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राजनीति: संकट में घिरे इमरान

पाकिस्तान में ग्यारह विपक्षी दलों का मोर्चा लोकतंत्र को बचाने के लिए सड़कों पर है। इनके उद्देश्य तो काफी बड़े हैं, पर सफलता को लेकर संदेह है। मोर्चे में शामिल दलों का अपना ही इतिहास लोकतंत्र विरोधी रहा है। उनकी सोच में बदलाव नहीं है। इसमें शामिल कई दल अभी तक एक दूसरे को काटने के लिए सेना और कट्टरपंथी संगठनों का सहारा लेते रहे हैं।

Defameइमरान खान की लोकप्रियता में गिरावट। फाइल फोटेा।

इमरान खान ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को लेकर नवाज शरीफ पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए थे। लेकिन जब इमरान खान खुद सत्ता पर आसीन हुए तो गलियारे के भ्रष्टाचार पर वे चुप हो गए, क्योंकि इसमें पाकिस्तान सेना और चीनी कंपनियों के आर्थिक हित जुड़े हुए हैं।
पाकिस्तान की राजनीति में इन दिनों तूफान-सा आया हुआ है। देश के प्रमुख विपक्षी दल सड़कों पर उतरे हुए हैं। ग्यारह विपक्षी दलों ने मिल कर पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट (पीडीएम) का गठन किया है। कोरोना काल में विपक्ष की जोरदार रैलियों से सरकार की नींद उड़ी हुई है।

अब तक गुजरांवाला, कराची, क्वेटा और पेशावर में हुई चार रैलियों में जिस कदर लोग उमड़े हैं, उससे साफ है कि इमरान खान सरकार की लोकप्रियता का ग्राफ नीचे जा रहा है। सेना भी इन रैलियों से परेशान है और उसने विपक्षी दलों को बातचीत का न्योता दिया है। ऐसे में एक अहम सवाल यह है कि क्या पाकिस्तान में लोकतंत्र सेना के चंगुल से निकल सकेगा? क्या पाकिस्तान के लोकतांत्रिक दल धार्मिक संगठनों और जातीय कबीलाई प्रभाव से बाहर निकल सकेंगे?

पाकिस्तान में ग्यारह विपक्षी दलों का मोर्चा लोकतंत्र को बचाने के लिए सड़कों पर है। इनके उद्देश्य तो काफी बड़े हैं, पर सफलता को लेकर संदेह है। मोर्चे में शामिल दलों का अपना ही इतिहास लोकतंत्र विरोधी रहा है। उनकी सोच में बदलाव नहीं है। इसमें शामिल कई दल अभी तक एक दूसरे को काटने के लिए सेना और कट्टरपंथी संगठनों का सहारा लेते रहे हैं।

डेमोक्रेटिक मूवमेंट में शामिल कुछ नेताओं ने खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में आतंकी संगठनों का विरोध करने वाली, धर्मनिरपेक्षता और लोकतांत्रिक समाजवाद की वकालत करने वाली अवामी नेशनल पार्टी को आतंकियों के सहयोग से खत्म करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। विपक्षी नेता इमरान खान और सेना के बीच सांठगांठ का आरोप लगा रहे हैं।

लेकिन पाकिस्तान की लोकतांत्रिक राजनीति का सच यही है कि यहां का लोकतंत्र बड़े जागीरदारों, बिरादरी और उद्योगपतियों के पास नजरबंद रहा है। पाकिस्तानी लोकतंत्र बिरादरी, धर्म, जाति से ऊपर नहीं उठ सका। रोटी, कपड़ा और मकान का समाजवादी नारा देने वाले जुल्फिकार अली भुट्टो भी उद्योगपतियों और जागीरदारों के प्रभाव से बाहर नहीं निकल सके।

