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राजनीति: लोक सेवा में हिंदी की उपेक्षा

कोठारी समिति ने 1970 के दशक में जब भारतीय भाषाओं के छात्रों के लिए सिविल सेवा के दरवाजे खोले थे तो उन्होंने कहा था कि जिन्हें इस देश की भाषाएं नहीं आतीं, उन्हें भारत की नौकरशाही में आने का कोई हक नहीं है।

UPPSCहिंदी को बढ़वा देने की जरूरत। फाइल फोटो।

उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद, लखनऊ जैसे शहर फिर सुलग रहे हैं। तात्कालिक कारण उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग के हाल में घोषित परिणामों में दो तिहाई से ज्यादा अंग्रेजी माध्यम से डिप्टी कलक्टर, पुलिस अफसर जैसे पदों पर उम्मीदवारों का चुना जाना है। कुल घोषित नौ सौ पदों में सात सौ अंग्रेजी माध्यम वाले चुने गए हैं, जबकि मुख्य परीक्षा में हिंदी माध्यम वाले कई गुना ज्यादा थे।

इसका एक कारण यह भी है कि हिंदी माध्यम की उत्तर पुस्तिकाएं भी अंग्रेजी माध्यम वाले परीक्षक जांचते हैं और परीक्षा का पूरा रंग-ढंग तीनों चरणों में अंग्रेजी की तरफ झुका हुआ है। इसीलिए हिंदी माध्यम के छात्र संघ लोक सेवा आयोग के बाद अब उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों की सेवा से भी बाहर होने लगे हैं।

दिल्ली जैसे महानगर में बैठे अभिजात्य वर्ग को इससे कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। शिक्षा और भाषा पर इस वर्ग की चुप्पी बताती है कि अंग्रेजी के दबदबे को बढ़ाने में यह तबका एक साथ है। संघ लोक सेवा आयोग में लगभग शत-प्रतिशत अंग्रेजी माध्यम वालों की सफलता इसी का परिणाम है और इसी का दुखद विस्तार अब धीरे-धीरे देश के बाकी लोक सेवा आयोग की तरफ हो रहा है। साल 2011 में जब से सिविल सेवा परीक्षा के प्रथम चरण में अंग्रेजी लाद दी गई, उसके बाद सरकारी प्रतिष्ठानों की सभी नौकरियों में से भारतीय भाषाएं तेजी से गायब होती जा रही हैं।

लेकिन क्या अंग्रेजी के दबदबे के लिए सिर्फ लोक सेवा आयोग जैसे संस्थान ही जिम्मेदार हैं? यदि आजादी के बाद के पूरे परिदृश्य पर नजर डालें तो उत्तर नहीं में मिलेगा। पतन की मुख्य भूमिका निभाई है शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा संस्थानों ने। दौलत सिंह कोठारी समिति ने जब वर्ष 1979 से संघ लोक सेवा आयोग की सबसे प्रतिष्ठित भारतीय प्रशासनिक सेवा परीक्षा भारतीय भाषाओं में भी कराने की सिफारिश की थी, तब उनका तर्क दिल्ली विश्वविद्यालय जैसे संस्थानों में स्नातक और स्नातकोत्तर शिक्षा इतिहास, अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र जैसे विषयों में भी हिंदी में भी बीस से तीस फीसद शिक्षा उपलब्ध होना था। लेकिन आज यह लगभग शून्य हो चुकी है।

उम्मीद तो यह की गई थी इसके बाद उच्च शिक्षा में भारतीय भाषाओं के माध्यम से पढ़ने वालों की संख्या बढ़ती जाएगी और प्रतिभावान छात्रों के लिए भी सिविल सेवाओं के दरवाजे खुलते जाएंगे। लेकिन हुआ उल्टा। संघ लोक सेवा आयोग द्वारा आयोजित किसी भी अन्य परीक्षा जैसे भारतीय वन सेवा, इंजीनियरिंग सेवा, चिकित्सा सेवा, रक्षा सेवा आदि में भारतीय भाषाओं की अनुमति आज तक नहीं दी गई और सिविल सेवाओं की परीक्षा प्रणाली में भी वर्ष 2011 और उसके बाद ऐसे परिवर्तन किए गए कि शिक्षा संस्थानों तक में अंग्रेजी का दबदबा बढ़ता चला गया।

ढुलमुल भाषा नीति की औपचारिकता निभाते हुए परीक्षा के प्रश्नपत्र हिंदी में उपलब्ध तो जरूर होते हैं, लेकिन उनके अनुवाद इतने कृत्रिम और जटिल होते हैं कि उन्हें समझ पाना आसान नहीं है। मूल रूप से प्रश्नपत्रों को बनाने से लेकर उनके मॉडल उत्तर तैयार करने की प्रक्रिया अंग्रेजी मानसिकता से इतनी ग्रस्त हो चुकी है कि धीरे-धीरे उम्मीदवारों को लगने लगा कि अंग्रेजी के अलावा कोई रास्ता है ही नहीं। यदि वे भी इन सेवाओं में जाना चाहते हैं तो अंग्रेजी ही एकमात्र विकल्प है।

