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अस्तित्व बचाने की चुनौती

आज बीएसएनएल और एमटीएनएल ने ग्राहकों का भरोसा खो दिया है। इसका कारण निजी आपरेटरों की तुलना में ग्राहक सेवा में कमियां और खामियां, उत्पादों की गुणवत्ता में कमी, श्रमिकों की समस्याएं और राजनीतिक हस्तक्षेप प्रमुख हैं। हकीकत यह है कि आज ये दोनों कंपनियां ग्राहकों को संतोषजनक सेवा नहीं दे पा रही हैं। उनके उत्पाद भी निजी टेलीकॉम कंपनियों के मुकाबले कमतर हैं।

आज भी निजी दूरसंचार ऑॅपरेटर अपना कारोबार बीएसएनएल और एमटीएनएल की मदद से ही आगे बढ़ा रहे हैं, क्योंकि उनका खुद का नेटवर्क बहुत कम है।

एक समय दूरसंचार सेवा बाजार में राज करने वाले भारत संचार निगम लिमिटेड (बीएसएनएल) और महानगर टेलीफोन निगम लिमिटेड (एमटीएनएल) आज अकुशल प्रबंधन, ग्राहक सेवा की दयनीय स्थिति, उत्कृष्ट उत्पादों की कमी, राजनीतिक हस्तक्षेप आदि के कारण दिवालिया होने के कगार पर आ गए हैं। बीएसएनएल और एमटीएनएल को वित्तीय संकट से उबारने के लिए सरकार इन दोनों कंपनियों को तेरह हजार करोड़ रुपए का पैकेज देकर इन्हें संकट से उबारना चाहती है। इसमें 6365 करोड़ रुपए का पैकेज स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) के लिए और 6767 करोड़ रुपए का इक्विटी निवेश, 4 जी स्पेक्ट्रम का आवंटन और रियल एस्टेट का मुद्रीकरण शामिल है। बीएसएनएल और एमटीएनएल का राहत पैकेज अभी दूरसंचार विभाग के पास विचाराधीन है। इसके लिए दूरसंचार क्षेत्र से संबंधित फैसला लेने वाली सर्वोच्च संस्था डिजिटल संचार आयोग की अनुमति लेनी होगी। केंद्र सरकार का मानना है कि दूरसंचार रणनीतिक क्षेत्र है और इसमें सार्वजनिक क्षेत्र की उपस्थिति जरूरी है। बीएसएनएल और एमटीएनएल अपने परिचालन खर्च वहन करने के लिए बैंकों से कर्ज लेने में नाकाम रही है। लिहाजा, इस साल फरवरी में आयोग की बैठक में बीएसएनएल और एमटीएनएल को पटरी पर लाने के पैकेज पर चर्चा हुई थी।
दूरसंचार विभाग (डीओटी) ने बीएसएनएल को फिर से पटरी पर लाने की योजना बनाई है। इसके तहत 4 जी स्पेक्ट्रम का आवंटन और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति योजना को लागू करने के लिए बांड के जरिए पूंजी जुटाने का प्रस्ताव है। सरकार बीएसएनएल की वित्तीय स्थिति में सुधार लाने के लिए 4 जी स्पेक्ट्रम का आवंटन कर सकती है। कयास लगाए जा रहे हैं कि बीएसएनएल को बाजार कीमत पर 2100 मेगाहर्ट्ज बैंड में स्पेक्ट्रम आवंटित किया जा सकता है। इधर, दूरसंचार विभाग की भी बीएसएनएल में निवेश करने की योजना है। अगर यह योजना मूर्त रूप लेती है तो निवेश की राशि का इस्तेमाल बीएसएनएल बाजार निर्धारित कीमतों पर स्पेक्ट्रम खरीदने में कर सकता है।

बीएसएनएल का नेटवर्क देशभर में फैला है। आज भी निजी दूरसंचार ऑॅपरेटर अपना कारोबार बीएसएनएल और एमटीएनएल की मदद से ही आगे बढ़ा रहे हैं, क्योंकि उनका खुद का नेटवर्क बहुत कम है। यदि बीएसएनएल और एमटीएनएल अपने सेवा एवं उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार लाकर नेटवर्क का सही इस्तेमाल करें तो वे मौजूदा घाटे से बाहर निकल सकती हैं। यह सच्चाई है कि बिना बीएसएनएल और एमटीएनएल की मदद के निजी दूरसंचार ऑपरेटर बाजार में नहीं टिक सकते। एमटीएनएल को अपने सर्विस लाइसेंस के नवीनीकरण के लिए तकरीबन ग्यारह हजार करोड़ रुपए की जरूरत है, लेकिन वित्तीय स्थिति खस्ताहाल होने के कारण वह दूरसंचार विभाग को इस राशि का भुगतान करने में असमर्थ है। लिहाजा, उसने दूरसंचार विभाग से इस राशि को माफ करने का आग्रह किया है। दूरसंचार विभाग के अनुसार एमटीएनएल को राहत देने के लिए हर संभव कोशिश की जा रही है। फिलहाल, एमटीएनएल की देनदारी बीस हजार करोड़ रुपए की है, जिसे उसने केंद्र सरकार की वैधानिक देयताओं के भुगतान के लिए लिया था। एमटीएनएल चाहता है कि सरकार इस कर्ज को मूलधन और ब्याज भुगतान के पूर्ण दायित्व के साथ संप्रभु गारंटी में तब्दील करे, ताकि उसे हर वर्ष दो हजार करोड़ रुपए का ब्याज भुगतान नहीं करना पड़े। एमटीएनएल 3 जी स्पेक्ट्रम का पूरी तरह से इस्तेमाल नहीं कर पाया है, इसलिए वह इसे दूरसंचार विभाग को वापस करना चाहता है। इससे उसे साढ़े तीन हजार करोड़ रुपए मिलने की संभावना है, जिसका इस्तेमाल एमटीएनएल अपने कारोबार को बढ़ाने में कर सकता है।

