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राजनीतिः अमीरी-गरीबी की बढ़ती खाई

देश में करोड़पतियों और अरबपतियों की तादाद बढ़ना कोई बुरी बात नहीं है। ये आंकड़े अर्थव्यवस्था की मजबूती और समृद्धि के साथ देश की बदलती तस्वीर के परिचायक हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू बेहद स्याह है कि आखिर अमीरों के अनुपात में गरीबों की आर्थिक सेहत क्यों नहीं सुधर रही है? क्या कारण हैं कि सरकार के अथक प्रयासों के बावजूद लोगों को गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकालने में सफलता नहीं मिल रही है?

Author October 18, 2018 2:04 AM
भारत सरकार के आंकड़े भी बताते हैं कि देश की कुल बाईस फीसद आबादी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। देश के सत्ताईस फीसद आबादी वाले एक सौ छब्बीस जिले सबसे गरीब और सुविधाओं से वंचित हैं।

अभिजीत मोहन

अमीर और गरीब के बीच खाई पाटने की कोशिशों के बीच हाल में आई एक रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में पिछले दो साल में ऐसे लोगों की तादाद दोगुने से ज्यादा हुई है जिनकी संपत्ति एक हजार करोड़ रुपए या इससे अधिक है। रिपोर्ट के मुताबिक 2016 में ऐसे लोगों की संख्या तीन सौ उनतालीस थी, जो 2018 में बढ़ कर आठ सौ इकतीस हो गई। इन आठ सौ इकतीस अमीरों की कुल संपत्ति सात सौ उन्नीस अरब डॉलर है, जो देश के सकल घरेलू उत्पाद के चौथाई हिस्से के बराबर है। पिछले साल जो विश्व संपदा रिपोर्ट आई थी, उसमें बताया गया था कि भारत में करोड़पतियों की संख्या में 22.2 फीसद का इजाफा हुआ है। पिछले साल ही अंतरराट्रीय मुद्रा कोष ने भी कहा कि भारत में पिछले डेढ़ दशक में अरबपतियों की संपदा में बारह गुना वृद्धि हुई है। साल 2015 में चीनी पत्रिका ‘हुरुन’ ने दुनिया के अमीरों की सूची जारी की थी, जिसमें बताया गया था कि दुनिया भर के 2089 अरबपतियों में सत्तानबे भारत के हैं। पिछले साल अमेरिका के पीटरसन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट से भी यह सामने आया कि भारत में अरबपतियों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। इसमें कहा गया था कि भारत दुनिया के 3.4 फीसद अरबपतियों का ठिकाना बन चुका है।

देश में करोड़पतियों और अरबपतियों की तादाद बढ़ना अच्छी बात है। ये आंकड़े अर्थव्यवस्था की मजबूती और समृद्धि के साथ देश की बदलती तस्वीर के परिचायक हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू बेहद स्याह है कि आखिर अमीरों के अनुपात में गरीबों की आर्थिक सेहत क्यों नहीं सुधर रही है? क्या कारण है कि सरकार के अथक प्रयासों के बावजूद लोगों को गरीबी के दुष्चक्र से बाहर निकालने में सफलता नहीं मिल रही है? आय में असमानता की गहराती खाई न केवल चिंताजनक है, बल्कि सच कहें तो यह देश के माथे पर कलंक है और शर्मसार करने वाली बात भी। कहने को सरकार की ओर से गरीबों के कल्याण व उत्थान के लिए ढेरों कल्याणकारी योजनाएं चलाई जा रही हैं, बावजूद इसके करोड़ों लोग अगर गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन को मजबूर हैं तो अमीरों की बढ़ती तादाद पर सवाल तो उठेगा ही। ऐसा इसलिए कि असंतुलित आर्थिक विकास से अमीरों को जितना फायदा होता है, उससे कई गुना गरीबों का नुकसान होता है। आय में बढ़ती असमानता का ही नतीजा है कि भारत में गरीबी, भुखमरी और कुपोषण की समस्याएं लगातार गहराती जा रही हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो आज देश में तीस करोड़ लोग ऐसे हैं जो भयावह गरीबी का सामना कर रहे हैं। भारत में बुनियादी सुविधाओं से वंचित अड़सठ करोड़ लोग ऐसे हैं जो गरीबी का दंश झेल रहे हैं।

भारत सरकार के आंकड़े भी बताते हैं कि देश की कुल बाईस फीसद आबादी बुनियादी सुविधाओं से वंचित है। देश के सत्ताईस फीसद आबादी वाले एक सौ छब्बीस जिले सबसे गरीब और सुविधाओं से वंचित हैं। इनमें अधिकतर जिले उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड राज्य के हैं। इसी तरह चौदह फीसद आबादी वाले एक सौ इक्यावन जिले गुजरात, तमिलनाडु, पंजाब और महाराष्ट्र में हैं। वैश्विक एजंसियों ने अपनी रिपोर्टों में आय में बढ़ती असमानता को पाटने और गरीब मुक्त भारत के लिए कुछ अहम सुझाव दिए हैं। मसलन, साढ़े ग्यारह करोड़ लोगों को गैर कृषि क्षेत्र में रोजगार दिया जाए, खाद्य उत्पादकता मौजूदा 2.3 टन प्रति हेक्टेयर से बढ़ा कर चार टन की जाए। इसके अलावा सामाजिक सेवाओं के सुधार पर वर्ष 2022 तक 10,88,000 करोड़ रुपए खर्च किए जाएं। अगर सरकार इन सुझावों पर अमल करती है तो आय असमानता पाटने में मदद मिलेगी।

