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सेहत के मोर्चे पर नई मुश्किलें

पुणे स्थित चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन और नई दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट आॅफ जिनेमिक्स एंड इंटिग्रेटेड बायोलॉजी का यह खुलासा चिंता बढ़ाने वाला है कि भारत की आधी से अधिक आबादी श्वास संबंधी रोगों और फेफड़ों से जुड़ी शिकायतों से ग्रस्त है...

Author नई दिल्ली | Published on: January 6, 2016 1:34 AM

पुणे स्थित चेस्ट रिसर्च फाउंडेशन और नई दिल्ली स्थित इंस्टीट्यूट आॅफ जिनेमिक्स एंड इंटिग्रेटेड बायोलॉजी का यह खुलासा चिंता बढ़ाने वाला है कि भारत की आधी से अधिक आबादी श्वास संबंधी रोगों और फेफड़ों से जुड़ी शिकायतों से ग्रस्त है और प्रतिदिन तकरीबन साढ़े तीन करोड़ लोग डॉक्टरों के पास बीमारियों के निदान के लिए पहुंच रहे हैं। चिकित्सकों ने यह निष्कर्ष 880 शहरों में व्यापक अध्ययन के बाद निकाला है। इस अध्ययन में पाया गया कि देश की आबादी का इक्कीस फीसद हिस्सा हृदय रोगों, अत्यधिक तनाव (हाइपर टेंशन) और उच्च रक्तचाप की चपेट में है। रिपोर्ट में फेफडेÞ की बीमारियों के अलावा दमा और क्रोनिक ब्रोंकाइटिस जैसी घातक बीमारियों के मरीजों की तादाद बढ़ने का उल्लेख है और साथ ही इस बात का भी जिक्र है कि विश्व की कुल 7.3 अरब की जनसंख्या के बरक्स भारत की 1.2 अरब की आबादी में सालाना विश्व भर में होने वाली मौतों की अठारह फीसद मौतें भारत में होती हैं।

ऐसे में यह कहना गलत नहीं कि भारत विश्व की सर्वाधिक बीमारियों का बोझ उठाने वाले देशों में शुमार हो चुका है। और अगर बीमारियों पर नियंत्रण के ठोस उपाए नहीं किए गए तो वह दिन दूर नहीं जब विश्व में भारत की पहचान एक बीमारू देश के रूप में होगी। जनवरी 2015 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा भी खुलासा किया जा चुका है कि विश्व में गैर-संक्रामक रोगों से मरने वाले लोगों की तादाद लगातार बढ़ रही है। इस रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में हर वर्ष 1.6 करोड़ लोगों की कैंसर, मधुमेह और हृदयाघात जैसे गैर-संक्रामक रोगों की वजह से समय से पूर्व ही मृत्यु हो जाती है। अगर समय से इलाज उपलब्ध हो तो इनमें से अधिकतर लोगों की जिंदगी बचाई जा सकती है।

रिपोर्ट के मुताबिक भारत में गैर-संक्रामक रोगों से तीस से सत्तर साल के बीच लोगों के मरने की आशंका 26.1 फीसद से बढ़ कर 26.2 फीसद से भी अधिक हो गई है। तुलनात्मक रूप से यह आंकड़ा दक्षिण एशिया और अफ्रीका के कुछ देशों की तुलना में बेहद खराब है। रिपोर्ट के मुताबिक पी-5 देशों (चीन, फ्रांस, रूस, ब्रिटेन और अमेरिका) में केवल रूस की स्थिति (29.2 फीसद के साथ) भारत से अधिक खराब है। 2012 में भारत में 52.2 फीसद लोगों की मौत गैर-संक्रामक रोगों से हुई। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने माना है कि गैर-संक्रामक बीमारियों में चार प्रमुख हैं- कैंसर, मधुमेह, हृदय रोग और सांस लेने में परेशानी। पिछले वर्ष पहले जब विश्व स्वास्थ्य संगठन और अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति द्वारा स्वास्थ्य की दृष्टि से लोगों की जीवन शैली में सुधार लाने के लिए व्यापक समझौते पर सहमति बनी तो उम्मीद बंधी कि गैर-संचारी रोगों का जोखिम कम होगा। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस दिशा में अभी तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।

