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राजनीति : सत्ता और चुनौतियों के सामने सू की

म्यांमा के कई इलाकों में चीन के निवेश को लेकर स्थानीय लोगों में भारी गुस्सा है। चीनी निवेश के कारण वहां विस्थापन की समस्या की बढ़ती जा रही है। इसलिए स्थानीय लोगों ने कई जगहों पर चीन का विरोध किया है। रखाइन प्रांत में भी चीन के निवेश के कारण विस्थापन की समस्या आयी है। कचीन राज्य में चीन के सहयोग से शुरू बोने वाली मैत्सोन जल बिजली परियोजना को जनता के विरोध के कारण रद्द करना पडा।

आंग सान सू की से मिलते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। फाइल फोटो।

म्यांमा में हुए आम चुनाव में आंग सान सू की की पार्टी नेशनल लीग फॉर डेमोक्रेसी (एनएलडी) को एक बार फिर बहुमत मिल गया है। जाहिर है, सू की की लोकप्रियता बरकरार है। एनएलडी की विरोधी पार्टी यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डवलपमेंट पार्टी (यूएसडीपी) जिसे सेना का समर्थन हासिल है, इन चुनावों में हार गई। इसलिए चुनाव परिणामों को लेकर उसका अंसतोष सामने आने लगा है। एनएलडी को जनता ने एक बार फिर से जिन उम्मीदों के साथ सत्ता सौंपी है, उससे सू की चुनौतियां और बढ़ गई हैं।

इससे कतई इंकार नहीं किया जा सकता कि म्यांमा की सत्ता में सेना का हस्तक्षेप बना रहेगा। इस बौद्ध देश की एक चौथाई से भी ज्यादा आबादी बेहद गरीब है। म्यांमा की स्थिति काफी हद तक पाकिस्तान की तरह है, जहां लोकतांत्रिक दलों की सरकार में भी सेना का भारी दखल है। म्यांमा भी पाकिस्तान की तरह धार्मिक अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न के लिए जाना जाता रहा है। सू की के कार्यकाल में भी म्यांमा में अल्पसंख्यक रोहिंग्या मुसलमानों के उत्पीड़न की घटनाएं बड़े पैमाने पर हुई हैं। लाखों रोहिंग्या बांग्लादेश में शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं, जिन्हें म्यांमा वापस लेने को राजी नहीं है।

आंग सान सू की की पार्टी दुबारा सत्ता में आई है। पर म्यांमा की चीन और भारत नीति में बदलाव की संभावना काफी कम है। सू की भी चीन के बेल्ट एवं रोड फोरम की समर्थक हैं, जिसका भारत लगातार विरोध कर रहा है। सू की के कार्यकाल में म्यांमा चीन की इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना में भागीदार बना और इस योजना के तहत चीन ने म्यांमा में काम शुरू कर दिया है। इस परियोजना के जरिए चीन म्यांमा में भारी निवेश कर रहा है।

इसी साल जनवरी में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग म्यांमा की यात्रा पर गए थे और वहां उनका भव्य स्वागत हुआ था। तभी दोनों मुल्कों के बीच बेल्ट एवं रोड पहल परियोजना पर तेजी से काम करने को लेकर सहमित बनी थी। दोनों मुल्कों के बीच चीन-म्यांमा आर्थिक गलियारा का काम तेज करने का रास्ता बना। साफ है, आने वाले वक्त में म्यांमा में चीन का प्रभाव निरंतर बढ़ेगा। म्यांमा खुद भी चीन के निवेश को लेकर उत्साहित है और इसके लिए उसने चीन और भारत के बीच अपनी विदेश नीति को संतुलित कर लिया है। चूंकि म्यांमा आसियान का भी सदस्य है, इसलिए वह चीन और भारत दोनों के बीच संतुलन बनाए रखना उसकी विवशता भी है।

दरअसल म्यांमा का भूगोल उसे खासा महत्त्वपूर्ण बनाता है। चीन के लिए म्यांमा हिंद महासागर में पहुंचने का सीधा मार्ग है। म्यांमा का भूगोल भारत के लिए इसलिए खास है कि म्यांमा पूर्वी एशियाई के देशों के लिए भारत का रास्ता खोलता है। इसका उदाहरण भारत-म्यांमा-थाईलैंड राजमार्ग परियोजना है, जिस पर काम चल रहा है। म्यांमा के महत्त्व को समझते हुए चीन और भारत दोनों ही रोहिंग्या शरणार्थियों के मसले पर चुप रहे हैं।

रोहिंग्या मुसलमानों के उत्पीड़न और विस्थापन को लेकर म्यांमा की दुनियाभर में कड़ी आलोचना हुई है। लेकिन इस मसले पर भारत और चीन ने संतुलित रणनीति अपना रखी है। दोनों मुल्क रोहिंग्या मसले पर म्यांमा से संबंधों को खराब नहीं करेंगे। बांग्लादेश और म्यांमा के बीच रोहिंग्या मुद्दे पर तनाव है और बांग्लादेश म्यांमा से इन्हें वापस लेने की लगातार मांग कर रहा है। लेकिन म्यांमा रोहिंग्या शरणार्थियों को वापस लेने को तैयार नहीं है।

