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नेपाल में सत्ता संघर्ष

इस बार का राजनीतिक संकट नेपाल के भीतर ही उत्पन्न हुआ है। यह संकट साम्यवाद और लोकतंत्र के बीच सामंजस्य का भी है। सर्वोच्च न्यायालय ने संसद की बहाली भले कर दी हो, लेकिन लोकतंत्र और साम्यवाद के बीच अंतर्द्वंद्व ने कई सवालों को जन्म दिया है।

Nepalनेपाल में राजनीतिक संकट। फाइल फोटो।

सतीश कुमार

नेपाल में कम्युनिस्ट पार्टी का ढांचा पूरी तरह से विखंडित हो चुका है। कम्युनिस्ट पार्टी के दोनों वरिष्ठ नेता- पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड और केपी शर्मा ओली एक दूसरे के धुर विरोधी के रूप में सामने आ चुके हैं। ऐसे में अब साम्यवादी विचारधारा और लोकतंत्र पर सवाल उठने लाजिमी हैं। 1990 के बाद जब नेपाल में लोकतंत्र का आगाज हुआ था, तब से लेकर आज तक ज्यादातर वक्त कम्युनिस्ट पार्टी ही सत्ता में रही। ऐसे में क्या यह माना जाए कि लोकतंत्र और साम्यवाद दोनों एक दूसरे के विरोधी हैं, दोनों के बीच में एक सामानांतर रेखा खींचना मुश्किल है। नेपाल की तंग राजनीतिक व्यवस्था इसी बात की दुहाई दे रही है।

पिछले तीन दशक के दौरान नेपाल की राजनीतिक व्यवस्था की व्याख्या करें तो दो महत्त्वपूर्ण बातें देखने को मिलती हैं। पहली तो यह कि नेपाल में लोकतंत्र और साम्यवाद का प्रसार एक दूसरे के विरोधाभासी होने के बावजूद वहां के राजनीतिक तंत्र का अंग बनता गया। और दूसरी बात यह कि भारत विरोध की लहर नेपाल की राजनीति का हिस्सा बन गई, विशेषकर कम्युनिस्ट पार्टी के सत्ता में आने के बाद यह सोच एक चुनौती बनने लगी। जबकि भारत-नेपाल संबंध सदियों पुराने हैं। विश्व राजनीति में दो देशों के बीच ऐसे अनोखे और अटूट रिश्ते कहीं भी देखने को नहीं मिलेंगे। इसलिए यह सवाल खड़ा होता है कि नेपाल में भारत विरोध की लहर पैदा कैसे हुई? क्या गलती भारत से हुई है या नेपाल से? या फिर चीन जैसे भारत विरोधी राष्ट्र के दबाव में नेपाल ने यह रुख अपनाया?

नेपाल में प्रधानमंत्री केपी ओली के संसद भंग करने और इससे मची राजनीतिक उठापटक को समझने के बाद यह बात स्पष्ट हो गई है कि दलगत राजनीति और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा ने नेपाल की व्यवस्था को भारत विरोधी बनाने का काम किया है। क्योंकि इस बार ठीकरा भारत पर नहीं फोड़ा गया, बल्कि आपस में ही एक दूसरे पर फोड़ा गया। इस बदलाव ने यह भी तय कर दिया कि कम्युनिस्ट व्यवस्था की एकता भी दिखावे से ज्यादा कुछ नहीं थी। कम्युनिस्ट नताओं में न ही कोई वैचारिक समानता है, न ही प्रशासनिक संस्थाओं को मजबूत करने की इच्छाशक्ति। बेतरतीब व्यवस्था के बीच एक आसान-सा रास्ता भारत विरोध का बन जाता है।

अस्सी के दशक में नेपाल को शांति क्षेत्र बनाने की जिरह हुई थी, लेकिन भारत ने इसका विरोध किया था। उसके बाद 1989 में नेपाल ने चीन से भारी मात्रा में हथियार खरीदे थे। हथियारों की यह खरीद 1950 की भारत नेपाल संधि के विरुद्ध थी। उसके बाद नदियों को लेकर विवाद छिड़ गया। फिर भगवान बुद्ध की स्थली को लेकर भी नेपाल ने विवाद खड़ने शुरू कर दिए। नेपाल के इस तरह के रुख को देखते हुए भारत ने 1989 में व्यापार प्रतिबंध जैसा कदम उठाया था। उसके बाद 2015 में संविधान को लेकर जो बवाल हुआ, उसके बाद तो दोनों देशों के रिश्तों में एक तरह से ठहराव आ गया था।

नेपाल में सुप्रीम कोर्ट ने पिछले हफ्ते कार्यवाहक प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को बड़ा झटका देते हुए संसद को भंग करने का फैसला पलट दिया और मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाले पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 275 सदस्यों वाली प्रतिनिधि सभा को भंग करने के सरकार के फैसले को असंवैधानिक करार देते हुए तेरह दिन के भीतर संसद का सत्र बुलाने का आदेश दे दिया। ओली सरकार की सिफारिश पर राष्ट्रपति विद्या देवी भंडारी ने पिछले साल दिसंबर में संसद भंग कर 30 अप्रैल और 10 मई को दो चरणों में चुनाव कराने की घोषणा कर दी थी। अपनी कम्युनिस्ट पार्टी में संकट झेल रहे ओली से ऐसी उम्मीद किसी ने नहीं की थी। राष्ट्रपति ने भी उनका पूरा साथ दिया।

