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राजनीति: हिंदी के विकास की बाधाएं

स्वतंत्र भारत में हिंदी की विकास यात्रा जितनी तीव्र गति से होनी चाहिए थी, उसे उतनी गति नहीं मिल पाई। इसका सबसे बड़ा कारण रहा कि स्कूली शिक्षा निसंदेह हिंदी या क्षेत्रीय भाषा में हो रही हो, लेकिन उच्च शिक्षा के लिए लोगों को अंग्रेजी माध्यम ही चुनना पड़ा है। इसलिए नवयुवक पहले से अपना अंग्रेजी आधार मजबूत करने का उपक्रम करने लगते हैं। ऐसी वर्जनाएं भी हिंदी के विकास में बाधक बनी हैं।

गांधीजी ने लिखा था कि ‘मैकाले ने जिस शिक्षण की नींव डाली वह गुलामी की नींव थी।

राजकुमार भारद्वाज

मानव को सामाजिक प्राणी कहा गया है। वह एकल इकाई के रूप में स्वयं को असहाय पाता है। जिस प्रकार पशु समूह में रहते हैं, उस प्रकार मानव को उस समूह में रहना रुचिकर लगता है, जिस समूह में इतने संस्कार हों कि उसे समाज की संज्ञा दी जा सके। मानव जब समाज में रहता है, तो सामूहिकता के भाव को प्रदर्शित करने के लिए विचारों का आदान-प्रदान करता है। विचारों के संप्रेषण के लिए किसी भाषा की आवश्यकता होती है।

हजारों वर्षों के अनुभव के पश्चात विभिन्न काल-क्षेत्रों में भाषाएं और बोलियां विकसित हुईं। मातृभूमि, मातृव्यंजन और मातृभाषा सभी को प्रिय होती है। कहा गया है, जननी जन्म भूमिश्च स्वर्गादपि, गरीयसी अर्थात जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से महान है। किसी अन्य की भाषा निश्चित रूप से उसके लिए प्रिय होगी, किंतु हमें अपनी ही भाषा प्रिय लगती है, क्योंकि वह हमारे भावों और विचारों के लिए सुगम्य है।

भारत के इतिहास में जिस तरह विदेशी आक्रांताओं ने संस्कृति को नष्ट-भ्रष्ट किया, उसमें न केवल भारतीय जनों का मनोबल तोड़ने के लिए उन्हें राजनीतिक, शासकीय और आर्थिक रूप से निर्बल किया गया, बल्कि उनकी सांस्कृतिक और भाषायी निष्ठा को भी भेदने का प्रयास किया गया। कभी मुगलों और इस्लामी अत्याचारियों ने फारसी और उर्दू को, तो कभी अंग्रेजों ने अंग्रेजी का लाद कर हमें भाषायी तौर पर पंगु बना दिया। हम न तो फारसी और उर्दू के रहे, न अंग्रेजी के हो पाए और मातृभाषा हिंदी भी हमें कामचलाऊ ही आती है।

भाषा केवल मन के विचारों को व्यक्त करने का माध्यम ही नहीं, उनकी जननी भी है। भाषा विचारों को संस्थापित भी करती है। हम चाहें जितना प्रयत्न करें, भारतीय आत्मा की अभिव्यक्ति अंग्रेजी के माध्यम से नहीं कर सकते। विश्व के सभी विज्ञानियों, आचार्यों और भाषाविदों ने मातृभाषा में शिक्षा दिए जाने का अधिवाद स्थापित किया है, इसलिए कि बच्चों के लिए और बड़ों के लिए भी मातृभाषा में भाव-संप्रेषण आसान होता है।

जब हम बचपन से सुने गए शब्दों को सुनते, बोलते और विचारते हैं, तो उनकी ग्राह्यता सुगम होती है। किंतु जैसे ही अन्य भाषा का शब्द या वाक्यांश प्रस्तुत होता है, तो मस्तिष्क कुछ पल के लिए विराम की अवस्था में आ जाता है, क्योंकि हम अपरिचित ध्वनियों के प्रति सजग नहीं होते हैं। हम केवल परिचित ध्वनियों के अभ्यस्त होते हैं और उसी में विचारों का विनिमय करते हैं। उसके समुच्चय को हम भाषा कहते हैं, जो सामूहिक अभिव्यक्ति के लिए आवश्यक है।

यही कारण था कि स्वतंत्र भारत में राष्ट्रीय एकता, संपर्क, संप्रेषण और संवाद के लिए विभिन्न देसज भाषाओं पर विचार-विमर्श के पश्चात हिंदी को राजभाषा की मान्यता दिए जाने का निर्णय हुआ। यह निर्णय लोकतंत्र के इस सर्वाधिक स्वस्थ सूत्र से हुआ कि हिंदी भाषियों की बहुतायत है। महात्मा गांधी का यह भी कहना था कि अखिल भारत के परस्पर व्यवहार के लिए ऐसी भाषा की आवश्यकता है जिसे जनता का अधिकतम भाग पहले से ही जानता-समझता है और हिंदी इस दृष्टि से सर्वश्रेष्ठ है। लोकतंत्र का यही सौंदर्य है कि बहुमत जिसके पक्ष में हो, वही बात निर्णय के स्तर तक पहुंचती है।

