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राजनीतिः नए बैंक की चुनौतियां

मौजूदा समय में ग्रामीण इलाकों में पर्याप्त संख्या में बैंकों की शाखाएं नहीं हैं। जहां हैं, वहां सभी लोग बैंकों से जुड़ नहीं पाए हैं। एक अनुमान के अनुसार भारत की कुल आबादी के अनुपात में अड़सठ फीसद लोगों के पास बैंक खाते नहीं हैं। गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) वर्ग में सिर्फ अठारह फीसद के पास ही बैंक खाता है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की कुल शाखाओं का चालीस फीसद ग्रामीण इलाकों में है। सरकार चाहती है कि आइपीपीबी की सेवाओं का लाभ कमजोर तबके तक पहुंच सके।

इंडिया पोस्ट पेमेंट बैंक (आइपीपीबी) एक सितंबर से अस्तित्व में आ चुका है। इस बैंक का आगाज प्रधानमंत्री ने देश के सभी साढ़े छह सौ जिलों में और तीन हजार दो सौ पचास संपर्क केंद्रों पर एक साथ वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिए किया। इस बैंक में सौ फीसद हिस्सेदारी सरकार की ही होगी। माना जा रहा है कि यह बैंक पेशेवर तरीके से संचालित किया जाएगा। सरकार का लक्ष्य 31 दिसंबर तक देश के सभी एक लाख पचपन हजार डाकघरों से आइपीपीबी को जोड़ना है। आइपीपीबी को मजबूती देने के लिए सरकार ने बजट राशि बढ़ा कर चौदह अरब पैंतीस करोड़ रुपए कर दी है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने इस बैंक के लिए छह अरब पैंतीस करोड़ रुपए की अतिरिक्त राशि भी मंजूर की है, जिसमें से चार अरब रुपए सिर्फ इस नई बैंकिंग व्यवस्था की प्रौद्योगिकी पर और बाकी दो अरब पैंतीस करोड़ रुपए मानव संसाधन पर खर्च किए जाएंगे। हालांकि पहले इसके लिए आठ अरब रुपए आबंटित किए गए थे।

आइपीपीबी बचत और चालू खाता, पैसों का हस्तांतरण, बिल और अन्य सेवाओं के भुगतान संबंधी सेवाएं ग्राहकों को मुहैया कराएगा। ये सुविधाएं बैंक की शाखा में, माइक्रो एटीएम, मोबाइल, ऐप, इंटरनेट बैंकिंग, आइवीआर आदि के जरिए ग्राहकों को उपलब्ध कराई जाएंगी। इसके अलावा प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण और पेंशन आदि की सुविधाएं भी इस बैंक में होंगी। आइपीपीबी खाता खोलते समय ग्राहकों को एक क्यूआर कोड देगा, जिससे ग्राहकों को खाता संख्या याद नहीं करनी पड़ेगी। क्यूआर कोड की मदद से ग्राहक कई दूसरे तरह के वित्तीय लेनदेन भी कर सकेंगे। इन सुविधाओं को ग्राहकों तक पहुंचाने के लिए डाकियों को जरूरी उपकरण और स्मार्टफोन दिए जाएंगे।

भुगतान बैंक का स्वरूप व्यावसायिक बैंक से अलग होगा। मौजूदा बैंक नकदी जमा और निकासी पर नाममात्र का शुल्क लेते हैं, क्योंकि वे जमा राशि का उपयोग ब्याज और कर्ज देने में करते हैं, जबकि भुगतान बैंक जमा राशि का इस्तेमाल कर्ज देने में नहीं कर सकेंगे। रिजर्व बैंक के निर्देशानुसार भुगतान बैंक में चालू एवं बचत खाता के तहत एक लाख रुपए तक की जमा राशि स्वीकार की जाएगी, लेकिन क्रेडिट कार्ड और कर्ज देने की अनुमति इसे नहीं होगी। इस बैंक को एक साल तक की परिपक्वता वाले सरकारी बांडों में उनकी मांग का न्यूतनम पचहत्तर फीसद निवेश करना अनिवार्य होगा, जबकि अधिकतम पच्चीस फीसद जमा बैंकों के सावधि व मियादी जमाओं के रूप में रखी जा सकेगी।

पिछले एक साल में भारतीय डाक विभाग ने सत्ताईस हजार से ज्यादा डाकघरों को कोर बैंकिंग के नेटवर्क से जोड़ा है। बाकी डाकघरों को भी इस नेटवर्क से जोड़ने का काम चल रहा है। आइपीपीबी के विस्तार के लिए अंर्स्ट एंड यंग द्वारा सुझाए गए हाइब्रिड मॉडल पर काम किया जा रहा है। इसके तहत मौजूदा डाककर्मी आइपीपीबी के शाखाओं का संचालन करेंगे। आइपीपीबी महानगरों और राज्यों की राजधानियों सहित दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में शाखाएं खोलेगा। ग्रामीण इलाकों में शाखाओं को खोलना इसकी सबसे बड़ी प्राथमिकता है।

भारतीय डाक ने वर्ष 2013 में बैंकिंग क्षेत्र में कदम रखने की योजना बनाई थी। अगस्त, 2015 में इसे सैद्धांतिक रूप से रिजर्व बैंक ने इसे लाइसेंस देने का फैसला किया था। आइपीपीबी को पिछले साल ही शुरू करने की योजना थी। लेकिन बाजार की चुनौतियों को देखते हुए इसमें जल्दबाजी का जोखिम नहीं लिया गया। आइपीपीबी से मौजूदा सभी बैंकों को जबर्दस्त चुनौती मिलेगी, क्योंकि वित्तीय समावेशन और अन्य सामाजिक सरोकारों को पूरा करने में यह महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। साथ ही, सूचना एवं प्रौधोगिकी, परिचालन से जुड़े जोखिम, बैंकिंग प्रणाली को मजबूत करने, बढ़ती प्रतिस्पर्धा का मुकाबला करने और ग्राहकों की जरूरतों को पूरा करने में भी यह खरा साबित होगा।

