गई। नेहरू से लेकर दिनकर तक ने एक ही सुर में बात की कि भारत में भिन्नताएं हैं, ये भिन्नताएं विशाल भौगोलिक क्षेत्र के कारण हैं, लेकिन इन सबके बीच आंतरिक एकता के सूत्र हैं जो ज्यादा मजबूत हैं, उन पर जोर दिया जाना चाहिए। क्या इतिहास, क्या साहित्य और क्या समाजविज्ञान- सबकी व्याख्या में यह दृष्टि घर कर गई। हिंदी साहित्य का संदर्भ लें तो रामचंद्र शुक्ल साहित्य में ‘विरुद्धों का सामंजस्य’ करते दिखाई देते हैं। भक्तिकाल के तमाम कवियों की व्याख्या लोकमंगल की साधना के रूप में की जाती है।

छायावादी कवियों के यहां राष्ट्र और व्यक्ति का द्वंद्व दिखाई देता है। 1916 के बाद से हिंदी साहित्य में जिस व्यक्तिवाद की धमक सुनाई पड़ती है, उसके पंख जगह-जगह राष्ट्रवाद की तलवार से कुतर दिए जाते हैं। प्रसाद के तमाम नाटकों, कहानियों और कविताओं में राष्ट्रवाद और व्यक्तिवाद का अंतर्द्वंद्व चलता है। अंतत: व्यक्ति के ऊपर राष्ट्र की चेतना की विजय होती है। रामचंद्र शुक्ल की शब्दावली में कहें तो यह समष्टिचेतना है, जिसमें सबका भला है। गांधी व्यक्ति और समुदायों का आह्वान राष्ट्र के नाम पर कर रहे थे। साम्राज्यवादी ताकत से लड़ने के लिए मजबूत राष्ट्रीयता-भाव से भरे समुदायों की जरूरत थी।

स्वाधीनता प्राप्ति के लक्ष्य ने जिस प्रकार की राष्ट्रीयता को जन्म दिया उसमें विषम आर्थिक विकास और जाति व्यवस्था पर टिके समाज के विभिन्न समुदायों की विशिष्ट जरूरतों को अलग-अलग सुनना और उनके लिए संघर्ष करना प्रमुख नहीं था। अत: बहुत-से जरूरी मुद््दे- जिनमें स्त्रियों, दलितों, अल्पसंख्यकों और आदिवासियों का मुद्दे महत्त्वपूर्ण थे- फर्श के नीचे खिसका दिए गए। राष्ट्रवाद के भीतर जिस मनुष्यतावाद की रक्षा करने की जरूरत थी, वह न हो सका।

प्रतीकवादी राष्ट्रवाद का, जिसमें पुनरुत्थानवादी तत्त्व अनिवार्य रूप से शामिल रहे हैं, बड़ा मखौल रवींद्रनाथ ठाकुर के यहां मिलता है। 1910 में लिखा गया उनका महत्त्वपूर्ण उपन्यास ‘गोरा’ राष्ट्रवाद की बहस के साथ ही विकसित होता है। गोरा सारा जीवन धर्म की पहचान के चिह्नों को राष्ट्र की पहचान के चिह्न के रूप में आग्रहपूर्वक धारण किए रहता है। जितना ही साम्राज्वादी ताकतों द्वारा उसकी राष्ट्रीयता पर हमला किया जाता है उतना ही धर्म और आचरण की श्रेष्ठता का बोध पैदा कर वह शत्रु को इस सांकेतिक लड़ाई में जीत लेना चाहता है। राष्ट्र की उसकी परिभाषा के अंदर दलित नहीं आते, अल्पसंख्यक नहीं आते। स्त्रियों की स्वतंत्रता और उनके संपर्क से उसे चारित्रिक पतन का अंदेशा रहता है, यहां तक कि वह अपने घर में काम करनेवाली नौकरानी और अपनी माता से भी दूरी बरतता है, लेकिन जैसे ही उस पर उसके जन्म का रहस्य जाहिर होता है कि वह कुलीन हिंदू ब्राह्मण नहीं बल्कि एक आयरिश महिला का पुत्र है जो 1857 के राष्ट्रीय स्वाधीनता संग्राम के दौरान उसे जन्म देकर मर गई थी; तो वह कविगुरुकी राष्ट्र संबंधी चिंताधारा के अनुकूल ही स्त्री और अन्य समुदायों के सहयोग से व्यापक मनुष्यता के दुख दूर करने को अपना लक्ष्य बनाता है। कट््टर पहचान के समस्त रूपों को छिन्न-भिन्न कर देता है।

भारत में राष्ट्रवाद स्वाधीनता की आकांक्षा और सामाजिक सुधार के लक्ष्यों के साथ आया था। राष्ट्रवाद का अर्थ भारतीय परंपरा में कहीं भी यह नहीं है कि रूढ़ियों को पाला-पोसा जाए। चाहे वे राजा राममोहन राय हों, मदनमोहन मालवीय हों, सर सैयद अहमद खां हों, जोतिबा फुले हों या कोई अन्य। भारत में राष्ट्रवाद के प्रतिपादकों और स्वतंत्रता सेनानियों में एक बड़ा हिस्सा है जो इसे धर्मनिरपेक्षता के साथ सकारात्मक रूप में देखता है। इन सबके यहां राष्ट्र की परिकल्पना में राष्ट्र और नागरिक की स्वतंत्रता और सामाजिक रूढ़ियों से मुक्ति का सपना शामिल है। राष्ट्रवाद की सही दिशा भी यही है। केवल अबाध व्यापार के लिए नहीं, मनुष्यता के अबाध अस्तित्व के लिए भी हमें राष्ट्र को भौगोलिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सत्ता के रूप में देखते हुए भी उसे मनुष्यता और दिलों की सीमा के रूप में देखना बंद करना होगा। इसके लिए मुहिम व्यापारिक शक्तियां नहीं चलाएंगी, यह काम नागरिक के रूप में हमें ही करना है।

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