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कैसे बदले शहरों की हवा

संयुक्त राष्ट्र की 2018 की विश्व शहरीकरण संभावनाओं की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की चौंतीस फीसद आबादी शहरों में रहती है, जो 2011 की जनगणना की तुलना में तीन फीसद अधिक है।

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सुशील कुमार सिंह

शहर जितने सघन और विकास के चरम पर हैं, उनकी हवा और उनका पानी उतना ही दूषित है। झुग्गी बस्तियों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। भारत की झुग्गी बस्तियों में रहने वाली सत्तावन फीसद आबादी तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में है। यह राज्यों की जिम्मेदारी है कि वे अपने नागरिकों को आवास और अन्य बुनियादी सुविधाएं प्रदान करें।

शहर आकांक्षाओं, सपनों और अवसरों से बने होते हैं। लोग स्तरीय शिक्षा, रोजगार, बेहतर जीवन, बड़े बाजार और ऐसी ही दूसरी संभावनाओं की तलाश में शहरों की ओर आते हैं जो उनकी मौजूदा परिस्थिति में उपलब्ध नहीं होतीं। ऐसे ही तमाम कारणों के चलते गांव, कस्बे, छोटे शहर, बड़े शहर और महानगरों के बीच लोगों के आवागमन का एक सतत चक्र चलता रहता है। इसीलिए भारत की शहरी आबादी में तेजी से वृद्धि देखी जा सकती है।

संयुक्त राष्ट्र की 2018 की विश्व शहरीकरण संभावनाओं की रिपोर्ट के मुताबिक भारत की चौंतीस फीसद आबादी शहरों में रहती है, जो 2011 की जनगणना की तुलना में तीन फीसद अधिक है। अनुमान यह भी है कि 2031 तक शहरी आबादी में छह फीसद की वृद्धि हो जाएगी। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2028 के आसपास दिल्ली दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला शहर हो सकता है और 2050 तक शहरी आबादी के मामले में भारत का योगदान सबसे अधिक होने की संभावना है। तब दुनिया में अड़सठ फीसद आबादी शहरों में रह रही होगी।

मौजूदा समय में यह आंकड़ा पचपन फीसद का है। अनियोजित शहरीकरण शहरों पर बहुत अधिक दबाव डालता है और शासन द्वारा निर्धारित नियोजन व क्रियान्वयन की चुनौती बरकरार रहती है। सुशासन का अभिलक्षण है कि संतुलन पर पूरा जोर हो, जहां विकासोन्मुखी नीतियां न्यायपरक तो हों ही, साथ ही इसे बार-बार दोहराया भी जाता रहे। शहरी विकास से संबंधित योजनाएं कई आयामों में मुखर हुई हैं, जिसमें स्मार्ट सिटी के तहत ऐसे शहरों को बढ़ावा देना है जो मुख्यत: समावेशी सुविधाओं के साथ नागरिकों को एक गुणवत्तापूर्ण जीवन प्रदान कर सकें। इसके अलावा स्वच्छ और टिकाऊ पर्यावरण के समावेशन से भी यह अभिभूत हों।

सरकार के अमृत मिशन में हर घर में पानी की आपूर्ति और सीवेज सुविधा के साथ नल की व्यवस्था की बात है। स्वच्छ भारत मिशन जहां शौच से मुक्त भारत की बात करता है, वहीं इसमें नगरीय ठोस अपशिष्ट का शत-प्रतिशत वैज्ञानिक प्रबंधन सुनिश्चित करना भी निहित है। इसी क्रम में हृदय योजना एक ऐसा समावेशी संदर्भ है, जहां शहर की विरासत को संरक्षित करने की बात देखी जा सकती है। प्रधानमंत्री आवास योजना शहरी के अंतर्गत झुग्गीवासियों सहित शहरी गरीबों को पक्के घर उपलब्ध करवाना है। भारत सरकार ने विगत वर्षों में इन क्षेत्रों में भारी निवेश किया है।

इससे बुनियादी सेवाओं में भी कुछ आधारभूत सुधार हुए हैं। बावजूद इसके चुनौतियां कम नहीं हुई हैं। 2011 की जनगणना को देखें तो सत्तर फीसद शहरी घरों को पानी की आपूर्ति थी, मगर उनचास फीसद के पास ही परिसर में पानी की आपूर्ति मौजूद थी। पर्याप्त शोधन क्षमता की कमी और आंशिक सीवेज जोड़ के कारण खुले नालों में लगभग पैंसठ फीसद गंदा पानी छोड़ा जा रहा था। नतीजन पर्यावरणीय को नुकसान हुआ और जल निकाय भी प्रदूषित हुए।