सरकार के इस फैसले का उन्हीं की पार्टी के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी प्रचंड ने भारी विरोध किया। संसद भंग करने के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कुल तेरह याचिकाएं दायर हुर्इं। इनमें सत्तारूढ़ कम्युनिस्ट पार्टी के मुख्य सचेतक देव प्रसाद गुरुंग की याचिका भी शामिल थी। संसद भंग करने के फैसले के बाद ओली को कम्युनिस्ट पार्टी के विरोधी धड़े ने पार्टी से बाहर कर दिया था। तब ओली पार्टी के अध्यक्ष थे। विरोधी धड़े ने अब प्रचंड को अध्यक्ष बनाया है। संसद भंग करने के खिलाफ प्रचंड के नेतृत्व वाली कम्युनिस्ट पार्टी और विपक्षी नेपाली कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का स्वागत किया है।

इस बार का राजनीतिक संकट नेपाल के भीतर ही उत्पन्न हुआ है। यह संकट साम्यवाद और लोकतंत्र के बीच सामंजस्य का भी है। सर्वोच्च न्यायालय ने संसद की बहाली भले कर दी हो, लेकिन लोकतंत्र और साम्यवाद के बीच अंतर्द्वंद्व ने कई सवालों को जन्म दिया है। पहले नेपाल में जो राजनीतिक अस्थिरता हुआ करती थी, उसके चलते संसद भंग करने का प्रावधान नहीं रखा गया था, ताकि स्थायित्व बना रहे। लेकिन अब नेपाल में राष्ट्रवाद की भावना के सहारे इस राजनीतिक संकट से निपटने की कोशिशें हो रही हैं। इसीलिए ओली की कैबिनेट ने नेपाल का नया राजनीतिक नक्शा जारी किया जिसमें लिंपियाधुरा, कालापानी और लिपुलेख को नेपाल का हिस्सा दिखाया गया। ऐसा करके ओली ने प्रचंड और माधव कुमार नेपाल जैसे विरोधियों को अपना साथ देने के लिए मजबूर कर दिया था।

नेपाल में साम्यवादी नेता अपने बुनियादी उसूलों से अलग होकर लोकतंत्र की नींव रखने की जुगत में दशकों से लगे रहे। साम्यवादी विचारधारा आर्थिक व्यवस्था के आईने में बनाई गई थी और इसका सीधा-सा अर्थ और मकसद हर व्यक्ति की जरूरत की पूर्ति एक राजनीतिक व्यवस्था के जरिए पूरा करना था। लेकिन दुनिया में कही भी और कभी भी ऐसा हुआ नहीं। यहां तक कि बोल्शेविक क्रांति के उपरांत रूस में भी नहीं।

सच्चाई यह है कि साम्यवादी व्यवस्था आज भी मार्क्स, लेनिन, स्टालिन और माओत्से तुंग के इर्दगिर्द ही सिमटी हुई है। पर यह भी सच है कि अमीबा की तरह उसमें से एक खंड अलग होकर एक नए अस्तित्व में दिखाई देने लगता है। किसी भी साम्यवादी व्यवस्था में इसके उदाहरण देखे जा सकते हैं। फिर भी लैटिन अमेरिका और एशिया के कुछ देशों में साम्यवादी तंत्र विकसित होता गया, लेकिन हर जगह उसका अंत दुनिया ने देखा। पर घोर आश्चर्य का विषय तो यह है कि साम्यवाद नेपाल में अपनी पीठ बनाने में सफल कैसे हो गया और 2007 से 2021 तक नेपाल की राजनीति का मुख्य केंद्र बना रहा।

नेपाल मूलत: एक हिंदू देश रहा है। उसकी पहचान भी सांस्कृतिक रूप से हिंदू रीति-रिवाजों से जुड़ी रही है। राजशाही के दौरान प्रचंड और केपी शर्मा ओली नेपाल की जेलों में बंद थे। नेपाल के लिए गरीबी सबसे बड़ी मुसीबत थी। अर्थव्यवस्था पूरी तरह से भारत केंद्रित थी। नेपाल की सेना महज राजा की सुरक्षा तक सिमटी थी। राष्ट्र राज्य के लिए सेना की जो भूमिका होती है, वह नेपाल में कभी बनी नहीं। ऐसे में नेपाल की अपनी कोई राजनीतिक सोच बनी भी नहीं।

अगर देखा जाए तो नेपाल में साम्यवाद का प्रसार भी बिहार के नक्सलवाद से जुड़ा हुआ था। जिस समय नक्सलबाड़ी आंदोलन बिहार में अपना मजबूत केंद्र बना चुका था, उसी समय से नेपाल के चंद नेता राजशाही के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध में लग गए थे और फिर इसी संघर्ष ने आगे चल कर जनक्रांति का रूप ले लिया था, जिसकी अगुआई प्रचंड कर रहे थे। लेकिन इस बात को समझने में भूल नहीं होनी चाहिए कि यह राजनीतिक सोच केवल गरीबी के कारण से नेपाल में बनी हुई है। जहां दुनिया भर में साम्यवाद अपने बुनियादी अंतर्द्वंद्व की वजह से खत्म हुआ, वही नेपाल में जिंदा कैसे है?

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