स्वास्थ्य संकटों के इस दौर में

भारत में प्रतिवर्ष डेंगू के हजारों मामले सामने आने और सैकड़ों मौतें होने के बावजूद प्रशासन इससे बचाव के कितने पुख्ता इंतजाम करता है।

सांकेतिक फोटो।

योगेश कुमार गोयल

भारत में प्रतिवर्ष डेंगू के हजारों मामले सामने आने और सैकड़ों मौतें होने के बावजूद प्रशासन इससे बचाव के कितने पुख्ता इंतजाम करता है। इसका खुलासा इसी से हो जाता है कि दुनिया में डेंगू का कहर झेलने वाली कुल आबादी के करीब पचास फीसद मरीज भारत में ही होते हैं। कोरोना संक्रमण के कारण हमारा स्वास्थ्य ढांचा पहले ही जरूरत से ज्यादा बोझ झेल रहा है और इसकी तीसरी लहर की चिंता भी बनी हुई है, ऐसे में डेंगू, चिकनगुनिया, वायरल बुखार आदि बीमारियों से भी एक साथ निपटने में स्वास्थ्य ढांचा पूरी तरह चरमरा सकता है।

उत्तर प्रदेश के बाद मध्यप्रदेश, बिहार, दिल्ली, हरियाणा सहित देश के कई राज्य इस समय डेंगू का दंश झेल रहे हैं। मध्यप्रदेश में अब तक करीब तीन हजार मामले सामने आ चुके हैं। उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद, मथुरा और आगरा जिलों में डेंगू से सौ से ऊपर मौतें हो चुकी हैं। केंद्र्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक इन क्षेत्रों में डेंगू के नए स्वरूप ‘डी-2’ का प्रकोप है, जो डेंगू की अन्य किस्मों से ज्यादा घातक है। इसे ‘डेंगू शॉक सिंड्रोम’ से जोड़ कर भी देखा जा रहा है। भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद के अनुसार कई मरीजों के रक्त नमूनों में डेंगू के इस घातक स्वरूप की पुष्टि हुई है। यह बहुत तेजी से फैलता और प्राणघातक साबित होता है। इसमें मरीज को बुखार आने के साथ उसका रक्तचाप अचानक कम हो जाता है, जिससे मरीज की मृत्यु भी हो सकती है। इसके अलावा यह प्लेटलेट को भी प्रभावित करता है।

चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मरीजों की त्वचा तेज बुखार के बावजूद ठंडी महसूस होती है। शॉक सिंड्रोम में मरीज बेचैन हो जाता है और धीरे-धीरे होश खोने लगता है। उसकी नब्ज कभी तेज चलती है तो कभी धीमी और रक्तचाप कम हो जाता है, जिससे मरीज सदमे में चला जाता है और उसके महत्त्वपूर्ण अंगों में रक्त संचार कम हो जाता है। कई मामलों में शॉक सिंड्रोम के मरीजों को अस्पताल तब ले जाया जाता है, जब उनकी हालत काफी नाजुक हो चुकी होती है और तब उन्हें बचा पाना बहुत मुश्किल हो जाता है।

कई बार डेंगू में कोशिकाओं से साइटोकाइन पदार्थ निकलने से रक्तवाहिकाओं को जोड़ने वाली कैपिलरी में स्राव होने लगता है और रक्त से प्लाज्मा बाहर निकलने लगता है, जिससे रक्तचाप कम हो जाता है। प्लाज्मा स्राव होने पर यह फेफड़ों, हृदय तथा पेट की ऊपरी परत पर जमा होने लगता है। एम्स के विशेषज्ञों का कहना है कि आमतौर पर लोग डेंगू के मरीजों का इलाज उनकी प्लेटलेट्स की गणना के आधार पर ही करते हैं, जबकि उनकी प्लेटलेट्स की संख्या पर निगरानी से ज्यादा जरूरी है हेमेटोक्रिट और रक्तचाप की निगरानी। हेमेटोक्रिट लाल रक्त कोशिकाओं की मात्रा का प्रतिशत है, जो पुरुषों में पैंतालीस और महिलाओं में चालीस फीसद होता है। अगर डेंगू के मरीजों में इसका स्तर सामान्य से अधिक बढ़ने लगे तो इसका अर्थ है कि मरीज की कैपिलरी से रक्त में मौजूद प्लाज्मा का रिसाव होने लगा है और यह जानलेवा हो सकता है। कैपिलरी वे रक्तवाहिनियां होती हैं, जिनकी दीवार डेंगू में अधिक छिद्रदार हो जाती है, जिस कारण प्लाज्मा रिस कर शरीर में ही आसपास जमा होने लगता है।

इस मौसम में हर साल डेंगू का ऐसा ही जानलेवा आतंक देखा जाता रहा है, लेकिन इसके बावजूद प्रशासन द्वारा डेंगू पनपने से रोकने के लिए समय रहते कोई कारगर कदम नहीं उठाए जाते। जब एकाएक कई स्थानों पर हालात बिगड़ने लगते हैं, तब प्रशासन गहरी नींद से जागता है। देश के अनेक राज्यों में हर साल इसी प्रकार डेंगू का कहर देखा जाता है, हजारों लोग डेंगू से पीड़ित होकर अस्पतालों में भर्ती होते हैं, जिनमें से सैंकड़ों मौत के मुंह में भी समा जाते हैं। डेंगू, चिकनगुनिया और वायरल बुखार वास्तव में कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का दुष्परिणाम हैं। अगर प्रशासन हर साल पहले ही दवाओं का छिड़काव कराने के साथ-साथ रोकथाम के लिए अन्य जरूरी कदम उठाए, तो लाखों लोग इन बीमारियों से बच सकते हैं। प्रशासन की घोर लापरवाही का ही नतीजा है कि विभिन्न राज्यों में कई इलाके ऐसे हैं, जहां कोई भी गली, मोहल्ला या परिवार ऐसा नहीं बचा है, जहां बच्चों से लेकर वृद्ध तक इस बीमारी से ग्रस्त न हुआ हो।

