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कैसे प्रदूषण-मुक्त हों नदियां

नदियों की प्रदूषण-मुक्ति के नाम पर खर्च बढ़ता जा रहा है, पर सरकारी प्रयास अब भी नतीजा लाते नहीं दिख रहे। आखिर क्यों?

Author January 11, 2016 01:59 am
चित्र का इस्तेमाल सिर्फ प्रतीक के तौर पर किया गया है।

नदियों की प्रदूषण-मुक्ति के नाम पर खर्च बढ़ता जा रहा है, पर सरकारी प्रयास अब भी नतीजा लाते नहीं दिख रहे। आखिर क्यों? क्योंकि नदी को धन नहीं, धुन चाहिए; क्योंकि नदी को ढांचे नहीं, ढांचों से मुक्ति चाहिए; क्योंकि नदी को शासन नहीं, अनुशासन चाहिए। नदी को मलीन करने वालों को रोकने के बजाय, निर्मलीकरण के नाम पर कर्ज, खर्च, मशीनें और ढांचे… ये प्रदूषण-मुक्ति के काम नहीं हैं। ये प्रदूषण-मुक्ति की आवाजों को पैसे में बदल लेने के काम हैं, जो कि शासन, प्रशासन और बाजार…तीनों ने अच्छी तरह सीख लिये हैं। ऐसे में सदाचार कैसे लौटे और नदी निर्मल हो, तो आखिर कैसे?

दरअसल, कोई नदी एक अलग टुकड़ा नहीं होती। नदी सिर्फ पानी भी नहीं होती। नदी एक समग्र और जीवंत प्रणाली होती है। अत: इस इसकी निर्मलता लौटाने का संकल्प करने वालों की सोच में समग्रता और हृदय में जीवंतता और निर्मलता का होना जरूरी है। नदियों को उनका मूल प्रवाह और गुणवत्ता लौटाना बरस-दो बरस का काम नहीं हो सकता, पर संकल्प निर्मल हो; सोच समग्र हो; कार्य-योजना ईमानदार और सुस्पष्ट हो, सातत्य सुनिश्चित हो, तो कोई भी पीढ़ी अपने जीवन-काल में किसी एक नदी को मृत्यु शय्या से उठाकर उसके पैरों पर चला सकती है।

एक बात और। धन की कमी इसमें कभी बाधा नहीं बनती। आजादी के दीवानों ने कभी पैसे की कमी का रोना नहीं रोया। जब जरूरत हुई, जुट गया। चाहे किसी मैली नदी को साफ करना हो या सूखी नदी को ‘नीले सोने’ से भर देना हो…सिर्फ धन से यह संभव भी नहीं होता। ऐसे प्रयासों को धन से पहले धुन की जरूरत होती है। नदी को प्रोजेक्ट बाद में, वह कशिश पहले चाहिए, जो पेटजाये को मां के बिना बेचैन कर दे। इस बात को भावनात्मक कह कर हवा में नहीं उड़ाया जा सकता। कालीबेई की प्रदूषण-मुक्ति का संत-प्रयास और अलवर के सत्तर गांवों द्वारा अपने साथ-साथ अरवरी नदी का पुनरोद्धार इस बात के पुख्ता प्रमाण हैं।

नदी से संबंधित समग्र सोच यह है कि झील, ग्लेशियर आदि मूल स्रोत हो सकते हैं, लेकिन नदी के प्रवाह को जीवन देने का असल काम नदी बेसिन की छोटी-बड़ी वनस्पतियां और उससे जुड़ने वाली नदियां, झरने, लाखों तालाब और बरसाती नाले करते हैं। इन सभी को समृद्ध रखने की योजना कहां है? हर नदी बेसिन की अपनी एक अनूठी जैव विविधता और भौतिक स्वरूप होता है। ये दोनों ही मिल कर नदी विशेष के पानी की गुणवत्ता तय करते हंै। नदी का ढाल, तल का स्वरूप, उसके कटाव, मौजूद पत्थर, रेत, जलीय जीव-वनस्पतियां मिल कर तय करते हैं कि नदी का जल कैसा होगा। नदी प्रवाह में स्वयं को साफ कर लेने की क्षमता का निर्धारण भी ये तत्त्व ही करते हैं। सोचना चाहिए कि एक ही पर्वत चोटी के दो ओर से बहने वाली गंगा-यमुना के जल में क्षार तत्त्व की मात्रा भिन्न क्यों है।