मौजूदा समय में ग्रामीण इलाकों में पर्याप्त संख्या में बैंकों की शाखाएं नहीं हैं। जहां हैं, वहां सभी लोग बैंकों से जुड़ नहीं पाए हैं। एक अनुमान के अनुसार भारत की कुल आबादी के अनुपात में अड़सठ फीसद लोगों के पास बैंक खाते नहीं हैं। गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) वर्ग में सिर्फ अठारह फीसद के पास ही बैंक खाता है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की कुल शाखाओं का चालीस फीसद ग्रामीण इलाकों में है। सरकार चाहती है कि आइपीपीबी की सेवाओं का लाभ कमजोर तबके तक पहुंच सके। दूसरी ओर निजी, सरकारी और विदेशी बैंक वित्तीय समावेशन की संकल्पना को साकार नहीं कर पा रहे हैं। देश के कमजोर और वंचित तबके को आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाए बिना देश के सुचारू विकास को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है।

आजादी के सात दशक बाद भी आबादी का एक बड़ा तबका अपनी वित्तीय जरूरतों को पूरा करने के लिए अभी भी महाजनों और साहूकारों पर निर्भर ही है। हकीकत यह है कि ये सूदखोर गरीबों का शोषण कर रहे हैं, जिसके कारण अक्सर आत्महत्याओं के मामले प्रकाश में आते हैं। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि आइपीपीबी अपने बड़े नेटवर्क और मानव संसाधन की मदद से वित्तीय समावेशन को अमलीजामा पहनाने और लोगों की वित्तीय जरूरतों को पूरा करने की दिशा में प्रभावी भूमिका निभाएगा। यूरोपीय देशों में डिपार्टमेंट ऑफ पोस्ट के द्वारा ‘पोस्टल गिरो’ जैसी योजना के माध्यम से नागरिकों को बैंकिंग सुविधा मुहैया कराई जा रही है।

इस योजना के तहत यूरोपवासियों को मनीआर्डर के साथ-साथ भुगतान की सुविधा भी घर पर दी जाती है। भारत में भी ऐसा किया जा सकता है। आज मोबाईल फोन और ग्रामीण इलाकों में डाकघरों का बड़ा नेटवर्क है। आइपीपीबी का फोकस ग्रामीण क्षेत्र पर रहेगा। यह पारंपरिक बैंकिंग के अलावा बीमा और शुल्क आधारित सेवाएं, डिजिटल बैंकिंग आदि की सुविधा भी मुहैया कराएगा। पिछले कुछ सालों में केवाईसी (अपने ग्राक को जानिए) के अनुपालन में लापरवाही बरतने के कारण बैंकों में धोखाधड़ी की घटनाएं बढ़ी हैं। प्रणाली जनित खामियों और कर्मचारियों द्वारा बरती जाने वाली लापरवाहियों की वजह से भी ऐसी घटनाएं बढ़ी हैं।

हालांकि ऐसा आइपीपीबी में बिल्कुल नहीं होगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। आतंकवादी भी आइपीपीबी की इस कमजोरी का फायदा उठा सकते हैं। सुदूर ग्रामीण इलाकों में उनके द्वारा घुसपैठ करना आसान होगा। लिहाजा, केवाइसी एवं प्रणाली जनित खामियों एवं कमर्चारियों द्वारा बरती जाने वाली लापरवाहियों के मुद्दे पर प्रस्तावित आइपीपीबी को सावधानी से काम करना होगा। आइपीपीबी के समक्ष तकनीकी, वित्तीय समावेशन और आर्थिक स्तर पर अनेक चुनौतियां हैं, जिसे एक निश्चित समय-सीमा के भीतर आइपीपीबी को दूर करना होगा, वरना प्रतिस्पर्धा में यह दूसरे भुगतान बैंकों से पिछड़ सकता है। वित्तीय समावेशन का अर्थ होता है हर किसी को बैंक से जोड़ना।

बैंक से जुड़े रहने पर ही किसी को सरकारी सहायता पारदर्शी तरीके से दी जा सकती है। लिहाजा, इस संकल्पना को साकार करना आइपीपीबी के लिए आसान नहीं होगा। इस सवाल का उठना लाजिमी है कि क्या भारतीय डाक को बुनियादी सुविधायों से लैस किए बिना प्रस्तावित आइपीपीबी को शुरू करना व्यावहारिक कदम है? यह भी सवाल उठता है कि डाककर्मी बिना प्रशिक्षण के आइपीपीबी के संचालन में कैसे सहयोग करेंगे। व्यावहारिकता पर सवाल उठना इसलिए भी प्रासंगिक है, क्योंकि देश के सुदूर ग्रामीण इलाकों में अनेक भारतीय डाक घाटे में चल रहे हैं। समग्र रूप से भी भारतीय डाक घाटे में है। वित्त वर्ष 2015-16 में भारतीय डाक को 6007.18 करोड़ रुपए का शुद्ध घाटा हुआ था। फिर भी, इस मुद्दे पर सरकार का रुख अभी भी साफ नहीं है। केवल सरकारी मदद से किसी भी संस्थान को आखिर कब तक चलाया जा सकेगा?

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