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कैसे रुके हिरासत में यातना

सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि हिरासत में मौतों की संख्या 2013 में 36 थी, 2014 में 39 थी और 2015 में बढ़ कर 41 पर पहुंच गई।
Author नई दिल्ली | January 19, 2016 21:24 pm
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

पुलिस थानों और जेलों में सीसीटीवी लगाने का मसला नए सिरे से सुर्खियों में आया है। महाराष्ट्र हाइकोर्ट ने राज्य सरकार को पिछले दिनों निर्देश दिया कि वह छह हफ्तों के अंदर थानों में सीसीटीवी लगाने का इंतजाम करे। दरअसल, अदालत राज्य में हिरासत में मौतों को लेकर कई याचिकाओं की- जिनमें एक जनहित याचिका भी शामिल थी- सुनवाई कर रही थी। खुद सरकारी वकील ने अदालत को बताया कि हिरासत में मौतों की संख्या 2013 में 36 थी, 2014 में 39 थी और 2015 में बढ़ कर 41 पर पहुंच गई। इन आंकड़ों को पर चिंता प्रगट करते हुए अदालत ने दोहराया कि डेढ़ साल पहले उसने सरकार को आदेश दिया था कि पुलिस थानों में सीसीटीवी लगाए, मगर सरकार इसके प्रति गंभीर नहीं दिखती। न्यायमूर्ति कानडे की अध्यक्षता वाले पीठ का कहना था कि समस्या को सुलझाने की राजनीतिक इच्छाशक्ति हो तो राज्य सरकार इसे कर सकती है, मगर यह प्रतीत हो रहा है कि वह इस बात के प्रति गंभीर नहीं है।

याद रहे कि मुश्किल से छह माह पहले सर्वोच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति टीएस ठाकुर की अगुआई वाले पीठ ने ‘डीके बसु बनाम पश्चिम बंगाल सरकार’ के नाम से जाने गए मामले में देश की हर जेल में अनिवार्यत: सीसीटीवी कैमरे लगाने का आदेश दिया था ताकि न्यायिक और पुलिस हिरासत में मानवाधिकारों के उल्लंघन को रोका जा सके। अदालत ने यह भी कहा था कि देश के तमाम पुलिस स्टेशनों पर बने लॉकअप में भी सीसीटीवी लगाना वांछनीय होगा, अलबत्ता उसने इसके बारे में ठोस निर्णय लेने का जिम्मा पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों पर छोड़ा था। यह पूछा जाना समीचीन होगा कि आखिर ऐसे कदमों से हिरासत में मानवाधिकारों के उल्लंघन पर क्या रोक लगाना मुमकिन है?
अब जहां तक इस मामले में अन्य मुल्कों का अनुभव है तो वह निश्चय ही सकारात्मक कहा जा सकता है। वह इस बात को रेखांकित करता है कि जहां इससे पुलिस ज्यादतियों पर अंकुश लग सकता है, वहीं यह भी स्पष्ट है कि पुलिस के खिलाफ ज्यादती के नकली आरोपों से भी उनका बचाव हो सकता है क्योंकि वह सीसीटीवी के रेकार्ड से छान कर अपनी बेगुनाही का सबूत दे सकती है।

अभी कुछ समय पहले जब अग्नेलो वाल्दारिस नामक युवक की पुलिस थाने में मौत के मामले पर विचार करते हुए अदालत ने थाने के हर कोने में महाराष्ट्र सरकार को रोटेटिंग कैमरे अर्थात चल-कैमरे लगाने की सलाह दी थी और उसके कुछ समय पहले गुजरात उच्च न्यायालय ने भी गुजरात सरकार को इसी किस्म का निर्देश अन्य मामले में दिया था और एक निश्चित सीमा तक उसे पूरा करने को कहा था, तब एक मानवाधिकार कार्यकर्ता ने इसकी चर्चा करते हुए लिखा था कि उनके मुताबिक वर्ष 2008 में कैटालोनिया के पुलिस थानों में सीसीटीवी लगाए गए और तब से पुलिस ज्यादतियों के खिलाफ आने वाली शिकायतों में चालीस फीसद की कमी आई। अमेरिका के कैलिफोर्निया के रियाल्टो शहर के एक अन्य अनुभव की भी उन्होंने चर्चा की थी, जिसमें पुलिसकर्मियों के शरीर पर ही कैमरे तैनात किए गए। लगभग एक लाख आबादी के इस शहर में संचालित इस नियंत्रित प्रयोग के अंतर्गत पुलिस के बल प्रयोग की घटनाओं में उनसठ फीसद की कमी आई और पुलिस के खिलाफ ज्यादतियों की शिकायतों में नवासी फीसद की कमी दर्ज की गई।

