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राजनीतिः जाट आरक्षण के सबक

हरियाणा के बाद गुजरात में भी आंदोलनकारियों में धारणा घर कर गई है कि सरकार केवल हिंसक उत्पात की भाषा समझती है। यह भी धारणा है कि आरक्षण, राजनीतिक रूप से मजबूत को मिलता है न कि कमजोर को। आर्थिक, राजनीतिक और कानून-व्यवस्था के तीनों आयामों के नए मॉडल पर काम किए बिना इसके जहरीले प्रभावों से समाज बच नहीं सकता।

हिंसा के बाद पटेलों को मिला आरक्षण

जाट आरक्षण की आग (18-23 फरवरी 2016) में झुलसे हरियाणा के ट्रिगर पॉइंट चिह्नित हो चुके हैं। इस दौरान हुई अंधी, लगभग बेरोकटोक, हिंसा के परस्पर विरोधी आख्यान सुनते हुए आप प्रदेश की राजनीति में जातिगत ध्रुवीकरण के सायों को कभी लंबे और कभी छोटा होते देखने की नियति से बच नहीं सकते। झज्जर में केंद्रीय सशस्त्र बलों पर हमला, रोहतक छात्रावास में जाट युवाओं की अंधाधुंध पुलिस पिटाई और रूट मार्च करते सैन्य बल का दिशाहीन पलायन, जग्गाबाड़ा (हांसी) में दो समुदायों की उन्मादी झड़प, जुलाना कस्बे के कैंची मोड़ पर आक्रामक जाट धरना, मुरथल (सोनीपत) में सुरक्षा बलों के हाथों चोट खाए उत्पातियों का तांडव, जैसे और भी तमाम ट्रिगर पॉइंट क्या महज रणनीतिक विफलताओं के सूचक हैं? हुआ यह कि एक दिशाहीन आर्थिक परिदृश्य में राजनीतिक बिजलियों की मार्गदर्शक कौंध और कानून-व्यवस्था की आश्वस्तकारी कड़क नदारद रही, जिसका खमियाजा हरियाणा वासियों ने भुगता।

सत्ता समीकरण के बरक्स राष्ट्रीय राजमार्ग नंबर एक पर पानीपत के जाट बहुल साढ़े आठ हजार मतदाता वाले सिवा गांव ने अनूठी दास्तान लिखी। बहुतेरे गांवों से भारी संख्या में वहां पहुंच कर आरक्षण समर्थक प्रदर्शनकारियों ने राजमार्ग बंद कर दिया था। राज्य भर में देहातों और शहरों के बीच बढ़ते तनाव के माहौल में वे भी दस किलोमीटर दूर लामबंद होते पानीपत शहर पर कूच करने को आमादा हुए। सिवा के लोग, खासकर गांव की वरिष्ठ स्त्रियां जिन प्रदर्शनकारियों को खाना-पानी देते आ रहे थे, उन्हीं के सामने अभेद्य दीवार बन कर अड़ गए और एक बड़ी अनहोनी टल गई। जींद में नौजवान डिप्टी कमिश्नर ने जाट धर्मशाला में जमा एक बड़ी उत्तेजित भीड़ की गैरत को अपनी शाब्दिक ललकार से ठंडा किया। सारे राज्य में करीब एक हजार करोड़ की संपत्ति के विनाश के बीच राजमार्गों पर कई दिन तक हजारों की संख्या में बाहर के ट्रक माल सहित फंसे रहे। पर इक्का-दुक्का मामलों को छोड़ कर उन्हें नुकसान नहीं पहुंचाया गया। इसके भी प्रमाण हैं कि जहां कई स्थानों पर राजनीतिक इशारे पर हिंसा भड़काने वालों को सक्रिय देखा गया, वहीं घोर अराजकता के माहौल का फायदा उठा कर आरक्षण से असंबद्ध बाहरी तत्त्वों ने भी लूटपाट में हिस्सा लिया।

नव उदारवादी दौर में, आरक्षण की चौतरफा मांग भारतीय लोकतंत्र के लिए एक अबूझ पहेली बन गई है। दरअसल, बेरोजगार युवाओं के बीच आरक्षण की मनोवैज्ञानिक अपील अस्सी-नब्बे के दशक के मंडल आयोग के दौर से कभी कम नहीं हुई। न इस दशक के राजस्थान, हरियाणा, गुजरात जैसे अन्य पिछड़ा आरक्षित वर्ग में शामिल होने को आतुर किसान समुदायों के खूनी आंदोलनों से सही सबक लिए गए हैं। स्पष्ट है कि जैसा बंदरबांट का हल राजनीतिक हलकों में आजमाया जा रहा है, वह सबके लिए संतोषप्रद नहीं हो सकता। यह भी कि सामाजिक समरसता के नजरिए से आरक्षण के नए समीकरणों को कानून-व्यवस्था की मशीनरी के बूते लागू किया जाना श्रेयस्कर नहीं।

