खुदकुशी, समाज और सवाल

जिन समाजों में ‘मैं’ की बजाय ‘हम’ की भावना होती है, उन समाजों में आत्महत्या दर अपेक्षाकृत कम होती है। समाज की मूल भावना ‘हम’ में ही निहित है। ‘मैं’ की भावना व्यक्ति को अकेलेपन की ओर धकेलती है। जब स्वयं की उन्नति ही सर्वप्रमुख हो जाती है और इसमें सफलता नहीं मिलती तो आत्महत्या के कारण जन्म लेते हैं।

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सांकेतिक फोटो।

बीते डेढ़ साल में महामारी ने दुनिया भर में लाखों लोगों का जीवन लील लिया। इस महामारी से मुकाबला करने के लिए दुनिया की तमाम शक्तियां एक साथ खड़ी हैं। लेकिन हम में से अधिकांश इस तथ्य से अनजान ही हैं कि दुनिया पिछले कई दशकों से निरंतर एक और गंभीर बीमारी से जूझ रही है जिससे लगभग आठ लाख लोग हर साल मौत के मुंह में चले जाते हैं। शायद ही ऐसा कोई देश होगा जहां आत्महत्या की प्रवृत्ति सरकार और समाज के लिए एक गंभीर संकट के रूप में सामने न आ रही हो। फिर भी इस समस्या को गंभीरता से नहीं लेना चिंताजनक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के मुताबिक अभी तक कुछ गिने-चुने देशों ने ही आत्महत्याओं की रोकथाम को अपनी स्वास्थ्य प्राथमिकता में शामिल किया है और सिर्फ अड़तीस देशों ने राष्ट्रीय स्तर पर रोकथाम रणनीति बनाई है।

दुनिया भर में यह मिथक कायम है कि आत्महत्या एक व्यक्तिगत कृत्य है जिसमें व्यक्ति अपने निजी कारणों के चलते जीवन समाप्त कर लेता है। पर वास्तविकता इससे कहीं अलग है। आत्महत्या के पीछे समाज की भूमिका सबसे अहम होती है। इस तथ्य पर सबसे पहले समाजशास्त्री इमाइल दुर्खीम ने अपनी पुस्तक ह्यद सुसाइडह्ण में विस्तृत चर्चा की। उनसे पूर्व अनेक विद्वानों ने आत्महत्या का संबंध पागलपन और भौतिक दशाओं से जोड़ कर देखा।

पर दुर्खीम ने एक लंबे और गहन शोध के पश्चात इन तथ्यों को नकारते हुए कहा था कि आत्महत्या का सामाजिक पर्यावरण की विभिन्न दशाओं के बीच का संबंध उतना ही अधिक प्रत्यक्ष और स्पष्ट होता है जितना जैविकीय और भौतिक दशाएं आत्महत्या के साथ एक अनिश्चित और अस्पष्ट संबंध को स्पष्ट करती हैं। अगर आत्महत्या की घचनाओं से जुड़े दुनिया भर के आंकड़ों का विश्लेषण करें तो यह स्वत: स्पष्ट हो जाएगा कि आत्महत्या का तानाबाना सामाजिक दबावों के चलते ही बुना जाता है। आर्थिक मंदी, अकेलापन, बेरोजगारी आदि समस्याओं को आत्महत्या से जोड़ कर देखा जाता है, पर इन कारणों की चर्चा करते हुए आमतौर पर इस तथ्य को भुला दिया जाता है कि भौतिक दशाएं सामाजिक दबाव का ही वास्तविक निरूपण हैं।

हालात की गंभीरता के मद्देनजर डब्ल्यूएचओ ने कुछ समय पहले नए दिशा-निर्देश जारी किए, ताकि इस दशक के अंत तक आत्महत्या की वैश्विक दर में एक तिहाई की कमी के लक्ष्य को हासिल किया जा सके। संयुक्त राष्ट्र स्वास्थ्य एजेंसी ने आत्महत्या की रोकथाम व जरूरी देखभाल के लिए सभी देशों की मदद के लिए नए परामर्श जारी किए हैं। इसके जरिए जीवन जीने की भावना को अपनाने व मजबूती प्रदान करने का प्रयास सबसे अहम कदम है। जीवन जीने की भावना उत्पन्न करने में समाज की भूमिका अहम होती है।

इस सत्य को इसलिए नहीं नकारा जा सकता कि क्योंकि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है और समाज ही उसके विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समाज और परिवार से प्राप्त सानिध्य भाव उसे जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव का मुकाबला करने का साहस देता है। यह शोध स्थापित तथ्य है कि जिन समाजों में ‘मैं’ की बजाय ‘हम’ की भावना होती है, उन समाजों में आत्महत्या की दर अपेक्षाकृत कम होती है। समाज की मूल भावना ‘हम’ में ही निहित है। ‘मैं’ की भावना व्यक्ति को अकेलेपन की ओर धकेलती है। जब स्वयं की उन्नति ही सर्वप्रमुख हो जाती है और इसमें सफलता नहीं मिलती तो आत्महत्या के कारण जन्म लेते हैं।

