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आगमनी कैसे गाऊं

अपूर्वानंद जनसत्ता 3 अक्तूबर, 2014: धूप का कोण बदलने लगा है। और उसमें तीखापन भी बढ़ रहा है। क्वांर जो ठहरा। सूरज को भी अब लौटने की जल्दी रहती है। श्वेत पंखुड़ियों को नारंगी डंठल पर सजाए शिउली की नन्ही बूंदों से सामने की जमीन का टुकड़ा भरने लगा है। हवा में एक रहस्यमय गंध […]

Author October 3, 2014 11:31 AM

अपूर्वानंद

जनसत्ता 3 अक्तूबर, 2014: धूप का कोण बदलने लगा है। और उसमें तीखापन भी बढ़ रहा है। क्वांर जो ठहरा। सूरज को भी अब लौटने की जल्दी रहती है। श्वेत पंखुड़ियों को नारंगी डंठल पर सजाए शिउली की नन्ही बूंदों से सामने की जमीन का टुकड़ा भरने लगा है। हवा में एक रहस्यमय गंध भरने लगी है। जैसे कोई प्रत्याशा तैर रही हो। कवि से शब्द उधार लूं तो कह सकता हूं, अनुभव से जानता हूं कि यह शारदीय गंध है।

बेटी के मायके आने का मौसम। वर्ष भर की प्रतीक्षा के फलीभूत होने का समय। मां की व्याकुलता के चरम पर पहुंचने का क्षण। बेटी आएगी तो? उमा, गौरा, पार्वती, मां किन नामों से पुकारती रही होगी? और पिता हिमालय? कौन-सा नाम दुलार का रहा होगा, डाक नाम? क्या मां का अलग होगा और पिता का अलग?

मैना वार्षिक प्रतीक्षा करते हुए गाती है। गाते हुए रोती है और रोते हुए गाती है। बेटी पगली थी, जो रीझ गई उस नंगे-बूचे पर। न घर का ठिकाना न खाने का जुगाड़। आते-जाते नजर पड़ी और हठ पकड़ ली, रहूंगी तो उसी के साथ, नहीं तो यों ही जीवन गुजार दूंगी। खाना-पीना छोड़ दिया। क्या करते? एक ही बेटी ठहरी। ठान लिया सो ठान लिया। पिता को भी दिल कड़ा करके मानना ही पड़ा। दूल्हे के घर-बार, आगे-पीछे का कुछ पता नहीं। क्या करता है, कौन साथी-संघाती है! आखिर बेटी है, इतने दुलार से, जतन से पाला-पोसा है, किसी भी ऐरे-गैरे के पल्ले ऐसे कैसे बांध दें। पर नहीं साहब, बेटी ने मजबूर कर दिया।

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उड़ते-पुड़ते सुना- दुहाजू है। पहली पत्नी ने बाप के सामने जान दे दी, क्योंकि मायके में पति का अपमान हो गया था। अहंकारी बाप ने गरीब दामाद को न्योता जो नहीं भेजा था। बस! बेटी का भी दिमाग फिर गया। गुस्से में तमतमाई बाप के घर जा धमकी और भरी महफिल में जान दे दी आग में कूद कर! फिर यह भी सुना कि पत्नी का शरीर कंधे पर लिए-लिए पगलाया हुआ घूमता रहा, घूमता रहा। एक-एक अंग गिरता रहा और यह पत्नी के विरह में क्रोध और शोक से बेहोश बस चक्कर लगाता रहा। क्या इस बीहड़ पत्नी प्रेम की कथा फैला कर मोह लिया इसने हमारी गौरी को? कुछ भी हो सकता है!

ऐसी खबर छिपती भी तो नहीं! लोगों को पता चला तो आ-आकर पिता के कान में फुसफुसाने लगे- अजी! वह तो सदा ही मताया रहता है। अजीब-अजीब साथी हैं उसके। और हमेशा देव-विरोधियों का साथ देता है। जिस दानव को देखो, जिस राक्षस की बात करो, इसका भक्त निकल आता है। और यह भी ऐसा है कि किसी को कुछ, किसी को कुछ देने को तैयार रहता है। देवगण तो तंग आ चुके हैं इससे! भली सोहबत नहीं है इसकी। किसी के भी पुकारने पर चल पड़ता है। उसकी मदद से भले लोगों को इन दुष्टों ने बहुत तंग किया है। बेचारे विष्णु को हमेशा इसका बिगाड़ा सुधारना पड़ता है। एक तो कुछ है नहीं अंटी में, जो है भी कोई मांगने आए, देने को तैयार। आपको अपनी बिरादरी का खयाल रखना ही होगा। बेटी को समझाइए।

बेटी समझाने से समझती है, भला! वह भी हमारी गौरी! भाग-पड़ा कर शादी करे, इससे अच्छा तो यही है कि हम इंतजाम कर दें। दिल को संतोष तो रहेगा कि बेटी को खुद विदा किया।