ग्रामीण भारत में रोजगार और कृषि क्षेत्रों के आर्थिक संकट, आरक्षण केंद्रित राजनीतिक आंदोलनों के प्रमुख उत्प्रेरक रहे हैं। इनके वाहक पारंपरिक रूप से सशक्त रहे वे समुदाय हैं जो गत तीन-चार दशकों में औद्योगीकरण और वैश्वीकरण की मार के चलते आर्थिक फिसलन का शिकार बनते गए। जबकि संविधान में जातिगत आरक्षण की व्यवस्था राजनीति, शिक्षा और सरकारी नौकरियों में सामाजिक प्रतिनिधित्व की प्रणाली के रूप में की गई थी। स्पष्टत: इसे न तो रोजगार पैदा करने की, न उच्च शिक्षा हासिल करने की और न ही गरीबी उन्मूलन की प्रणाली में बदला जा सकता है। हालांकि, इन्हीं भावनाओं को भड़का कर तमाम राजनीतिक दलों ने आरक्षण आंदोलनों का इस्तेमाल वोट बैंकों को चरितार्थ करने में किया है। लिहाजा, इस बीच यह भी सामान्य क्रम जैसा हो चला है कि समय-समय पर आरक्षण के उग्र होते आयाम कानून-व्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती बनते दिखें।

ताजातरीन, गुजरात में पटेलों को आरक्षण मना हुआ और हरियाणा में जाटों को मिला, जबकि दोनों जगह व्यापक सामाजिक तनाव और राज्य-विरोधी हिंसा देखने को मिली। आरक्षण के छह दशक से अधिक के प्रयोगों से आज कई ज्वलंत सवाल निकले देखे जा सकते हैं। मसलन, नीति निर्धारकों और योजनाकारों को विचार करना होगा कि क्या कृषि और रोजगार जैसे आर्थिक संकट के संदर्भ में आरक्षण जैसा राजनीतिक हल संतोषजनक कहा जा सकता है, जिसे जरूरत पड़ने पर पुलिस के जोर से भी लागू करना पड़ेगा। जनमानस में अलग सवाल हैं। प्राय: पूछा जाता है कि आखिर जातिगत आरक्षण कब तक चलते रहेंगे? क्या आरक्षण का आधार आर्थिक नहीं होना चाहिए? क्या वर्तमान आरक्षण प्रणाली से गुणवत्ता पर असर नहीं पड़ता? क्या शिक्षा और रोजगार के व्यापक निजीकरण और धन के खेल ने आरक्षण की सामाजिक प्रतिनिधित्व की अवधारणा को कमजोर नहीं किया है? क्या सबको एक जैसी अच्छी शिक्षा की सुविधा देकर नौकरियों से आरक्षण को समाप्त कर देना चाहिए? क्रीमी लेयर के सिद्धांत को हर तरह के आरक्षण पर लागू करना चाहिए या नहीं? सामाजिक-शैक्षणिक रूप से आगे बढ़ चुकी जातियों को आरक्षण से बाहर करने के लिए पुनर्विचार के दायरे में लाया जाए? न केवल इन सवालों पर शतुर्मुर्गी अस्पष्टता देखने को मिलती है, बल्कि राजनीतिक क्षेत्रों में बराबर कशमकश हावी रहती है कि सर्वोच्च न्यायालय की तयशुदा पचास प्रतिशत की आरक्षण सीमा को कैसे लांघा जाय!
जनवरी, 2016 में सर्वोच्च न्यायालय ने पूर्व में निरस्त जाट आरक्षण की पुनर्विचार याचिका भी ठुकरा दी। हरियाणा में आरक्षण के गिर्द जाट लामबंदी को पहले से अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल खासकर सैनी और यादव समुदाय ने शुरू से ही बेहद शक की नजर से देखा था। उनके नजरिए से, राजनीतिक रूप से बढ़े-चढ़े जाटों का इस आरक्षित वर्ग में प्रवेश का मतलब होता उनके अपने दबदबे का कम होना। कृषि क्षेत्र का बढ़ता संकट तमाम ग्रामीण तबकों, जाटों में भी, रोजगार का दुर्भिक्ष लेकर आया, पर इसका मतलब यह तो नहीं कि लोमड़ी को मुर्गियों के दड़बे में डाल दिया जाए! लेकिन विभिन्न समुदायों की इस बढ़ती छटपटाहट पर राज्य सरकार का रवैया पहले की तरह आश्वासनों से स्थिति टालने वाला ही रहा। राजनीतिक अनिश्चितता के बीच आंदोलन के वरिष्ठ नेताओं के संयम मार्ग को धता बता कर उत्तेजित युवाओं ने राजमार्ग और रेलमार्ग पर घेरा डाल दिया।
जोतें छोटी होती जाने और फसल की कीमतों में ठहराव के चलते किसान के लिए खेती हताशा का सौदा बन चुकी है। कृषि जमीन के व्यापक अधिग्रहण ने ग्रामीण युवाओं को एक अनिश्चित भविष्य की दहलीज पर ला खड़ा किया है। रोहतक, झज्जर और सोनीपत जैसे दिल्ली से लगे जिलों में खाए-अघाए, लेकिन कृषि रहित जीवन के लिए बे-तैयार ग्रामीण युवाओं का सब्र का बांध खासा कमजोर हो चला है। भाजपा ने लोकसभा/ विधानसभा विजय अभियान में जाटों को आरक्षण की परिधि में बनाए रखने का वादा किया था। साथ ही कृषि उत्पादन की कीमतों को आकर्षक रखने वाली स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों को लागू करना भी पार्टी की चुनावी रणनीति का अहम हिस्सा था। केंद्र और राज्य में भाजपा सरकार होने के बावजूद दोनों मुद्दों पर वांछित पहल के अभाव ने एक रोष भरे व्यापक जन-आंदोलन की जमीन तैयार की।

