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प्रपंच के सहारे महिमामंडन

शहादत दिवस पर बापू से जुड़े असंख्य वृत्तांत सहज ही याद आने लगते हैं। उन्हें दुहराने के बजाय गांधी-हत्या के अल्पज्ञात तथ्यों और कथ्यों को बताना और जताना राष्ट्रहित में होगा। पिछले दिनों हिंदुओं के चंद स्वयंभू नायकों की भभकी और फुफकार पर गौर करना होगा। खासकर इसलिए कि समय बीतते किंवदंतियां इतिहास का हिस्सा […]

Author January 30, 2015 3:31 PM

शहादत दिवस पर बापू से जुड़े असंख्य वृत्तांत सहज ही याद आने लगते हैं। उन्हें दुहराने के बजाय गांधी-हत्या के अल्पज्ञात तथ्यों और कथ्यों को बताना और जताना राष्ट्रहित में होगा। पिछले दिनों हिंदुओं के चंद स्वयंभू नायकों की भभकी और फुफकार पर गौर करना होगा। खासकर इसलिए कि समय बीतते किंवदंतियां इतिहास का हिस्सा बन जाती हैं। झूठ की धूल सच को ढंक देती है।

पिछले महीने भाजपा के उन्नाव से सांसद सच्चिदानंद हरि साक्षी ने हत्यारे गोडसे को देशभक्त करार दिया। पार्टी से चेतावनी मिलने पर बिना शर्त माफी मांग ली। ये साक्षी महाराज वही हैं, जो पिछले दशक में लोहिया की पुण्यतिथि पर मुलायम सिंह यादव से ‘आजीवन साथ निभाने’ का एलान कर फिर भाजपा की गोद में जा पड़े। इनके आश्रम में एक युवती के कत्ल (15 अप्रैल 2013) का आरोप लगा था। कथित आश्रम में वित्तीय घोटालों की चर्चा चली थी। मगर मोदी के बहाव में चले, सांसद बन गए।

यहां मुख्य बात हत्यारों के गिरोह और उसके सरगना नाथूराम विनायक गोडसे की है। गोडसे का नाम गांधी से जुड़ गया है। आखिर कैसा, कौन और क्या था नाथूराम विनायक गोडसे? क्या वह चिंतक था, ख्यातिप्राप्त राजनेता था, हिंदू महासभा का निर्वाचित पदाधिकारी था, स्वतंत्रता सेनानी था? सच्चाई यह है कि पुणे शहर के उसके पुराने मोहल्ले सदाशिव पेठ के बाहर उसे कोई जानता तक नहीं था, जबकि तब वह चालीस की आयु के समीप था।

नाथूराम स्कूल से भागा हुआ छात्र था। नूतन मराठी विद्यालय में मिडिल की परीक्षा में फेल हो जाने पर उसने पढ़ाई छोड़ दी थी। उसका मराठी भाषा का ज्ञान बड़े निचले स्तर का था। अंगरेजी का ज्ञान तो था ही नहीं। जीविका के लिए उसने सांगली शहर में दर्जी की दुकान खोली थी। उसके पहले वह बढ़ई का काम करता था। फलों का ठेला भी लगा चुका था। उसके पिता विनायक गोडसे डाकखाने में बाबू थे, मासिक आय पांच रुपए थी। नाथूराम अपने पिता का लाड़ला था, क्योंकि उसके पहले जन्मे सभी पुत्र मर गए थे। इसीलिए अंधविश्वास में मां ने नाथूराम को बेटी की तरह पाला। नाक में नथ पहनाई, जिससे नाम नत्थूराम पड़ गया। उसकी आदतें और हरकतें भी औरतों जैसी हो गर्इं। नाथूराम के बाद तीन और पुत्र पैदा हुए थे, जिनमें गोपाल भी था, जो नाथूराम के साथ सह-अभियुक्त था।

नाथूराम की युवावस्था किसी खास घटना या विचार के लिए नहीं जानी जाती है। उस समय उसके हमउम्र लोग भारत में क्रांति का अलख जगा रहे थे। शहीद हो रहे थे। इस स्वाधीनता संग्राम की हलचल से नाथूराम को तनिक भी सरोकार नहीं था। अपने नगर पुणे में वह रोजी-रोटी के ही जुगाड़ में लगा रहता था। मई 1910 में जन्मे नाथूराम के जीवन की पहली खास घटना थी सितंबर 1944 की, जब हिंदू महासभा नेता लक्ष्मण गणेश थत्ते ने सेवाग्राम में धरना दिया था।

