भीड़ हिंसा की बढ़ती हदें

भीड़ हिंसा वह सामाजिक विकृति है, जो किसी धर्म में विश्वास नहीं करती।

सांकेतिक फोटो।

सौरभ जैन

भीड़ हिंसा वह सामाजिक विकृति है, जो किसी धर्म में विश्वास नहीं करती। भारत जैसे राष्ट्र, जिसमें भिन्न-भिन्न जाति, धर्म, भाषा वाले नागरिक निवास करते हैं, ऐसी घटनाएं उसकी प्रकृति के प्रतिकूल सिद्ध होती हैं। सवाल मनुष्य की बुद्धि और विवेक पर भी उठते हैं कि हम हिंसा के प्रति इतने आकर्षित क्यों हो रहे हैं? किसी अफवाह मात्र के आधार पर अपना विवेक शून्य कर ऐसी घटनाओं को अंजाम देकर हम साबित क्या करना चाहते हैं?

देश के अलग-अलग हिस्सों से आ रही भीड़ हिंसा की खबरों ने फिर एक बार चिंता में डाल दिया है। कुछ ही दिन पहले मध्यप्रदेश के नीमच में एक शख्स को वाहन से बांध कर घसीटा गया, जिसमें उसकी मौत हो गई। ऐसी घटनाओं का दुष्प्रभाव यह पड़ रहा है कि इन पर अंकुश लगने के बजाय इनके प्रति लोगों का आकर्षण बढ़ता देखा जा रहा है। यही कारण है कि मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र में देवास, उज्जैन, इंदौर में भीड़ हिंसा की घटनाएं निरंतर सामने आ रही हैं। उज्जैन के महिदपुर में धार्मिक नारे न लगाने पर दुकानदार का सामान फेंकने और देवास जिले के हाटपिपल्या में आधार कार्ड नहीं दिखाने पर फेरीवाले को पीटने की घटनाएं भी सामने आर्इं। ये सभी घटनाएं कुछ दिन के अंतराल पर हुई हैं।

इंदौर का मामला तो राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना था, जिसमें भीड़ एक युवक की पिटाई करती दिखाई दे रही है। यह घटना इंदौर में बाणगंगा क्षेत्र की है, जहां चूड़ी बेचने वाले एक शख्स को लोगों ने पीट दिया। पुलिस ने दोनों पक्षों के खिलाफ मुकदमा दर्ज किया है। चूड़ी बेचने वाले के खिलाफ पॉक्सो कानून के तहत मामला दर्ज किया गया है। उस पर पहचान छिपाने के आरोप भी लगे हैं। अब सवाल मौके पर न्याय करती भीड़ पर खड़े होते हैं। अगर वह युवक दोषी है, तो इसकी जांच करने का काम पुलिस और सजा देने का काम न्यायपालिका का है। हमारी व्यवस्था में भीड़ को यह अधिकार किसने दिया कि वह सड़कों पर न्याय करने उतर जाए? सड़कों पर न्याय करती भीड़ ने एक बार फिर व्यवस्था पर प्रश्न चिह्न खड़ा किया और भीड़ हिंसा पर चर्चा को जन्म दिया है।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में ‘हम’ शब्द इस राष्ट्र में निवास करने वाले सभी नागरिकों के लिए प्रयोग किया गया है, पर जब पालघर जैसी भीड़ हिंसा की घटनाएं होती हैं, तो ‘हम’ पर प्रश्न चिह्न लग जाते हैं। पालघर की घटना से पूरा देश स्तब्ध था, सोशल मीडिया पर वायरल घटना के वीडियो ने तब भी मनुष्यता पर सवाल खड़े किए थे। ऐसी घटनाओं को भीड़ हिंसा के रूप में देखने के बजाय धार्मिक रंग देने से एक नई बहस जन्म ले लेती है। भीड़ हिंसा वह सामाजिक विकृति है, जो किसी धर्म में विश्वास नहीं करती। भारत जैसे राष्ट्र, जिसमें भिन्न-भिन्न जाति, धर्म, भाषा वाले नागरिक निवास करते हैं, ऐसी घटनाएं उसकी प्रकृति के प्रतिकूल सिद्ध होती हैं। सवाल मनुष्य की बुद्धि और विवेक पर भी उठते हैं कि हम हिंसा के प्रति इतने आकर्षित क्यों हो रहे हैं? किसी अफवाह मात्र के आधार पर अपना विवेक शून्य कर ऐसी घटनाओं को अंजाम देकर हम साबित क्या करना चाहते हैं?

