How to develop scientific thinking in children - राजनीतिः कैसे हो बच्चों में वैज्ञानिक सोच का विकास - Jansatta
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राजनीतिः कैसे हो बच्चों में वैज्ञानिक सोच का विकास

विज्ञान के सिद्धांतों को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने की पहल करनी होगी। शैक्षणिक परिभ्रमण के दौरान बच्चों को प्रत्येक वस्तु के प्रेक्षण की सलाह देनी होगी। उनके प्रेक्षणों के अनुसार निष्कर्ष की वस्तुस्थिति समझने के लिए बड़े वैज्ञानिकों को आमंत्रित किया जाना चाहिए। शिक्षकों को भी चाहिए कि वे लगातार नवसृजन की ओर प्रेरित होते रहें।

Author June 4, 2018 5:22 AM
जरूरत है हम विज्ञान की अवधारणाओं को बच्चों में पूर्ण रूप से विकसित करने की सफल कोशिश करें।

आज वैज्ञानिक युग में सब कुछ प्रायोगिक है। हम उन्हीं चीजों को मानते हैं जिसे विज्ञान सत्य कहता है। विश्वास की अवधारणा पूरी तरह से निर्वासित हो चुकी है। विज्ञान ही आज हमारी दशा और दिशा तय कर रहा है। सवाल है कि इस वैज्ञानिक युग में हमारे बच्चे क्या सोचते हैं? उनके बालमन की क्या स्थिति है? दादी-नानी की परियों और भूत-बेतालों की रहस्यमयी, अकल्पनीय दुनिया से बाहर आ चुके बच्चों में अब किस तरह का विश्वास पल रहा है? वे अपने चारों ओर किस मायावी संसार का निर्माण कर रहे हैं? अब भूत-प्रेत, परी-सुपरमैन का अस्तित्व तेजी से गायब हो रहा है। हालांकि कार्टून के प्रभाव में सुपरमैन का एक छद्म संसार अब भी बच्चों के बीच बना हुआ है। इस आवरण के पीछे अभिभावकों और विद्यालयों की दृष्टि नहीं पहुंच पा रही है। अब माताएं भी बच्चों को चंदामामा और सूरज दादा के कल्पित संसार से बाहर निकाल कर ग्रहों, नक्षत्रों की परिक्रमा करा रही हैं। बच्चे भी अपने को बच्चे न समझने की दलील दे रहे हैं। एक टीवी विज्ञापन में आजकल दिखाया जा रहा है कि बच्चे का पिता जब शेर और भालू से लड़ कर उसके लिए केवल एक पैकेट केक लाने की बात करता है, तो बच्चा गर्व से चिढ़ाने के अंदाज में कहता है कि ‘मुझे बच्चा न समझना’, अर्थात उसे पता है कि शेर या भालू से कोई मनुष्य एक पैकेट केक के लिए इतना नहीं लड़ सकता है और लड़ कर सही-सलामत नहीं बच सकता है। मतलब साफ है कि बच्चों को छोटा समझ कर डराने का वक्त अब नहीं है।

अब बच्चे उस दौर में हैं जहां विज्ञान एक खुली किताब की तरह है। उन्हें वैज्ञानिकता की दृष्टि परिवेश से मिल जा रही है। वैज्ञानिक यंत्रों और प्रौद्योगिकी ने यह कार्य और सरल बना दिया है। उन्हें ऐसी किसी चीज में कोई रुचि नहीं है जो उन्हें विज्ञान से परे लगता है। परंतु यहां सवाल है कि यही बच्चे जब पाठ्यक्रम को आत्मसात करते हैं, तो उन्हें विज्ञान कठिन लगता है। वैज्ञानिक नियमों की अवधारणाओं का प्रायोगिक स्तर उन्हें रुचिकर लगता है, लेकिन जैसे ही वह सैद्धांतिक रूप में सामने आता है, बच्चे अचानक से विमुख होने लगते हैं। आखिर ऐसा क्यों है?

बच्चे बचपन से जिस वैज्ञानिक-संस्कार में पलते हैं, वहां उनके लिए उन अनुभवों को चलताऊ और अपनी भाषा के शब्दों में बता पाना संभव हो जाता है, लेकिन जैसे ही वे वैज्ञानिक शब्दावली के संपर्क में आते हैं, वे समस्याओं से घिर जाते हैं। वे रचनात्मक तरीकों से विज्ञान को हल करने की तमाम कोशिशें करते हैं, लेकिन वे कोशिशों और तथ्यों के बीच कठिन रूप से घिर जाते हैं। हमारा घरेलू और सामाजिक दृष्टिकोण बच्चों को सहायता देने के स्थान पर उसमें कमी देखता है। इसलिए बच्चे विज्ञान के सैद्धांतिक पक्षों से दूर होने लगते हैं। विद्यालय में पाठ्यक्रम को निर्धारित समय पर पूरा करने का एक व्यापक दबाव होता है, जिसकी आड़ में विज्ञान शिक्षक बच्चों की मनोदशाओं को समझने में लगातार धोखा खाते हैं। आज विज्ञान की प्रमुख शाखाओं जीव विज्ञान, रसायन विज्ञान और भौतिक विज्ञान के प्रति बच्चों में एक घोर उदसीनता आ गई है। इन विज्ञान विषयों में छात्रों की लगातार घटती संख्या हमें वैज्ञानिकता की पाठ्य और प्रायोगिक दुनिया की अवधारणा को नए सिरे से सोचने पर विवश करती है।

