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विश्व स्वास्थ्य संगठन की अनेक रपटों से लेकर देश में हुए तमाम सर्वेक्षण बताते हैं कि हमारी सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था सुधरने के बजाय और बदहाल होती जा रही है..

Author नई दिल्ली | January 2, 2016 12:03 AM

हमारी चिकित्सा व्यवस्था अरसे से जिन खामियों और विसंगतियों की शिकार है, उन्हें कब और कैसे दूर किया जाएगा, यह एक गंभीर समस्या है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की अनेक रपटों से लेकर देश में हुए तमाम सर्वेक्षण बताते हैं कि हमारी सार्वजनिक चिकित्सा व्यवस्था सुधरने के बजाय और बदहाल होती जा रही है। शायद इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि संपन्न और प्रभावशाली तबकों के लोग अब सरकारी अस्पतालों की सेवाएं नहीं लेते। इन्हें गरीब मरीजों के इलाज की खानापूरी के लिए छोड़ दिया गया है। चिकित्सा सुविधा के विस्तार के नाम पर ग्रामीण इलाकों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तो खोल दिए गए, मगर उनकी सुध नहीं ली जाती। नियुक्त होने पर भी इन केंद्रों पर डॉक्टर जाना नहीं चाहते।

यों भारत में डॉक्टरों की कमी नहीं है। डॉक्टर और जनसंख्या के अनुपात का राष्ट्रीय औसत बहुत-से विकासशील देशों के मुकाबले अच्छा कहा जा सकता है। मगर चिकित्सा-सुविधाएं शहर-केंद्रित होकर रह गई हैं। एक ऐसे देश में जहां दो तिहाई आबादी गांवों में रहती है, डॉक्टरों की तीन चौथाई संख्या केवल शहरों में है। नर्स या दूसरे स्वास्थ्य कर्मियों की सेवाएं तो ग्रामीण इलाकों में और भी कम मिल पाती हैं। नतीजतन, भारत में शिशु मृत्यु दर सबसे ज्यादा है और प्रसव के दौरान स्त्रियों की मौत का ग्राफ कई कंगाल अफ्रीकी देशों की तुलना में भी ऊंचा है। यहां हर माह लगभग अस्सी हजार महिलाओं की मौत प्रसव के ही दौरान हो जाती है। दस लाख बच्चे हर साल एक माह के होते-होते दम तोड़ देते हैं।

स्वास्थ्य संबंधी हमारी चुनौतियां इतनी सीधी नहीं रहीं जितनी दो-ढाई दशक पहले थीं। सबसे बड़ा अंतर आज यह है कि भारत अब बेहद गरीब देश नहीं रहा है। अब हम तेजी से विकासशील और विकसित दुनिया की वास्तविकताओं के बीच में फंस रहे हैं- उच्च रक्तचाप, मधुमेह के साथ-साथ मलेरिया, जापानी बुखार (इन्सेफलाइटिस), डेंगू जैसी बीमारियां फैल रही हैं। कुपोषण के आंकड़े हमें दुनिया में सबसे कमजोर देशों में रखते हैं जबकि मधुमेह की दरें अमेरिका से ज्यादा हैं। जहां टेढ़ी टांगों और पिचके पेटों के साथ एक तिहाई बच्चे बुरी तरह कुपोषण के शिकार हैं, वहीं हमारे शहरों में मोटापा एक नई बीमारी के रूप में उभर रहा है। आसपास रहने वाले समुदाय- धनी और बेहद गरीब, ग्रामीण और शहरी- स्वास्थ्य की एकदम भिन्न चुनौतियों से जूझ रहे हैं और अभी तक हमारी नीतियां इन संकटों से निपटने में विफल रही हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में हमारी स्वास्थ्य सेवाएं सबसे बदतर हालत में हैं। प्रतिवर्ष दस लाख से अधिक महिलाएं प्रसव के दौरान मौत के मुंह में चली जाती हैं। आज भी अधिकांश ग्रामीण भारत किसी भी प्रकार की स्वास्थ्य सेवा से पूरी तरह अछूता है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी दखल अब भी महामारी से संबंधित कार्यक्रमों, टीकाकरण और परिवार नियोजन तक सीमित है। यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि साबुन का प्रयोग, पानी उबालने जैसे स्वास्थ्य जागरूकता के बुनियादी मुद््दों को उठाने के कार्यक्रम निजी कंपनियों और गैर-सरकारी संगठनों ने चलाए हैं। वास्तव में 2000 तक भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा पूरी तरह तहस-नहस हो चुकी थी, हमारे हाथ में एक क्षत-विक्षत, टूटी हुई, बीमारों का इलाज कराने में असमर्थ प्रणाली थी, जबकि इसके देखते-देखते हजारों लोग मौत के मुंह जा रहे थे। जैसा कि जन स्वास्थ्य केंद्रों का स्व-मूल्यांकन करती एक सरकारी रिपोर्ट कहती है, ‘स्वास्थ्यकर्मियों की उपस्थिति… अक्सर आवश्यकता से कम होती है…. आवश्यक दवाओं की उपलब्धता न्यूनतम होती है, और अस्पतालों की क्षमता निहायत अपर्याप्त है।’

