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राजनीतिः कैसे थमेंगे बाल अपराध

जोर सजा की कठोरता पर नहीं, सुधार पर होना चाहिए। इसका अर्थ यह भी है कि बाल अपराध की जड़ों का उन्मूलन किया जाए। गरीबी, पारिवारिक-सामाजिक विघटन, पोर्नोग्राफी, बाल श्रम तथा अन्य प्रकार से होने वाले बच्चों के शोषण-उत्पीड़न से निपटे बगैर बाल अपराध को खत्म करने की रणनीति बहुत कारगर नहीं हो सकती।

भारतीय समाज में बाल अपराध की दर दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। इसका कारण है कि वर्तमान समय में नगरीकरण तथा औद्योगीकरण की प्रक्रिया ने एक ऐसे वातावरण का सृजन किया है जिसमें अधिकांश परिवार बच्चों पर नियंत्रण रखने में असफल सिद्ध हो रहे हैं। वैयक्तिक स्वंतत्रता में वृद्धि के कारण नैतिक मूल्य बिखरने लगे हैं, इसके साथ ही अत्यधिक प्रतिस्पर्धा ने बालकों में विचलन पैदा किया है। कंप्यूटर और इंटरनेट की उपलब्धता ने इन्हें समाज से अलग कर दिया है। फलस्वरूप वे अवसाद के शिकार होकर अपराधो में लिप्त हो रहे हैं।
जब किसी बच्चे द्वारा कोई कानून-विरोधी या समाज-विरोधी कार्य किया जाता है तो उसे किशोर अपराध या बाल अपराध कहते हैं। कानूनी दृष्टिकोण से बाल अपराध आठ वर्ष से अधिक तथा सोलह वर्ष से कम आयु के बालक द्वारा किया गया कानून-विरोधी कार्य है जिसे कानूनी कार्यवाई के लिए किशोर न्यायालय के समक्ष उपस्थित किया जाता है। बाल अपराध में बालकों के असामाजिक व्यवहारों को लिया जाता है अथवा बालकों के ऐसे व्यवहारों का जो लोक कल्याण की दृष्टि से अहितकर होते हैं। ऐसे कृत्यों को करने वाला या उनमें शामिल होने वाला किशोर बाल-अपराधी कहलाता है।

समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से बाल अपराध के लिए आयु को अधिक महत्त्व नहीं दिया जाता, क्योंकि व्यक्ति की मानसिक व सामाजिक परिपक्वता सदा ही आयु से प्रभावित नहीं होती। अत: कुछ विद्वान, बालक के प्रकट व्यवहार व प्रवृत्ति को बाल अपराध के लिए आधार मानते हैं। जैसे आवारागर्दी करना, स्कूल से अनुपस्थित रहना, माता-पिता तथा संरक्षकों की आज्ञा न मानना, अश्लील भाषा का प्रयोग करना, चरित्रहीन व्यक्तियों से संपर्क रखना आदि। लेकिन जब तक कोई वैध तरीका सर्वसम्मति से स्वीकार नहीं कर लिया जाता तब तक आयु को ही बाल अपराध का निर्धारक आधार माना जाएगा। समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से एक बाल अपराधी वह व्यक्ति है जिसके व्यवहार को समाज अपने लिए हानिकारक समझता है और इसलिए वह उसके द्वारा निषिद्ध होता है।

किशोरावस्था में व्यक्तित्व के निर्माण तथा व्यवहार के निर्धारण में वातावरण का बहुत हाथ होता है; अत: अपने उचित या अनुचित व्यवहार के लिए किशोर बालक स्वयं नहीं बल्कि उसका वातावरण उत्तरदायी होता है। इस कारण बहुत सारे देशों में किशोर अपराधों की बाबत अलग न्यायविधान है। भारत में भी ऐसी व्यवस्था चली आ रही है। उनके न्यायाधीश व अन्य न्यायाधिकारी बाल मनोविज्ञान के जानकार होते हैं। वहां बाल-अपराधियों को दंड नहीं दिया जाता, बल्कि उनके जीवनवृत्त के आधार पर उनका तथा उनके वातावरण का अध्ययन करके वातावरण में मौजूद अपराधों को जन्म देने वाले तत्त्वों में सुधार करके बच्चों के सुधार का प्रयत्न किया जाता है। अपराधी बच्चों के प्रति सहानुभूति, प्रेम, दया और संवेदना का व्यवहार किया जाता है।