हरियाणा की राजनीतिक सत्ता में सदा से जाटों की प्रभावी भागीदारी निर्विवाद रूप से चली आ रही है। स्वाभाविक था कि वे अपनी आर्थिक समस्याओं का हल भी अपनी राजनीतिक प्रभुता में ढूंढ़ते। पूर्ववर्ती कांग्रेसी हुड््डा सरकार के समय में इस खींचतान का संतुलन मुख्यत: दो उपायों से बना रह सका। एक तो किसानों को अधिग्रहीत कृषि भूमि की ऊंची कीमतें दी जाने लगीं, जो छोटी जोत के किसानों के लिए घाटे की कृषि के मुकाबले कहीं बेहतर वक्ती विकल्प जैसा लगता था। 2012 के केंद्रीय कांग्रेसी सरकार के भूमि अधिग्रहण विधेयक ने भी इस संबंध में किसानों की मोलभाव क्षमता को मजबूत किया। दूसरे, हरियाणा के तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के नेतृत्व में बने कृषि मूल्य आयोग ने कृषि उत्पादनों के आयात-निर्यात आवृत्ति चक्र को किसानों के हक में भी इस्तेमाल किया। फलस्वरूप किसान को अपनी फसल की लगातार बेहतर कीमतें मिलीं।

बेशक इन कदमों ने हुड््डा सरकार को जाट आरक्षण की उग्रता से अस्थायी राजनीतिक शांति दिलाए रखी। हालांकि अंतत: कांग्रेस को 2014 के लोकसभा चुनाव से ऐन पहले जाट आरक्षण विधेयक का दिखावा करना पड़ा। हरियाणा में आम समझ है कि उस दौर में शासन-प्रशासन ने जनता को आरक्षण हिंसा के रहमो-करम पर छोड़ दिया था। हालांकि जिस व्यापक पैमाने पर इस हिंसक आंदोलन ने प्रदेश को अपनी गिरफ्त में ले लिया उसे सामान्य कानून-व्यवस्था के मानकों से आंकना उचित नहीं है, तो भी सर्वव्यापी जड़ता को ‘पॉलिसी पैरालिसिस’ की संज्ञा देना ही उचित होगा। यह बुनियादी तथ्य समझ लेना चाहिए कि पुलिस बल के कलेवर को न पेशेवर रहने दिया गया है और न सत्ता निरपेक्ष। समय की मांग थी एक रणनीतिक नेतृत्व और लोकतांत्रिक तेवर वाली पुलिस। इसके आभाव में, यह आधे-तिहाई मन से स्वयं को ही बचाने में लगी पुलिस सिद्ध हुई।

क्या इस व्यापक हिंसा का कोई विकल्प था? हरियाणा के बाद गुजरात में भी आंदोलनकारियों में धारणा घर कर गई है कि सरकार केवल हिंसक उत्पात की भाषा समझती है। यह भी धारणा है कि आरक्षण, राजनीतिक रूप से मजबूत को मिलता है न कि कमजोर को। आर्थिक, राजनीतिक और कानून-व्यवस्था के तीनों आयामों के नए मॉडल पर काम किए बिना इसके जहरीले प्रभावों से समाज बच नहीं सकता। व्यक्तिगत नहीं, परस्पर आधारित रोजगार कौशल, तमिलनाडु जैसा लचीला आरक्षण ढांचा और समुदाय केंद्रित संवेदी पुलिस क्रमश: इन आयामों के प्रस्थान बिंदु हो सकते हैं।

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