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राजनीतिः कैसे रुकेगी भोजन की बर्बादी

रविवार को प्रधानमंत्री ने ‘मन की बात’ शृंखला की ताजा कड़ी में देशवासियों को भोजन की बर्र्बादी के प्रति आगाह किया।

फाइल फोटो

शादियों, उत्सवों या त्योहारों में होने वाली भोजन की बर्बादी से हम सब वाकिफ हैं। इन अवसरों पर ढेर सारा खाना कचरे में चला जाता है। कई बार तो घरों के आसपास फेंके गए भोजन से उठने वाली दुर्गंध व सड़ांध वहां रहने वालों के लिए परेशानी खड़ी कर देती है, सड़ते भोजन से जानवरों की मौतों की खबर भी हम पढ़ते रहते हैं। शादियों में खाने की बर्बादी को लेकर सरकार भी चिंतित है।  

रविवार को प्रधानमंत्री ने ‘मन की बात’ शृंखला की ताजा कड़ी में देशवासियों को भोजन की बर्र्बादी के प्रति आगाह किया। भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के लिए यह पाठ पढ़ना जरूरी है। यों भारतीय संस्कृति में अन्न को देवता का दर्जा प्राप्त है और यही कारण है कि भोजन जूठा छोड़ना या उसका अनादर करना पाप माना जाता है। मगर आधुनिकता की अंधी दौड़ में हम अपना यह संस्कार भूल गए हैं। होटल-रेस्तरां के साथ ही शादी-ब्याह जैसे आयोजनों में सैकड़ों टन खाना रोज बर्बाद हो रहा है। भारत ही नहीं, समूची दुनिया का यही हाल है। एक तरफ करोड़ों लोग दाने-दाने को मोहताज हैं, कुपोषण के शिकार हैं, वहीं रोज लाखों टन खाना बर्बाद किया जा रहा है।

दुनिया भर में हर वर्ष जितना भोजन तैयार होता है उसका एक तिहाई यानी लगभग 1 अरब 30 करोड़ टन बर्बाद चला जाता है। बर्बाद जाने वाला भोजन इतना होता है कि उससे दो अरब लोगों की खाने की जरूरत पूरी हो सकती है। विश्व भर में होने वाली भोजन की बर्बादी को रोकने के लिए विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन, अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष और विश्व खाद्य कार्यक्रम ने एकजुट होकर एक परियोजना शुरू की है। एक रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि भारत में बढ़ती संपन्नता के साथ ही लोग खाने के प्रति असंवेदनशील हो रहे हैं। खर्च करने की क्षमता के साथ ही खाना फेंकने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। आज भी देश में विवाह-स्थलों के पास रखे कूड़ाघरों में चालीस प्रतिशत से अधिक खाना फेंका हुआ मिलता है।
विश्व खाद्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया का हर सातवां व्यक्ति भूखा सोता है। अगर इस बर्बादी को रोका जा सके तो कई लोगों का पेट भरा जा सकता है। विश्व भूख सूचकांक में भारत का 67वां स्थान है। देश में हर साल 25.1 करोड़ टन खाद्यान्न का उत्पादन होता है लेकिन हर चौथा भारतीय भूखा सोता है। इंडियन इंस्टीट्यूट आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में हर साल 23 करोड़ टन दाल, 12 करोड़ टन फल और 21 करोड़ टन सब्जियां वितरण प्रणाली में खामियों के कारण खराब हो जाती हैं।
विश्व खाद्य संगठन के मुताबिक भारत में हर साल पचास हजार करोड़ रुपए का भोजन बर्बाद चला जाता है, जो कि देश के खाद्य उत्पादन का चालीस फीसद है। इस अपव्यय का दुष्प्रभाव हमारे देश के प्राकृतिक संसाधनों पर पड़ रहा है। हमारा देश पानी की कमी से जूझ रहा है लेकिन अपव्यय किए जाने वाले इस भोजन को पैदा करने में इतना पानी व्यर्थ चला जाता है जिससे दस करोड़ लोगों की प्यास बुझाई जा सकती है। एक आकलन के मुताबिक अपव्यय के बराबर की धनराशि से पांच करोड़ बच्चों की जिंदगी संवारी जा सकती है। चालीस लाख लोगों को गरीबी के चंगुल से मुक्त किया जा सकता है और पांच करोड़ लोगों को आहार सुरक्षा की गारंटी दी जा सकती है। भारत में हर साल पांच साल से कम उम्र के दस लाख बच्चों के भूख या कुपोषण से मरने के आंकड़े संयुक्त राष्ट्र ने जारी किए हैं। देश के 51.14 प्रतिशत परिवारों की आय का जरिया महज अस्थायी मजदूरी है। 4.08 लाख परिवार कूड़ा बीन कर, तो 6.68 लाख परिवार भीख मांग कर अपना गुजारा करते हैं। गांव में रहने वाले 39.39 प्रतिशत परिवारों की औसत मासिक आय दस हजार रुपए से भी कम है।
ये तथ्य भी विचारणीय हैं कि हमारे देश में हर साल उतना गेहूं बर्बाद होता है जितना आस्ट्रेलिया की कुल पैदावार है। नष्ट हुए गेहूं की कीमत लगभग पचास हजार करोड़ रुपए होती है और इससे तीस करोड़ लोगों को साल भर भरपेट खाना दिया जा सकता है। हमारा 2.1 करोड़ टन अनाज केवल इसलिए बर्बाद हो जाता है, क्योंकि उसे रखने के लिए हमारे पास माकूल भंडारण की सुविधा नहीं है। देश के कुल उत्पादित फल-सब्जी का चालीस फीसद समय पर मंडी तक नहीं पहुंच पाने के कारण सड़-गल जाता है।