यह स्थिति काफी शोचनीय तो है, पर हैरत की बात नहीं। भारत की गिनती दुनिया के उन देशों में होती है जहां जीडीपी के अनुपात में स्वास्थ्य के मद में सरकारी खर्च बहुत कम होता है। भारत में यह एक फीसद के आसपास है, जबकि चीन और ब्राजील में तीन फीसद से अधिक। लिहाजा, भारत में सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था संसाधनों की घोर कमी की शिकार है। फिर, आबंटित धन का भी ठीक से इस्तेमाल नहीं हो होता। इस सबका खमियाजा गरीबों को ही भुगतना पड़ता है जो सरकारी अस्पतालों पर निर्भर रहे हैं। दूसरी ओर जो लोग निजी अस्पताल का खर्च किसी तरह उठा सकने में सक्षम हैं वे भी ठगा हुआ महसूस करते हैं। निजी अस्पताल बेकार के निदान करने और इलाज को लंबा खींचने में दिलचस्पी रखते हैं, ताकि ज्यादा कमाई हो। कहने को देश की समूची आबादी को चिकित्सा सेवा के दायरे में लाने की बात जब-तब उठती रहती है, पर इसके पीछे कोई गंभीरता नहीं होती, निरा शब्दाडंबर होता है। जब तक स्वास्थ्य के मद में खर्च जीडीपी के तीन फीसद से ऊपर नहीं होगा, सार्वभौम चिकित्सा-सुविधा का लक्ष्य पाया नहीं जा सकता। सिर्फ टीकाकरण या दुर्घटना बीमा जैसे कार्यक्रमों को समग्र सार्वभौम चिकित्सा-सुविधा का पर्याय मान लेना वैसा ही है जैसे जन धन योजना को वित्तीय समावेशन कहना। स्वास्थ्य के मामले में भारत दुनिया में कहां खड़ा है यह हर साल संयुक्त राष्ट्र की मानव विकास रिपोर्ट बता देती है। कुछ समय पहले आई ताजा रिपोर्ट ने एक बार फिर यह कड़वी हकीकत बयान की है कि शिक्षा और स्वास्थ्य के लिहाज से भारत विकासशील देशों की कतार में भी बहुत पीछे है।

ऐसा माना जा रहा है कि अगर गैर-संचारी रोगों पर नियंत्रण की दिशा में पर्याप्त कदम नहीं उठाए गए तो इन रोगों से मरने वाले लोगों की तादाद जल्दी ही सालानाचार करोड़ से पार पहुंच सकती है। अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति का मानना है कि इक्कीसवीं शताब्दी में गैर-संचारी रोगों पर नियंत्रण पाना सबसे बड़ी चुनौती है। तेजी से बदल रही जीवन शैली, खानपान और शारीरिक कसरत की कमी के कारण आज जीवन पर खतरा मंडराने लगा है। इन भयंकर रोगों से लाखों लोग काल के गाल में समा रहे हैं। आज गैर-संक्रामक रोगों की वजह से विश्व की एक तिहाई आबादी की जिंदगी समय से पहले खत्म हो जा रही है। कैंसर, मधुमेह, हृदय, श्वास रोग और मानसिक रोगों जैसे गैर-संक्रामक रोगों से बेहतर तरीके से निपटने के लिए अभी तक कारगर कदम नहीं उठाए गए हैं। हालांकि इस दिशा में ‘पार्टनरशिप टु फाइट क्रॉनिक डिजीज’ (पीएॅसीडी) ने हाल ही में ‘संकल्प दिशा: स्वस्थ भारत’ नाम से एक राष्ट्रीय रूपरेखा तैयार की है। इसका उद््देश्य देश में 2025 तक स्वस्थ भारत के संकल्प को हासिल करने में सहयोग देना है।

