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राजनीतिः बोलियों की बिसात पर

हिंदी भारत की राष्ट्रीय पहचान की भाषा बन चुकी है और सूरीनाम, मॉरिशस, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में बसे भारतवंशी अपने बच्चों को गर्व से हिंदी पढ़ा-सिखा रहे हैं, क्योंकि उनके लेखे हिंदी ही उनकी मूलभूमि भारत की भाषा है। इसलिए बोलियों के प्रेमियों को चाहिए कि हिंदी को शक्ति व समृद्धि प्रदान करने वाली बोलियों को हिंदी से जुदा कर उन्हें अलग, स्वतंत्र पहचान देने की गलती न करें।
हिंदी वर्णमाला।

राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के दौरान हिंदीतर तथा हिंदीभाषी, सभी ने हिंदी को राष्ट्रभाषा, पूरे देश की संपर्क भाषा के रूप में स्वीकार कर लिया था और इसके राष्ट्रव्यापी प्रचार के लिए उन सबने मनोयोगपूर्वक प्रयास भी किए। इसके पीछे आचार्य केशवचंद्र सेन, बंकिमचंद्र्र, स्वामी दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी, रवींद्रनाथ ठाकुर, लोमान्य तिलक, सुभाषचंद्र्र बोस, विनोबा भावे, राज गोपालाचारी जैसे हिंदीतर प्रांतों के मनीषियों व महापुरुषों की प्रेरणा व सक्रियता रही, तो दूसरी तरफ हिंदी प्रदेश समझे जाने वाले प्रांतों के लेखकों, कवियों और जनता का भी योगदान रहा कि उन्होंने अपनी-अपनी जनपदीय बोलियों का मोह त्याग कर राष्ट्रभाषा हिंदी को समृद्ध करने में अपनी रचनात्मक ऊर्जा का उपयोग किया। भारतेंदु हरिश्चंद्र से लेकर महावीर प्रसाद द्विवेदी, मिश्र बंधु, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, निराला, पंत, माखनलाल चतुर्वेदी, हजारीप्रसाद द्विवेदी, नंददुलारे वाजपेयी, चंद्रधर शर्मा ‘गुलेरी’, शिवपूजन सहाय, रामवृक्ष बेनीपुरी, रामधारी सिंह ‘दिनकर’ आदि सभी की अपनी-अपनी जनपदीय बोलियां थीं- किसी की भोजपुरी तो किसी की अवधी, किसी की गढ़वाली, तो किसी की बज्जिका- लेकिन सभी ने अपनी जनपदीय बोलियों के बजाय तरजीह व प्राथमिकता दी राष्ट्रभाषा हिंदी को समृद्ध करने की।

ऐसा नहीं था कि उस समय हिंदी का विरोध नहीं था। सबसे पहले तो अंग्रेजी-प्रेमी भारतीय ही हिंदी को ‘अविकसित’ मान कर शिक्षा तथा राजकाज के माध्यम के रूप में उपयुक्त व समर्थ भाषा नहीं समझते थे। विरोध का दूसरा मोर्चा था तमिलनाडु, बंगाल जैसे हिंदीतर प्रांतों का। उल्लेखनीय है कि जिन राजगोपालचारी ने 1937 में मद्रास के मुख्यमंत्री के रूप में वहां के स्कूलों में हिंदी की पढ़ाई अनिवार्य की थी, वे ही 1965 में हिंदी विरोधी आंदोलन के मुखर प्रवक्ता बन गए, क्योंकि तब वे स्वतंत्र पार्टी के अध्यक्ष के रूप में अपनी पार्टी के लिए दक्षिण वालों का वोट हथियाने के लिए हिंदी-विरोध को कारगर हथियार के रूप में इस्तेमाल करने की मंशा से परिचालित थे।
हिंदी का विरोध कर उसके समानांतर उसकी बोलियों को खड़ा करने की वोट-प्रेरित राजनीति की यह हवा अब हिंदी प्रदेशों में भी जोर-शोर से बहने लगी है। इस कार्य में बड़े से लेकर छोटे तक, राजनीतिक से लेकर गैर-राजनीतिक तक, प्रगतिशील, प्रतिक्रियावादी, सांप्रदायिक, गैर-सांप्रदायिक सभी तरह के के न्यस्त स्वार्थ वाले व्यक्ति शामिल हैं। बिहार तो इस मामले में अगुआई ही कर रहा है जहां विभिन्न बोलियों के झंडे उठा कर चलने वालों की जमात बढ़ती जा रही है। बिहार में ही एक समय रामवृक्ष बेनीपुरी (1900-1968) जैसे समाजवादी साहित्यकार हुआ करते थे जिन्होंने मैथिली-प्रेमी होने के बावजूद मैथिली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने की मांग कर निरंतर विरोध किया। हालांकि हिंदी में, जैसा कि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ ने अपने संस्मरण में लिखा है, विद्यापति का उद्धार बेनीपुरी जी ने किया था। आज भी उन्हीं के द्वारा संपादित ‘विद्यापति पदावली’ अधिकांशत: सारे देश में पढ़ाई जाती है, पर मैथिली भाषा का आंदोलन उन्हें पसंद नहीं था। वे मानते थे कि मैथिली भाषा अगर क्षेत्रीय भाषा मान ली गई तो अंगिका, वज्जिका, भोजपुरी, मगधी, अवधी, राजस्थानी आदि सभी भाषाओं को क्षेत्रीय अधिकार देने पड़ेंगे और इस प्रकार हिंदी का क्षेत्र खंडित हो जाएगा। गौरतलब है कि इन्हीं बेनीपुरी जी ने 1954 में ‘नई धारा’ नामक पत्रिका में एक नोट लिख कर पं. बनारसीदास चतुर्वेदी जैसे गांधीवादी साहित्यकार को हिंदी का दुश्मन बता डाला था क्योंकि चतुर्वेदी जी जनपदीय भाषाओं के आंदोलन का समर्थन कर रहे थे।