चीन ने तो रोहिंग्या मुद्दे का लाभ उठाते हुए म्यांमा से आर्थिक संबंधों को और मजबूत किया है। चीन को पता है कि रोहिंग्या मुसलमानों को लेकर म्यांमा पर भारी अंतराष्ट्रीय दबाव है और बचाव के लिए उसे चीन का समर्थन चाहिए। चीनी राष्ट्रपति ने इस साल जनवरी में तमाम अंतराष्ट्रीय दबावों को दरकिनार करते हुए म्यांमा की यात्रा की थी। मानवाधिकार मुद्दे पर घिरे म्यांमा को चीन ने एक तरह से नैतिक समर्थन दिया है। वैसे मानवाधिकार उल्लंघनों को लेकर चीन पर भी गंभीर आरोप हैं। चीन पर भी लंबे समय से अल्पसंख्यक उइगर मुसलमानों के उत्पीड़न के आरोप लग रहे हैं।

चीन की दूरगामी नीति म्यांमा के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन की है। म्यांमा में शासन चाहे किसी का हो, चीन को इससे कोई फर्क नहीं पड़ा है। हालांकि म्यांमा के कई इलाकों में चीन के निवेश को लेकर स्थानीय लोगों में भारी गुस्सा है। चीनी निवेश के कारण वहां विस्थापन की समस्या की बढ़ती जा रही है। इसलिए स्थानीय लोगों ने कई जगहों पर चीन का विरोध किया है। रखाइन प्रांत में भी चीन के निवेश के कारण विस्थापन की समस्या आयी है। कचीन प्रांत में चीन के सहयोग से शुरू बोने वाली मैत्सोन जल बिजली परियोजना को जनता के विरोध के कारण रद्द करना पडा। जनता के विरोध के कारण ही म्यांमा में चीन को दिए गए तांबे के खनन कार्य संबंधी परियोजनाएं बंद करपनी पड़ीं।

दो बड़ी ताकतें टकराती है तो छोटे मुल्कों को लाभ मिलता है। म्यांमा भी इस समय भारत और चीन के टकराव का लाभ उठा रहा है। आंग सांग सू की इसे समझती हैं। उन्होंने बेल्ट एवं रोड फोरम में हिस्सा लिया और साझेदारी पर हामी भरी। वहीं भारत के निवेश का भी म्यांमा में स्वागत किया जा रहा है। दरअसल, म्यांमा चीन और भारत दोनों का पड़ोसी है। दोनों ही देशों के लिए म्यांमा की भौगोलिक स्थिति काफी महत्त्व रखती है।

सू की को पता है कि चीन-म्यांमा आर्थिक गलियारा का एक उद्देश्य क्षेत्रीय ताकत के रूप में उभर रहे भारत की घेरेबंदी है। चीन हिंद महासागर तक अपनी सैन्य ताकत का विस्तार कर रहा है। सू की इस हकीकत से भी अनजान नहीं हैं कि चीन-म्यांमा आर्थिक गलियारा भी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे की नकल है और इस गलियारे को लेकर भारत चिंतित है। इसके जरिए रेल नेटवर्क बिछाया जाएगा और म्यांमा के विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों को जोड़ा जाएगा और इसे चीन सीमा तक ले जाया जाएगा।

इस गलियारे का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा रखाइन प्रांत में क्याकप्यू बंदरगाह है जिसका विकास चीन बेल्ट एवं रोड पहल के तहत कर रहा है। चीन क्याकप्यू बंदरगाह को भारत की पूर्वी सीमा का ग्वादर बनाना चाहता है। इस बंदरगाह के रास्ते वह हिंद महासागर में प्रवेश करेगा। यह उसके लिए दोहरा लाभ होगा। चीन जहां इस बंदरगाह का इस्तेमाल तेल और गैस आयात के लिए करेगा, वहीं भारतीय समुद्री सीमा की घेरेबंदी भी करेगा। भारत के पश्चिम में पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह पर एक तरह से चीन का ही कब्जा है।

इसी तरह दक्षिण में श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पर भी उसका नियंत्रण है। अब पूर्वी सीमा पर म्यांमा में क्याकप्यू बंदरगाह पर भी चीन की मौजूदगी का रास्ता साफ हो गया है। इसके अलावा बांग्लादेश के बंदरगाहों में भी वह घुसपैठ की कोशिश कर रहा है।

भारत ने आसियान सदस्य देशों से भारत-प्रशांत क्षेत्र में सक्रियता की अपील की है। म्यांमा आसियान का सदस्य है। भारत चाहता है कि म्यांमा भी भारत-प्रशांत क्षेत्र में सक्रिय भागीदार बने। म्यांमा में बेल्ट एंड रोड पहल का प्रभाव कम करने के लिए यह जरूरी भी है। हालांकि दुबारा सत्ता मे आई आंग सू की के रूख का इंतजार भारत करेगा।

भारत-प्रशांत क्षेत्र को लेकर सू की कितती गंभीर होंगी, यह समय बताएगा। भारत अपनी क्षमता के मुताबिक म्यांमा में निवेश कर चीन के प्रभाव को रोकने की कोशिश कर रहा है। हालांकि आर्थिक निवेश के मामले में चीन के मुकाबले भारत की क्षमता काफी कम है, लेकिन भारत म्यांमा में चीन के बढ़ते प्रभाव को गंभीरता से लिया है।

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