ताज़ा खबर
 

शोषण की परतें

भारत में गरीबी घटने के बजाय बढ़ी ही है। गरीबी बढ़ने का ही नतीजा है कि गैर बराबरी, बेरोजगारी, हिंसा, शोषण और महिलाओं के प्रति अपराधों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। गांवों से शहरों की ओर पलायन पहले जैसा ही जारी है। ऐसे में सबसे जरूरी है कि सरकारें जनकल्याण की योजनाओं पर जोर दें। इससे कम से कम अपराधों में तो कमी लाई जा सकती है।

slaveryसांकेतिक फोटो।

पिछले कुछ समय में दुनिया में गुलामी और इससे जुड़े पेशों व बुराइयों पर दुनिया का ध्यान खींचने की कोशिशें होती रही हैं। संयुक्त राष्ट्र जैसे वैश्विक मंच से लेकर तमाम देशों खासतौर से विकसित देशों में मानवाधिकार समूह इनके खिलाफ आवाज उठाते रहे हैं और उन देशों को सचेत करते रहे हैं कि जहां ये समस्याएं गहरे पैठी हुई हैं।

समस्या ज्यादा गंभीर इसलिए भी है कि दुनिया के ज्यादातर देश आधुनिक गुलामी की परिभाषा में आने वाले अपराध और बुराइयों में जकड़े हुए हैं और इनसे मुक्ति पाने की दिशा में कोई उनकी ओर से गंभीर प्रयास होते भी नहीं दिखते। पिछले साल जारी एक सूचकांक में वैश्विक गुलामी से घिरे देशों में भारत का स्थान सबसे ऊपर रखा गया। आस्ट्रेलिया के एक मानवाधिकार समूह वॉक फ्री फाउंडेशन ने आधुनिक गुलामी के नए आयामों में भीख मांगने, बाल और बंधुआ मजदूरी व वेश्यावृत्ति जैसे अस्वीकार्य पेशों को शामिल किया है।

इस सूचकांक के मुताबिक आधुनिक गुलामी में सबसे ज्यादा बदतर स्थिति महिलाओं और बच्चों की है। इस मानवाधिकार समूह के मुताबिक भारत में सवा करोड़ से ज्यादा लोग बंधुआ मजदूरी और भीख मांगने जैसे काम में लगे हैं। जबकि हकीकत में भारत में यह स्थिति कहीं ज्यादा विकट है और ऐसे लोगों की तादाद छह-सात करोड़ से ज्यादा ही बैठेगी। पिछले कुछ सालों में भीख मांगने वालों की तादाद एक करोड़ आंकी गई थी और लगभग पांच करोड़ से ज्यादा लोग बंधुआ मजदूरी की गुलामी में फंसे थे।

इसमें भी बाल मजदूरों और महिलाओं की तादाद सबसे ज्यादा निकली। वेश्यावृति में फंसी महिलाओं और पुरुषों की तादाद छह से सात लाख के लगभग आंकी गई थी। दरअसल बंधुआ मजदूरी करने वाले लोगों की तादाद का सही आंकड़ा सरकार के पास नहीं है। घरों, कारखानों, होटलों, खेतों, ढाबों और दूसरे कार्यों में लिप्त बाल व बंधुआ मजदूरों की सही तादाद का पता लगा पाना आसान भी नहीं है। यह कोई छिपी बात भी नहीं है कि ऐसे जो सरकारी आंकड़े आते रहे हैं, वे वास्तविकता से बहुत दूर हैं।

गुलामी के पेशों में एशिया के जिन शीर्ष पांच देशों में भारत को सबसे ऊपर बताया गया है, उसमें चीन दूसरे और पाकिस्तान तीसरे पायदान पर है। आबादी के मुताबिक देखा जाए तो भारत की आबादी चीन से कम है। इस लिहाज से भारत में आधुनिक गुलामों की तादाद चीन से अधिक हुई। जाहिर है, इस वैश्विक गुलामी से पीछा छुड़ाने में भारत से अधिक चीन ने कारगर पहल की। पाकिस्तान और बांग्लादेश छोटे देश हैं, इसलिए इनकी तुलना भारत से नहीं की जा सकती।

लेकिन इन देशों के जो आंकड़े दिए गए हैं, उससे यह स्पष्ट होता है कि इनकी हालत भारत से अच्छी नहीं है। इस रिपोर्ट में आबादी के अनुपात के अनुसार जिन देशों के आंकड़े पेश किए गए हैं उसमें भारत, कतर, उत्तर कोरिया, कंबोडिया और उज्बेकिस्तान हैं। इन देशों में आधुनिक गुलामों की तादाद सबसे ज्यादा है। भारत में तमिलनाडु के शिवकाशी में दियासलाई उद्योग, उत्तर प्रदेश में कांच, ताला, चीनी मिट्टी के बर्तन व कालीन उद्योग, केरल के कांचीपुरम, तिरुवंतपुरम व दूसरे शहरों में चल रहे हथकरघा उद्योग, आंध्र प्रदेश के जग्गमपेट के टाइल उद्योग, जयपुर के पत्थर पॉलिश और जम्मू-कश्मीर व राजस्थान के कालीन उद्योग में बाल और बंधुआ मजदूरों की तादाद सबसे ज्यादा है।

भारत में मानव तस्करी की समस्या भी कम गंभीर नहीं है। हालांकि केंद्र और राज्य सरकारें इस दिशा में प्रयास करने की बातें करती रही हैं, कई कानून भी बने हैं, यदाकदा कार्रवाइयां भी होती हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में कोई बदलाव आता नहीं दिखा। राजधानी दिल्ली में ही मानव तस्करी के आए दिन खुलासे होते रहते हैं। लेकिन पुलिस मानव तस्करी पर अंकुश लगा पाने में नाकाम साबित हुई है।

