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इंटरनेट की टूटती सांसें

सर्वर का बैठ जाना अब इसलिए आम है कि दुनिया में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इससे डाटा के रूप में सूचनाओं का प्रवाह सुनिश्चित करने वाले सर्वरों पर बोझ भी लगातार बढ़ रहा है। यों सर्वरों की संख्या और उनकी क्षमता में बढ़ोत्तरी की जा रही है, लेकिन इनका अचानक धोखा दे जाना साबित कर रहा है कि सर्वरों पर बोझ उनकी क्षमता से कई गुना ज्यादा है।

सांकेतिक फोटो।

संजय वर्मा

शायद ही कोई इससे इनकार करे कि दुनिया आज जिस मुकाम पर है, उसमें तकनीक की अहम भूमिका है। उसमें भी इंटरनेट शीर्ष पर है। कोरोना काल में इंटरनेट ने तकरीबन पूरी दुनिया की गति को थामे रखा। पर जो तकनीक दुनिया को चला रही है, क्या वह हमेशा इसी तरह चलती और आगे बढ़ती रहेगी? अरसे से दावा किया जा रहा है कि एक दिन इंटरनेट अपने बोझ से ही बैठ जाएगा। इंटरनेट का रुक जाना सांसें थम जाने जैसा होगा। हो सकता है कि यह दावा कपोल कल्पित लगे, पर इधर एक घटना से इस खतरे का अहसास करा दिया है।

कुछ ही दिन पहले, 8 जून, 2021 को दुनिया की हजारों छोटी-बड़ी वेबसाइटों ने अचानक काम करना बंद कर दिया। इनमें कई समाचारपत्रों की वेबसाइटें भी थीं। ईकॉमर्स कंपनी अमेजन की वेबसाइटों का संचालन एक घंटे के लिए थम गया। इतनी-सी देर में कंपनियों को लाखों डॉलर की चपत लग गई। जांच-पड़ताल में पता चला कि एक मामूली-सी गड़बड़ी इसके लिए जिम्मेदार थी। गड़बड़ी विभिन्न वेबसाइटों के डाटा को दुनिया भर में आवाजाही के लिए सर्वर उपलब्ध कराने वाली एक कंपनी में पैदा हुई थी। यह अमेरिकी कंपनी असल में क्लाउड सेवा प्रदाता- ‘फास्टली’ है। इसका काम बिना तारों के संजाल के तकनीक के बादलों पर डाटा को यहां से वहां प्रयोगकर्ताओं तक पहुंचाना है।

यह कंपनी अपने सर्वर पर सेवाएं लेने वाली कंपनियों की वेबसाइटों का कुछ डाटा सुरक्षित रखती है। ऐसा करने के पीछे कंपनियों की वेबसाइटों की गति को बढ़ाना है। यानी दुनिया में कभी भी इनकी वेबसाइटों को खोला जाए तो उन पर तेज और आसान सर्फिंग हो सके। लेकिन जो कंपनी वेबसाइटों को गति प्रदान कर रही है, उसके यहां हुई मामूली गड़बड़ी ने महज एक घंटे में लाखों डॉलर के कारोबार का भट्टा बैठा दिया। यह तो सिर्फ एक तकनीकी गड़बड़ी का मामला था। इसे आसानी से सुलझा लिया गया, लेकिन अगर इसमें साइबर सेंधमारों की भूमिका शामिल हो जाए, कुछ शत्रु देश गलत मंशा से कोई गड़बड़ी पैदा करने लगें तो इंटरनेट को तबाही से कैसे बचाया जा सकेगा।

फिलहाल इस सवाल का माकूल जवाब शायद ही किसी के पास हो। बड़ी कंपनियां तो फिर भी कुछ छोटे-मोटे व्यवधान झेल सकती हैं, लेकिन उन हजारों-लाखों छोटी कंपनियों के कामकाज का क्या होगा, जिनके लिए इंटरनेट का कुछ समय के लिए रुकना भी घातक साबित हो सकता है। फर्ज कीजिए, आगे चल कर अस्पताओं में मरीजों को आॅक्सीजन आपूर्ति करने का काम आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और इंटरनेट पर आधारित व्यवस्था के हवाले कर दिया जाता है और अचानक किसी क्षण इंटरनेट काम करना बंद कर देता है। ऐसे में होने वाली क्षति की कल्पना भी नहीं की जा सकती। सर्विस प्रोवाइडर- फास्टली के हादसे ने इंटरनेट के एक नए मर्ज की तरफ भी संकेत किया है।

असल में, इंटरनेट की सहूलियत के कारण बहुत-सा कामकाज गिनी-चुनी कंपनियों के जिम्मे हो गया है। बड़ी-बड़ी कंपनियां भी अपनी वेबसाइटों की देखरेख आदि का काम चुनिंदा कंपनियों के हवाले कर रही हैं। ऐसी कंपनियों के पास न तो ज्यादा कर्मचारी होते हैं और न ही कोई बड़ा आधारभूत ढांचा। यानी जिस तरह एक कमरे में बैठ कर इंटरनेट की बदौलत हजारों कंपनियां बनाई और चलाई जा रही हैं, उसी तरह बेहद कम संसाधनों से इंटरनेट के संचालन और देखरेख का काम भी किया जा रहा है। इससे यह दृश्य कभी भी उपस्थित हो सकता है कि एक कंपनी में हुई सामान्य-सी गड़बड़ी पूरे इंटरनेट के ढांचे को बिगाड़ दे। इंटरनेट के भारी-भरकम साम्राज्य के सामने मौजूद संकटों में से यह सिर्फ एक उदाहरण है। खतरे तो और भी हैं, जिनके संकेत अक्सर मिलते रहते हैं।