क्या बताऊं लेकिन, जो सोचा था, उससे भी भयानक निकला। बरात जो आई द्वार पर तो पास-पड़ोसी मुंह दबा कर हंसने लगे। एक ही निराली बरात! बैल पर दूल्हा देखा है किसी ने? फिर सांप, वगैरह गले में लिपटे? अजीब सूरत-शकल वाले साथी। कोई भी तो भला आदमी नहीं दीखा! भूत-पिशाच, सब! बिरादरी वालों ने व्यंग्य में मुंह बिचकाया। पड़ोसिनें आंखें नचाने लगीं: खून का घूंट पीकर रहना पड़ा। बेटी लेकिन जरा भी विचलित नहीं हुई। मानो वर ने कोई मंतर फूंक दिया हो। बाप कुछ बोले नहीं। बस! मुंह बंद कर सारी रस्में निभाते रहे। हो-हल्ला करते हुए, इसके नशेड़ी-भंगेड़ी दोस्त खा-पीकर जैसे आए थे, वैसे ही रवाना हो गए।

सबने हम पर तरस खाया। काना-फूसी शुरू हो गई: देखना, बेटी कल रोती-गाती न लौट आए तो कहना! मां-बाप भी कैसे गैर-जिम्मेवार हैं, बेटी पर नजर नहीं रखते। सर नीचे करके सब सुनना पड़ा। लेकिन एक-एक दिन निकले और बेटी की खबर ही नहीं। इधर मां का कलेजा कांपता रहा और उधर लोगों को फिर मौका मिला: कुछ तो अता-पता रखना चाहिए! सुना है कैलास पर कोई झोंपड़ी डाल रखी है। भांग-धतूरा खाकर पड़ा रहता है, कोई काम-काज करता नहीं है। बेचारी नखरों की पली पार्वती झाडू लगाती है खुद। घर में कोई अच्छा बर्तन-बासन नहीं है। बस! आसपास से जलावन लाकर टूटे-फूटे बरतन में खाना बनता है और खाया जाता है। सुना है, परम क्रोधी है उसका दूल्हा।

मैना दम साधे उसकी ओर से खबर का इंतजार करती रहीं। कोई सुनगुन नहीं, कोई समाचार नहीं। नारद भी नहीं आते इस ओर आजकल कि पूछूं। उसी बंदे ने तो तैयार कर लिया था अपनी मोहिनी बातें सुना-सुना कर। वरना तो मैंने कह दिया था, नहीं भेजूंगी उस नशेड़ी-भंगेड़ी के साथ अपनी उमा को।
साल बीतने को आया। कास फूलने लगे हैं, शिउली फूल की भीनी गंध से हवा हल्की हो आई है। मैना का धीरज का बांध टूटने लगता है। पिता हिमालय तो राजकाज में व्यस्त रहते हैं, फिर ठहरे पुरुष! रात को कैलास की ओर मुंह करके चुपचाप देखते रहते हैं, लंबी सांस भरते हैं, कुछ बोलते नहीं। मैना भर्त्सना करती हैं उनकी, ‘जाओ, बेटी को लिवा लाओ। लोगबाग भी क्या कह रहे हैं, सुना है तुमने? ब्याह करके बस छुट्टी पा ली उससे, जैसे बेटी बोझा थी!’ मैना कहती हैं, ‘ले आओ बेटी-जमाई दोनों को, इस बार महादेव को कहूंगी, यहीं रह जाओ! घरजमाई की तरह रहेगा। बेटी आंख के सामने तो रहेगी कम से कम!’

बेटी आती है, प्रसन्नवदन। कोई गहना-आभूषण नहीं। एक मलिन-सी साड़ी है, लेकिन खुश नजर आती है। मां अकेले में जानना चाहती है। बेटी हंस उठती है। पूरी दुनिया उस बैल के सवार, डमरूवाले के साथ घूमने के किस्से सुनाती है। डरपोक देवताओं के तरह-तरह के मदद, पैरवी के किस्से सुनाती है। लगता है, इसका भी दिमाग फिरने लगा है। शिव का मन लगता है समाज-बाहर लोगों के बीच: भूत-प्रेत, दानव-राक्षस। डमरू बजाते हैं, नाचते-गाते हैं। नृत्य देखोगी मां तो पागल हो जाओगी! मैना अचरज से सब सुनती रहती हैं। दामाद में पुरुष जैसा लक्षण तो कोई दीखता ही नहीं।

अभी मां-बेटी की बात खत्म नहीं हुई कि तीन दिन निकल जाते हैं। उधर डमरू की आवाज आने लगती है। और नंदी के गले में बंधी घंटी की भी। उमा व्यस्त हो उठती है। पति आ गया लगता है। मैना क्षुब्ध होती हैं, इतनी भी क्या बेसब्री! लोग क्या कहेंगे! इतनी व्याकुलता, पत्नी के बिना कुछ दिन भी रह नहीं सकता! बेटी मां को समझाती है: तुम्हारा जमाई मेरे बिना रह नहीं सकता। और तुम भी तो किसी की बेटी हो।