संपूर्ण भारत के लिए सन 1876 में सुधारालय स्कूल अधिनियम बना, जिसमें 1897 में संशोधन किया गया था। यह अधिनियम भारत के अन्य स्थानों पर पंद्रह तथा मुंबई में सोलह वर्ष के बच्चों पर लागू होता था। इस कानून में बाल-अपराधियों को औद्योगिक प्रशिक्षण देने की बात भी कही गई थी। अखिल भारतीय स्तर लागू होने वाले कानून के स्थान पर अलग-अलग प्रांत में बाल अधिनियम बने। सन 1920 में मद्रास, बंगाल, बंबई, दिल्ली, पंजाब में तथा 1949 में उत्तर प्रदेश में और 1970 में राजस्थान में बाल अधिनियम बने। बाल अधिनियमों में समाज-विरोधी व्यवहार करने वाले बालकों को प्रशिक्षण देने तथा आपराधिक कुप्रभाव से बचाने के प्रावधान किए गए, उनके लिए दंड के स्थान पर सुधार को प्राथमिकता देना स्वीकार किया गया।

हमारे देश में बच्चों द्वारा किए जाने वाले अपराधों पर नियंत्रण के लिए विशेष न्यायिक व्यवस्था सुनिश्चित करने की खातिर संवैधानिक व्यवस्थाओं के साथ किशोर न्याय अधिनियम, 1986 व संशोधित, 2000 प्रचलन में है। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने दिसंबर 1996 के बाल श्रम से संबंधित निर्णय में बाल श्रम के लिए गरीबी को उत्तरदायी मानते हुए कहा था कि जब तक परिवार के लिए आय की वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो पाती, तब तक बाल श्रम से निजात पाना मुश्किल है। हालांकि संविधान के अनुच्छेद पैंतालीस के तहत 2003 में 93वें संविधान संशोधन किया गया, जिसमें श्रम के घंटे कम कर बच्चों को बाल श्रम से मुक्ति दिलाने का प्रावधान किया गया। यही नहीं, उनके पुनर्वास के लिए विशेष विद्यालयों व पुनर्वास केंद्रों की व्यवस्था की गई है, जहां ‘रोजगार’ से हटाए गए बच्चों को अनौपचारिक शिक्षा, व्यावसायिक प्रशिक्षण, अनुपूरक पोषाहार आदि की सुविधाएं मुहैया कराई जाती हैं। सरकारी प्रयासों के अलावा, बाल अपराध को रोकने के लिए मनोवैज्ञानिक तरीके अपनाकर भी इस समस्या से निजात पाई जा सकती है।

इस समय भारत के सभी राज्यों में किशोर न्यायालय हैं। किशोर न्यायालय में एक प्रथम श्रेणी का मजिस्ट्रेट, आरोपी बालक, माता-पिता, प्रोबेशन अधिकारी, साधारण पोशाक में पुलिसकर्मी उपस्थित रहते हैं। किशोर न्यायालय का वातावरण इस प्रकार का होता है कि बच्चे के मन सेकोर्ट का खौफ दूर हो जाए। ज्यों ही कोई बालक अपराध करता है तो पहले उसे रिमांड क्षेत्र में भेजा जाता है और चौबीस घंटों के भीतर उसे किशोर न्यायालय के सम्मुख प्रस्तुत किया जाता है। उसकी सुनवाई के समय उस व्यक्ति को भी बुलाया जाता है जिसके प्रति बालक ने अपराध किया हो। सुनवाई के बाद आरोपी बालक को चेतावनी देकर, जुर्माना करके या माता-पिता से बांड भरवा कर उन्हें सौंप दिया जाता है अथवा उसें परिवीक्षा पर छोड़ दिया जाता है या किसी सुधार संस्था, मान्यता प्राप्त विद्यालय के परिवीक्षा हॉस्टल में रख दिया जाता है।