पाकिस्तान बनने के बाद देश के दो बड़े प्रांत पंजाब और सिंध की राजनीति कुछ परिवारों और बिरादरियों के नियंत्रण में चली गई। पाकिस्तान की सेना पंजाब और सिंध के बड़े जागीरदारों, मजबूत बिरादरी और परिवारों को लोकतांत्रिक राजनीति में इस्तेमाल करती रही। यहां की लोकतांत्रिक राजनीति को नून, टिवाना, वडैच, गरदेजी, लेघारी, दौलताना बिरादरी ही नियंत्रित करती रहीं।

राजनीति में पीर और धार्मिक समूहों की भी अपनी भूमिका शुरू से रही है। पश्चिमी पाकिस्तान की मजबूत बिरादरियों और पंजाबी-पश्तून वर्चस्व वाली पाकिस्तानी सेना ने बंगाली मुसलमानों को इसलिए पसंद नहीं किया कि वे वास्तव में लोकतांत्रिक थे। जुल्फिकार अली भुट्टो खुद को समाजवादी सोच का बताते थे। लेकिन उन्हें भी बंगालियों का लोकतंत्र पसंद नहीं आया। पश्चिमी पाकिस्तान की जागीरदारी और जातीय सोच ने बांग्लादेश बना दिया।

पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट की रैलियों में कई महत्त्वपूर्ण मुद्दे उठाए जा रहे हैं। बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार को लेकर इमरान खान सरकार और सेना पर हमले किए जा रहे हैं। विरोधियों का आरोप है कि सेना का सरकार में हद से ज्यादा दखल है, सेना ने ही इमरान खान को सत्ता में बिठाया है। हालांकि महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी से पाकिस्तान जनता लंबे समय से जूझ रही है।

पाकिस्तान डेमोक्रेटिक मूवमेंट में शामिल दो दल मुसलिम लीग (एन) और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी पहले सत्ता पर काबिज रहे हैं। 1980 और 1990 के दशक में नवाज शरीफ और बेनजीर भुट्टो लोकतांत्रिक राजनीति के माध्यम से देश के प्रधानमंत्री बने। उस समय भी महंगाई और भ्रष्टाचार पाकिस्तान में बड़े मुद्दे थे। गरीबी, भुखमरी और महंगाई को कम करने के लिए ईमानदार प्रयास कभी पाकिस्तान के नेताओं ने किए ही नहीं। पाकिस्तानी नेता जब विपक्ष में होते हैं तब उन्हें महंगाई, भ्रष्टाचार और बेरोजगारी याद आती है। आटा और चीनी की कीमतों को मुद्दा बनाते हैं।

भ्रष्टाचार के दाग से शायद ही कोई बड़ा पाकिस्तानी नेता बचा होगा। बेनजीर भुट्टो के पति और पूर्व राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी भ्रष्टाचार के मामले में जेल काट चुके हैं। पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ भी भ्रष्टाचार के आरोप में फंसे हुए हैं। इमरान खान को पहली बार सत्ता मिली है। दरअसल, पाकिस्तान में भ्रष्टाचार मामलों की जांच करने वाली एजेंसी- राष्ट्रीय जवाबदेही ब्यूरो (एनएबी) सत्ता पर काबिज लोगों के इशारे पर विरोधियों को तंग करती है।

यही नहीं, पाकिस्तान के लोकतांत्रिक दल जब विपक्ष में होते हैं तो जम कर सत्ता पक्ष पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हैं, लेकिन सत्ता में आने के बाद भ्रष्टाचार के उन बड़े मामलों में चुप्पी साध लेते है, जिसमें सेना या बाहरी मजबूत ताकतों के हित जुड़े होते हैं। इमरान खान ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे को लेकर नवाज शरीफ पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए थे। लेकिन जब इमरान खान खुद सत्ता पर आसीन हुए तो गलियारे के भ्रष्टाचार पर वे चुप हो गए, क्योंकि इसमें पाकिस्तान सेना और चीनी कंपनियों के आर्थिक हित जुड़े हुए हैं।

