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राजनीति: आलस्य से उपजती बीमारियां

हर उम्र, हर वर्ग के लोगों में बढ़ रही आरामतलबी और अलस्य सिर्फ शारीरिक सक्रियता कम नहीं कर रही, ऐसी जीवनशैली की वजह से पैदा हो रही व्याधियां जन-धन की बड़ी क्षति के लिए भी जिम्मेदार हैं। जबकि ऐसी सभी बीमारियों से बचने का सबसे कारगर उपाय संतुलित भोजन और सक्रिय-सकारात्मक जीवनशैली अपनाना ही है।

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गलत दिनचर्या के चलते बढ़ रहा है हृदय रोग। सांकेतिक फोटो।
हर आयु वर्ग और कमोबेश दुनिया के हर हिस्से में, निष्क्रिय जीवनशैली बीते कई बरसों से चिंता का विषय बनी हुई है। पर इन दिनों घटती शारीरिक सक्रियता पर सोचना और जरूरी हो गया है, क्योंकि कोरोना संक्रमण से लड़ने में शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता ही सबसे अहम है। यही वजह है कि व्यायाम से बढ़ती दूरी और रोजमर्रा की जिंदगी में निष्क्रिय होते रहन-सहन के बारे में गंभीरता से सोचना जरूरी हो गया है।

हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपने दिशा-निर्देंशों- ‘डब्ल्यूएचओ गाइडलाइन आॅन फिजिकल एक्टिविटी एंड सेडेंटरी विहेबियर’ में हर उम्र के लोगों को नियमित व्यायाम करने के लिए चेताया है। इसके मुताबिक हर उम्र के लोगों को शारीरिक रूप से सक्रिय रहना बेहद जरूरी है। सभी वयस्कों को प्रत्येक सप्ताह कम से कम डेढ़ सौ से तीन सौ मिनट का वक्त कसरत के लिए निकालना चाहिए। यानी सभी के लिए प्रतिदिन औसतन एक घंटे का व्यायाम जरूरी है। इसमें उन लोगों को भी हल्के-फुल्के व्यायाम करने की सलाह दी गई है, जो किसी गंभीर रोग से जूझ रहे हैं। इन सलाहों में दिव्यांगों और महिलाओं को भी शारीरिक गतिविधियों और व्यायाम के लिए प्रोत्साहित किया गया है।

महिलाओं को गर्भावस्था और प्रसव के बाद नियमित रूप से हल्के व्यायाम करने की सलाह देते हुए दिव्यांगों को व्यायाम से होने वाले फायदों के बारे में बताया है। डब्ल्यूएचओ ने कहा है कि अपनी जीवनशैली में व्यायाम को शामिल करने का सकारात्मक प्रभाव लोगों के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ेगा। इसीलिए लोग शारीरिक गतिविधियों में कमी न लाएं। संगठन के मुताबिक कोविड-19 के कारण घर तक सिमटी जिंदगी में बहुत से लोग शारीरिक सक्रियता से दूर हो रहे हैं। जबकि व्यायाम न केवल शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए जरूरी है, बल्कि शारीरिक रूप से सक्रिय रहने का असर रोग प्रतिरोधक क्षमता पर पड़ता है। यानी दुनिया के हर हिस्से में बसे लोगों को डब्ल्यूएचओ द्वारा यह सलाह दी गई है कि शारीरिक रूप से सक्रिय रह कर कोरोना ही नहीं, दूसरी बीमारियों को भी हराया जा सकता है।

दरअसल, परंपरागत रूप से श्रमशील जीवनशैली वाले हमारे देश में अब बड़ी आबादी शारीरिक निष्क्रियता की शिकार है। मौजूदा दौर में यह निष्क्रियता अनगिनत शारीरिक और मानसिक व्याधियों को न्योता देने वाली साबित हो रही है। एक ओर कुपोषण और चिकित्सा सुविधाओं की पहुंच न होना आमजन की सेहत के लिए खतरा है, तो दूसरी ओर सुविधा संपन्न जीवनशैली भी लोगों का स्वास्थ्य बिगाड़ रही है। गांवों से लेकर शहरों तक आम लोगों की जिंदगी में भागमभाग तो बहुत है, पर शारीरिक श्रम कम हुआ है। साथ ही इंटरनेट और स्मार्ट फोन की दखल ने भी शारीरिक निष्क्रियता में इजाफा किया है।

2018 में आई विश्व स्वास्थ्य संगठन की ही एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत की बड़ी आबादी आलस्य की वजह से कई गंभीर बीमारियों की जद में आ रही है। डब्ल्यूएचओ के आंकड़ों के मुताबिक करीब बयालीस करोड़ लोग आलस्य के कारण बीमार हो रहे हैं। यानी शारीरिक निष्क्रियता की चपेट में आने वाली आबादी, कुल आबादी का चौंतीस फीसद है। शारीरिक गतिविधियों में निष्क्रियता के कारण ऐसे लोगों के हृदयाघात, मोटापा, उच्च रक्तचाप, कैंसर और मधुमेह जैसी बीमारियों के साथ ही मानसिक रोगों की चपेट में आने का खतरा बढ़ा है। पिछले दो सालों में स्मार्ट फोन पर बीत रहा समय और जीवन की आपाधापी और बढ़ी है। नतीजतन, इस व्यस्तता के कारण बहुत से लोग शारीरिक श्रम से भी दूर हुए हैं। हाल के महीनों में कोरोना संक्रमण के कारण घरबंदी ने इस निष्क्रियता को और बढ़ा दिया है।