सजा का जो प्रावधान है, उसके भय का भी इस अमानवीय कारोबार में लिप्त समूहों पर बहुत असर नहीं दिखता है। आधुनिक गुलामी के जितने भी आयाम हैं, सभी को अपराध घोषित किया जा चुका है। इसके बावजूद अपराध और अपराधी दोनों ही बढ़ रहे हैं। बंधुआ और बाल मजदूरी या मानव तस्करी कानून की नजर में भले अपराध हों, लेकिन इन्हें अंजाम देने वालों के हौसले बुलंद हैं।

आधुनिक गुलामी से निपटने के लिए सबसे अधिक दृढ़ता दिखाने वाले देशों में नीदरलैंड, अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, पुर्तगाल, स्पेन, नार्वे, बेल्जियम और स्वीडन जैसे देशों का नाम आता है। हैरानी की बात है कि भारत इस जमात में शामिल नहीं है। जाहिर है, भारत में इस दिशा में कानूनों को अमल में लाने काम अभी उतनी सख्ती और ईमानदारी से नहीं हो पाया है, जितना कि होना चाहिए।

इसका कारण यही है कि समाज में जिन कार्यों और प्रवृत्तियों को अपराध घोषित किया जा चुका है, उन पर अंकुश लगाने में शासन-प्रशासन नाकाम साबित हुए हैं। इसकी वजह भारत में भ्रष्टाचार और लापरवाही का बहुत ज्यादा होना है। समाज और सरकारें संवेदनहीन और गैरजिम्मेदार हैं। भारतीय समाज में लगातार बढ़ते ऐसे जघन्य अपराध इस हकीकत को और पुष्ट करते हैं कि नीचे से लेकर ऊपर तक प्रत्येक क्षेत्र में अपराध रोकने की दृढ़ इच्छाशक्ति की बेहद कमी है। अपराधियों को पुलिस और राजनेताओं का संरक्षण यह साबित करता है कि अपराधी पुलिस के संरक्षण में ही बढ़ते हैं और इसी से उन्हें बड़े अपराध करने के लिए हौसला मिलता है।

चाहे बाल वेश्यावृति हो या बाल व बंधुआ मजदूरी से जुड़े मामले हों, हर मामले में पुलिस को कार्रवाई करने का पूरा अधिकार है। लेकिन लगता है ऐसे मामलों में कार्रवाई करने की उसकी कोई दिलचस्पी नहीं दिखती। वरना सक्षम कानून के होते हुए भी अपराध क्यों बढ़ते हैं, यह गंभीर सवाल है। ऐसे में केंद्र और राज्य सरकारों को चाहिए कि आधुनिक गुलामी के क्षेत्रों में फंसे लोगों को मुक्त कराने के लिए ऐसी कोशिशें हों जिनका सार्थक परिणाम सामने आए। इसके लिए पुलिस बल का कायाकल्प जरूरी है।

इसके लिए पहले भी कई क्षेत्रों से सरकारों को ऐसे सलाह-मशविरे दिए जाते रहे हैं। यह बात भी अरसे से कही जाती रही है कि यदि भारत को दुनिया में अपनी धमक बढ़ानी है और तमाम तरह की समस्याओं से निजात पाना है तो उसे दृढ़ इच्छाशक्ति का परिचय देना होगा। भ्रष्टाचार का खात्मा कर नई कार्य संस्कृति बनानी होगी। लेकिन भ्रष्टाचार के वैश्विक सूचकांक में भी हमारी स्थिति दयनीय ही है।

भारत में गरीबी घटने के बजाय बढ़ी ही है। गरीबी बढ़ने का ही नतीजा है कि गैर बराबरी, बेरोजगारी, हिंसा, शोषण और महिलाओं के प्रति अपराधों में बेतहाशा वृद्धि हुई है। गांवों से शहरों की ओर पलायन पहले जैसा ही जारी है। ऐसे में सबसे जरूरी है कि सरकारें जनकल्याण की योजनाओं पर जोर दें। इससे कम से कम अपराधों में तो कमी लाई जा सकती है।

वैश्विक गुलामी से जुड़े अपराधों से निपटने के लिए नए सिरे से पहल की जरूरत है। सरकारें यह कह कर नहीं बच सकतीं कि आज जिन पेशों को वैश्विक गुलामी कह कर भारत या दूसरे देशों पर निशाना साधा जाता है, वह किसी अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा है, या जिन पेशों को नई गुलामी का नाम दिया है, वे भारत ही नहीं दुनिया के तमाम देशों में सैकड़ों से सालों से जारी हैं। इसके लिए सिर्फ कानून ही पर्याप्त नहीं होंगे, सामाजिक और आर्थिक स्तर पर भी प्रयासों की सख्त जरूरत है। इक्कीसवीं सदी के किसी भी देश के लिए यह शर्म की बात है कि उसके यहां बड़े स्तर पर ऐसी सामाजिक बुराइयां और अपराध गहरी जड़ें जमाए हुए हैं। लोकतंत्र, मानवाधिकार, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार में समान अधिकारों का वादा और दावा करने वालों को इस बारे में सोचना होगा।

Next Stories
1 ग्रीष्म लहर की चुनौती
2 समान शिक्षा का सपना
3 विनिवेश और निजीकरण के आगे
यह पढ़ा क्या?
X