थानों और जेलों में सीसीटीवी हो या पुलिस के शरीर पर कैमरे हों, इन दोनों के माध्यम से ऐसी घटनाओं पर निश्चय ही अंकुश लगाया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, अमेरिका में पिछले साल रे टेन्सिंग नामक पुलिस अफसर को सैम्युअल डूबोस नामक तैंतालीस वर्षीय अफ्रीकी-अमेरिकी व्यक्ति की हत्या करने के कारण हैमिल्टन कौन्टी के न्यायाधीश ने सजा सुनाई। बिना आगे वाले हिस्से के लाइसेंस प्लेट गाड़ी चला रहे डूबोस को टेन्सिंग ने रास्ते में रोक कर चालक का लाइसेंस मांगा और चूंकि उसके पास लाइसेंस नहीं था, इसलिए तैश में आकर टेन्सिंग ने अपनी पिस्तौल निकाल कर डूबोस पर गोली चला दी, जिससे उसकी वहीं मौत हो गई। उन्नीस जुलाई को की गई इस हत्या को लेकर टेन्सिंग ने पहले बहाने बनाने की कोशिश की, मगर उसके शरीर पर लगे वीडियो कैमरे के फुटेज से असलियत सामने आ गई। न्यायाधीश ने दो टूक कहा कि यह हत्या है और टेन्सिंग को इस अपराध की सजा सुनाई।

उसके चंद रोज पहले अश्वेतों के अधिकारों के लिए संघर्षरत रही सांडरा ब्लांड नामक अश्वेत महिला की जेल में हुई मौत को लेकर जो विवाद खड़ा हुआ, उसमें भी यही तथ्य सामने आया कि किस तरह पुलिस ने उसे कार चलाते हुए रोका था और महज सड़क पर लेन गलत चुनने के चलते उसकी पिटाई की थी। इस मामले में भी सच्चाई उजागर होने में पुलिस के शरीर पर लगे वीडियो कैमरे के फुटेज से काफी मदद मिली।
गौरतलब है कि 2011-12 में ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सामने ऐसे पंचानबे हजार मामले आए। हिरासत में मौतों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय समय-समय पर हस्तक्षेप करता रहा है। भारत में मानवाधिकार उल्लंघन की बढ़ती घटनाओं के मद््देनजर केंद्र और राज्य सरकारों को वह लताड़ता रहा है कि पुलिस ज्यादतियों को रोकने के लिए उसने 1996 में जो दिशा-निर्देश जारी किए थे, उन पर क्यों नहीं अमल हो रहा है।

उदाहरण के तौर पर सर्वोच्च न्यायालय की न्यायमूर्ति एचएस बेदी और जेएम पांचाल के पीठ ने शिमोगा शहर में बाईस साल पहले डोड्डापेट थाने के अंदर हुई गुरुमूर्ति और राजाकुमार की मौत के मामले में शेकरप्पा और छह अन्य कांस्टेबलों को जिम्मेदार ठहराया था। दोषी पुलिसकर्मियों की सजा को सही ठहराते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दो बातें रेखांकित की थीं। एक, हिरासत में हत्या निस्संदेह ऐसा घृणित अपराध है, जो नागरिकों के रक्षक कहे गए लोगों द्वारा किया जाता है। इनमें सबसे विचलित करने वाला पक्ष यही होता है कि पुलिसिया वर्दी और प्राधिकार का डर दिखा कर उन्हें पुलिस हिरासत में यातनाएं दी जाती हैं, जहां पीड़ित पूरी तरह असहाय होता है।