औसतन हर भारतीय एक साल में छह से ग्यारह किलो अन्न बर्बाद करता है। जितना अन्न हम एक साल में बर्बाद करते हैं, उसकी कीमत से ही कई सौ कोल्ड स्टोरेज बनाए जा सकते हैं जो फल-सब्जी को सड़ने से बचा सकें। एक साल में जितना सरकारी खरीदी का धान व गेहूं खुले में पड़े होने के कारण नष्ट हो जाता है, उससे ग्रामीण अंचलों में पांच हजार गोदाम बनाए जा सकते हैं। यदि पंचायत स्तर पर ही एक क्विंटल अनाज के आकस्मिक भंडारण व उसे जरूरतमंद को देने की नीति का पालन हो तो कोई भूखा नहीं मरेगा।
भोजन का फेंका जाना पहली निगाह में भले ही मामूली-सी बात प्रतीत हो या फिर एक बड़े कार्यक्रम की अपरिहार्यता बता कर इससे पल्ला झाड़ लिया जाए, लेकिन यह एक गंभीर मसला है। इस संदर्भ में विश्व खाद्य एवं कृषि संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि खाद्य अपव्यय को रोके बिना खाद्य सुरक्षा संभव नहीं है। भोजन के अपव्यय से जल, जमीन और जलवायु के साथ साथ जैव-विविधता पर भी बेहद नकारात्मक असर पड़ता है।

रिपोर्ट के मुताबिक उत्पादित भोजन, जिसे खाया नहीं जाता, उससे प्रत्येक वर्ष रूस की वोल्गा नदी के जल के बराबर जल की बर्बादी होती है। अपव्यय किए जाने वाले इस भोजन की वजह से तीन अरब टन से भी ज्यादा मात्रा में खतरनाक ग्रीनहाउस गैसें उत्सर्जित होती हैं। दुनिया की लगभग 28 फीसद भूमि, जिसका क्षेत्रफल 1.4 अरब हेक्टेयर है, ऐसे खाद्यान्न को उत्पन्न करने में व्यर्थ होती है। यह रिपोर्ट खतरे की घंटी है, जो बताती है कि हमारी लापरवाही और अनुचित गतिविधियों के कारण, पैदा किए जाने वाले अनाज का एक तिहाई हिस्सा यानी करीब 1.3 अरब टन अनाज बर्बाद चला जाता है, वहीं 87 करोड़ लोग भूखे सोने के लिए विवश हैं।

हमारे यहां शादियों, उत्सवों या त्योहारों में होने वाली भोजन की बर्बादी से हम सब वाकिफ हैं। इन अवसरों पर ढेर सारा खाना कचरे में चला जाता है। कई बार तो घरों के आसपास फेंके गए भोजन से उठने वाली दुर्गंध व सड़ांध वहां रहने वालों के लिए परेशानी खड़ी कर देती है, सड़ते भोजन से जानवरों की मौतों की खबर भी हम पढ़ते रहते हैं। शादियों में खाने की बर्बादी को लेकर भारत सरकार भी चिंतित है। 2011 में खाद्य मंत्रालय ने कहा था कि वह शादियों में मेहमानों की संख्या के साथ ही परोसे जाने वाले व्यंजनों की संख्या सीमित करने पर विचार कर रहा है। इस बारे में विवाह समारोह (दिखावटी प्रदर्शन और फिजूलखर्च पर प्रतिबंध) अधिनियम, 2006 भी बनाया गया है। अलबत्ता यह सख्ती से लागू नहीं होता।
खाने की बर्बादी रोकने की दिशा में महिलाएं बहुत कुछ कर सकती हैं। खासकर बच्चों में शुरू से यह आदत डालनी होगी कि उतना ही थाली में परोसें, जितनी भूख हो। एक-दूसरे से बांट कर खाना भी भोजन की बर्बादी को बड़ी हद तक रोक सकता है। भोजन और खाद्यान्न की बर्बादी रोकने के लिए हमें अपने दर्शन और परंपराओं का स्मरण करने तथा अपनी आदतों को सुधारने की जरूरत है। धर्मगुरुओं व स्वयंसेवी संगठनों को भी इस दिशा में पहल करनी चाहिए।

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