इंटरनेट की गति में व्यवधान डालने वाली घटनाओं को अक्सर इंटरनेट शटडाउन कहा जाता है। शटडाउन की बारंबारता हाल में वर्षों में काफी बढ़ी है। मसलन, पिछले साल 14 दिसंबर को गूगल की कई सेवाएं एक घंटे के लिए ठप्प पड़ गई थीं। दुनिया भर में गूगल और उसकी अन्य सेवाओं से जुड़े उपभोक्ताओं को कंप्यूटर और मोबाइल स्क्रीन पर सेवा के अस्थायी रूप से प्रभावित होने का संदेश मिला था। बताया गया कि गूगल के सर्वर में आई गड़बड़ी की वजह से ऐसा हुआ। बीते वर्षों में ऐसी घटनाएं बढ़ती गई हैं। कभी सर्वर फेल हो जाता है, तो कभी समुद्र के नीचे मौजूद इंटरनेट केबल कट जाता है। साइबर हमलों की निरंतरता ने अलग से चिंता पैदा कर दी है।

इसी से यह आशंका जोर पकड़ने लगी है कि किसी दिन ऐसा हो सकता है कि इंटरनेट पूरी तरह बैठ जाए और तब दुनिया में लॉकडाउन से ज्यादा बड़ी समस्या इंटरनेट के शटडाउन से पैदा हो जाए। सर्वर का बैठ जाना अब इसलिए आम है कि दुनिया में इंटरनेट उपभोक्ताओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इससे डाटा के रूप में सूचनाओं का प्रवाह सुनिश्चित करने वाले सर्वरों पर बोझ भी लगातार बढ़ रहा है। यों सर्वरों की संख्या और उनकी क्षमता में बढ़ोत्तरी की जा रही है, लेकिन इनका अचानक धोखा दे जाना साबित कर रहा है कि सर्वरों पर बोझ उनकी क्षमता से कई गुना ज्यादा है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि साइबर सेंधमारों यानी हैकरों की नजर भी इन सर्वरों पर रहती है, ताकि वहां से डाटा चुरा सकें और मनचाहा खेल कर सकें। ऐसे में सर्वरों पर साइबर हमले का खतरा लगातार बना रहता है।

बीते तीन दशकों में इंटरनेट इस्तेमाल करने वालों की संख्या और विभिन्न कामकाज के लिए हमारी इस तकनीक पर निर्भरता- दोनों में भारी अनुपात में इजाफा हुआ है। आकलन कहता है कि ढाई दशक पहले 1995 में दुनिया की आबादी का सिर्फ एक फीसद हिस्सा इंटरनेट से जुड़ा हुआ था। लेकिन अब तो साढ़े चार से पांच अरब आबादी इंटरनेट की सक्रिय उपभोक्ता है। आज की तारीख में करीब साठ फीसद आबादी किसी न किसी रूप में इंटरेट का इस्तेमाल कर रही है। भारत में करीब उनसठ करोड़ और पड़ोसी चीन में पचासी करोड़ लोग इंटरनेट का इस्तेमाल करने लगे हैं। यानी पूरी दुनिया में खरीद-फरोख्त, पढ़ाई, परीक्षा, टीकाकरण, सरकारी योजनाओं का पंजीकरण और भी बहुत सारा काम इंटरनेट से हो रहा है। ऐसे में अगर किसी वजह से इंटरनेट की सांसें थमती हैं, तो नजारा सच में काफी भयावह हो सकता है।

चार साल पहले 2017 में अमेरिकी विश्वविद्यालय स्टैनफोर्ड के शोधकर्ता और मनोवैज्ञानिक जेफ हैनकॉक ने विश्वविद्यालय के छात्रों के सामने इंटरनेट शटडाउन की स्थितियां सामने रखी थीं, तो निष्कर्ष यह निकला कि ऐसे हालात में उन्हें कुछ अशुभ घटित होने जैसा अहसास होगा। मानो किसी ने हमारे सिर पर बम फोड़ दिया हो, क्योंकि दुनिया से पूरी तरह कट जाने के बाद हरेक व्यक्ति को यह अहसास हो सकता है कि वह किसी निर्जन द्वीप पर अकेला फंस गया और निरुपाय हो गया है।

सवाल है कि इंटरनेट शटडाउन से कैसे निपटा जाए। जाहिर है कि तकनीक के मामले में पीछे लौटने की कोई संभावना अब नहीं है। ज्यादा अच्छा रास्ता यह है कि इंटरनेट के संचालन में आ रही बाधाओं को दूर करने के तरीके ईजाद किए जाएं। जैसे सर्वरों की संख्या बढ़ाई जाए, इंटरनेट को हीलियम गुब्बारों की सहायता से दूरदराज के इलाकों तक पहुंचाया जाए, उपग्रहों के जरिए उनकी रफ्तार बढ़ाई जाए। साथ में वे कमियां भी दूर की जाएं, जहां से हैकरों को इसमें सेंध लगाने की कोई गुंजाइश दिखती है। जिन तकनीकों के सहारे इंटरनेट यहां तक पहुंचा है, उन्हीं तकनीकों से इसके रास्तों पर रोशनी भी बिखेरी जा सकती है।

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