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राजनीति: विषाणुओं के आगे बेबस इंसान

बर्ड फ्लू की मौजूदा संहारक क्षमता वैश्विक तापमान और एचआइवी (एड्स) के साझा खतरे से दस गुना अधिक व तीव्र है। यही नहीं, यदि किसी विषाणु में उत्परिवर्तन की क्षमता पैदा हो जाए, तो वह अचानक और भी ज्यादा संहारक बन जाता है।

Author Updated: January 11, 2021 11:03 AM
Birdसांकेतिक फोटो।

अभिषेक कुमार सिंह

टीकों के सहारे कोरोना विषाणु से जंग के खात्मे की उम्मीद लगाए बैठी दुनिया में इधर जहां इसके नए-नए रूपों से हलचल मच गई है, वहीं एवियन इंफ्लूएंजा यानी बर्ड फ्लू की एक बार फिर खौफनाक दस्तक ने चिंता में डाल दिया है। हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश सहित आधा दर्जन से ज्यादा राज्यों में विषाणु एच5एन8 और एच5एन1 की चपेट में आकर बड़ी संख्या में कौवों, बत्तखों, मुर्गे-मुर्गियों, कबूतरों और प्रवासी पक्षियों की मौतों का संकट अकेला यह नहीं है कि इसके दुष्परिणाम सिर्फ पक्षियों को भुगतने हैं, बल्कि असली डर यह है कि कहीं यह फिर हम इंसानों तक न पहुंच जाए। अगर ऐसा हुआ तो बर्ड फ्लू का डरावना अतीत कोरोना की त्रासदी को कई गुना बढ़ाते हुए ऐसा संकट पैदा कर सकता है, जिसमें हालात को काबू कर पाना आसान नहीं होगा।

वैसे तो कोरोना विषाणु से पैदा हुई महामारी कोविड-19 के प्रकोप के मद्देनजर किसी के लिए यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि बर्ड फ्लू के रूप में नई आपदा दुनिया का कितना बुरा हाल कर सकती है, पर कोरोना से पहले के दौर में एवियन इंफ्लूएंजा के खतरों को कोई कम बड़ी चेतावनी नहीं माना जाता था। बर्ड फ्लू के बारे में संयुक्त राष्ट्र कह जा चुका है कि जिस तरह दुनिया में आवागमन की रफ्तार तेज हुई है और लोगों के खानपान की प्रवृत्तियां बदली हैं, उन्हें देखते हुए बर्ड फ्लू का विषाणु एच5एन1 एक खतरनाक स्थिति पैदा करने की हैसियत में आ जाता है।

हालिया अतीत में इस विषाणु की चपेट में आने से दुनिया में पचास लाख से पंद्रह करोड़ लोगों के मारे जाने की आशंका जताई जा चुकी है। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र के एक स्वास्थ्य अधिकारी डेविड नेबारो के मुताबिक बर्ड फ्लू की मौजूदा संहारक क्षमता वैश्विक तापमान और एचआइवी (एड्स) के साझा खतरे से दस गुना अधिक और तेज है। यही नहीं, यदि किसी विषाणु में उत्परिवर्तन (म्यूटेशन) की क्षमता पैदा हो जाए, तो वह अचानक और भी ज्यादा संहारक बन जाता है।

उत्परिवर्तन का आशय यह होता है कि ऐसी स्थिति में कोई विषाणु एक संक्रमित व्यक्ति से दूसरे तक महज खांसी या छींक के जरिये भी पहुंच सकता है, उसके लिए संक्रमित मुर्गी या बत्तख का मांस खाना जरूरी नहीं रह जाता। विशेषज्ञों का मानना है कि बर्ड फ्लू का विषाणु एंटीजेनिक छलांग (यानी एक जीव प्रजाति से दूसरी जीव प्रजाति तक फैलने वाला संक्रमण) लगा चुका है और इसने इंसानों तक पहुंच का वह अंतिम दरवाजा पार कर लिया है, जो इसे सामान्य इन्फ्लूएंजा की तरह फैलने से रोके हुए था। अभी तक माना जाता था कि जब कोई व्यक्ति बर्ड फ्लू से संक्रमित पक्षी (मुर्गी या बत्तख) के अधपके मांस का सेवन करता है, तभी वह इसकी जद में आ सकता है।

लेकिन उत्परिवर्तन के बाद अब यह जरूरत भी खत्म हो चुकी है। अब समस्या उन विषाणुओं के इंसानों तक आ पहुंचने की है जिनका संबंध असल में पशु-पक्षियों को होने वाली संक्रामक बीमारियों से है। लेकिन खानपान की बदलती प्रवृत्तियों, वनों की अवैध कटाई और जलवायु परिवर्तन जैसे कारकों ने इंसानों को अन्य जीवों के विषाणुओं के करीब पहुंचा दिया है। ऐसे में घोड़ों, बंदरों, कुत्तों, कई वन्य जीवं से लेकर चमगादड़ों और अन्य पक्षी प्रजातियों को डसने वाले विषाणु प्रजातिगत दरवाजा पार कर इंसानी बस्ती में घुसपैठ कर चुके हैं।

