ताज़ा खबर
 

राजनीतिः ईरान पर डोरे डालता चीन

ईरान यह समझ रहा है कि उसके साथ साझेदारी बढ़ाने में चीन सिर्फ अपना हित देख रहा है, क्योंकि इस चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध चरम पर पहुंच चुका है। चीन अगर ईरान के साथ साझेदारी बढ़ाएगा, तो उसकी पहुंच फारस की खाड़ी तक आसानी से हो जाएगी।

Author Published on: August 1, 2020 1:31 AM
अगर चीन और ईरान के बीच इस प्रस्तावित साझेदारी पर सहमति बन जाती है तो भारतीय हित सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे।

संजीव पांडेय

ईरान और चीन के बीच आर्थिक-सामरिक साझेदारी संबंधों वाले प्रस्ताव को लेकर इन दिनों खासी हलचल है। दोनों मुल्कों के बीच प्रस्तावित साझेदारी में सिर्फ चार सौ अरब डालर का निवेश ही शामिल नहीं है, बल्कि इस साझेदारी से ईरानी बंदरगाहों पर चीन का प्रभाव और दखल भी काफी बढ़ने की संभावना है। फिलहाल दोनों मुल्कों के बीच आर्थिक-सैन्य साझेदारी संबंधी समझौते के प्रस्ताव पर भी विचार हो रहा है। हालांकि इस प्रस्ताव को अभी ईरानी संसद से मंजूरी नहीं मिली है। इसे ईरान के रणनीतिक खेल के रूप में भी देखा जा रहा है, क्योंकि अमेरिका में इसी साल राष्ट्रपति चुनाव होने हैं।

अगर चीन और ईरान के बीच इस प्रस्तावित साझेदारी पर सहमति बन जाती है तो भारतीय हित सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे, क्योंकि मध्य एशिया से लेकर अफगानिस्तान तक में भारत में प्रवेश का रास्ता ईरान के दो महत्त्वपूर्ण बंदरगाह हैं। भारत की परेशानी यह भी है कि ईरान ने भारत के सहयोग से बनाए जाने वाले चाबहार-जाहेदान रेल लाइन का निर्माण कार्य खुद शुरू कर दिया है। यह प्रस्तावित रेल लाइन भारत के लिए काफी अहमियत रखती है। रेल लाइन के सहारे भारत अफगानिस्तान के हाजीगक तक व्यापारिक रास्ते को विकसित करने की योजना बना रहा है। लेकिन ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंध इस रेल लाइन के विकास में भारतीय भागीदारी को लेकर बाधा बना हुआ है। ईरान-चीन के बीच साझेदारी संबंधी प्रस्ताव से यूरोपीए देश और अमेरिका भी सतर्क हैं, क्योंकि साझेदारी पर सहमति बनने के बाद ईरान होरमुज जलडमरूमध्य के पास स्थित जस्क बंदरगाह चीन के हवाले कर सकता है। होरमुज जलडमरूमध्य वैश्विक तेल आपूर्ति का एक महत्त्वपूर्ण रास्ता है। दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की जिद्द ने ईरान को चीन की तरफ जाने को मजबूर किया है।

ईरान-चीन सामरिक भागीदारी को लेकर ईरान में भी विरोधी स्वर उठे हैं। लेकिन सवाल यह है कि दुनिया ईरान से एकतरफा उम्मीद क्यों लगाए बैठी है? पश्चिमी ताकतें चाहती हैं कि ईरान चीन के पाले में न जाए, लेकिन वे ईरानी अर्थव्यवस्था के संकट पर ध्यान देने को तैयार नहीं हैं। आखिर ईरान की अपनी मजबूरियां हैं। जिस प्रस्तावित सामरिक भागीदारी पर बातचीत हो रही है, उसकी शुरुआत चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के 2016 में हुए ईरान दौरे के दौरान हुई थी। अब ईरान की मजबूरी है, क्योंकि अमेरिका ने 2018 के अंत में ईरान पर फिर से प्रतिबंध लगा दिए। अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद ईरान का तेल निर्यात ढाई लाख बैरल रोजाना पर सिमट कर रह गया। जबकि प्रतिबंध से पहले ईरान पच्चीस लाख बैरल कच्चा तेल रोजाना निर्यात करता था। रही-सही कसर तेल की गिरती कीमतों ने पूरी कर दी। इससे ईरान के सामने गंभीर संकट खड़ा होना स्वाभाविक था।

ईरान की चिंता उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा भी है। रेल, सड़क, नौवहन की बहुपक्षीय व्यवस्था वाले इस गलियारे को ईरान और मजबूत करने की कोशिशें करता रहा है। साल 2002 में इस गलियारे को पूरी तरह से विकसित करने के लिए ईरान, भारत और रूस के बीच सहमति बनी थी। गलियारे के विकास पर खासा काम भी हुआ। लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों ने गलियारे के भविष्य पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है। भारत के मुंबई से ईरान के बंदर अब्बास, चाबहार के रास्ते अजरबैजान होते हुए रूस और यूरोप तक जाने वाला यह गलियारा ईरान के लिए खासा महत्त्वपूर्ण है। इस गलियारे का विस्तार प्रस्तावित चाबहार-जाहेदान रेल लाईन तक है। ईरान पर दुबारा अमेरिकी प्रतिबंध लगाए जाने के बाद रूस इस गलियारे से संबंधित कुछ योजनाओं से पीछे हट गया। ईरान में अजरबैजान सीमा से तुर्कमेनिस्तान सीमा तक जाने वाली रेल लाइन का विद्युतीकरण करने का काम रूसी रेलवे के पास था, लेकिन उसने काम शुरू नहीं किया।