शहरी और ग्रामीण भारतीय जनता जन-स्वास्थ्य सेवाओं से बहुत असंतुष्ट है। पचासी प्रतिशत से भी अधिक मरीजों ने निजी स्वास्थ्य सेवाओं को चुना और गरीब लोगों तक ने आर्थिक रूप से विनाशकारी उपचारों के लिए अपनी जेब से पैसा दिया। इलाज का खर्च अब दूसरा सबसे बड़ा कारण है कि ग्रामीण भारत के लोग कर्जदार हैं। निजी स्वास्थ्य सेवाओं की ओर इस रुझान ने हमें दुनिया की अकेली ऐसी अर्थव्यवस्था बना दिया है, जहां स्वास्थ्य पर सरकार की तुलना में निजी क्षेत्र ज्यादा खर्च कर रहा है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में हमारे सार्वजनिक और निजी व्यय का अनुपात 1:4 है। यह पाकिस्तान से भी बदतर है जो कि इस क्षेत्र में कोई खास सफल नहीं है, वहां का अनुपात 1:3 का है।

देश में स्वास्थ्य सेवाओं की दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण हमारे राजनीतिक वर्ग में इस अहसास का जोर पकड़ना है कि स्वास्थ्य सेवा सामान्यत: मतदाताओं के लिए कोई प्राथमिकता नहीं है। शायद यह वजह किसी हद तक समझाती है कि 2001 में घोषित स्वास्थ्य-नीति स्वास्थ्य के हमारे लक्ष्यों के संदर्भ में क्यों सबसे कमजोर थी। यह 1978 की अल्मा-अल्टा घोषणा के अनुमोदन से कदम खींचना था, जिसमें शताब्दी के अंत तक ‘सबके लिए स्वास्थ्य’ की शपथ तो ली गई थी, और स्वास्थ्य सेवा के अपने वादों में इसने न तो ‘व्यापक’ और न ही ‘सबके लिए’ जोड़ा था। सरकारों ने इस क्षेत्र में पीछे हटना शुरू कर दिया था, और अपनी खाली हुई इस भूमिका को भरने के लिए निजी खिलाड़ियों को उतार दिया। हमारे ध्यान नहीं देने से जन-स्वास्थ्य सेवा प्रणाली बुरी तरह लड़खड़ा गई और एक ऐसे क्षेत्र की उपेक्षा हुई जिसमें आमतौर पर सरकारें सक्रिय रही हैं। स्वास्थ्य सेवा तक प्रभावी पहुंच में एक बड़ी चूक अब भी यही है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सरकारी प्राथमिक चिकित्सा केंद्रों के बाहर कम खर्च वाले चिकित्सीय विकल्प उपलब्ध नहीं हुए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में चिकित्सकों की संख्या दयनीय रूप से प्रति हजार लोगों पर 0.6 है, जबकि शहरी क्षेत्र में 3.9 है। और स्वास्थ्य केंद्र तक जाने के लिए बीमार व्यक्ति का ऊबड़-खाबड़ सड़कों पर सफर करना ग्रामीण स्वास्थ्य के विकल्प और खराब कर देता है।

देश में स्वास्थ्य-बजट का सिर्फ तीन फीसद हिस्सा आयुर्वेद पर खर्च होता है। जबकि आयुर्वेद में भारत की मुख्य चिकित्सा पद्धति बनने के सभी गुण मौजूद हैं। देश के सकल घरेलू उत्पाद का सिर्फ 4.2 फीसद चिकित्सा सेवा पर खर्च होता है। भारतीय चिकित्सा पद्धातियों के शोध, अनुसंधान और विकास पर विशेष ध्यान देने और पुरातन पद्धतियों से सेहत सुधार के लिए सोलह जिलों में आयुष केंद्र खोलने का फैसला किया गया है। इन केंद्रों में आयुर्वेद, होम्योपैथी और यूनानी पद्धतियों से इलाज के साथ-साथ योग और प्राकृतिक चिकित्सा को भी वरीयता दी जाएगी।