हमारा समाज विज्ञान के प्रति अब भी उदासीन है। हम वैज्ञानिक सोच को बच्चों में उदारता के साथ फैलाने में नाकाम हो रहे हैं। हमारा संस्कार बच्चों की बीमारी को जब टोने-टोटके मान बैठता है। जब बच्चे इन टोटकों के संपर्क में आते हैं तो लाख चाहने पर भी वैज्ञानिक दृष्टि के शिखर पर पहुंचने से पूर्व ही वे लुढ़क जाते हैं। घर की तमाम चीजों में वर्जनाओं और अंधविश्वास का इतना सघन मकड़जाल फैल चुका है कि बच्चों की नव-वैज्ञानिक दृष्टि उसे आसानी से नहीं काट पाती। अभिभावक विज्ञान को मात्र एक विषय मानता है, इसी कारण बच्चा भी अंकीय पद्धति में उलझ कर उसे विषय मान लेता है। जबकि सत्य है कि विज्ञान पद्धति है, विज्ञान सृजन है, विज्ञान ठोस तथ्य है, विज्ञान कारण का निवारण है, विज्ञान प्रमाण है, विज्ञान स्पष्ट नजरिया है आदि।

विज्ञान की कक्षाएं भी वैज्ञानिक पद्धति और अवधारणाओं के सिद्धांत को अनमने रूप से पेश करती हैं। शिक्षा का मनोविज्ञान मानता है कि प्रत्येक बालक में एक नैसर्गिक वैज्ञानिकता होती है, जिसे शिक्षक और अभिभावक अपनी-अपनी दृष्टि से देखते हैं या उसकी अवहेलना करते हैं। आज का बच्चा भी वैज्ञानिक आविष्कारों से खेलना जानता है, उसके निर्माण की संपूर्ण तकनीकी से अवगत होना चाहता है, लेकिन अपने प्रश्नों का उचित जवाब नहीं मिल पाने की वजह से वह इन वैज्ञानिक प्रश्नों से दूर हटता जाता है। हमारे देश का वैज्ञानिक माहौल इतना विकसित नहीं हो पाया है कि बच्चों को वैज्ञानिकता के प्रति नवीन रूप से आग्रही बना सके। अभिभावक, शिक्षक, समाज विज्ञान के प्रति अब भी संकुचित दृष्टि रखते हैं। बच्चों को वही पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाता है जिससे वे कोई नौकरी पाकर अपनी पूरी जिंदगी पैसों का जुगाड़ कर सकें। विज्ञान का साथ देना तलवार की धार पर चलने जैसा है। सरकारी तंत्र ने भी विज्ञान को उदासीन बना कर रखा हुआ है। विज्ञान के प्रति छात्रों को उत्सुक करने के लिए कई योजनाओं पर लगातार विचार करने की आवश्यकता

विज्ञान को रोचक और प्रायोगिक बनाने के साथ-साथ, सैद्धांतिक स्तर पर उसमें परिवर्तन की आवश्यकता है। विज्ञान के सिद्धांतों को दैनिक जीवन का हिस्सा बनाने की पहल करनी होगी। शैक्षणिक परिभ्रमण के दौरान बच्चों को प्रत्येक वस्तु के प्रेक्षण की सलाह देनी होगी। उनके प्रेक्षणों के अनुसार निष्कर्ष की वस्तुस्थिति समझने के लिए बड़े वैज्ञानिकों को आमंत्रित किया जाना चाहिए। शिक्षकों को भी चाहिए कि वे लगातार नवसृजन की ओर प्रेरित होते रहें। विज्ञान के किसी भी क्षेत्र में बच्चों से मिल रहे सुझावों पर लगातार समिति बना कर उस पर विचार-विमर्श किया जाना चाहिए। यह कार्य अकेले शिक्षकों, बच्चों और शासन का नहीं है। इसमें अभिभावक, परिवार और समाज को भी आगे आना होगा। उन्हें पारंपरिक अंधविश्वासों से इतर एक नया वैज्ञानिक समाज बनाने की दिशा में पहल करनी होगी।

जरूरत है हम विज्ञान की अवधारणाओं को बच्चों में पूर्ण रूप से विकसित करने की सफल कोशिश करें। उसे अमलीजामा पहनाने के लिए आ रही तमाम अड़चनों को समय रहते दूर करने का प्रयास करें। हमारा समाज आज भी वैज्ञानिक चेतना और वैज्ञानिक पैदा करने में अन्य देशों की तुलना में कमजोर है। शायद हमारी शैक्षणिक संरचना और सोच दोनों में ही कमी है, अन्यथा विज्ञान के मामलों में हम अन्य देशों की तुलना में पीछे नहीं रहते। अब भी वक्त शेष है जब हम अपनी सोच को विज्ञान तक ले जाएं, विज्ञान के प्रति सचेष्ट हों, विज्ञान को जीएं और विज्ञान के लिए वक्त निकालें। वह दिन दूर नहीं जब हमारे बच्चे भी विज्ञान की ओर झुकेंगे। विज्ञान को विषय न मान कर जीवन का अंग मानेंगे। विज्ञान में हो रहे शोधों की संख्या में लगातार वृद्धि देखने को मिलेगी। यह केवल और केवल सामूहिक प्रयासों से संभव है कि हम बच्चों को बाल्यावस्था से ही विज्ञान की चेतना और नवीन सृजन के रूप दिखाते रहें। इससे निश्चित तौर पर आने वाले समय में हमारी वैज्ञानिक क्षमता में वृद्धि देखने को मिलेगी।

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