पिछले साल ईरानी राष्ट्रपति हसन रोहानी और रूसी राष्ट्रपति पुतिन के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाने को लेकर बैठक भी हुई थी, मगर जमीन पर दोनों मुल्कों के बीच सिर्फ सीरिया में रणनीतिक सहयोग नजर आया। इसके पीछे रूस का स्वार्थ भी हो सकता है। ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों का फायदा उठाते हुए रूस ईरान के हिस्से वाले अंतराष्ट्रीय तेल बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने लगा। इन बदले हालात का लाभ चीन उठा सकता है। अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण ईरान में योजनाओं के विकास से भारत और रूस पीछे हटे हैं। चीन के अपने रणनीतिक स्वार्थ हैं। चीन की बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव परियोजना अगर उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे से जुड़ गई, तो इससे चीन और ईरान दोनों को लाभ मिलेगा। चीन ईरान के रास्ते यूरोपीय बाजार तक पहुंच सकेगा। साथ ही, ईरान के महत्त्वपूर्ण बंदरगाहों में घुसपैठ कर फारस की खाड़ी से अरब सागर तक अपना वर्चस्व बढ़ाएगा।

हालांकि चीन-ईरान साझेदारी पर अभी ज्यादा कुछ कहना जल्दीबाजी होगी, क्योंकि प्रस्तावित साझेदारी में कई पेंच फंस सकते हैं। दरअसल, ईरान और पाकिस्तान में बहुत फर्क है। चीन के साथ सामरिक साझेदारी में पेंच ईरान का स्वाभिमान है। ईरान के कई नेताओं ने इस प्रस्तावित साझेदारी का विरोध किया है। ईरानी नेताओं का साफ मानना है कि चीन की छिपी शर्तें ईरान के स्वाभिमान और संप्रभुता दोनों को चोट पहुंचाएंगी। सामरिक साझेदारी में ईरान चीन की उन शर्तों को कतई नहीं मानेगा, जो जिनसे उसकी संप्रभुता पर आंच आए। ईरान चीन के निवेश, कर्ज और वर्चस्व के खेल को बखूबी समझता है। पाकिस्तान में चीन-पाक आर्थिक गलियारे को लेकर तमाम सवाल उठते रहे हैं। पाकिस्तान चीन के कर्जजाल में फंस गया है। कई परियोजनाओं को लेकर दोनों के बीच हुए समझौतों की शर्तों की जानकारी पाकिस्तानी संसद तक को नहीं है। इसे संसद और संसदीय समिति के अधिकार क्षेत्र से भी बाहर रखा गया है।

चीनी निवेश और कर्ज के जाल में अफ्रीकी देश भी बुरी तरह से फंस चुके हैं। अंगोला जैसे देश को तेल बदले निवेश और कर्ज देकर चीन ने अंगोला का जम कर दोहन किया है। कई और अफ्रीकी देश चीन के कर्ज जाल में बुरी तरह से फंस चुके है। इसलिए ईरान चीन से सामरिकी भागीदारी करने से पहले शर्तों की गहन पड़ताल करेगा। ईरान सुन्नी अरब देश सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और चीन के बीच के अच्छे संबंधों को भी नजरअंदाज नहीं कर सकता है। चीन के तेल आयात का बड़ा हिस्सा सऊदी अरब से आता है। चीन उत्पादों के लिए भी अरब जगत के देश बड़ा बाजार हैं।

दरअसल, ईरान ने चीन से साझेदारी बढ़ाने की बात कर संकेत दिए हैं कि उसे अगर बहुत ज्यादा तंग किया गया तो उसके पास विकल्प खुले हैं। ईरान इस बात को भलीभांति समझता है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के बाद ईरान-चीन का द्विपक्षीय व्यापार 2019 में घट कर तेईस अरब डालर रह गया, जबकि 2016 में ईरान दौरे के दौरान जिनपिंग ने दावा किया था कि दोनों मुल्कों के बीच द्विपक्षीय व्यापार दस साल में छह सौ अरब डालर तक लेकर जाएंगे। ईरान यह समझ रहा है कि उसके साथ साझेदारी बढ़ाने में चीन सिर्फ अपना हित देख रहा है, क्योंकि इस चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध चरम पर पहुंच चुका है। चीन अगर ईरान के साथ साझेदारी बढ़ाएगा, तो उसकी पहुंच फारस की खाड़ी तक आसानी से हो जाएगी।

चाबहार, जस्क और बंदर अब्बास बंदरगाह में चीन अगर निवेश करता है तो भारत की मुश्किलें बढ़ेंगी। भारतीय की कूटनीति के लिए यह गंभीर चुनौती होगी। ग्वादर और चाबहार नजदीक हैं। ग्वादर में चीनी नौसेना की मौजूदगी के कयास लगातार लगाए जा रहे है, लेकिन पाकिस्तान इससे इंकार करता रहा है। अगर ग्वादर, जस्क और चाबहार में चीन की नौसेना जम गई, तो भारत पश्चिमी समुद्री सीमा पर बुरी तरह से घिर जाएगा और समुद्री सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है।

 

 

 

 

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 राजनीतिः शिक्षा के डिजिटलीकरण की राह
2 राजनीतिः चीन की सामरिक घेरेबंदी
3 राजनीति: आसान नहीं है कोरोना टीके की डगर
ये पढ़ा क्या?
X