आयुर्वेद सहित चिकित्सा की अन्य वैकल्पिक पद्धतियों को बढ़ावा देने के लिए पिछले महीने फिक्की ने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में आरोग्य मेले का आयोजन किया था। इसका उद््घाटन केंद्रीय आयुषमंत्री श्रीपद येससो नाईक ने किया था। चार दिन तक चले इस मेले में आयुर्वेद, योग एवं रस औषधियों के प्रति लोगों में भारी रुझान देखा गया। वैकल्पिक चिकित्सा के क्षेत्र में काम करने वाली एक अग्रणी संस्था डीएस रिसर्च सेंटर ने भी इस मेले में कैंसर चिकित्सा के प्रति जागरूकता पैदा करने के लिए अपना स्टॉल लगाया था। इस संस्था ने कैंसर के उपचार के लिए खाद्य पदार्थों की पोषक ऊर्जा से औषधि तैयार की, जो कैंसर रोगियों में उम्मीद की एक नई किरण बन गई है। इस संस्था ने भारत सरकार से अपनी औषधि के परिणामों की जांच-पड़ताल करा कर उसे चिकित्सा की वर्तमान धारा में शामिल किए जाने की मांग की है ताकि लाखों कैंसर रोगियों की जान बचाई जा सके।

हम इस मामले में दूसरे देशों से कुछ सबक सीख सकते हैं। टेलीमेडिसिन सेवा का उपयोग करके हम देश के सुदूर भागों और अस्पतालों में स्वास्थ्य सेवा में गुणात्मक सुधार ला सकते हैं। दूरदराज के इलाकों में डॉक्टर और प्रशिक्षित चिकित्साकर्मी उपलब्ध नहीं होते, लोग लाचारी की हालत में नीमहकीमों और झाड़-फूंक करने वालों की शरण में जाते हैं। फिर इलाज के नाम पर जो कुछ होता है, कई बार वह किसी हादसे से कम नहीं होता। अलबत्ता जागरूकता की कमी भी इसकी एक बड़ी वजह है। लेकिन अफ्रीका के देश पहले ही दिखा चुके हैं कि टेलीमेडिसिन प्रणाली के द्वारा दुर्गम गांवों को प्रभावपूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ कर इसे बड़े पैमाने पर भी किया जा सकता है। रवांडा ट्रैकनेट का प्रयोग करता है, यह आॅनलाइन सूचना प्रणाली है जो मोबाइल फोन पर भी उपलब्ध है। यह खासतौर से गांवों में मरीजों को एड्स की दवाएं और जांच के परिणाम उपलब्ध करवाती है। युगांडा में सेटेलाइट संगठन ग्रामीण क्लीनिकों को ई-मेल सक्षम पीडीए के जरिए नगर के डॉक्टरों से जोड़ता है। पिछले दशक से, भारत आईटी इन्फ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहा है जो टेलीमेडिसिन और रिमोट स्वास्थ्य सेवाओं, इंटरनेट किओस्क और मोबाइल फोन नेटवर्क को अच्छी तरह फिट कर सकेगा। इससे पूर्व टेलीमेडिसिन प्रणाली को बनाने के लिए सही सूचना प्रणाली की आवश्यकता है जो डॉक्टरों को देश के उन कोनों से जोड़ सके जो पहुंच से बाहर हैं।

संकट अक्सर देशों की अर्थव्यवस्था के प्रति अपनी नीतियों में नवीनताएं और बुनियादी बदलाव लाने का मौका देते हैं- जिसके परिणामस्वरूप उत्पादकता में बढ़ोतरी, वृद्धि के छोटे रास्ते और विकास के नए मॉडल दिखते हैं जो मौजूदा तरीकों से श्रेष्ठ होते हैं। भारत के लिए आने वाले वर्ष हमें अवसर देते हैं कि स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक वास्तव में अनूठी, नवीन पहल को आकार दें, जो विकास के साथ आने वाली चुनौतियों का पूर्वानुमान लगाते हुए प्राथमिक चिकित्सा के हमारे अधूरे लक्ष्यों को पूरा करे।

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