चूंकि भारत में गैर-संक्रामक रोगों से निपटने के लिए कोई ठोस नीति नहीं है, लिहाजा ऐसे में इस रूपरेखा से राज्यों को स्वास्थ्य संबंधी मामलों को प्राथमिकता देने में मदद मिलेगी। विडंबना यह है कि हृदय रोग, कैंसर, मधुमेह और मस्तिष्काघात से मरने वाले लोगों की सर्वाधिक संख्या भारत में ही है। हालांकि भारत सरकार गैर-संक्रामक रोगों से निपटने के लिए चिंतित दिखती है लेकिन उसका अपेक्षित परिणाम देखने को नहीं मिल रहा है। अगर इन बीमारियों पर शीघ्र काबू नहीं पाया गया तो ये बीमारियां राष्ट्रीय आपदा का रूप ग्रहण कर सकती हैं, जिससे निपटना फिर आसान नहीं होगा। सरकार की कोशिश यह है कि तीस वर्ष से ज्यादा उम्र के व्यक्तियों में गैर-संचारी रोगों को लेकर ज्यादा से ज्यादा जागरूकता पैदा की जाए और व्यापक स्तर पर उनका शारीरिक परीक्षण किया जाए।

निस्संदेह यह एक सार्थक पहल है। लेकिन जानकर हैरानी होगी कि पिछले साल सरकार ने तीस वर्ष से अधिक के सात करोड़ लोगों के परीक्षण की योजना बनाई, लेकिन अभी तक उस दिशा में दो कदम भी आगे नहीं बढ़ा जा सका है। अगर इस योजना को आकार दिया जाए तो देश की एक बड़ी आबादी को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने में मदद मिलेगी। भारत के महापंजीयक द्वारा जारी रिपोर्ट में कहा जा चुका है कि देश के पैंतीस से चौंसठ वर्ष आयु वर्ग के लोगों में बयालीस फीसद मौतों की वजह गैर-संचारी रोग हैं। वर्तमान में देश में कैंसर रोगियों की संख्या पैंतीस लाख से ऊपर पहुंच चुकी है। और भी चिंता वाली बात यह है कि तमाम अनुसंधानों के बावजूद यह रोग अब भी लाइलाज बना हुआ है। अगर इन रोगों के लक्षणों को समझ लिया जाए तो इन पर नियंत्रण पाने में आसानी होगी। ऐसा माना जाता है कि कैंसर के रोगी का जितना जल्दी इलाज शुरू होगा उतना ही लाभकारी होगा।

पिछले सालों में कैंसर रोगियों के उपचार में नई तकनीक और दवाइयां ईजाद हुई हैं। लेकिन ये दवाइयां इतनी महंगी हैं कि आम लोगों की पहुंच से बाहर हैं। सरकार को चाहिए कि इन दवाइयों की बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण लगाए ताकि कैंसर जैसी बीमारी से ग्रस्त आम आदमी अपना इलाज करा सके। इसके अलावा सरकार को स्वास्थ्य सेवाओं में व्यापक सुधार के लिए शहरों के साथ ही गांवों की ओर भी ध्यान देना होगा। इसलिए और भी कि गैर-संचारी रोगों से मरने वालों की ज्यादा तादाद गांवों में ही है। ग्रामीण भारत में स्वास्थ्य सेवा का बुनियादी ढांचा पूरी तरह चरमरा चुका है। ग्रामीण इलाकों में खोले गए अस्पताल जर्जर हैं। वहां बहुत-से अस्पतालों में जरूरत के समय न तो डॉक्टर मिलते हैं और न ही दवाइयां। विशेषज्ञ डॉक्टरों की सेवाएं मिल पाना तो बहुत दूर की बात है। ऐसी स्थिति में भला गैर-संक्रामक रोगों से कैसे निपटा जा सकता है!

विडंबना यह है कि गांव के लोगों को तब तक गैर-संचारी रोगों के बारे में जानकारी नहीं होती जब तक कि वे पूरी तरह चपेट में नहीं आ जाते हैं। जब उन्हें जानकारी मिलती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। चूंकि ग्रामीण इलाकों में इसके इलाज की सुविधा नहीं होती, लिहाजा उन्हें शहर की ओर रुख करना पड़ता है। आज जरूरत तो इस बात की है कि भारत सरकार और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं गैर-संचारी रोगों से निपटने के लिए समन्वित रूप से असरकारीकार्यक्रम तैयार करें। गैर-संक्रामक रोगों का बढ़ता दायरा न सिर्फ जिंदगी को मौत में बदल रहा है बल्कि सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए भी यह बड़ी चुनौती है।

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