ऊर्जा, सिंचाई और जल परिवहन के नाम पर हम नदियों के प्रवाह मार्ग में अवरोध-दर-अवरोध खड़े करने की परियोजनाएं पेश करते रहें, बाढ़-मुक्ति के नाम पर तटबंध बनाते रहें, नदी तटबंधों को एक्सप्रेस-वे में बदलते रहें, गाद-सफाई के नाम पर मालती और उज्जयिनी जैसी नदियों के तल को जेसीबी लगा कर छील दें, उनके ऊबड़-खाबड़ तल को समतल बना दें, प्रवाह की तीव्रता के कारण मोड़ों पर स्वाभाविक रूप से बने आठ-आठ फुट गहरे कुंडों को खत्म कर दें, वनस्पतियों को नष्ट कर दें और उम्मीद करें कि नदी में प्रवाह बचेगा। उम्मीद करें कि अमेठी की उज्जयिनी जैसी छोटी-सी नदी, संजय गांधी अस्तपताल व एचएएल के बहाए जहर को स्वयं साफ कर लेगी, यह संभव नहीं है।

ऐसी बेसमझी को नदी पर सिर्फ स्टॉप डैम बना कर नहीं सुधारा जा सकता। कानपुर की पांडु के पाट पर इमारत बना लेना, पश्चिमी उत्तर प्रदेश की हिंडन को औद्योगिक कचरा डंप करने का साधन मान लेना और मेरठ की काली नदी में बूचड़खानों के मांस-मज्जा और खून बहाना और नदी को एक्सप्रेस-वे नामक तटबंधों से बांध देना- नदियों को नाला बनाने के काम हैं। समझना चाहिए कि अविरलता ही नदी का गुण होता है। यह गुण लौटाने के लिए नदी को उसका प्राकृतिक स्वरूप लौटाना चाहिए। नालों को वापस नदी बनाना चाहिए।

जैव विविधता लौटाने के लिए नदी के पानी की जैव आॅक्सीजन मांग घटानी होगी, ताकि नदी को साफ करने वाली मछलियां, मगरमच्छ, घड़ियाल और जीवाणुओं की एक बड़ी फौज इसमें जिंदा रह सके। नदी को उसकी रेत और पत्थर लौटाने होंगे, ताकि नदी सांस ले सके। कब्जे रोकने होंगे, ताकि नदियां आजाद बह सकें। नहरी सिंचाई पर निर्भरता कम करनी होगी। नदी से सीधे सिंचाई अक्तूबर के बाद प्रतिबंधित करनी होगी, ताकि नदी के ताजा जल का कम से कम दोहन हो। भूजल पुनर्भरण के लिए तालाब, सोखता पिट, कुंड और अपनी जड़ों में पानी संजोने वाली पंचवटी की एक पूरी खेप ही तैयार करनी होनी होगी, भूजल को निर्मल करने वाले जामुन जैसे वृक्षों को साथी बनाना होगा। इस दृष्टि से प्रत्येक नदी जलग्रहण क्षेत्र की एक अलग प्रबंध तथा विकास योजना बनानी होगी।

नदी जलग्रहण क्षेत्र के विकास की योजना शेष हिस्से जैसी नहीं हो सकती। झारखंड, बुंदेलखंड, उत्तराखंड व अन्य हिम क्षेत्रों को सामने रखें। ये सभी क्षेत्र, भारत की आबोहवा को दुरुस्त रखने वाले जरूरी प्राकृतिक टापू हैं। उदाहरण के तौर पर बुंदेलखंड की विकास योजना, एक तीर्थ और वनक्षेत्र के रूप में हो सकती है। धरती से सिर्फ ज्यादा से ज्यादा उपजाने की जुगत लगाने से सूखे का दीर्घकालिक समाधान नहीं हो सकता।

बुंदेलखंडवासियों के आजीविका प्रबंधन की दृष्टि से खेती और खनन से ज्यादा मवेशी, वनोत्पाद, तीर्थ और हस्तकौशल के कुटीर उद्योगों को प्राथमिकता पर आना चाहिए। आज हम धन की मांग करने वाले जिंदगी के सारे सपनों की पूर्ति धरती और प्रकृति की सांस खींच कर करने में लगे हैं। यह ज्यादा दिन नहीं चलेगा। नदी जलग्रहण क्षेत्र में रोजगार के कुटीर और अन्य वैकल्पिक साधनों को लेकर पुख्ता कार्य योजना चाहिए ही।

