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आखिर गांव आदर्श बनें कैसे

ग्राम स्वराज की अवधारणा महात्मा गांधी ने दी थी। इसके मूल में श्रम और रोजगार आधारित शिक्षा थी।

प्रमोद भार्गव

जब देश में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू हुई थी, तब इसकी मूल अवधारणा में यह उद्देश्य जुड़ा था कि ग्रामीण विकास नीचे से ऊपर की ओर हो। इसीलिए ग्राम सभाओं को पंचायत क्षेत्र में विकास कार्य चुनने का अधिकार दिया गया था।

ग्राम स्वराज की अवधारणा महात्मा गांधी ने दी थी। इसके मूल में श्रम और रोजगार आधारित शिक्षा थी। लेकिन कालांतर में हमारे शासकों ने शिक्षा का अंग्रेजीकरण करने और बाल श्रम को अपराधीकरण में बदलने का काम किया। नतीजा सामने है कि शिक्षा बेरोजगारी उत्पादन का कारखाना बन गई और बच्चे किशोरावस्था से ही अपराध व नशे के आदी हो रहे हैं। सरकारों के पास इन समस्याओं से निदान के कोई सार्थक उपाय नहीं हैं।

इसलिए या तो अर्थ आधारित विकास के कथित प्रावधान किए जाते हैं या फिर जागरूकता के थोथे अभियान चलाए जाते हैं। सरकार ने प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना के तहत देश के नौ हजार ग्रामों का कायाकल्प करने का संकल्प किया है। इससे पहले सांसद आदर्श ग्राम योजना भी शुरू हुई थी, जिसके अपेक्षित परिणाम नहीं रहे। प्रधानमंत्री आदर्श ग्राम योजना के तहत 2014 से 2019 के दौरान हर सांसद को चरणबद्ध तरीके से अपने लोकसभा क्षेत्र में मात्र तीन ग्राम आदर्श बनाने थे।

इसके बाद 2019 से 2024 के बीच पांच गांव और आदर्श बनाए जाने थे। परंतु सांसदों ने कोई दिलचस्पी नहीं ली। देश में करीब साढ़े छह लाख गांव हैं। लेकिन सांसद अपनी निधि और कल्पनाशीलता से दर्जन भर गांव भी आदर्श नहीं बना पाए। केंद्र सरकार ने ग्रामों में चल रही विकास परियोजनाओं की जमीनी जांच के लिए एक साझा समीक्षा मिशन (सीआरएस) भी बनाया था, जिसमें इकतीस सदस्य थे। इस समिति ने अपनी जांच में पाया कि सांसद आदर्श ग्राम योजना अपने उद्देश्य में सफल नहीं रही। अतएव योजना की समीक्षा की जानी चाहिए। हो सकता है, अब नौ हजार ग्रामों के कायाकल्प का संकल्प इसी समीक्षा का परिणाम हो?

चहुंमुखी और समावेशी विकास के लक्ष्य ग्राम, किसान और खेती को समृद्ध बनाए बिना संभव नहीं हैं। शहरीकरण के तमाम उपायों के बावजूद आज भी देश के साढ़े छह लाख गांवों में सत्तर फीसद आबादी रहती है। इसलिए दुनिया भारत को गांवों का देश कहती है। ग्राम विकास योजना का यह सपना इसलिए अहम था, क्योंकि समय के साथ बदलाव तेजी से आ रहे हैं, लिहाजा ऐसे में गांवों में बदलाव की प्रक्रिया तेज नहीं की गई तो वे पिछड़ जाएंगे।

देखा जाए तो एक सांसद के लिए यह लक्ष्य कोई बहुत बड़ा नहीं है। उनके पास पर्याप्त सांसद निधि होती है। स्थानीय राजनीति के वे नेतृत्वकर्ता होते हैं और प्रशासन उनके मार्गदर्शन में काम करने को बाध्य होता है। अपनी नेतृत्व दक्षता से इस ताने-बाने में समन्वय बैठा कर यदि सांसद लक्ष्य के प्रति प्रतिबद्धता जताते, तो गांव का चौतरफा विकास आसान हो जाता। लेकिन सांसदों ने अपने लोकसभा क्षेत्र के ग्राम विकसित करने में कोई दिलचस्पी ही नहीं दिखाई, बल्कि इस दौरान यह और हुआ कि जिन ग्रामों में शराब की दुकानें नहीं थीं वहां भी वे खोल दी गर्इं।

यह बहस जारी है कि गांव का विकास ऊपर से नीचे की ओर होना चाहिए अथवा नीचे से ऊपर की ओर। जब देश में त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था लागू हुई थी, तब इसकी मूल अवधारणा में यह उद्देश्य जुड़ा था कि ग्रामीण विकास नीचे से ऊपर की ओर हो। इसीलिए ग्राम सभाओं को पंचायत क्षेत्र में विकास कार्य चुनने का अधिकार दिया गया था। वैसे भी संसदीय क्षेत्र इतना बड़ा होता है कि किसी भी सांसद को प्रत्येक गांव की वास्तविक जरूरतों को जानना मुश्किल है। यह इसलिए भी मुमकिन नहीं है, क्योंकि हमारे ज्यादातर सांसद अपने संसदीय क्षेत्रों में प्रवास यात्राओं पर ही आते हैं।

