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राजनीतिः कैसे रोक पाएंगे बाल विवाह

कैसी विडंबना है कि जिस देश में महिलाएं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च पद पर आसीन हुई हों वहां बाल विवाह जैसी कुप्रथा के चलते बहुत-सी बालिकाएं अपने अधिकारों से वंचित कर दी जाती हैं। बाल विवाह न केवल उनकी सेहत के लिहाज से बल्कि उनके व्यक्तित्व के विकास के लिहाज से भी खतरनाक है। इस कुप्रथा को खत्म करना है तो समाज को ही आगे आना होगा।

Author April 28, 2017 3:16 AM

रमेश सर्राफ धमोरा

तेलंगाना के रंगा रेड्डी जिले में बाल विवाह होते वक्त बचाई गई एक लड़की ने ग्यारहवीं की परीक्षा में 93 फीसद अंक लाकर सबको चौंका दिया है। पिछले वर्ष अप्रैल में संध्या नामक लड़की को एक सामाजिक संस्था की मदद से बाल विवाह का शिकार होने से बचा लिया गया। संध्या के पिता दसवीं की परीक्षा के बीच ही महज सोलह साल की उम्र में उसकी शादी कराना चाहते थे। बाल विवाह रोके जाने के करीब पंद्रह दिनों बाद ही संध्या के पिता की अधिक शराब पीने से मौत हो गई थी। संध्या ने कहा, आज पिता जिंदा होते तो उन्हें मुझ पर गर्व महसूस होता। पिता की मौत के बाद संध्या ही परिवार का खर्च चलाती है। वह दूसरों के कपड़े प्रेस कर अपना और परिवार का पेट पालने के साथ पढ़ाई कर रही है।
भारत में ही नहीं, दुनिया के कई और हिस्सों में बच्चे विवाह के बंधन में बांध दिए जाते हैं। भारत में यह प्रथा लंबे समय से चली आ रही है। जो बच्चे अभी खुद को भी अच्छे से नहीं समझते, जिन्हें जिंदगी की कड़वी सच्चाइयों का कोई ज्ञान नहीं, जिनकी उम्र अभी पढ़ने-लिखने की होती है उन्हें विवाह के बंधन में बांध कर क्यों उनका जीवन बर्बाद कर दिया जाता है?

यूनिसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार हमारे देश में सैंतालीस फीसद बालिकाओं की शादी अठारह वर्ष से कम उम्र में कर दी जाती है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि बाईस फीसद बालिकाएं अठारह वर्ष से पहले ही मां बन जाती हैं। यह रिपोर्ट हमारे सामाजिक जीवन के उस स्याह पहलू की ओर इशारा करती है जिसे अक्सर हम रीति-रिवाज व परंपरा के नाम पर अनदेखा करते हैं। तीव्र आर्थिक विकास, बढ़ती जागरूकता और शिक्षा अधिकार कानून लागू होने के बाद भी अगर यह हाल है, तो जाहिर है कि बालिकाओं के अधिकारों और कल्याण की दिशा में अभी काफी कुछ किया जाना शेष है। कैसी विडंबना है कि जिस देश में महिलाएं राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री जैसे सर्वोच्च पद पर आसीन हुई हों वहां बाल विवाह जैसी कुप्रथा के चलते बहुत-सी बालिकाएं अपने अधिकारों से वंचित कर दी जाती हैं। बाल विवाह न केवल उनकी सेहत के लिहाज से बल्कि उनके व्यक्तित्व के विकास के लिहाज से भी खतरनाक है।
हाल ही में जारी ‘एवरी लास्ट गर्ल’ नामक रिपोर्ट के अनुसार भारत में बाल विवाह में कमी जरूर आई है लेकिन आज भी देश में प्रति सात सेकेंड में अठारह साल से कम उम्र की किशोरी की जबरन शादी हो जाती है। सबसे ज्यादा बाल विवाह वाले देशों में अफगानिस्तान, यमन और सोमालिया के साथ भारत भी शामिल है। 2001 में हुई जनगणना के अनुसार देश में अठारह वर्ष से कम आयु की 43.5 फीसद किशोरियां शादीशुदा थीं। 2011 की जनगणना में यह आंकड़ा 30.2 था। कुल मिलाकर भारत की अठारह साल सेकम उम्र की दस करोड़ से ज्यादा किशोरियों के गले में मंगलसूत्र है। जबकि संयुक्त राष्ट्र की ओर से तैयार सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल (एसडीजी) के अनुसार 2030 तक भारत समेत पूरे विश्व में बाल विवाह को खत्म करने का लक्ष्य रखा गया है।