भारत में जुर्म में संलिप्त नाबालिगों की संख्या में निरंतर हो रही बढ़ोतरी के कारण किशोर न्याय अधिनियम में बदलाव पर विचार किया गया। भारत में जहां साल 2012 में 27 हजार 936 किशोर आपराधिक गतिविधियों में शामिल थे वहीं साल 2013 में यह संख्या बढ़ कर 31 हजार 725 तक पहुंच गई और 2014 में यह आंकड़ा 33 हजार 526 तक जा पहुंचा। दिल्ली में दिसंबर 2012 में हुए सामूहिक बलात्कार कांड के बाद देश में अपराधिक मामलों में नाबालिगों की आयु को लेकर खासा विवाद उत्पन्न हुआ था। इसके पीछे मुख्य कारण इस घिनौने और निर्मम हत्याकांड को अंजाम देने वाले आरोपियों में से एक का नाबालिगहोना था। भारत में इस संदर्भ में नाबालिग आयु अठारह वर्ष से घटा कर चौदह वर्ष करने की पुरजोर मांग हुई थी, जिससे जघन्य अपराधों में संलिप्त नाबालिगों पर वयस्क कानून के अंतर्गत सजा हो सके। देश भर में धरनों और प्रदर्शनों के दौर के बाद, पिछले सत्र में देश की संसद में लंबित पड़ा किशोर न्याय बिल अंतत: पास कर दिया गया और नाबालिग आयु को पुन: परिभाषित कर सोलह वर्ष कर दिया गया। भारत में 15 जनवरी, 2016 से नया किशोर न्याय अधिनियम 2015 लागू हो गया है।

किशोर न्याय अपराध कानून के तहत किशोर आरोपी की उम्र सीमा के निर्धारण को लेकर चली बहस में यह तर्क बहुत बार दोहराया गया कि उम्र सीमा घटा देने से संगीन अपराधों में किशोरों के लिप्त की प्रवृत्ति पर अंकुश लग सकेगा। लेकिन इस बहस में किशोर अपराध-न्याय से जुड़ी कई अहम बातें नजरअंदाज कर दी गर्इं। अठारह साल की उम्र सीमा बहुत सोच-समझ कर तय की गई थी। इसके पीछे दो मकसद मुख्य थे। एक, आरोपी का सुधार, और दूसरा, सुधारगृह से वापसी के बाद नया जीवन शुरू करने की भरपूर गुंजाइश देना।
उम्र सीमा घटाने का मतलब है कि बहुत-से आरोपी, जो पहले किशोर न्यायालय में पेश होते, अब सामान्य अदालत में पेश होंगे और उन पर उन्हीं धाराओं के तहत मुकदमे चलेंगे जो वयस्कों पर लागू होते हैं। ऐसे में दोषी सिद्ध होने पर उन्हें दी जाने वाली सजा की अवधि (पहले की तुलना में) काफी अधिक होगी। इसका अर्थ है कि पहले से जहां अधिक से अधिक तीन साल के बाद आरोपी अपने घर-परिवार में लौट आता था, वहीं अब ज्यादा साल गुजारने के बाद लौटेगा, और उसके सुधरने की संभावना पहले से कम होगी तथा नए सिरे से स्वावलंबी होने के प्रयास बहुत मुश्किल हो जाएंगे।
इसलिए जोर सजा की कठोरता पर नहीं, सुधार पर होना चाहिए। इसका अर्थ यह भी है कि बाल अपराध की जड़ों का उन्मूलन किया जाए। गरीबी, पारिवारिक-सामाजिक विघटन, पोर्नोग्राफी, बाल श्रम तथा अन्य प्रकार से होने वाले बच्चों के शोषण-उत्पीड़न से निपटे बगैर बाल अपराध को खत्म करने की रणनीति बहुत कारगर नहीं हो सकती। यह अफसोस की बात है कि इन तकाजों को नजरअंदाज करके सिर्फ कानून को और कड़ा करने तथा सजा की सख्ती पर जोर देने का रुझान बढ़ता गया है।
विभिन्न देशों की भांति भारत में भी बाल अपराधियों को सुधारने के लिए प्रयास किए गए हैं और बाल अपराध की पुनरावृत्ति में कमी आई है। फिर भी इन उपायों में अभी कुछ कमियां हैं जिन्हें दूर करना आवश्यक है। बालक अपराध की ओर उन्मुख न हो, इसके लिए आवश्यक है कि बालकों को स्वस्थ मनोरंजन के साधन उपलब्ध कराए जाएं, अश्लील साहित्य व दोषपूर्ण चलचित्रों पर रोक लगाई जाए, बिगड़े हुए बच्चों को सुधारने में माता-पिता की मदद करने के लिए बाल सलाकार केंद्र गठित किए जाएं तथा संबंधित कार्मिकों को उचित प्रशिक्षण दिया जाए। बाल अपराध की रोकथाम के लिए सरकारी एजेंसियों, शैक्षिक संस्थाओं, पुलिस, न्यायपालिका, सामाजिक कार्यकर्ताओं तथा स्वैच्छिक संगठनों के बीच तालमेल की आवश्यकता है।

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