शिव आ गए हैं अपनी प्रिया को लिवा जाने। पड़ोसिनें फिर फिस-फिस करती हैं, ‘लगता है भांग खत्म हो गई जो यह पीस कर रख आई थी! गौरी, जरा हाथ तो दिखाओ अपने, लोढ़े से सिलबट्टा पर भांग पीसते-पीसते घट्टा तो नहीं पड़ गया है बेचारी की हथेली में!’ और वह आ ही गया! नाचता है, डमरू बजाता है, कोई लोकलाज नहीं! सास-ससुर के सामने, ससुराल में भी नाच-गान की महफिल! मैना रोते-रोते बेसुध हो जाती हैं, लेकिन बेटी निष्ठुरता से जाने को तैयार हो जाती है।

कवि राम प्रसाद ठिठोली करते हैं, ‘अरे उमा, यह नचैया-बजवैया त्रिशूल लेकर क्या करता है? सेंध काटता है क्या उससे? और दोनों बेटों को गंजी पहनाए बिना दुनिया घुमाती रहती हो। कहीं तुम्हारी सौत के बेटे तो नहीं?’

उमा भी बदल गई है। भिखमंगा कह कर दुरदुराए जाने पर भी अपने शंकर की असलियत जानती है। श्मशान से भय नहीं लगता उसे। वह तो उस बमभोले के साथ खुश है। भस्म रचाए उस त्रिनेत्र की प्रेम -भरी निगाहों की शीतलता और ऊष्मा, दोनों का ही अनुभव किया है उसने। सर्वहारा है तो क्या हुआ! कलावंत है। डमरू बजाता है तो जैसे काल को ही पुकारता हो। और भीषण दयालु है। किसी को भी तो निराश नहीं करता। लेकिन पार्वती देवताओं की तरफ उसके झुकाव को समझ नहीं पातीं। नाकारा देवता, हमेशा रोते-गाते आते हैं, इस राक्षस ने यह छीन लिया, उसने मार कर निकाल दिया। शिकायत करते हैं, दुहाई देते हैं, ‘आपने ही मन बढ़ा रखा है उनका, आपके पास जमघट लगाए रहते हैं!’

हर वर्ष शरत की पदचाप सुनते हुए इस किस्से को दुहराता हूं। लेकिन इस बार जी कर रहा है, उमा को कहूं, ‘उधर ही रह जाओ, मां! यह पर्व अब बेटी का रहा नहीं। एक तो तुम्हें इतने अस्त्र-शस्त्रों से लैस कौन कर रहा है? क्या ये छली, कायर, देवता शिव के साथ तुम्हारा भी इस्तेमाल कर रहे हैं मां? तुम तो मैना-पुत्री हो न? फिर यह अहंकार इनका कि कहें कि इनके तेजों के मिश्रण से तुम जनमी हो!

आखिर महिषासुर ने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, जो तुम उससे युद्ध कर उसका वध करो! जमीन-संपत्ति का झगड़ा है न उनके बीच! फिर उस युद्ध में तुम्हारा क्या प्रयोजन, मां? वह तो उन्हीं में से है, जो तुम्हारे पति के साथ नाचते-गाते हैं, भांग-बूटी छानते हैं। तुम्हारे सौम्य प्रेमिल मुख से इन हथियारों का क्या मेल!’

कहना चाहता हूं, ‘मां! इधर मत आओ अभी। हर वर्ष ही तुम्हारे आगमन के पहले हवा में रक्त और आंसुओं का नमक घुलने लगा है आजकल। तुम्हारे नाम पर सेना बन गई है और तुम्हारे उस बमभोले ने जो मजे में सजावट के तौर पर त्रिशूल ले रखा था, उसे मालूम नहीं, उसके चलते उसे डरौने के तौर पर इस्तेमाल करने लगे हैं लोग। पूरा मौसम घृणा का हो चला है। तुम्हारी मां की व्यथा अलग थी, उमा। वह एक मां की आशंका थी। लेकिन वह तो अब अपने नातियों गणेश-कार्तिकेय के साथ तुम्हारा स्वागत ही करती रही है न? पिता हिमालय अपनी प्रतिष्ठा के अहंकार में नाचने-गाने वाले डमरूधारी को ससुराल आने से सती के पिता दक्ष की तरह रोकते तो नहीं! फिर ये कौन हैं उमा, जो तुम्हारे नाम पर लोगों को डरा-धमका रहे हैं? तुम इनका स्वागत कैसे स्वीकार कर सकती हो मां?’

मैं अपनी बड़ी होती बेटी को देखता हूं, मां। मैं उसे बताना चाहता हूं कि यह बेटी का पर्व है, बेटी और मां-बाप का। मां-बाप की बात न मानने वाली हठी बेटियों का, प्रेम की असुविधा का वरण करने वाली बेटियों का। यह उनके स्वागत का पर्व है। लेकिन मैं उसे तुम्हारे पास कैसे भेजूं, तुम्हें इतने हिंसक रूप में कैसे दिखाऊं उसको! वे कौन हैं जो तुम्हारी अभ्यर्थना के नाम पर युद्ध-घोष कर रहे हैं? मैं उस घड़ी-घंटाल के शोर में तुम्हारी आगमनी कैसे गाऊं?

 

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