2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने लिंचिंग पर अंकुश लगाने के लिए डीएसपी स्तर के अधिकारी द्वारा भीड़ हिंसा की जांच करने के आदेश दिए थे। साथ ही विशेष कार्यबल, जो ऐसे लोगों के बारे में खुफिया जानकारी एकत्रित करें, जो इस तरह की वारदात को अंजाम देना चाहते हैं या अफवाह फैला रहे हैं, का गठन करने को कहा था। ये सब बातें सुनने में बेहद अच्छी लगती हैं, पर धरातल की वास्तविकता इसके उलट होती है। न्यायालय ने उस समय टिप्पणी की थी कि ‘कोई भी नागरिक अपने आप में कानून नहीं बन सकता है। लोकतंत्र में भीड़तंत्र की इजाजत नहीं दी जा सकती।’ इससे जाहिर होता है कि भीड़ किस प्रकार कानून से ऊपर होती जा रही है।

वैश्विक संदर्भ में बात की जाए तो ‘लिंचिंग’ शब्द अमेरिका से आया है। अमेरिकी क्रांति के दौरान वर्जीनिया के बेडफर्ड काउंटी के चार्ल्स लिंच अपनी निजी अदालतें बैठाने लगे और अपराधियों को बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के सजा देने लगे। वहां लोगों की भीड़ के सामने पेड़ों या पुलों से लटका कर अंग-भंग कर और जिंदा जला कर अमानवीय तरीके से हत्या की जाती थी। अमेरिका स्थित ‘नेशनल एसोसिएशन फॉर द एडवांसमेंट आॅफ कलर्ड पीपुल’ के आंकड़ों के अनुसार 1882 से 1968 तक अमेरिका में 4,743 लोगों की हत्या भीड़ द्वारा की गई। लिंचिंग के शिकार लोगों में जहां 3,446 अश्वेत अफ्रीकी अमेरिकी थे, वहीं इनमें 1,297 श्वेत लोग भी थे।

हमारे देश में भीड़ हिंसा यानी मॉब लिंचिंग की प्रवृत्ति हर काल में देखी गई है। भीड़ ने सबसे पहले डायन बता कर महिलाओं को अपना शिकार बनाया, फिर यह प्रवृत्ति बदली और गोहत्या की अफवाहों पर भीड़ गोरक्षक बन कर मैदान में कूद पड़ी। कुछ समय बाद बच्चा चोरी के शक में भीड़ द्वारा पीटने का तीसरा चलन सामने आ गया।

5 अप्रैल, 2017 को राजस्थान के अलवर में दो सौ लोगों की गोरक्षक भीड़ ने दूध का व्यापार करने वाले पहलू खान को मार दिया। इस मामले को सर्वाधिक सुर्खियां मिलीं, पर इस घटना को भी धार्मिक रंग दे दिया गया। इंडिया स्पेंड वेबसाइट के अनुसार वर्ष 2010 से 2017 के बीच दर्ज तिरसठ मामलों में से सत्तानबे फीसद मामले पिछले तीन वर्षों के दौरान दर्ज हुए हैं। रिपोर्ट की मानें तो वर्ष 2012 से अब तक सामुदायिक घृणा से प्रेरित ऐसी एक सौ अट्ठाईस घटनाएं हो चुकी हैं, जिनमें सैंतालीस लोगों की मृत्यु हुई और एक सौ पचहत्तर लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं। जनवरी, 2017 से पांच जुलाई, 2018 के दरम्यान दर्ज उनहत्तर मामलों में केवल बच्चा चोरी की अफवाह के चलते तैंतीस लोग भीड़ हिंसा में मारे जा चुके हैं और निन्यानबे लोग गंभीर रूप से घायल हो चुके हैं।

राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के अनुसार 2001 से 2014 तक देश में 2,290 महिलाओं की हत्या डायन बता कर पीट-पीट कर की गई। इनमें 464 हत्याएं अकेले झारखंड में हुर्इं। ओड़िशा में 415 और आंध्र प्रदेश में ऐसी 383 हत्याएं हो चुकी हैं। इसी क्रम में हरियाणा में 209 हत्याएं हुई हैं। स्टेप्स फाउंडेशन के अनुसार 28 सितंबर, 2015 से 7 जून, 2019 तक घटी ऐसी घटनाओं में 141 लोगों की जान जा चुकी है।

इनमें मरने वालों में सत्तर मुसलिम और इकहत्तर गैर-मुसलिम हैं। ये आंकड़े सिद्ध करते हैं कि भीड़ की नजर में न तो कोई हिंदू होता है, न ही कोई मुसलमान, भीड़ समान रूप से सभी को अपना शिकार बनाती है। 2018 में सबसे ज्यादा इकसठ लोगों की हत्या हुई। इसलिए सबसे पहले इन घटनाओं को धार्मिक नजर से देखने के बजाय सामाजिक विकृति और संविधान की मूल भावना के विपरीत रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए। ये तमाम आंकड़े बेहद गंभीर और चिंतनीय स्थिति की ओर इशारा करते हैं।

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