गैर सरकारी संगठन आक्सफेम की रिपोर्ट बताती है कि भारत में आर्थिक असमानता बीते तीन दशकों से तेजी से बढ़ी है। हालत यह है कि देश के कुल सकल घरेलू उत्पाद का पंद्रह फीसद हिस्सा भारतीय अरबपतियों के खाते में है। रिपोर्ट में इस हालत के लिए सरकार की नीतियों को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा गया है कि भारत में अमीरों ने देश में सृजित संपत्ति का एक बड़ा हिस्सा ‘सांठगांठ वाले पूंजीवाद’ या ‘बपौती’ में हासिल किया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक सड़सठ करोड़ भारतीयों की संपत्ति में सिर्फ एक फीसद की वृद्धि हुई है, जबकि इसके उलट अरबपतियों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है। पिछले दिनों ‘वर्ल्ड इनइक्विलिटी लैब’ के अध्ययन से भी यह तथ्य सामने आया था कि 1980 के दशक से ही भारत में आय असमानता लगातार बढ़ रही है। रिपोर्ट के मुताबिक वर्तमान समय में शीर्ष 0.1 फीसद सबसे अमीर लोगों की कुल संपदा बढ़ कर निचले पचास फीसद लोगों की कुल संपदा से कई गुना अधिक हो गई है।

इस रिपोर्ट में पाया गया है कि आय असमानता में बढ़ोतरी 1947 में देश की आजादी के तीस साल की तुलना में उलट है। उस समय आय असमानता काफी घटी थी और निचले पचास फीसद लोगों की संपत्ति राष्ट्रीय औसत की तुलना में ज्यादा तेजी से बढ़ी थी। जबकि मौजूदा दौर में आम लोगों की आय के बनिस्बत कुछ लोगों की आय में बढ़ोतरी हैरान करने वाली है। ‘वैश्विक असमानता रिपोर्ट 2018’ को विश्व के जाने-माने अथर्शास्त्री फाकुंडो एल्वारेडो, लुकास चांसल, थॉमस पिकेटी, इमानुआल साइज और गैब्रियल जकमैन ने तैयार किया है। इसलिए इसे आसानी से खारिज नहीं किया जा सकता। इस रिपोर्ट में पिछले चालीस साल के दौरान वैश्वीकरण के असमानता वाले प्रभाव को दर्शाते हुए ‘भारतीय आय असमानता, 1922-2014 ब्रिटिश राज से करोड़पति राज’ शीर्षक से बनाया गया है। इस रिपोर्ट पर गौर करें तो साल 2016 में देश की कुल दौलत का पचपन फीसद हिस्सा शीर्ष के दस फीसद अमीरों के पास था। इसी तरह 2014 में देश के शीर्ष एक फीसद आय वाले लोगों के पास राष्ट्रीय आय का बाईस फीसद हिस्सा था और शीर्ष दस फीसद के पास छप्पन फीसद था। अध्ययन में कहा गया है कि 1982-83 में देश के शीर्ष एक फीसद लोगों की आय अगले एक दशक में छह फीसद से बढ़ कर दस फीसद हो गई। इस आय में वर्ष 2000 तक पंद्रह फीसद की वृद्धि हुई और 2014 में यह बढ़ कर तेईस फीसद हो गई। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में निजीकरण, उदारीकरण और विनिवेश प्रक्रिया शुरू किए जाने के बाद से आर्थिक माहौल में तेजी से बदलाव हुआ है। निस्संदेह भारत के विकास में इसका महत्त्वपूर्ण योगदान है। लेकिन सच यह भी है कि इससे आय असमानता में भारी इजाफा भी हुआ है।

पेरिस स्थित आर्थिक विश्लेषण संगठन ‘आर्गनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक कोआॅपरेशन एंड डवलपमेंट (ओईसीडी) ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा है कि भारत में 90 के दशक के बाद से आय असमानता तेजी से बढ़ी है। ओईसीडी ने पाया है कि ब्राजील, अर्जेंटीना और इंडोनेशिया ने पिछले दो दशक में असमानता घटाने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। लेकिन चीन, भारत, रूस और दक्षिण अफ्रीका में आय असमानता में कमी आने के बजाय इसमें वृद्धि हुई है। इस रिपोर्ट के आंकड़ों का महत्त्व इसलिए है कि चौंतीस विकसित देशों के संगठन ओईसीडी का वैश्विक उत्पादन में साठ फीसद से अधिक का योगदान है। पिछले साल न्यू वर्ल्ड वेल्थ ने भी अपनी रिपोर्ट में खुलासा किया था कि भारत दुनिया का दूसरा सबसे ज्यादा असमान आय वाला देश है। ऐसे में उचित होगा कि देश के नियंता इसे गंभीरता से लेते हुए आर्थिक असमानता की खाई को पाटने के लिए ठोस रणनीति बनाएं और उसका ईमानदारी से क्रियान्वयन कराएं।

 

 

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