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राजनीतिः सरकारी स्कूलों के पक्ष में

हमारे स्कूल ऐसी प्रयोगशाला बना दिए गए हैं, जहां हर कोई विचारों और नवाचारों को आजमाना चाहता है। देश के लगभग बीस फीसद स्कूल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। समुदाय के लोगों की ज्यादा रुचि स्कूल में होने वाली शिक्षा की जगह वहां हो रहे आर्थिक कामों में अपना हिस्सा मांगने में अधिक दिखाई पड़ने लगी है।

Author March 17, 2016 2:29 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

सरकारी स्कूल हमारे देश की सावर्जनिक शिक्षा व्यवस्था की बुनियाद हैं। ये देश के सबसे वंचित और हाशिए पर पहुंचा दिए गए समुदायों की शिक्षा में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। देश की शिक्षा वयवस्था के निजीकरण और इसे मुनाफा आधारित बना डालने का मंसूबा पाले लोगों के रास्ते में भी सरकारी स्कूल सबसे बड़ी रुकावट हैं। तमाम हमलों और विफल बना दिए जाने की साजिशों के बीच इनका वजूद कायम है और आज भी जो लोग सामान शिक्षा व्यवस्था का सपना पाले हुए हैं उनके लिए यह उम्मीद बनाए रखने का काम कर रहे हैं।

नब्बे के दशक में उदारीकरण का दौर शुरू होने के बाद से सावर्जनिक सेवाओं पर बहुत सुनोयोजित तरीके से हमले हो रहे हैं। उन्हें नाकारा, चुका हुआ और अनुपयोगी साबित करने की हर कोशिश की जा रही है। एक तरह से सावर्जनिक सेवाओं का उपयोग करने वालों को पिछड़ा और सब्सिडी याफ्ता गरीब के तौर पर पेश किया जा रहा है। उच्च मध्यवर्ग, यहां तक कि मध्यवर्ग भी, अब सावर्जनिक सेवाओं के उपभोग में बेइज्जती-सा महसूस करने लगे हैं। उनको लगता है कि इससे उनका क्लास स्टेटस कम हो जाएगा। इसकी वजह से सरकारी सेवाओं पर भरोसा लगातार कम हो रहा है।

कायदे से तो इसे लेकर सरकार को चिंतित होना चाहिए था, लेकिन सरकारी तंत्र, राजनेता और नौकरशाह इन सबसे खुश नजर आ रहे हैं। चूंकि निवेश और निजीकरण सरकारों के एजेंडे में सबसे ऊपर आ चुके हैं, इसलिए सामाजिक सेवाओं में सरकारी निवेश को सब्सिडी कह कर मुफ्तखोरी के ताने माने जा रहे हैं और इन्हें कम या बंद करने का कोई भी मौका हाथ से जाने नहीं दिया जा रहा है।

हमारे सरकारी स्कूलों में भी धीरे-धीरे नेताओं, नौकरशाहों, व्यवसायियों और नौकरी-पेशा लोगों के बच्चों का जाना लगभग बंद हो चुका है, अब जो लोग महंगी और निजी स्कूलों की सेवाओं का मूल्य नहीं चुका सकते हैं उनके लिए सस्ते प्राइवेट स्कूल भी उपलब्ध हैं। इनमें से कई तो सरकारी स्कूलों के सामने किसी भी तरह से नहीं टिकते हैं, लेकिन फिर भी लोग अपने बच्चों को सरकारी स्कूल की जगह निजी स्कूलों में भेजना ज्यादा पसंद करते हैं। और तो और, अब स्वयं सरकारी स्कूल के अध्यापक भी अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूलों में भेजने को तरजीह देने लगे हैं। यह स्थिति हमारी सावर्जनिक शिक्षा व्यवस्था की त्रासदी ब्यान करती है।

आज हमारे स्कूल भी हमारी आर्थिक और सामाजिक गैरबराबरी के नए प्रतीक बन गए हैं। सत्ताधारियों की मदद से शिक्षा के एक व्यवसाय के रूप में पनपने के सबूत भी हैं। यह बहुत आम जानकारी हो चुकी है कि किस तरह से नेताओं, अफसरों और व्यापारियों की गठजोड़ ने सावर्जनिक शिक्षा को दीमक की तरह चाट कर धीरे-धीरे चौपट किया है, ताकि यह दम तोड़ दे और इसकी जगह पर निजी क्षेत्र को मौका मिल सके।