भारत में चौदह साल से कम उम्र की बच्चियों में बाल विवाह की दर कम है, लेकिन पंद्रह से अठारह साल की किशोरियों को शादी के बंधन में जबरन जोड़ दिया जाता है। राजस्थान, पश्चिम बंगाल और आंध्र प्रदेश में बाल विवाह की दर अन्य राज्यों की तुलना में ज्यादा है। कम उम्र में शादी के बाद जल्दी गर्भवती होने से जच्चा और बच्चा, दोनों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। इस खास वर्ग में ही शादी के बाद एड्स जैसी बीमारी के संक्रमण का खतरा भी सबसे ज्यादा होता है। पश्चिम बंगाल के कुछ जिलों के लोग अपनी लड़कियों की शादी कम उम्र में सिर्फ इसलिए कर देते हैं कि उनके ससुराल चले जाने से खर्च कुछ कम होगा। वहीं कुछ लोग अंधविश्वास के चलते अपनी लड़कियों की शादी कम उम्र में ही कर देते हैं।
मार्च 2015 में जारी भारत की जनगणना-2011 के कुछ खास आंकड़े बताते हैं कि इस समय देश में 1.21 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिनका बाल विवाह हुआ है। यह संख्या देश के कुल आयकर दाताओं की एक तिहाई है। बाल विवाह के सर्वाधिक मामलों वाले राज्य उत्तर प्रदेश, राजस्थान, बिहार, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश और गुजरात हैं। भले ही भारत ने पोलियो, चेचक और कुष्ठ जैसे घातक रोगों पर जीत हासिल कर ली हो, लेकिन राजा राममोहन राय से शुरू हुए संघर्ष के पौने दो सौ साल बीतने के बाद भी बाल-विवाह की समस्या कायम है।

जनगणना में बाल-विवाह के 1.21 करोड़ मामले दिख रहे हैं, जबकि पुलिस के पास मुश्किल से साल में कुछ सौ मामले ही दर्ज होते हैं। यानी 99 फीसद से ज्यादा बाल-विवाह के मामलों में शिकायत दर्ज नहीं होती। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने इस संबंध में फरवरी 2013 में बनाई राष्ट्रीय नीति में माना है कि पिछले पंद्रह सालों में बाल विवाह के मामलों में ग्यारह फीसद की कमी आई। इस रफ्तार से बाल विवाह खत्म करने में पचास साल और लग जाएंगे।
संयुक्त राष्ट्र की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार, भारत दुनिया का ऐसा तीसरा देश है जहां बाल विवाह का चलन सबसे ज्यादा है। भारत में बीस से उनचास साल की उम्र की करीब सत्ताईस फीसद महिलाएं ऐसी हैं जिनकी शादी पंद्रह से अठारह साल की उम्र के बीच हुई थी। जुलाई 2014 में यूनिसेफ द्वारा ‘एंडिग चाइल्ड मैरिज: प्रोग्रेस एंड प्रास्पेक्ट्स’ शीर्षक से बाल-विवाह से संबंधित एक रिपोर्ट जारी की गई। इस रिपोर्ट के अनुसार विश्व में 72 करोड़ महिलाएं ऐसी हैं, जिनकी शादी अठारह साल से कम उम्र में हुई है। विश्व की प्रत्येक तीन बालिका वधुओं में एक भारतीय है।

बाल विवाह की कुरीति को रोकने के लिए 1928 में शारदा एक्ट बनाया गया था। इस अधिनियम के मुताबिक नाबालिग लड़के और लड़की का विवाह करने पर जुर्माना और कैद हो सकती थी। आजादी के बाद से इस अधिनियम में कई संशोधन किए गए। 1978 में हुए संशोधन के तहत लड़की की शादी की उम्र न्यूनतम पंद्रह वर्ष से बढ़ा कर न्यूनतम अठारह वर्ष और लड़के की न्यूनतम अठारह वर्ष से बढ़ा कर न्यूनतम इक्कीस वर्ष कर दी गई। ‘बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम 2006’ की धारा 9 व 10 के तहत बाल विवाह के आयोजन पर दो वर्ष तक का कठोर कारावास तथा एक लाख रुपए का जुर्माना, या दोनों का प्रावधान किया गया है। इसके अलावा बाल विवाह कराने वाले अभिभावक, रिश्तेदार, विवाह कराने वाले पुरोहित या काजी को भी तीन महीने तक की कैद और जुर्माना हो सकता है। अगर बाल विवाह हो जाता है तब किसी भी बालक या बालिका की अनिच्छा होने पर उसे न्यायालय द्वारा वयस्क होने के दो साल के अंदर अवैध घोषित करवाया जा सकता है।

अगर इस कुप्रथा को जड़ से खत्म करना है तो इसके लिए समाज को ही आगे आना होगा तथा बालिकाओं के पोषण, स्वास्थ्य, सुरक्षा और शिक्षा के अधिकार को सुनिश्चित करना होगा। शिक्षा को बढ़ावा देना होगा। अभिभावकों को बाल विवाह के दुष्परिणामों के प्रति जागरूक करना होगा। सरकार को भी बाल विवाह की रोकथाम के लिए बने कानून का जोरदार ढंग से प्रचार-प्रसार तथा कड़ाई से पालन करना होगा। बाल विवाह प्रथा के खिलाफ समाज में जोरदार अभियान चलाना होगा।

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