यही कारण है कि उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा जैसे राज्यों के लाखों नौजवान दिल्ली पहुंचते ही अपने दिल पर पत्थर रख कर अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने को विवश होते हैं। जेएनयू, जामिया, दिल्ली विश्वविद्यालय में शिक्षण की मौजूदा व्यवस्था उन्हें अंग्रेजी माध्यम में पढ़ने को मजबूर कर रही है। लगातार ऐसी शिकायतें आती रही हैं कि हिंदी में शोध प्रबंध लिखने पर कभी जामिया ने स्वीकार नहीं किया, तो कभी जेएनयू ने। लगता है जैसे पूरे देश का उच्च तबका अंग्रेजी का गुलाम हो चुका है।

इसका असर धीरे-धीरे पटना, इलाहाबाद, बनारस, जयपुर जैसे शहरों तक भी पहुंच गया है। वहां से अंग्रेजी की महामारी अब गांवों की तरफ कूच कर रही है। यहां तक कि उत्तर भारत की सभी राज्य सरकारें भी आगे बढ़ कर अंग्रेजी के स्कूलों को बढ़ावा दे रही हैं। इसलिए सारा दोष लोक सेवा आयोग को देना उचित नहीं होगा। जब आप लगातार स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक अंग्रेजी माध्यम में ले रहे हैं, तो जाहिर है आप सरकारी नौकरियों की परीक्षा देने में अंग्रेजी माध्यम ही चुनेंगे और आंकड़े भी इस बात को सिद्ध करते हैं कि हिंदी सहित भारतीय भाषाओं में परीक्षा देने वालों की संख्या लगातार कम हो रही है।

इसमें आयोगों का दोष भी है, क्योंकि जो प्रश्नपत्र बनाए जाते हैं या उनके जो मॉडल उत्तर बनाए जाते हैं, वे ज्यादातर उन लोगों द्वारा बनाए जाते हैं जिनकी ख्याति अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाने वाले शिक्षकों और प्रशासकों की है। इसलिए पलड़ा उत्तर पुस्तिकाओं की जांच से लेकर साक्षात्कार तक में अंग्रेजी के पक्ष में झुका रहता है। यह प्रश्न लोकतंत्र की बुनियादी बात का भी है कि आखिर लोक प्रशासन के लिए चुने गए अधिकारी किस जनता के लिए चुने गए हैं!

क्या वह जनता अंग्रेजी जानती है? क्या इनके अधीनस्थ छोटे कर्मचारी अंग्रेजी जानते हैं? यदि नहीं तो क्या कभी ये सच्चे लोकसेवक बन पाएंगे? कोठारी समिति ने 1970 के दशक में जब भारतीय भाषाओं के छात्रों के लिए सिविल सेवा के दरवाजे खोले थे तो उन्होंने कहा था कि जिन्हें इस देश की भाषाएं नहीं आती, उन्हें भारत की नौकरशाही में आने का कोई हक नहीं है। उन्होंने यह तक जोड़ा था कि न केवल भाषा बल्कि भारतीय साहित्य को भी उन्हें जानना आवश्यक होगा, केवल तभी वे इस जटिल देश के असमान व्यवस्था को बेहतर बनाने में मदद कर सकते हैं।

अंग्रेजी के दबदबे की शुरुआत आजादी के तुरंत बाद ही हो गई थी, जब अंग्रेजी जानने वालों को शासन-प्रशासन की नौकरियों में प्राथमिकता मिली। दो दशक बीतते-बीतते जनमानस ने यह महसूस करना शुरू कर दिया था कि अंग्रेजी ही उनका उद्धार कर सकती है। हालांकि सत्तर के दशक में डा. राम मनोहर लोहिया, डा. डीएस कोठारी जैसे मनीषियों ने गांधी के सपनों की दुहाई देते हुए भारतीय भाषाओं के लिए लड़ाई लड़ी, लेकिन तत्कालीन सरकारें प्रचंड रूप से अंग्रेजी की हिमायती ही बनी रही।

उन्हें अपने अस्तित्व के लिए यह जरूरी भी लगा, क्योंकि दक्षिण के कामराज, राजगोपालाचारी जैसे दिग्गज नेता कांग्रेस से दूरी बना चुके थे और ऐसे में हिंदी की बात करना राजनीतिक जोखिम साबित होता। तीन भाषा सूत्र एक अच्छा समाधान हो सकता था, लेकिन उत्तर भारत की राजनीति ने इसे सफल नहीं होने दिया। फिर अस्सी के दशक के बाद उदारीकरण की आड़ में अंग्रेजी के हिमायतियों ने हिंदी और भारतीय भाषाओं को हाशिए से भी बाहर करना शुरू कर दिया। इसी की अंतिम चोट थी साल 2011 में कोठारी समिति की सिफारिशों को पलटते हुए सिविल सेवा परीक्षा में अंग्रेजी लाद देना। जिसका अनुसरण आज उत्तर प्रदेश आयोग और दूसरे आयोग कर रहे हैं।

इसलिए समाधान का रास्ता आयोग के पास उतना नहीं है, जितना हमारी शिक्षा व्यवस्था और शिक्षा संस्थानों के पास।अब नई शिक्षा नीति भी घोषित कर दी गई है। अच्छी बात यह है कि उसमें भारतीय भाषाओं में प्राथमिक शिक्षा देना अनिवार्य बनाया गया है और यदि संभव हो तो आठवीं और उससे आगे की शिक्षा भी अपनी भारतीय भाषाओं में देने की सिफारिश की गई है। हालांकि अभी कार्यान्वयन का मसौदा सामने नहीं आया है, लेकिन यदि ईमानदारी से आचरण किया जाए तो इसी रास्ते से सरकारी नौकरियों में भारतीय भाषाओं का प्रतिनिधित्व वापस लौट सकता है।

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