उस दौर में महात्मा गांधी भारत विभाजन रोकने के लिए मोहम्मद अली जिन्ना से वार्ता करने मुंबई जा रहे थे। चौंतीस वर्षीय अधेड़ नाथूराम उन प्रदर्शनकारियों में शरीक था। खंजर लेकर गोडसे बापू पर वार करना चाहता था। उसे आश्रमवासियों ने पकड़ लिया था। तब हम सभी भाई-बहन सेवाग्राम में रहते थे। लखनऊ जेल से रिहा होकर हमारे पिता संपादक के. रामा राव गांधीजी के साथ देश-विदेश के कई अंगरेजी दैनिकों के विशेष संवाददाता थे। मैं पहली कक्षा का छात्र था। पिताजी बड़े विक्षिप्त-से घर आए। गोडसे की हरकत बताई।

गोडसे के जीवन की दूसरी घटना थी एक वर्ष बाद, जब ब्रिटिश वायसराय ने भारत की स्वतंत्रता पर चर्चा के लिए राजनेताओं को शिमला आमंत्रित किया था। तब नाथूराम पुणे की किसी अनजान पत्रिका के संवाददाता के रूप में वहां उपस्थित था। जो लोग नाथूराम गोडसे को प्रशंसा का पात्र समझते हैं, उन्हें खासकर याद रखना होगा कि गांधीजी की हत्या के बाद जब नाथूराम के पुणे आवास और मुंबई के उसके मित्रों के घर पर छापे पड़े तो मारक अस्त्रों का भंडार पकड़ा गया था, जिसे उसने हैदराबाद के निजाम पर हमला करने के नाम पर बटोरा था। यह दीगर बात है कि इन असलहों का प्रयोग कभी नहीं किया गया।

मुंबई और पुणे के व्यापारियों से अपने हिंदू राष्ट्र संगठन के नाम पर नाथूराम ने अकूत धन वसूला था, जिसका कभी लेखा-जोखा तक नहीं दिया गया। बारीकी से परीक्षण करने पर निष्कर्ष यही निकलता है कि कतिपय हिंदू उग्रवादियों द्वारा नाथूराम भाड़े पर रखा गया, हत्यारा था। जेल में उसकी चिकित्सा रपटों से ज्ञात होता है कि उसका मस्तिष्क अधसीसी के रोग से ग्रस्त था। यह अड़तीस वर्षीय बेरोजगार, अविवाहित और दिमागी बीमारी से ग्रस्त नाथूराम किसी रूप में मामूली मनस्थिति वाला व्यक्ति नहीं हो सकता। उसने गांधी की हत्या का पहला प्रयास 20 जनवरी, 1948 को किया था। उसके सहअभियुक्त मदनलाल पाहवा से मिल कर नई दिल्ली के बिड़ला भवन पर बम फेंका था, जहां गांधीजी प्रार्थना सभा कर रहे थे। बम का निशाना चूक गया। पाहवा पकड़ा गया, मगर नाथूराम भाग कर मुंबई में छिप गया।

दस दिन बाद अपने अधूरे काम को पूरा करने वह दिल्ली आया। तीस जनवरी की संध्या की एक घटना से साबित होता है कि नाथूराम कितना धर्मनिष्ठ हिंदू था! हत्या के लिए तीन गोलियां दागने के पहले, वह गांधीजी की राह रोक कर खड़ा हो गया था। पोती मनु ने नाथूराम को हटने के लिए आग्रह किया, क्योंकि गांधीजी को प्रार्थना के लिए देरी हो गई थी।

इस धक्का-मुक्की में मनु के हाथ से पूजा वाली माला और आश्रम भजनावाली जमीन पर गिर गर्इं। उसे रौंदता हुआ नाथूराम आगे बढ़ा, पिछली सदी का जघन्यतम अपराध करने।

जो लोग अब भी नाथूराम गोडसे के प्रति थोड़ी नरमी बरतते हैं उन्हें उस क्रूर हत्यारे के बारे में एक प्रमाणित तथ्य पर गौर करना चाहिए। गांधीजी को मारने के दो सप्ताह पूर्व नाथूराम ने अपने जीवन को काफी बड़ी राशि के लिए बीमा कंपनी से सुरक्षित करा लिया था। उसकी मौत के बाद उसके परिजन इस बीमा राशि से लाभान्वित होते। एक कथित ‘‘मिशन’’ को लेकर चलने वाला व्यक्ति बीमा कंपनी से हरजाना कमाना चाहता था। नाथूराम ने जेल के भीतर सुविधाओं की मांग भी की थी, हालांकि उसे स्नातक और पर्याप्त शिक्षित न होने के कारण पंजाब जेल नियम संहिता के अनुसार साधारण कैदी की तरह रखा जाना था।

अपने मृत्युदंड के निर्णय के खिलाफ नाथूराम ने लंदन की प्रिवी कांउसिल में अपील की थी जबकि भारत स्वाधीन हो चुका था। वह अपील ‘‘कंगाल अधिनियम’’ के तहत दायर की गई थी, जो निर्धन, असहाय अपराधी कानूनी मदद पाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। जजों ने उसे जाहिर है अस्वीकार कर दिया था। उसके भाई गोपाल गोडसे ने जेल में हर गांधी जयंती में बढ़-चढ़ कर शिरकत की, क्योंकि जेल नियम में ऐसा करने पर सजा की अवधि में छूट मिलती है। गोपाल पूरी सजा की अवधि के पहले ही रिहाई पा गया था।