बर्ड फ्लू हो, कोविड-19 हो या इबोला, स्वाइन फ्लू, निपाह और सार्स आदि कोई अन्य संक्रामक बीमारी, हाल के वर्षों में दुनिया भर में इनके उभार ने साबित कर दिया है कि इंसान यह मान कर निश्चिंत नहीं हो सकता कि जो बीमारियां पशु-पक्षियों को होती हैं, वे उसे नहीं हो सकतीं। असल में विषाणु जीवन की शुरूआती इकाइयों में से एक हैं। विज्ञान इस तर्क से सहमत है।

लेकिन बड़ा सवाल यह है कि इंसानों तक नए-नए विषाणु आखिर पहुंचते कैसे हैं। इसी तरह जिन विषाणुओं को पहले कभी देखा-सुना नहीं गया, वे अचानक कैसे सामने आ जाते हैं। इन सवालों के जवाबों में से एक यह है कि विषाणु कुछ और नहीं बल्कि जीवाणुओं में पनपने वाले परजीवी ही हैं। जब ये कुछ कोशिकाओं से किसी कारणवश बाहर निकल आते हैं या बैक्टीरिया का खोल तोड़ देते हैं तो उनकी चपेट में आने वाला कोई भी जीव आसानी से संक्रमित हो जाता है। मनुष्यों तक पशु-पक्षियों के विषाणु पहुंचने की दो बड़ी वजहें हैं।

एक है, जीवों के साथ इंसानों का संपर्क। यह संपर्क कई कारणों से हो सकता है। संभव है कि संक्रमित जीवों को लोगों ने पालतू बना कर अपने पास ही रखा हो। दुधारू मवेशियों, कुत्ते-बिल्ली और घोड़े जैसे जानवरों को होने वाली संक्रामक बीमारियां कब इंसानों को अपनी गिरफ्त में ले लें, कहा नहीं जा सकता है। आमतौर पर इंसान को वही विषाणु नुकसान पहुंचाते हैं जो दूसरे जीव-जंतुओं से उस तक पहुंचते हैं।

इस बारे में किए गए शोधों का निष्कर्ष है कि मनुष्य तक अस्सी फीसद विषाणु पालतू जानवरों, मुर्गियों, जंगली जानवरों के जरिए या फिर उन नए इलाकों की खोज के दौरान पहुंचते हैं, जहां वह पहले कभी न गया हो। हालांकि यह सही है कि विषाणुओं का एक प्रजाति से दूसरी प्रजाति के जीव तक पहुंचना दुर्लभ घटना है, और यदि ऐसा हो भी जाए तो भी इनके कोरोना विषाणु जैसा असर दिखाने की संभावना तो लाखों में एक बार ही हो सकती है। लेकिन मांसाहार की बदलती प्रवृत्तियां इंसानों को अन्य जीवों के विषाणु की चपेट में लाने का एक अन्य बड़ा कारण अवश्य है।

वैसे तो सभी जीवों में किसी न किसी तरह या कई तरह के विषाणुओं का संक्रमण हमेशा मौजूद होता है और उनका शरीर इससे लड़ कर जीवन को बनाए रखने में सक्षम होता है। मनुष्य के शरीर में भी कई ऐसे विषाणु होते हैं जो या तो उसे नुकसान नहीं पहुंचाते या फिर कुछ घातक बीमारियों से बचाते हैं। बीमारी से बचाने वाले वायरसों को मित्र विषाणु कहा जाता है।

इस श्रेणी में पेजिविषाणु और जीबीवी-सी का नाम लिया जा सकता है। लेकिन वायरसों के बढ़ते हमलों ने साबित किया है कि इस मामले में अगर इंसान डाल-डाल है, वे पात-पात हैं। मामला अकेले कोरोना का नहीं है, बल्कि बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू, इबोला, डेंगू बुखार और एचआईवी-एड्स से होने वाली मौतों में बीते तीन-चार दशकों में कई गुना बढ़ोत्तरी हो चुकी है और कहा जा रहा है कि 1973 के बाद से दुनिया को विषाणुजनित तीस नई बीमारियों ने मानव समुदाय को घेर लिया है।

धरती पर फैले सबसे घातक रोगाणुओं ने जैव-प्रतिरोधी और अन्य दवाओं के खिलाफ जबर्दस्त जंग छेड़ रखी है और बीमारियों के ऐसे उत्परिवर्तित विषाणु आ गए हैं, जिन पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि विषाणु लगातार अपना स्वरूप बदल रहे हैं और इस कारण उनके प्रतिरोध के लिए बनी दवाइयां और टीके कारगर नहीं रह पाते हैं। कोरोना विषाणु के मामले में यही हो रहा है।

ब्रिटेन-अफ्रीका में इसके नए रूपों ने कोविड-19 को लेकर बनाई जा रही टीकों तक के सामने यह चुनौती पैदा कर दी है कि वे इनके खिलाफ असरदार होंगी भी या नहीं। ऐसा क्यों हुआ? मेडिकल साइंस में इसका जवाब यह है कि ज्यादातर स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने रोगाणुओं (माइक्रोब्स) के जीवन चक्रों को समझने की कोशिश नहीं की या संक्रमण की कार्यप्रणाली को नहीं जाना। नतीजतन, हम संक्रमण की शृंखला तोड़ने में ही नाकाम नहीं हुए, बल्कि कुछ मामलों में तो इसे और मजबूत ही बना डाला है।

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