दूसरे, नागरिकों की व्यक्तिगत आजादी और जिंदगी की हिफाजत करने के लिए भले ही संवैधानिक प्रावधान बने हों, मगर हकीकत यही है कि पुलिस हिरासत में यातना और मौत की घटनाओं में लगातार इजाफा हो रहा है। ऐसे मामलों की अदालतों द्वारा भर्त्सना किए जाने के बावजूद कुछ पुलिस अधिकारी ऐसा व्यवहार करते हैं कि शक के आधार पर गिरफ्तार किए गए लोगों को जान से हाथ धोना पड़ता है।
इस स्थिति में सुधार के लिए विधि आयोग ने अहम सिफारिशें की थीं। आयोग के मुताबिक (भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872) में उचित संशोधन की आवश्यकता है ताकि हिरासत में हुई मौत को लेकर अपने आप को बेगुनाह साबित करने की जिम्मेदारी पुलिस की हो। दूसरे, अपराध दंड संहिता की धारा 197 को रद्द करने की आवश्यकता है ताकि अदालत की वरीयता की रक्षा की जा सके।

विधि आयोग की सिफारिशों के अलावा पुलिस सुधार के लिए समय-समय पर बने आयोगों और समितियों ने भी कई महत्त्वपूर्ण सुझाव दिए हैं। पर उनकी रिपोर्टें धूल खा रही हैं। आखिर एक जनतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस की कार्यप्रणाली ऐसी क्यों है कि आम लोग उसकी मौजूदगी से आश्वस्त होने के बजाय उससे भय खाते हैं। प्रश्न उठना लाजिमी है कि हिरासत में यातना दिए जाने की घटनाओं में बढ़ोतरी के पीछे क्या वजहें हैं।

दरअसल, यातना देने वाले को मालूम रहता है कि वह पूरी तरह सुरक्षित है, वह कुछ भी करे, सजा से बचा रह सकता है। खुद केंद्र और राज्य सरकारें भी अपराध दंड संहिता की धारा 197 के अंतर्गत दोषी अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई करने की मंजूरी नहीं देती हैं। ऐसा नहीं है कि इस तरह की मौतों को रोकने के लिए सरकार ने नीतियां नहीं बनाई हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने हिरासत में मौतों को लेकर अपने स्पष्ट दिशा-निर्देश तय किए हैं। इनमें ऐसी घटनाओं की सूचना चौबीस घंटे के भीतर पहुंचाने में, इस बात की पड़ताल करते हुए कि कहीं पुलिस या सरकारी अधिकारी ने कोई गड़बड़ी तो नहीं की है, इसे भी जांचने के दिशा-निर्देश दिए हैं। इसके अलावा अपराध दंड संहिता की धारा 176 के अंतर्गत, किसी भी अस्वाभाविक मौत को लेकर जिला प्रशासन के लिए यह अनिवार्य होता है कि वह चौबीस घंटे के अंदर न्यायिक जांच करे। इतना ही नहीं, हिरासत में मौत के मामले में शव परीक्षण भी चौबीस घंटे के अंदर कराए जाने का प्रावधान बनाया गया है। लेकिन तथ्य बताते हैं कि इन सभी नियमों का धड़ल्ले से उल्लंघन किया जाता है।

सबसे बड़ा सवाल है कि सरकारें जनता की बेहतरी के प्रति कितनी गंभीर होती हैं। कुछ साल पहले संसद में हीरेन मुखर्जी स्मारक व्याख्यान देते हुए नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री प्रोफेसर अमर्त्य सेन ने एक अहम बात कही थी, जिस पर हर सरकार को गौर करना ही चाहिए। उनका कहना था कि ‘सामाजिक न्याय के विचार की पड़ताल करते हुए यह महत्त्वपूर्ण हो जाता है कि हम न्याय के प्रणाली-केंद्रित नजरिए और नतीजा केंद्रित नजरिए में फर्क करें। अक्सर हम न्याय को कुछ सांगठनिक प्रणालियों के संदर्भ में सोचते हैं- कुछ संस्थाएं, कुछ नियमन, कुछ व्यवहारगत नियम- जिनकी सक्रिय मौजूदगी हमें बताती है कि न्याय को अमल में लाया जा रहा है। सवाल यह है कि क्या न्याय की मांग महज संस्थाओं के गठन तथा नियमों के निर्धारण तक सीमित रखी जा सकती है।’

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