बीते कुछ वर्षों में डिजिटल होती जीवनशैली और सुविधा संपन्न रहन-सहन के चलते इंसानी शरीर की सक्रियता तेजी से कम हुई है। महानगरीय जीवनशैली में तो मशीनों की दस्तक ने रोजमर्रा के कामकाज से जुड़ी क्रियाशीलता को और कम कर दिया है। हाल के बरसों में लोगों की जीवनशैली और आर्थिक स्थिति में भी बड़ा बदलाव आया है। इसके चलते हर सुख-सुविधा जुटा लेना लोगों की प्राथमिकता बन गई है।

नतीजतन, सुविधा संपन्न जीवनशैली और कसरत से दूरी के चलते अब सेहत से जुड़े अनगिनत दुष्प्रभाव देखने को मिल रहे हैं। बदलते सामाजिक-पारिवारिक ढांचे में महिलाओं की शारीरिक सक्रियता तो और भी कम हो गई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का ही अध्ययन बताता है कि भारतीय महिलाओं में शारीरिक श्रम न करने की समस्या पुरुषों की तुलना में दोगुनी है। देश की तकरीबन 47.7 प्रतिशत महिलाएं पर्याप्त कसरत नहीं करती हैं। गौर करने वाली बात है कि हमारे यहां बच्चों और युवाओं में भी जंक फूड और निष्क्रिय जीवनशैली के कारण मोटापे के आंकड़े बढ़ रहे हैं।

यह वाकई चिंताजनक है कि गांवों-कस्बों में भी शारीरिक सक्रियता में कमी आई है। यही वजह है कि शारीरिक बीमारियां ही नहीं, मानसिक और मनोवैज्ञानिक उलझनें भी कई गुना बढ़ी हैं। जीवनशैली जनित बीमारियां हर आयु वर्ग को घेर रही हैं। छोटे-छोटे बच्चे भी बड़ी संख्या में मोटापे, अवसाद और तनाव का शिकार बन रहे हैं। देखा जाए तो दुनिया भर में ऐसे लोग बड़ी तादाद में हैं, जिनके बीमार रहने का कारण कसरत न करना है। दुनिया भर में अस्सी फीसद से भी ज्यादा किशोर आबादी शारीरिक रूप से पर्याप्त सक्रिय नहीं है। आंकड़े बताते हैं कि हर वर्ष वैश्विक स्तर पर पचास लाख मौतें लोगों को शारीरिक रूप से ज्यादा सक्रिय बना कर ही रोकी जा सकती हैं। पहले ही सामुदायिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर कई परेशानियों से जूझ रहे भारत जैसे बड़ी जनसंख्या वाले देश के नागरिकों लिए यह विचारणीय है कि कम से कम शारीरिक श्रम की कमी तो बीमारियों को बढ़ावा न दे।

व्यापक रूप से देखा जाए तो डिजिटल माध्यमों ने बेवजह व्यस्तता बढ़ा कर लोगों को शारीरिक सक्रियता से दूर किया है। इसके चलते शारीरिक बीमारियां ही नहीं, मानसिक व्याधियों के शिकार लोगों के आंकड़े भी बढ़ रहे हैं। सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर बीत रहा समय व्यावहारिक जिंदगी की जरूरतों और जिम्मेदारियों से ही चुराया जा रहा है। व्यायाम के लिए समय न निकाल पाने वाले लोग भी ऐसे मंचों पर काफी समय बिता रहे हैं। इनमें नई पीढ़ी के लोग बड़ी संख्या में हैं। हालात ऐसे हो चले हैं कि आज देश में जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों का बोझ 61.3 फीसद है। भारत में मधुमेह, हृदय रोग, मोटापा, उच्च रक्तचाप जैसी व्याधियों के रोगियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

युवा और बच्चे भी इन बीमारियों की चपेट में आ रहे हैं। हर उम्र, हर वर्ग के लोगों में बढ़ रही आरामतलबी और आलस्य सिर्फ शारीरिक सक्रियता कम नहीं कर रही, ऐसी जीवनशैली की वजह से पैदा हो रहीं व्याधियां जन-धन की बड़ी क्षति के लिए भी जिम्मेदार हैं। जबकि ऐसी सभी बीमारियों से बचने का सबसे कारगर उपाय संतुलित भोजन और सक्रिय-सकारात्मक जीवनशैली अपनाना ही है। ऐसे में शारीरिक व्यायाम को प्राथमिकता दिया जाना आवश्यक है।

कोरोना काल में भी एहतियात बरतते हुए श्रमशील जीवनशैली की ओर फिर लौटने की कोशिश जरूरी है। नागरिकों का अपनी सेहत से जुड़ी गतिविधियों को लेकर सजग और सक्रिय होना अच्छे स्वास्थ्य के लिए ही नहीं, देश की बेहतरी के लिए भी जरूरी है। यह समझना मुश्किल नहीं कि आमजन के स्वास्थ्य का सीधा असर उनकी कार्य-शक्ति पर पड़ता है। जिस तरह सरकार का बेहतर स्वास्थ्य सुविधा उपलब्ध कराने हेतु प्रयत्नशील रहना आवश्यक है, उसी तरह आम नागरिकों का भी अपनी जीवनशैली का चुनाव करते हुए चिंतनशील रहना जरूरी है।

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