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राजनीतिः बीमार भारत और चुनौतियां

गैर-संक्रामक रोगों से मरने वालों की ज्यादा तादाद गांवों में है। गांवों में स्वास्थ्य सेवा का बुनियादी ढांचा पूरी तरह चरमराया हुआ है। गांवों में स्थापित अस्पताल जर्जर हैं। न तो वहां डॉक्टर हैं और न दवाइयां। ऐसे में बेहतर इलाज के लिए ग्रामीण आबादी शहर की ओर रुख करने को मजबूर होती है। इसलिए गांवों में बेहतर और सस्ता इलाज उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए, ताकि लोगों को असमय मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सके।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की जनवरी 2015 में आई रिपोर्ट बताती है कि विश्व में गैर-संक्रामक रोगों से मरने वाले लोगों की तादाद लगातार बढ़ रही है और इसमें भारत की स्थिति बेहद नाजुक है।

अभिजीत मोहन

बेहतर इलाज और अच्छी स्वास्थ्य सेवाएं देने के मामले में भारत की स्थिति बेहद दयनीय है। मेडिकल जर्नल लैंसेट का यह खुलासा चिंतित करने वाला है। एक सौ सैंतीस देशों पर किए गए सर्वे के मुताबिक देश में खराब इलाज के कारण हर वर्ष तकरीबन चौबीस लाख लोगों को मौत के मुंह में जाना पड़ रहा है। रिपोर्ट में दर्शाए गए आंकड़ों पर गौर करें तो दो साल पहले यानी 2016 में मरने वालों का आंकड़ा सोलह लाख था, जो कि 2018 में बढ़ कर चौबीस लाख हो गया है। यह रेखांकित करता है कि तमाम प्रयासों के बावजूद देश में स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर नहीं हुई हैं। रिपोर्ट के मुताबिक एक सौ सैंतीस देशों की सूची में भारत अपने पड़ोसी देश चीन, बांग्लादेश, श्रीलंका और भूटान से भी पीछे है। बेहतर इलाज के अभाव में भारत में प्रति एक लाख लोगों में एक सौ बाईस की मौत होती है। जबकि पड़ोसी देश चीन में यह आंकड़ा छियालीस, श्रीलंका में इक्यावन, बांग्लादेश में सत्तावन, नेपाल में तिरानवे और पाकिस्तान में एक सौ उन्नीस है।

रिपोर्ट बताती है कि खराब इलाज से मरने वालों में भारत ब्रिक्स देशों में सबसे आगे है। रिपोर्ट के अन्य पहलुओं पर नजर दौड़ाएं तो तपेदिक (टीबी), दिल की बीमारी, पक्षाघात, टेस्टीकुलर कैंसर, कोलोन कैंसर और किडनी की बीमारी से जुड़े लोगों की सर्वाधिक मौतें भारत में ही होती हैं। रिपोर्ट में भारत को चेताते हुए कहा गया है कि अगर स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार नहीं हुआ तो गंभीर बीमारियों से मरने वालों की तादाद बढ़ सकती है। आंकड़ों पर गौर करें तो पता चलता है कि देश में सालाना होने वाली कुल मौतों में छह फीसद लोगों की मौत कैंसर से होती है। कैंसर की वजह से देश में रोजाना तेरह सौ मौतें होती हैं। इसी तरह मधुमेह भी भारत के लिए जानलेवा साबित हो रहा है। भारत में छह करोड़ से अधिक लोग मधुमेह से पीड़ित हैं। हर वर्ष तकरीबन पंद्रह लाख लोग इसकी चपेट में आ रहे हैं। इसी तरह भारत की आधी से अधिक आबादी श्वास संबंधी रोगों और फेफड़ों से जुड़ी बीमारियों से ग्रस्त है। रोजाना तकरीबन साढ़े तीन करोड़ लोग डॉक्टरों के पास बीमारियों के निदान के लिए जाते हैं। इस तरह भारत विश्व की सर्वाधिक बीमारियों का बोझ उठाने वाले देशों में शुमार हो चुका है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की जनवरी 2015 में आई रिपोर्ट बताती है कि विश्व में गैर-संक्रामक रोगों से मरने वाले लोगों की तादाद लगातार बढ़ रही है और इसमें भारत की स्थिति बेहद नाजुक है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया भर में हर वर्ष एक करोड़ साठ लाख लोग कैंसर, मधुमेह और हृदयघात जैसे गैर-संक्रामक रोगों की वजह से मर रहे है। रिपोर्ट के मुताबिक भारत में गैर-संक्रामक रोगों से तीस से सत्तर साल आयुवर्ग के लोगों के मरने की आशंका 26.1 से बढ़ कर 26.2 फीसद हो गई है। तुलनात्मक रूप से यह आंकड़ा दक्षिण एशिया और अफ्रीका के कुछ देशों की तुलना में बेहद खराब है। रिपोर्ट के मुताबिक पी-5 देशों (चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका) में केवल रूस की ही स्थिति (29.2 फीसद के साथ) भारत से अधिक खराब है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने माना है कि गैर-संक्रामक बीमारियों में कैंसर, डायबिटीज, हृदय रोग और सांस लेने में परेशानी संबंधी प्रमुख चार बीमारियां हैं। गैर-संक्रामक रोगों की वजह से भारत ही नहीं, विश्व की एक तिहाई आबादी मुश्किल में है। उसका कारण यह है कि इन गैर-संक्रामक बीमारियों से निपटने के लिए अभी तक कारगर कदम नहीं उठाए गए हैं। अच्छी बात यह है कि इस दिशा में ‘पार्टनरशिप टू फाइट क्रॉनिक डिजीज’ (पीएॅसीडी) ने हाल ही में संकल्प दिशा स्वस्थ भारत की नाम से एक राष्ट्रीय रूपरेखा तैयार की है। इसका उद्देश्य देश में 2025 तक स्वस्थ भारत के संकल्प को हासिल करने में सहयोग देना है। चूंकि भारत में गैर-संक्रामक रोगों से निपटने के लिए कोई ठोस नीति नहीं है लिहाजा ऐसे में इस ब्लू प्रिंट से राज्यों को स्वास्थ्य संबंधी मामलों को प्राथमिकता देने में मदद मिलेगी। अगर इसे जमीनी शक्ल दी जाती है तो भारत में हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और मस्तिष्क आघात से मरने वाले लोगों की संख्या कम होगी।