इसलिए जब कुछ अपवाद सामने आते हैं तो वे राष्ट्रीय खबर बन जाते हैं। 2011 में इसी तरह की एक खबर तमिलनाडु से आई थी, जहां इरोड जिले के कलेक्टर आर. आनंदकुमार ने जब अपनी छह साल की बेटी को एक सरकारी स्कूल में दाखिल कराया, तो यह घटना एक राष्ट्रीय खबर बन गई। स्कूल के स्तर पर भी इसका असर देखने को मिला था। कलेक्टर की बच्ची के सरकारी स्कूल में जाते ही सरकारी अमले ने उस स्कूल की सुध लेनी शुरू कर दी और उसकी दशा पहले से बेहतर हो गई। जाहिर है, अगर यह अपवाद आम व्यवहार बन जाए तो बड़े बदलाव देखने को मिल सकते हैं।

शायद इसी को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर, 2014 में केंद्र सरकार से कहा था कि जिस तरह से सरकारी मेडिकल कॉलेज सबसे अच्छे माने जाते हैं उसी तरह से सरकार देश भर में अच्छे स्कूल क्यों नहीं खोलती है। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने भी पिछले साल अगस्त में एक महत्त्वपूर्ण फैसला देते हुए उत्तर प्रदेश सरकार से कहा था कि जन-प्रतिनिधियों और सरकारी खजाने से वेतन या मानदेय पाने वाले हर व्यक्ति के बच्चे का सरकारी स्कूल में पढ़ना अनिवार्य किया जाए और इसकी अवहेलना करने वालों पर कड़ी कार्रवाई हो। इस फैसले का आम जनता द्वारा तो खूब स्वागत किया गया, लेकिन संपन्न वर्ग की प्रतिक्रिया थी कि पालकों को यह आजादी होनी चाहिए कि उन्हें अपने बच्चों को कहां पढ़ाना है। हाईकोर्ट के इस आदेश के बावजूद उत्तर प्रदेश के मंत्री और नौकरशाह इस पर अमल के लिए तैयार नहीं हुए। पिछले दिनों जो खबरें आर्इं, उनके अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार हाईकोर्ट के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) दाखिल करने की तैयारी में है।

यह एक ऐसा दौर है जब तमाम ताकतवर और रुतबे वाले लोग ‘सरकारी स्कूलों के निजीकरण’ के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। इसके लिए खुले तौर पर लॉबिंग की जा रही है। ये लोग सरकारी स्कूलों को ऐसा सफेद हाथी बता रहे हैं, जो चुका हुआ, भ्रष्ट, निष्क्रिय, और बोझ बन चुका है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी नाम की कॉरपोरेट सामाजिक जिम्मेदारी नुमा एक सामाजिक संस्था है, जिसका मानना है कि सरकारी स्कूल भारत के बच्चों की जरूरतों पर खरे नहीं उतर रहे हैं। इसीलिए यह निजी स्कूलों की वकालत और जनमत बनाने का काम करती है।

सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी द्वारा ‘स्कूल चयन अभियान’ नाम से एक परियोजना चलाई जा रही है, जिसके तहत स्कूलों की जगह छात्रों को फंड देने की वकालत जा रही है, जिसे वे ‘स्कूल वाउचर’ का नाम दे रहे हैं। उनका तर्क है कि इस वाउचर के सहारे गरीब और वंचित परिवारों के बच्चे भी अपने चुने हुए स्कूलों में पढ़ सकेंगे। जाहिर-सी बात है कि इससे उनका मतलब निजी स्कूलों से है। सेंटर फॉर सिविल सोसाइटी की एक प्रमुख मांग यह भी है कि आरटीइ कानून को लेकर उस गुजरात मॉडल को अपनाया जाए, जहां निजी स्कूलों की मान्यता के लिए जमीन और अन्य आवश्यक संसाधनों में छूट मिली हुई है और लर्निंग आउटपुट के आधार पर मान्यता का निर्धारण होता है। इस साल फरवरी में निजी स्कूलों के संगठन नेशनल इंडिपेंडेंट स्कूल्स एलांयस (नीसा) द्वारा इसी मांग को लेकर दिल्ली के जंतर मंतर पर एक प्रदर्शन भी किया गया, जिसमें प्रधानमंत्री से स्कूलों की मान्यता के मामले में गुजरात मॉडल को देश भर मे लागू करने की मांग की गई थी।