विश्व बैंक की रिपोर्ट ‘फ्राम स्टेट टू मार्केट’ में सुशासन की अवधारणा को बीसवीं सदी के अंतिम दशक में उद्घाटित होते हुए देखा जा चुका है। उसी विश्व बैंक के जल और स्वच्छता कार्यक्रम 2011 के अनुसार अपर्याप्त स्वच्छता के चलते साल 2006 में 2.4 खरब रुपए की सालाना क्षति हुई। यह आंकड़ा जीडीपी के लगभग 6.4 फीसद के बराबर था। सुशासन नुकसान से परे एक ऐसी व्यवस्था है जहां से चुनौतियों को कम करने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं होता। इसमें कोई दुविधा नहीं कि सतत विकास का लक्ष्य भारत सहित दुनिया के लिए आज भी एक चुनौती है। देश में स्वच्छ पेयजल उपलब्ध कराना और अपशिष्ट जल का समुचित निस्तारण पहली और बड़ी चुनौती है। जिस प्रकार शहरों पर जनसंख्या का दबाव बढ़ रहा है, भूजल तेजी से खत्म हो रहा है, नदियां सूख रही हैं और जलवायु परिवर्तन का अनचाहा स्वरूप शहरों पर असर डाल रहा है, उससे शहरों की दुश्वारियां बढ़ती जा रही हैं।

एक आदर्श शहर तभी विकसित हो सकता है, जब उसके गांव कायम रहें। शहर भी तभी बना रह सकता है जब गांव भी विकसित हों। वैसे भी भारत गांवों का देश है। कोविड-19 के प्रकोप के चलते यह बात और पुख्ता हुई है कि केवल शहरी विकास व सुधार से ही सुशासन को कायम रखना संभव नहीं है। कृषि विकास दर को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि उदरपूर्ति से लेकर आसान जीवन आज भी गांवों पर निर्भर है।

ऐसे में उप शहरी क्षेत्रों और ग्रामीण क्षेत्रों में बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और बुनियादी ढांचे में निवेश पर जोर दिया जाना एक अनिवार्य सत्य के रूप में स्वीकार करना चाहिए। ऐसा करने से शहरों में उत्पन्न होने वाली जटिल परिस्थितियों से निपटना भी आसान रहेगा। इसमें कोई दो राय नहीं कि शहरों के पास अपने आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों के लिए सेवा केंद्र के रूप में कार्य करने की भी जिम्मेदारी है।

शहरों के स्वरूप को बिगड़ने से बचाने के लिए कई ठोस कदम उठाने की जरूरत है। गौरतलब है कि दिल्ली और नोएडा जैसे कई शहरों का भूमिगत जलस्तर हर साल नीचे जा रहा है। चेन्नई जैसे शहर भूमिगत जल शून्य हो चुके हैं। दूसरे महानगर भी ऐसे ही संकटों से गुजर रहे हैं। ऐसे शहरों में दूसरी सबसे बड़ी समस्या मोटर वाहनों से निकलने वाला धुआं है, जो शहरी आबादी को बड़ी और गंभीर बीमारियां दे रहा है। हाल में आवास और शहरी मामलों के मंत्रालय ने कचरा मुक्त शहरों का स्टार रेटिंग प्रोटोकाल टूलकिट-2022 पेश किया। यह उद्धरण इसलिए कि शहर जितने बड़े, कचरे के ढेर उतना ऊंचा। इससे निपटना भी शहरी सुधार और बेहतर सुशासन का पर्याय ही कहा जाएगा।

दो टूक शब्दों में कहें तो शहर जितने सघन और विकास के चरम पर हैं, उनकी हवा और पानी उतना ही दूषित है। मलिन बस्तियों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। भारत की मलिन बस्तियों में रहने वाली सत्तावन फीसद आबादी तमिलनाडु, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और महाराष्ट्र में है। यह राज्यों की जिम्मेदारी है कि वे अपने नागरिकों को आवास और अन्य बुनियादी सुविधाएं प्रदान करें। शहरी सुधार की दिशा में संभावनाएं भी हमेशा उफान पर रहती हैं और शहरी भावना भी उथल-पुथल में रहती है। चाहे शहर हो या गांव, जल नहीं तो कल नहीं।

फिलहाल जल के अभाव के राष्ट्रीय मुद्दे का हल खोजने के लिए जल शक्ति मंत्रालय भारत सरकार ने एक जुलाई 2019 से जल संरक्षण पुर्नस्थापना, पुर्नभरण और पुन: उपयोग पर अभियान चला कर जल शक्ति अभियान शुरू किया था। गौरतलब है कि देश भर में जल संकट से जूझते साढ़े सात सौ से ज्यादा शहरों से सूचना, शिक्षा और संचार की व्यापक गतिविधियों के माध्यम से जल संरक्षण उपायों को जन आंदोलन बनाने के लिए सक्रियता देखी जा सकती है।

वर्तमान में चार हजार से अधिक शहरों में से साढ़े तीन हजार से ज्यादा छोटे शहर और कस्बे जलापूर्ति और सीवेज प्रबंधन की बुनियादी ढांचे के निर्माण की किसी भी केंद्रीय योजना के तहत शामिल नहीं है। शहर दिन दूनी रात चौगुनी की तर्ज पर विस्तार भी ले रहे हैं और शायद इसी रफ्तार से चुनौतियों का सामना भी कर रहे हैं। यह समझना होगा कि शहरीकरण के स्वरूप को बिगाड़ने से बचाने के लिए लोगों को शहरों से दूर रखने की आवश्कता नहीं है, बल्कि शहरों की सुविधाएं वहां ले जाने की आवश्कता है जहां लोग पहले से ही रहते हैं। दो टूक यह भी है कि शहरी और ग्रामीण भारत को साथ-साथ विकसित करने के लिए समग्र दृष्टिकोण की आवश्कता है।

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