हालांकि भारत सरकार गैर-संक्रामक रोगों से निपटने के लिए भारी धनराशि खर्च कर रही है, लेकिन उसके अपेक्षित परिणाम देखने को नहीं मिल रहे हैं। चिकित्सकों का कहना है कि अगर इन बीमारियों पर शीध्र ही नियंत्रण नहीं किया गया तो यह बीमारी राष्ट्रीय आपदा का रूप ले सकती है। सरकार की कोशिश है कि गैर-संचारी रोगों को लेकर लोगों के बीच जागरूकता पैदा की जाए और व्यापक स्तर पर उनका शारीरिक परीक्षण कराया जाए। निस्संदेह यह एक सार्थक कहद होगा। लेकिन जानकर हैरानी होगी कि गत वर्ष सरकार ने तीस वर्ष से अधिक आयु के सात करोड़ लोगों के परीक्षण की योजना बनाई थी, पर अभी तक उस दिशा में दो कदम भी नहीं बढ़ा जा सका है। अगर इस योजना को आकार दिया जाए तो देश की एक बड़ी आबादी को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने में मदद मिलेगी। अगर गैर-संक्रामक रोगों के लक्षणों को समझ लिया जाए तो इन पर नियंत्रण पाने में आसानी होगी। गैर-संक्रामक रोगों का जितना जल्दी इलाज शुरू होता है, उतना ही लाभकारी होता है। सरकार को चाहिए कि वह गैर-संक्रामक रोगों की दवाइयों की बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण लगाए।

सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं में व्यापक सुधार के लिए शहरों के साथ-साथ गांवों पर ज्यादा फोकस बढ़ाना होगा। गैर-संक्रामक रोगों से मरने वालों की ज्यादा तादाद गांवों में है। गांवों में स्वास्थ्य सेवा का बुनियादी ढांचा पूरी तरह चरमराया हुआ है। गांवों में स्थापित अस्पताल जर्जर हैं। न तो वहां डॉक्टर हैं और न दवाइयां। ऐसे में बेहतर इलाज के लिए ग्रामीण आबादी शहर की ओर रुख करने को मजबूर होती है। इसलिए गांवों में बेहतर और सस्ता इलाज उपलब्ध कराना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए, ताकि लोगों को असामयिक मौत के मुंह में जाने से बचाया जा सके। निस्संदेह पिछले कुछ वर्षों में कैंसर जैसी घातक बीमारियों के उपचार में नई तकनीक और दवाइयां ईजाद हुई हैं, लेकिन ये इतनी अधिक महंगी हैं कि आम लोगों की पहुंच से बाहर हैं। हालांकि अच्छी बात यह है कि भारत सरकार महंगी जीवनरक्षक दवाइयों की कीमत कम करने का प्रयास कर रही है ताकि गंभीर बीमारियों से त्रस्त आम आदमी भी इलाज करा सके।

यहां ध्यान देना होगा कि नशाखोरी विशेष रूप से तंबाकू और शराब के कारण भी बीमारियां बढ़ रही हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि तंबाकू के सेवन से प्रतिवर्ष साठ लाख लोगों की मौत होती है और तरह-तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ता है। यह तथ्य है कि हर वर्ष हजारों लोगों की मौत शराब पीने और उससे उत्पन होने वाली बीमारियों की वजह से होती है। आज जरूरत इस बात की है कि भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं गंभीर बीमारियों से निपटने के लिए समन्वित रूप से असरकारक कार्यक्रम तैयार करें। इसलिए कि गंभीर बीमारियों का बढ़ता दायरा न सिर्फ जिंदगी को मौत में बदल रहा है बल्कि सामाजिक व आर्थिक विकास कार्य में भी विघ्न डाल रहा है। अच्छी बात यह है कि भारत सरकार ने देश के लोगों को निरोग बनाने के लिए आयुष्मान भारत योजना का शुभारंभ किया है। लेकिन इस योजना को अमलीजामा पहनाना किसी चुनौती से कम नहीं है।

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