लेकिन आज बेनीपुरी जी के बिहार में ही विभिन्न बोलियों के ध्वजारोहियों ने उन्हें संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कराने की मुहिम चला रखी है। वर्ष 2003 में वाजपेयी सरकार ने मैथिली को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर इस मुहिम को वैधता प्रदान कर दी। मोदी सरकार पर भी इन बोलियों को संविधान में शामिल करने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। इसमें भोजपुरी वाले सबसे आगे हैं। अंगिका वाले अंगिका को संविधान से लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक मान्यता दिलाने के लिए बेचैन हैं। बोलियों के क्षेत्रों से जुड़े नेता भी अपना वोट-बैंक सुरक्षित रखने के लिए ऐसी मांगों को पुरजोर समर्थन दे रहे हैं। इन्हें हिंदी की अखंडता, एकता की कोई परवाह नहीं, परवाह है सिर्फ अपने वोटों की, चाहे हिंदी चिंदी-चिंदी क्यों न हो जाए।

हिंदी के संश्लिष्ट स्वरूप को उससे उसकी निर्मिति में सहायक रही बोलियों को छटकाया जा रहा है, सिर्फ इसलिए कि सत्ता पर काबिज रहने के लिए वोट प्राप्त किए जा सकें। इन राजनीतिकों की उदारता का फल है कि बिहार के कई विश्वविद्यालयों में भोजपुरी, अंगिका, मैथिली जैसी बोलियों के स्वतंत्र रूप से पठन-पाठन चलाए जा रहे हैं। इन बोलियों के प्रति प्रेम के पीछे वोट-प्रेम तो है ही, साथ ही पद और पैसे का लोभ भी कम नहीं है। इस प्रकार देखा जाए तो अब बोलियां ऐसी दुधारू गाय हो गई हैं जिनके थन से राजनेता वोट प्राप्त करने की उम्मीद करते हैं तो बोलियों के प्रवक्ता-बुद्धिजीवी धन प्राप्त करते हैं। वैसे हम भी बोलियों के विरोधी नहीं हैं लेकिन हम बोलियों की कीमत पर राष्ट्रभाषा का अहित नहीं चाहते। क्या यह विचारणीय नहीं कि अगर हिंदी क्षेत्र के सारे विद्यार्थी अंगिका, भोजपुरी, मगही, अवधी, बुंदेली आदि जनपदीय भाषाओं को पढ़ने लगें तो फिर हिंदी कौन पढ़ेगा? क्या यह विचारणीय नहीं कि अगर इन बोलियों को संवैधानिक दर्जा प्राप्त हो जाएगा तो हिंदी का वह संख्याबल कम नहीं हो जाएगा जिसके आधार पर हम इसे राष्ट्रभाषा व संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने का संकल्प लेते रहते हैं?

इन मुद्दो पर हमारे बोली-प्रेमियों को सोचना चाहिए, उन्हें यह भी सोचना चाहिए कि अन्य भाषाओं में जैसा कि अज्ञेय जी ने कहा है, प्रदेश बोलते हैं पर हिंदी में पूरा देश बोलता है। आज हिंदी भारत की राष्ट्रीय पहचान की भाषा बन चुकी है और सूरीनाम, मॉरिशस, दक्षिण अफ्रीका आदि देशों में बसे भारतवंशी अपने बच्चों को गर्व से हिंदी पढ़ा-सिखा रहे हैं, क्योंकि उनके लेखे हिंदी ही उनकी मूलभूमि भारत की भाषा है। इसलिए बोलियों के प्रेमियों को चाहिए कि हिंदी को शक्ति व समृद्धि प्रदान करने वाली बोलियों को हिंदी से जुदा कर उन्हें अलग स्वतंत्र पहचान देने की गलती न करें।
साथ ही उन्हें इस बात पर भी ध्यान देना चाहिए कि हिंदी के बरक्स बोलियों को स्थापित करने की इस मुहिम में अंग्रेजी भाषा धड़ल्ले से गांव-गांव में पसरती जा रही है। मेरा अपना गांव भोजपुरी (जिला सिवान, बिहार) क्षेत्र में पड़ता है, लेकिन अपने गांव में ही देखता हूं कि कुछ वर्षों के दौरान अंग्रेजी के माध्यम से पढ़ाई करने वाले कई स्कूल खुल गए हैं। इनमें पढ़ने वाले बच्चे जनवरी से दिसंबर तक के महीने बता देंगे, पर उन्हें चैत से लेकर फागुन तक के महीनों का ज्ञान नहीं, उन्हें सनडे से लेकर सटरडे तक याद है, पर रविवार से लेकर शनिवार तक का पता नहीं। मैंने एक शिक्षक से जब इस बाबत शिकायत की तो उन्होंने बताया कि इन बच्चों के अभिभावकों की ही इच्छा है कि इन्हें अंग्रेजी शब्दों का ज्ञान कराया जाए। अंग्रेजी को लेकर ऐसा ही उत्साह अन्य बोलियों वाले क्षेत्र में देखा जा सकता है। लेकिन इसकी फिक्र न नेताओं को है, न इन बोलियों के ध्वजारोहियों को। निस्संदेह यह प्रवृत्ति देश को भाषाई गुलामी की तरफ ले जाने वाली है जिस पर हमें गंभीर रूप से सोचना चाहिए और सहायक बोलियों को हिंदी से अलग करने के कुचक्र का विरोध करना चाहिए।

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