हालांकि हर साल 16 मई को राष्ट्रीय डेंगू दिवस भी मनाया जाता है, ताकि समय से एहतियाती कदम उठा कर डेंगू के खतरे को न्यूनतम किया जा सके, लेकिन जिम्मेदार लोगों के नाकारापन के चलते हर साल डेंगू के जानलेवा आतंक को झेलते रहना ही जैसे आम आदमी की नियति बन गई है। हर साल लगभग सभी जगहों पर स्थानीय प्रशासन द्वारा डेंगू की रोकथाम के पुख्ता इंतजाम के दावे तो किए जाते हैं, लेकिन जब एकाएक डेंगू का जानलेवा आतंक सामने आता है तो ये सारे दावे धरे के धरे रह जाते हैं और स्थिति बिगड़ने पर प्रशासन के हाथ-पांव फूल जाते हैं। वास्तविकता यही है कि अधिकांश स्थानों पर मच्छरों को पनपने से रोकने के लिए समय रहते संतोषजनक प्रबंध नहीं किए जाते, जिससे सरकारी और निजी अस्पतालों तक में मच्छरों की भरमार नजर आती है और डेंगू के साथ-साथ चिकनगुनिया, मलेरिया तथा स्वाइन फ्लू के मामले हर साल सामने आते हैं। डेंगू हो या अन्य कोई संक्रामक बीमारी, इनका प्रकोप बढ़ते ही निजी लैबों द्वारा आनन-फानन में जांच की दरें बढ़ा दी जाती हैं और अनेक स्थानों पर तो प्रशासन की मिलीभगत से इन बीमारियों की जांच की आड़ में मरीजों को लूटने का खेल प्राय: बेखौफ चलता है।

हर तीन-चार वर्ष के अंतराल पर डेंगू एक महामारी के रूप में उभरता है। करीब तीन साल पहले भारत में डेंगू के एक लाख से भी ज्यादा मामले सामने आए थे। तब एम्स में डेंगू के दस वर्षों के आंकड़ों का अध्ययन करने पर यह तथ्य भी सामने आया कि एम्स में डेंगू से मृत्युदर सात से दस फीसद है। डेंगू अब दिनों-दिन इतना खतरनाक हो रहा है कि कुछ मामलों में यह मरीज को इतनी बुरी तरह अपनी चपेट में लेता है कि शरीर के अधिकांश अंग कार्य करना बंद कर देते हैं और उसकी मौत हो जाती है। अध्ययनकर्ताओं का कहना है कि पहले जहां डेंगू का असर पंद्रह-बीस दिनों बाद शरीर के अन्य अंगों पर शुरू होता था, वहीं कई मामलों में अब यह एक सप्ताह के अंदर ही किडनी, लीवर और आंतों तक पहुंच जाता है और शरीर के अंग कार्य करना बंद कर देते हैं।

इस समय कई स्थानों पर हालत यह है कि डेंगू के मरीजों से अस्पताल भरे पड़े हैं, एक-एक बिस्तर पर दो-तीन मरीज हैं और नए मरीजों को भर्ती करने के लिए जगह नहीं है। प्रतिवर्ष मानसून के बाद देश भर में डेंगू के कई हजार मामले सामने आते हैं और डेंगू की दस्तक के बाद डॉक्टरों तथा प्रशासन द्वारा आम जनता को कुछ हिदायतें दी जाती हैं, लेकिन डॉक्टर और प्रशासन इस मामले में खुद कितने लापरवाह रहे हैं, उसका प्रमाण डेंगू फैलने के बाद भी कमोबेश सभी राज्यों में जगह-जगह पर फैले कचरे और गंदगी के ढेर तथा विभिन्न अस्पतालों में सही तरीके से साफ-सफाई न होने और अस्पतालों में भी मच्छरों का प्रकोप देख कर स्पष्ट रूप से मिलता रहा है।

प्रशासनिक लापरवाही का आलम यह कि ऐसी कोई बीमारी फैलने के बाद एक-दूसरे पर दोषारोपण कर जिम्मेदारी से बचने की होड़ दिखाई देती है। भारत में प्रतिवर्ष डेंगू के हजारों मामले सामने आने और सैकड़ों मौतें होने के बावजूद प्रशासन इससे बचाव के कितने पुख्ता इंतजाम करता है, इसका खुलासा इसी से हो जाता है कि दुनिया में डेंगू का कहर झेलने वाली कुल आबादी के करीब पचास फीसद मरीज भारत में ही होते हैं। कोरोना संक्रमण के कारण हमारा स्वास्थ्य ढांचा पहले ही जरूरत से ज्यादा बोझ झेल रहा है और इसकी तीसरी लहर की चिंता भी बनी हुई है, ऐसे में डेंगू, चिकनगुनिया, वायरल बुखार आदि बीमारियों से भी एक साथ निबटने में स्वास्थ्य ढांचा पूरी तरह चरमरा सकता है।

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