पाकिस्तानी लोकतंत्र के सामने चुनौतियां सेना और लोकतांत्रिक दलों को नियंत्रित करने वाले कुछ खास परिवारों की तरफ से भी हैं। वंशवादी नेता पाकिस्तानी लोकतंत्र की विशेषता हैं, जो सेना से सांठगांठ कर ही शासन चला सकते हैं। नवाज शरीफ भी सेना के करीब रहे हैं। जनरल मोहम्मद जिया-उल-हक की खास पसंद नवाज शरीफ थे, जो जिया की मेहरबानी से 1990 के दशक में पहले पंजाब के वित्त मंत्री और बाद में मुख्यमंत्री बने।

किसी जमाने में जुल्फिकार अली भुट्टो भी सेना के करीब थे। वे सैन्य तानाशाह अय्यूब खान के कार्यकाल में मंत्री रहे थे। इमरान खान अपने परिवार में पहली पीढ़ी के राजनेता हैं, जिन्होंने खुद पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआइ) नामक राजनीतिक दल बनाया। लेकिन वे भी पाकिस्तानी सेना की पसंद हैं और उसी के इशारे पर चलते हैं। इमरान बिरादरीवाद से भी ऊपर नहीं उठ पाए। उनके अंदर भी पश्तून बिरादरीवाद कूट-कूट कर भरा है। वे पश्तूनों वर्चस्व वाले संगठन तालिबान के प्रति हमदर्दी रखते हैं।

इस समय पाकिस्तान में भुट्टो परिवार की तीसरी पीढ़ी राजनीति कर रही है। पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी को नियंत्रित कर रहे भुट्टो परिवार का पाकिस्तान में आज भी प्रभाव है। सिंध का सबसे प्रभावशाली राजनीतिक परिवार भुटटो का ही है। उधर नवाज शरीफ परिवार की अगली पीढ़ी पाकिस्तान की राजनीति में प्रवेश कर गई है। पंजाब की राजनीति में शरीफ परिवार का दबदबा कायम है।

नवाज शरीफ खुद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बने, वहीं अपने भाई शाहबाज शरीफ को पंजाब का मुख्यमंत्री बनवाया। अब शरीफ परिवार की परंपरा नवाज शरीफ की बेटी मरियम नवाज बढ़ा रही हैं। शरीफ परिवार किसी भी कीमत पर पंजाब की सत्ता हासिल करना चाहता है। शरीफ परिवार को पंजाब की राजनीति में चुनौती दूसरे मजबूत परिवार चौधरी परिवार से मिलती रही है। चौधरी परिवार से संबंधित चौधरी शुजात हुसैन और परवेज इलाही कभी शरीफ के साथ ही थे। चौधरी परिवार भी सेना का करीबी रहा है, जिनका पंजाब के जाटों में खासा प्रभाव है।

पाकिस्तान के लोकतांत्रिक दलों की बड़ी समस्या धार्मिक संगठनों के साथ सांठगांठ की है। वैसे तो पाकिस्तान बनने के बाद ही इस्लामिक विचारधारा की पार्टियां पाकिस्तान में सक्रिय हो गईं, जिसमें जमात-ए-इस्लामी और जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम जैसी पार्टियां शामिल हैं। लेकिन 1990 के दशक में दूसरे लोकतांत्रिक दलों ने धार्मिक और कट्टरपंथी संगठनों का सहयोग लेना शुरू कर दिया।

जमात-ए-इस्लामी जैसी पार्टियों ने खुल कर धर्म की राजनीति की। देवबंदी मुसलमानों की पार्टी जमीयत उलेमा-ए-इस्लाम देवबंदी विचारधारा की वकालत करती है। नवाज शरीफ की पार्टी सहित कई दूसरे राजनीतिक दल भी धार्मिक संगठनों के प्रभाव में रहे हैं और विरोधी राजनीतिक दलों को खत्म करने के लिए इनका सहयोग लेते रहे हैं। ऐसे में अब पाकिस्तान का भविष्य क्या होगा, यह बड़ा सवाल है। जाहिर है, इसका एकमात्र जवाब भी यही है कि जो सेना चाहेगी।

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