बीएसएनएल और एमटीएनएल का कर्ज निजी क्षेत्र की इकाइयों की तुलना में बहुत ही कम है और उनके पास ढेर सारी अचल संपत्तियां हैं। दोनों कंपनियों के पास देशभर में करीब 7500 अचल परिसंपत्तियां हैं, जिनका मूल्य लगभग सत्तर हजार करोड़ रुपए बैठता है। कंपनी का प्रस्ताव जमीनों को पट्टे पर देकर राजस्व अर्जित करना है। इसलिये, बीएसएनएल और एमटीएनएल देशभर में अपनी जमीन को सार्वजनिक क्षेत्र की दूसरी इकाइयों को किराए पर देने की योजना बना रहे हैं। केंद्र सरकार को दिए गए पुनरुद्धार आवेदन में दोनों कंपनियों ने 4 जी सेवाओं की मांग की है, ताकि वे ग्राहकों को बेहतर विकल्प और सेवा मुहैया करा सकें। विशेषज्ञों का कहना है कि दोनों कंपनियों को संकट से उबारने का एक उपाय विलय भी है। इससे दोनों कंपनियां पटरी पर आ सकती हैं। एमटीएनएल के दिल्ली और मुंबई मंडल का एकीकरण करना सबसे आसान और बेहतर विकल्प है। दोनों कंपनियों के साथ आने से एक मजबूत दूरसंचार इकाई का निर्माण होगा और संकट दूर होने के साथ कारोबार भी बढ़ेगा।

आज बीएसएनएल और एमटीएनएल ने ग्राहकों का भरोसा खो दिया है। इसका कारण निजी आपरेटरों की तुलना में ग्राहक सेवा में कमियां और खामियां, उत्पादों की गुणवत्ता में कमी, श्रमिकों की समस्याए और राजनीतिक हस्तक्षेप प्रमुख हैं। हकीकत यह है कि आज ये दोनों कंपनियां ग्राहकों को संतोषजनक सेवा नहीं दे पा रही हैं। उनके उत्पाद भी निजी टेलीकॉम कंपनियों के मुकाबले कमतर हैं। ऑनलाइन सेवा देने के मामले में भी ये फिसड्डी रही हैं। यही कारण है कि बड़ी संख्या में उनके ग्राहक निजी कंपनियों का दामन थाम रहे हैं। राजस्व बढ़ाने के लिए बीएसएनएल और एमटीएनएल ब्रॉडबैंड और फाइबर टु होम का विस्तार करने की जरूरत थी। लेकिन एसा हो नहीं पाया। इस कारोबार से हर साल हजारों करोड़ रुपए का मुनाफा हो सकता था, लेकिन दोनों ही कंपनियों ने योजनबद्ध तरीके से काम नहीं किया और इसी का नतीजा रहा कि घाटा बढ़ता गया। दोनों कंपनियों की इस वक्त सबसे बड़ी समस्या कर्मचारियों की संख्या है। इन कर्मचारियों के वेतन, भत्तों पर हर महीने मोटी रकम जा रही है, जबकि अमद हो नहीं रही। एमटीएनएल के पास इस तेईस हजार से ज्यादा कर्मचारी हैं। एमटीएनएल की कुल लागत में कर्मचारियों पर आने वाला खर्च परिचालन से मिलने वाले 572.83 करोड़ रुपए राजस्व की तुलना में 29 फीसद ज्यादा है। अठारह साल में पहली बार एमटीएनएल अपने कमर्चारियों के दो महीने के वेतन का भुगतान विगत महीनों में नहीं कर सका। इसका पर चौदह हजार करोड़ रुपए है, जबकि दूरसंचार क्षेत्र का कुल कर्ज छह लाख करोड़ रुपए है। यही समस्या बीएसएनएल की की है, कम कमाई और ज्यादा खर्च। उसकी कमाई का भी सबसे ज्यादा हिस्सा कर्मचारियों के वेतन-भत्तों में निकल जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि कारोबार विस्तार और नए उत्पादों के लिए पैसा कहां से आए। इसमें दो राय नहीं है कि दोनों कंपनियों के पास प्रशिक्षित कर्मचारी, देशव्यापी नेटवर्क, मजबूत आधारभूत संरचना, तकनीकी जानकारी आदि संसाधन उपलब्ध हैं। बावजूद इसके, इन दोनों का कंगाली के दरवाजे पर पहुंचना चिंता का विषय है। सच कहा जाए तो इन दोनों संस्थानों की खस्ताहाल स्थिति के लिए सीधे तौर पर दोनों संस्थानों के कमर्चारियों को दोषी नहीं ठहराया जा सकता है। अगर आज बीएसएनएल और एमटीएनएल को राहत पैकेज देने की बात कही जा रही है तो कहीं न कहीं सरकार भी इसके लिए दोषी है। सरकारी नीतियों की वजह से ही दोनों कंपनियां डूबने के कगार पर आ गई हैं और निजी दूरसंचार ऑपरेटर चांदी काट रहे हैं।

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