राजभाषा हिंदी की स्थिति अभी भी दयनीय बनी हुई है, बल्कि सच कहें तो बना दी गई है। क्षुद्र राजनीति के लिए कई जनों में यह भाव दिखता है कि यह तो राजकीय या शासकीय भाषा है। हिंदी के कारण हमारी प्रांतीय भाषाओं पर संकट आ सकता है। गैर-हिंदी भाषियों का यह तर्क इसलिए नहीं पचता है कि जो लोग शासकीय स्तर पर घोषणा करते हैं कि वे हिंदी भाषी हैं, उनकी वास्तविकता है कि वे सब अपने घरों में हिंदी नहीं बोलते। वे घरों में पहाड़ी, गढ़वाली, मारवाड़ी, हरियाणवी, मराठी, ब्रज, बुंदेलखंडी, भोजपुरी, अवधी आदि बोलियां बोलते हैं। फिर भी वे गर्व से कहते हैं कि वे हिंदी भाषी हैं। मारवाड़ी या भोजपुरी बोलने वालों को कभी प्रतीत नहीं हुआ कि हिंदी उनकी बोली का अतिक्रमण या दमन कर रही है।

संस्कृत भारत का भाषायी समुद्र है, जिसमें हर भाषा और बोली अंतत: विलीन हो जाती है और संस्कृत से ही वाष्पीकृत हो शब्द-बूंदें हर भाषा और बोली में प्राण संचार करती हैं। यह शाश्वत क्रम भारत की सभी भाषाओं और बोलियों को समृद्ध कर रहा है। हिंदी और अन्य भाषाओं व बोलियों का तारतम्य स्वतंत्र भारत के पश्चात आकार नहीं ले रहा है, यह अनवरत प्रवाह सदियों से विभिन्न अवरोधों और अल्पविरामों के पश्चात भी सतत गतिमान है। हिंदी अन्य भाषाओं और बोलियों से ऊर्जा ग्रहण करती है, तो अन्य भाषाओं और बोलियों को समृद्ध भी करती है।

यदि स्वस्थ मन से सर्वेक्षण हो, तो यह निष्कर्ष निकलेगा कि परतंत्र भारत में विदेशी आक्रांताओं ने जिन विदेशी भाषाओं का चलन यहां प्रारंभ किया था, उन भाषाओं के कारण प्रांतीय भाषाओं पर आठ सौ सालों तक संकट रहा। जबकि स्वतंत्र भारत में जब से हिंदी को राजभाषा का दर्जा मिला, तब से अन्य प्रांतीय भाषाएं भी समृद्ध हुई हैं। उनमें नव-साहित्य का सृजन तीव्र गति से हुआ है। अब गढ़वाली और मराठी के कवि सम्मेलन आम बात हो गए हैं। ऐसा इसलिए है कि हिंदी का जो वैज्ञानिक स्वरूप है, वह मूलत: संस्कृत से आया है और हिंदी की यह भाषायी वैज्ञानिकता अन्य भारतीय भाषाओं और बोलियों से स्वाभाविक ढंग से मेल खाती है।

हिंदी को राजभाषा घोषित किए जाने के साथ ही हर राज्य को अपनी आधिकारिक भाषा में कार्य करने का अधिकार दिया गया, ताकि प्रांतीय भाषाएं और बोलियां पुष्पित-पल्लवित हो सकें। यही कारण है कि गोवा में कोंकणी, गुजरात में गुजराती, कर्नाटक में कन्नड़, केरल में मलयालम, महाराष्ट्र में मराठी, ओडिशा में उड़िया, तेलंगाना में तेलुगु और पश्चिम बंगाल में बंगाली को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है और वे अपने क्षेत्रों में फल-फूल रही हैं।

महात्मा गांधी जब कहते थे कि ह्लराष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूंगा हैह्व, तो इसका सीधा-सा अर्थ है कि वह भाषा जो समूचे राष्ट्र को एकसूत्र में पिरो दे। हिंदी का मंच या बिंदु ऐसा हो, जहां सब आकर भारतीय हो जाएं। वह भाषा, जो सबको स्वर दे सके। किंतु स्वतंत्र भारत में हिंदी की विकास यात्रा जितनी तीव्र गति से होनी चाहिए थी, उसे उतनी गति नहीं मिल पाई। इसका सबसे बड़ा कारण रहा कि स्कूली शिक्षा निसंदेह हिंदी या क्षेत्रीय भाषा में हो रही हो, लेकिन उच्च शिक्षा के लिए लोगों को अंग्रेजी माध्यम चुनना पड़ा है। इसलिए नवयुवक पहले से अपना अंग्रेजी आधार मजबूत करने का उपक्रम करने लगते हैं।

ऐसी वर्जनाएं भी हिंदी के विकास में बाधक बनी हैं। इसलिए शिक्षा तंत्र में ऐसी व्यवस्था किए जाने की आवश्यकता है, जहां सभी विषय देसज भाषाओं में पढे़-पढ़ाए जाते हों। हाल में आइआइटी-इंदौर में इन दिनों एक अनोखा प्रयोग शुरू हुआ है। संस्थान छात्रों को गणित और विज्ञान जैसे तकनीकी विषयों का प्राचीन ज्ञान संस्कृत भाषा के माध्यम से प्रदान कर रहा है। इंदौर के इस संस्थान ने देश के प्राचीन ग्रंथों के गणितीय और वैज्ञानिक ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए अपने किस्म का पहला आनलाइन पाठ्यक्रम शुरू किया है। देश के अन्य प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों को भी ऐसे प्रयास करने चाहिए, ताकि हिंदी सहित अन्य देसज भाषाओं को आवश्यकताओं से जोड़ा जा सके।

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