दुर्भाग्य पूर्ण तथ्य यह है कि आत्महत्या जैसी घातक प्रवृत्ति पर दुनिया भर में शोध कार्यों का अभाव है। मनोवैज्ञानिक इस बात पर विशेष बल देते हैं कि आत्महत्या से बचाव का सबसे सशक्त माध्यम समाज के उस जुड़ाव से है जहां वातार्लाप निरंतर बना रहे। उल्लेखनीय है कि जिन देशों में निजता को इतनी अधिक प्राथमिकता दी जाती है कि लोग अपने मन की बात भी किसी से नहीं करते, वहां विकास के तमाम मापदंडों पर खरे उतरने के बावजूद लोग अधिक आत्महत्या करते हैं। फिनलैंड और जापान इसके जीवंत उदाहरण हैं। फिनलैंड के मनोवैज्ञानिक भी यह स्वीकार करते हैं कि आमतौर पर एक दूसरे से बहुत कम बातें साझा करने की आदत की वजह से यहां के लोगों खासकर तौर पर युवाओं के लिए अपनी परेशानियों के बारे में खुल कर बात करना बहुत कठिन हो गया है।

इस हकीकत को स्वीकार करते हुए फिनलैंड ने राष्ट्रीय स्तर पर पहल की और जब आत्महत्या के कारणों की पड़ताल की तो पाया कि नब्बे फीसद लोग मानसिक विकारों के कारण ऐसा आत्मघाती कदम उठाते हैं। इसलिए फिनलैंड ने अवसाद की पहचान और उपचार के लिए लोगों को प्रशिक्षित किया और एक राष्ट्रीय नेटवर्क के जरिए लोगों के रुख में बदलाव लाने का प्रयास शुरू किया। इसके सकारात्मक परिणाम देखने में आए। 1990 से 2014 के बीच फिनलैंड में आत्महत्या की दर प्रति एक लाख पर 30.3 से गिर कर 14.6 फीसद पर आ गई। डब्ल्यूएचओ के आंकड़े बताते हैं कि विकासशील देशों में मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या के बीच सीधा संबंध है। आस्ट्रेलिया में मानसिक स्वास्थ्य और आत्महत्या रोकथाम समूह सांस्कृतिक प्रतिमानों को बदलने की कोशिश कर रहे हैं। स्कॉटलैंड में वर्ष 2000 में प्रति एक लाख लोगों पर आत्महत्या की दर 31.2 फीसद थी। इससे निपटने के लिए सरकार ने 2002 में ह्यचूज लाइफह्ण नामक एक राष्ट्रीय कार्यक्रम चलाया और वर्ष 2016 तक आत्महत्या दर में अठारह फीसद की कमी दर्ज की गई।

अगर भारत की बात की जाए तो 2019 में अंतरराष्ट्रीय स्वास्थ्य संस्था- ग्लोबल बर्डन आॅफ डिजीज की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार भारत में हर साल सवा दो लाख से ज्यादा लोग आत्महत्या कर रहे हैं, यानी हर चार मिनट में एक व्यक्ति अपनी जान दे रहा है। वर्ष २०१८ में पारित हुए मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम-2017 के तहत भारत में आत्महत्या के अपराधीकरण का कानून खत्म करते हुए मानसिक बीमारियों से जूझ रहे लोगों को मुफ्त मदद का प्रावधान किया गया है। इस नए कानून के तहत आत्महत्या का प्रयास करने वाले किसी भी व्यक्ति को बिना किसी भेदभाव के मदद पहुंचाना, इलाज करवाना और उसका पुनर्वास करना सरकार की जिम्मेदारी होगी।

यह सर्वविदित सत्य है कि किसी भी सामाजिक समस्या से निपटने के लिए समाज और सरकार दोनों की भूमिका बराबर होती है, जैसा कि जापान ने किया। जापान में अकीता प्रांत वह जगह है जहां सबसे ज्यादा खुदकुशी के मामले दर्ज किए जाते हैं। वहां के प्रशासक ने आत्महत्या पर रोक के लिए बजट का आवंटन किया। ह्यब्रीफ्रेंडर्स वर्ल्डवाइड टोक्योह्ण नाम की हॉट लाइन रात आठ बजे से सुबह साढ़े पांच बजे तक खुली रहती है। जापान में ऐसी और भी सेवाएं हैं।

इसी कड़ी में 2007 में एक सुसाइड प्रिवेंशन प्लान भी बनाया गया और सरकारी एजेंसियों ने समझने की कोशिश की कि किन परिस्थितियों के चलते लोग अपनी जान लेने पर विवश हो जाते हैं। फिर 2016 में प्रांतों को सुविधा दी गई कि स्थानीय जरूरतों के हिसाब से बदलाव लाया जाए। नतीजन जापान में आत्महत्या दर एक लाख में सत्ताईस से घट कर सोलह हो गई। जापान सरकार 2027 तक इसे तेरह फीसद तक लाना चाहती है। आत्महत्या की घटनाओं को रोकने के लिए जापान ने बाकयाद एक मंत्रालय- मिनिस्ट्री आॅफ लोनलीनेस बनाया है। ऐसी ही पहल तीन साल पहले ब्रिटेन ने की थी। ये उदाहरण इस तथ्य को समझने के लिए काफी हैं कि आत्महत्या से निपटने के लिए अथक प्रयासों की आवश्यकता है। मानव संसाधन का हनन किसी भी देश की अपूरणीय क्षति है। इसलिए भारत को भी इस दिशा में जरूरी कदम उठाने की जरूरत है।

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