संसदीय क्षेत्र में उनके स्थायी निवासी होने से तो कोई वास्ता ही नहीं रह गया है। लिहाजा क्षेत्र के विकास के प्रति वे दिलचस्पी भी उतनी नहीं लेते। इसलिए पंचायती राज के अस्तिव में आने के तत्काल बाद जो मुख्यमंत्री गांधीवादी विचारधारा से प्रभावित थे और प्रशासनिक दृष्टि से उदारवादी रुख अपनाना चाहते थे, उन्होंने पंचायती राज के तहत विकास प्रक्रिया का क्रम नीचे से ऊपर की ओर कर दिया था। यानी कई राज्यों में विकास कार्यों के निर्णय से लेकर जनपद और जिला पंचायतों में सरकारी नौकरियों की नियुक्ति प्रक्रिया में भी पंचायती राज की अहम भूमिका सामने आने लगी थी। ऐसे राज्यों में कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र और अविभाजित मध्य प्रदेश प्रमुख रहे हैं।

जब पंचायती राज की प्रभावशाली भूमिका प्रकट हुई तो सांसदों और विधायकों को लगा कि उनका महत्त्व नगण्य हो रहा है। नतीजतन विधायिका और पंचायती राज में जबर्दस्त जंग छिड़ गई। विधायिका का आरोप था कि पंचायती राज को पर्याप्त अधिकार दे दिए जाने से सांसद और विधायकों के कार्य-क्षेत्र में सीधी कटौती हुई है और इनकी भूमिका संसद व विधानसभाओं में बैठ कर कानून निर्माता के नुमाइंदे तक सिमट गई है। प्रशासन में हस्तक्षेप लगभग समाप्त हो गया है। लिहाजा ऊपर से पंचायती राज के पर कतरने शुरू हो गए और विकास प्रक्रिया का क्रम फिर से बिगड़ने लग गया। हालांकि यह विरोध नैतिक व तार्किक कतई नहीं था।

प्रजातंत्र की जिस प्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली के माध्यम से विधायिका को जो अधिकार मिलते हैं, उसी प्रणाली से पंचायती राज का वजूद जुड़ा है। दरअसल समावेशी लोकतंत्र अहम के टकराव से नहीं, उदार मानसिकता से चलता है। विकास प्रक्रिया नीचे से चले, इसीलिए प्रशासनिक सुधार आयोग ने ग्राम पंचायतों को और अधिक स्वायत्त तथा अधिकार संपन्न बनाने की सिफारिश केंद्र सरकार से की है। विकास की प्रक्रिया यदि संविधान की सबसे छोटी इकाई ग्राम सभा से शुरू हो तो बुनियादी विकास की संभावनाएं बढ़ जाएंगी, ऐसी उम्मीद की जा सकती है।

गांव का समग्र विकास कैसा होता है, इसके दो बड़े उदाहरण हमारे सामने हैं। ऐसे आदर्श ग्रामों में एक गांव महाराष्ट्र का रालेगन सिद्धि है और दूसरा गुजरात का गांव पुंसरी है जो आधुनिकता से संपन्न है। रालेगांव ऐसा गांव है, जहां पूरी आबादी शिक्षित होने के साथ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर है। पुरुष हो या महिला, कोई भी बेरोजगार नहीं है। गांव के ज्यादातर परिवारों से एक व्यक्ति सेना में है। अन्ना हजारे के प्रयत्नों से जो कुल्हाड़ी बंदी, नसबंदी, नशाबंदी, घासचराई बंदी, श्रमदान, शिक्षा और जल संरक्षण के कारगर व फलदायी उपाय हुए हैं, वे केवल रालेगांव तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि आसपास के साढ़े तीन सौ ग्रामों ने भी ऐसे ही क्रांतिकारी व अप्रत्याशित विकास की राह पकड़ ली है।

आज अकेले रालेगांव से अरबों रुपए की प्याज का निर्यात होता है। अकाल अथवा सूखा जैसी स्थिति से निपटने के लिए अनाज-बैंक खोल दिया गया है। ताज्जुब यह कि इस विकास में किसी सांसद, विधायक अथवा नौकरशाह का कोई योगदान नहीं रहा, बावजूद इसके यह भारत का अनूठा आदर्श गांव बन गया। दूसरा विकसित गांव पुसंरी माना जाता है। यहां गली-गली में सीसीटीवी कैमरे हैं। सामुदायिक रेडियो है। उम्दा सफाई व्यवस्था है। आरओ-जल की सुविधा है। दूध का धंधा करने वाले पशुपालकों के लिए बस सेवा है। लेकिन सभी लोगों के पास रोजगार नहीं है।

मसलन वे रालेगांव के लोगों की तरह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं। सभी लोग शिक्षित तो क्या साक्षर भी नहीं हैं। नशाबंदी पूरे गुजरात में लागू है, इसलिए पुंसरी में भी है। चूंकि यह गांव तकनीक से जुड़ा है, इसलिए इसे मौजूदा सोच व परिप्रेक्ष्य में विकसित माना जा रहा है। दरअसल, तकनीक से जुड़ा विकास ऐसा विकास है जो हमेशा अधूरा रहता है। इसीलिए कहा भी गया है कि तकनीक उस सर्पनी की तरह है जो अपने ही बच्चों को पैदा करने के बाद निगल जाती है। अब सोचना हमारे नीति-निर्माताओं को है कि कैसा विकास चाहते हैं- स्थायी अथवा अस्थायी?

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