नाथूराम गोडसे के साथ जिसे फांसी दी गई थी, वह था नारायण आप्टे, निकटतम मित्र और सहधर्मी। ब्रिटिश वायुसेना में नौकर आप्टे पहले गणित का अध्यापक था और एक ईसाई छात्रा मनोरमा सालवी को कुंवारी मां बना कर छोड़ गया। हालांकि उसकी पत्नी और विकलांग पुत्र भी थे। शराबप्रेमी आप्टे की अदालती रपट के अनुसार उसके जीवन की यादगार घटना थी 29 जनवरी, 1948 की रात, जो उसने पुरानी दिल्ली के वेश्यालय में गुजारी थी। अगली शाम को बापू की हत्या हुई।

तीसरा अभियुक्त विष्णु रामकृष्ण करकरे शस्त्रों का तस्कर था। अनाथालय में परवरिश पाई। चाय की दुकान खोली। गोडसे से हिंदू महासभा के कार्यालय में परिचय हुआ। राष्ट्रवाद का दम भरने लगा। पुलिस की पकड़ से बच जाता अगर वह समीपस्थ पुर्तगाली उपनिवेश गोवा में घुसने में सफल हो जाता। भाग नहीं पाया। दिगंबर रामचंद्र वडगे, जो सरकारी गवाह बना और क्षमा पा गया, पुणे में शस्त्र भंडार नामक दुकान चलाता था। नाटे सांवले, भैंगी दृष्टि वाले वड़गे ने विनायक दामोदर सावरकर को हत्या की साजिश का सूत्रधार बताया था। पर पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में सावरकर रिहा हो गए थे।

तब विभाजन और पाकिस्तान के पंजाब और सिंध से भाग कर आए हिंदू शरणार्थी हिंदू उग्रवादियों के लिए बारूद बन रहे थे। जनमत भी मुसलमानों के विरुद्ध था। बस चिनगारी लगाने वाला चाहिए था। उस समय दिग्भ्रमित सोशलिस्ट भी सरदार पटेल को हिंदू उग्रवादियों का पोषक मान रहे थे। वह दौर था जब नेहरू और इन सोशलिस्टों में निकट का रिश्ता था। हालांकि दो दशक बाद लोकनायक जयप्रकाश नारायण और डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया था कि पटेल का विरोध करना और नेहरू का पक्ष लेना एक ऐतिहासिक भूल थी।

कुछ सिरफिरे लोग नाथूराम गोडसे को उच्चकोटि का चिंतक, ऐतिहासिक मिशन वाला पुरुष और अदम्य नैतिक ऊर्जा वाला व्यक्ति बना कर पेश करते हैं। उनके तर्क का आधार नाथूराम का वह दस-पृष्ठीय वक्तव्य है, जिसे उसने बड़े युक्तिसंगत, भावना भरे शब्दों में लिख कर अदालत में पढ़ा था कि उसने गांधीजी को क्यों मारा? इस बयान में गोडसे ने दो झूठ कहे थे।

पहला यह कि गांधीजी गोवध बंदी के विरुद्ध थे। इसका संदर्भ था जब भारतीय मुसलमानों के खिलाफत आंदोलन का गांधीजी ने समर्थन किया था, ताकि तुर्की के खलीफा का सम्मान बना रहे। तब मुसलिम नेताओं ने प्रस्ताव रखा था कि आखिल भारतीय खिलाफत समिति मुसलमानों से गोवध बंद करने की अपील करेगी। गांधीजी ने कहा कि ऐसी बात करना सौदेबाजी जैसी हो जाएगी। इसलिए खिलाफत आंदोलन की समाप्ति पर गोवध बंदी पर समझौता संभव है।

दूसरा झूठ गोडसे ने कहा था कि गांधीजी राष्ट्रभाषा के पक्षधर नहीं हैं। बापू ने ही भारत में अंगरेजी हटाने और हिंदी लाने का अभियान चलाया था। बैरिस्टर गांधी का मशहूर बयान था कि, ‘‘दुनिया से कह दो कि गांधी अंगरेजी नहीं जानता।’’

फांसी के दिन (15 नवंबर, 1949) अंबाला जेल का आंखों देखा हाल न्यायमूर्ति जीडी खोसला ने अपने संस्मरणों में लिखा है। गोडसे और आप्टे को उनके हाथ पीछे बांध कर फांसी पर ले जाया गया तो गोडसे लड़खड़ा रहा था। गला रुंधा था। भयग्रस्त और विक्षिप्त दिखा। आप्टे पीछे चल रहा था। माथे पर शिकन थी। दोनों आक्रांत लग रहे थे। ऐसे थे ये दोनों हीरो इतिहास के।

 

के विक्रम राव

 

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