आज भारत की सरकारें नदियों पर कार्य-योजनाएं तो बना रही हैं, नदी प्रबंधन का सिद्धांत आज तक नहीं बनाया। समग्र सोच का एक विषय यह भी है। सिद्धांत पहले बनाने चाहिए, कार्य-योजना बाद में। सिद्धांत कार्य-योजना का ऐसा मूलाधार होते हैं, जिनका पालन हर हाल में करने से ही कार्य-योजना अपना लक्ष्य पाने में ईमानदार भूमिका अदा कर पाती है। वह सिद्धांत ही क्या, जो व्यवहार में लागू न हो सके।

नदी में से कब-कहां और कितना रेत-पत्थर-पानी निकालने की अनुमति हो, इसका कोई तय सिद्धांत होना चाहिए कि नहीं? नदी निर्मलता का सिद्धांत क्या हो? नदी को पहले गंदा करें और फिर साफ करें, या नदी गंदी ही न होने दी जाए? कोई नाला कचरे को पहले ढोकर नदी तक लाए, हमारे संयंत्र फिर उसे साफ करें या कचरे का निस्तारण कचरे के मूल स्रोत पर ही किया जाए? नदी भूमि को हरित क्षेत्र बना कर नदी को आजाद बहने दिया जाए या ‘रिवरफ्रंट व्यू डेवलपमेंट’, एक्सप्रेस वे और औद्योगिक कॉरीडोर के बीच में फंस कर मरने के लिए छोड़ दिया जाए?

वर्ष 1932 में पहली बार कमिश्नर हॉकिन्स ने बनारस के नाले को गंगा में मिलाने का एक आदेश दिया। मालवीयजी की असहमति के बावजूद वह लागू हुआ। इससे पहले नदी में नाला मिलाने का कोई उदाहरण शायद ही हो। क्या हमें तय नहीं करना चाहिए कि पहले कचरे को नदी में मिलने ही नहीं दिया जाएगा, कचरे का निस्तारण उसके मूल स्रोत पर ही किया जाएगा? आज हम कचरा-जल नदी में और ताजा जल नहरों में बहा रहे हैं। यह सिद्धांत विपरीत है। इसे उलट दें। ताजे स्वच्छ जल को नदी में बहने दें और कचरा-जल को शोधन के बाद नहरों में जाने दें। यह क्यों नहीं हो सकता?

सामुदायिक व निजी सेप्टिक टैंकों पर पूरी तरह कामयाब मलशोधन प्रणालियां भारत में ही मौजूद हैं। लखनऊवासी अपना मल-मूल सुलतानपुर-जौनपुर को सौंपते हैं, दिल्लीवासी बृज को। कोलकोतावासी अपना मल नदी में नहीं बहाते। हजारों तालाबों के जरिए वे आज भी निर्मल कथा ही लिख रहे हैं। बेंगलुरु के हनी शकर्स सेप्टिक टैंक से मल निकाल कर कंपोस्ट में तब्दील कर नदी भी बचा रहे हैं और खेती भी। भारत सरकार के रक्षा अनुसंधान विकास संगठन द्वारा ईजाद मल की जैविक निस्तारण प्रणाली को देखें, पता चलेगा कि हर नई बसावट, सोसाइटी फ्लैट्स तथा व्यावसायिक परिसरों आदि को सीवेज पाइपलाइन से जोड़ने की जरूरत ही कहां है? लेकिन शासन-प्रशासन को है; क्योंकि ये पाइपलाइनें उन्हें सीवेज देखरेख के नाम पर ग्राहक से ढेर सारा पैसा वसलूने का मौका देती हैं।

पाइपलाइनों से जुड़े सीवेज के सौ फीसद शोधन पर अभी तक सरकार गंभीर नहीं हुई है। अभी वह नदी में निवेश और शौच में मुनाफा देख रही कंपनियों का रूट-प्लान बनाने में व्यस्त है। उनकी सोच समझाइश से ज्यादा साधी जा रही है नोट से। नोट देकर साधना, सामाजिक खोट का प्रतीक है। समाज के पास वोट हैं। जन, जीव और प्रकृति के बजाय पैसा, पद और पार्टी को प्राथमिकता पर रखने वाले नेताओं को मिलने वाले वोट का रास्ता बंद करें। वे खुद-ब-खुद सध जाएंगे। रही बात प्रदूषण और प्रदूषकों को बांधने की, समाज की समग्र सोच और उसे कार्यरूप में उतारने का संकल्प, दोनों को बांध सकता है। अविरलता को लक्ष्य बनाना होगा। निर्मलता का मार्ग खुद-ब-खुद प्रशस्त हो जाएगा।

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