दरअसल, यह ढील इसलिए मांगी जा रही है, क्योंकि लाखों की संख्या में प्राइवेट स्कूल शिक्षा का अधिकार कानून के मानकों को पूरा नहीं कर रहे हैं, इसलिए उन पर बंद होने का खतरा मंडरा रहा है। दरअसल, हमारी शिक्षा व्यवस्था सफेद नहीं, बीमार हाथी की तरह है, जिसे गंभीर इलाज की जरूरत है। मगर समस्या यह है कि हर कोई इसका अपनी तरह से इलाज करना चाहता है। यहां सूंड़ और पूंछ की कहानी सच साबित हो रही है और कुछ लोग इस भ्रम को और बढ़ा कर शिक्षा को अपनी दुकानों में सजाना चाहते हैं।

सरकारी स्कूल अगर बीमार हैं, तो इसके लिए जिम्मेदार कोई और नहीं, सरकारें हैं। शिक्षा को स्कूलों के एजेंडे से गायब कर दिया गया है और इसकी जगह पर शौचालय, एमडीएम और सतत तथा व्यापक मूल्यांकन प्रणाली (सीसीइ) को प्राथमिकता मिल गई है। सारा जोर आंकड़े दुरुस्त करने पर है, और स्कूल एक तरह से ‘डाटा कलेक्शन एजेंसी’ बना दिए गए हैं। कागजी काम बहुत हो गया है और शिक्षकों का काफी समय आंकड़े जुटाने और रजिस्टरों को भरने में ही चला जाता है। हर काम के लिए लक्ष्य और निश्चित समयावधि निर्धारित कर दी गई है। हमारे शिक्षकों का सारा ध्यान इसी लक्ष्य को पूरा करने की जोड़-तोड़ लगा रहता है।
हमारे स्कूल ऐसे प्रयोगशाला बना दिए गए हैं, जहां हर कोई विचारों और नवाचारों को आजमाना चाहता है। देश के लगभग बीस फीसद स्कूल एक शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं। समुदाय के लोगों की ज्यादा रुचि स्कूल में होने वाली शिक्षा की जगह वहां हो रहे आर्थिक कामों में अपना हिस्सा मांगने में अधिक दिखाई पड़ने लगी है। शिक्षकों के लिए किसी भी तरह के प्रोत्साहन की व्यवस्था नहीं है। उलटे सारी नाकामियों का ठीकरा उन्हीं के सिर पर फोड़ दिया जाता है।

इन तमाम समस्याओं से जूझते हुए भी हमारी सावर्जनिक शिक्षा वयवस्था अपने आप को बनाए और बचाए हुए है और दौड़ नहीं, तो कम से कम चल रही है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अनुसार देश भर में करीब दो लाख सरकारी स्कूल हैं, जहां 13.8 करोड़ बच्चे पढ़ते हैं, जबकि प्राइवेट स्कूलों में करीब 9.2 करोड़ छात्र पढ़ते हैं। यानी अब भी सरकारी स्कूल ही हैं जो तमाम कमजोरियों के बावजूद हमारी शिक्षा व्यवस्था को अपने कंधे पर उठाए हुए हैं और आज भी सबसे ज्यादा बच्चे अपनी शिक्षा के लिए इन्हीं पर निर्भर हैं, जिनमें ज्यादातर गरीब और हाशिये पर पंहुचा दिए गए समुदायों से हैं। इसलिए जरूरी है कि इन्हें मजबूत बनाया जाए।
मगर यह काम सभी की सहभागिता और सहयोग के बिना नहीं हो सकता है। इस दिशा में राज्य, समाज, शिक्षकों और स्कूल प्रबंधन समिति आदि को मिल कर अपना योगदान देना होगा। कोठारी आयोग द्वारा साठ के दशक में ही समान शिक्षा प्रणाली की वकालत की गई थी। मजबूत सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था हमें उस सपने के और करीब ला सकती है।

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