पराली के धुएं से बढ़ता संकट

केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने फसल अवशेषों के प्रबंधन के लिए वर्ष 2014 में राष्ट्रीय नीति का गठन किया, जिसमें प्रौद्योगिकी के उपयोग के साथ पराली के प्रबंधन के लिए कई उद्देश्य निर्धारित किए थे।

सांकेतिक फोटो।

वेंकटेश दत्ता

केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने फसल अवशेषों के प्रबंधन के लिए वर्ष 2014 में राष्ट्रीय नीति का गठन किया, जिसमें प्रौद्योगिकी के उपयोग के साथ पराली के प्रबंधन के लिए कई उद्देश्य निर्धारित किए थे। लेकिन इस मोर्चे पर अभी तक कोई खास प्रगति नहीं हुई है।

हर साल की तरह इस बार फिर से दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र सहित आसपास के राज्यों में वायु प्रदूषण का संकट फिर से गहराता जा रहा है। बड़ा कारण भी वही है, पराली का जलना। पिछले एक पखवाड़े से यह संकट ज्यादा गहरा गया है। पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के किसानों को मानसून में बोई गई धान की फसल काटने और अगली फसल बोने के लिए काफी कम समय मिलता है।

इसलिए 15 अक्तूबर से 15 नवंबर तक पराली जलाने की घटनाएं बढ़ जाती हैं। इस दौरान धान की फसल काटी जाती है और गेहूं की बुवाई के लिए बचे हुए अवशेषों को साफ करने की आवश्यकता होती है। फसल के दौरान लगभग दो से ढाई करोड़ टन धान की भूसी निकलती है। ज्यादातर किसान खेतों को जल्दी साफ करने के लिए धान की पराली जलाने का सहारा लेते हैं। नासा का उपग्रह ‘मोडिस’ भी अंतरिक्ष से उत्तर भारत के जलते हुए खेतों की लगातार तस्वीरें दे रहा है।

जैसे-जैसे सर्दियों में प्रदूषण बढ़ता है, वैसे-वैसे देश के किसानों और नीति निमार्ताओं के बीच की खाई भी बढ़ती जाती है। पराली जलाने से होने वाला धुआं दिल्ली के वायु प्रदूषण के स्रोतों में से एक है। अन्य स्रोतों में धूल, उद्योग और वाहनों से उत्सर्जित होने वाला धुआं आदि हैं। दिल्ली के प्रदूषण में पराली जलाने की हिस्सेदारी हवा की गति और दिशा के आधार पर पांच से पचपन फीसद तक होती है।

समस्या सिर्फ दिल्ली तक ही सीमित नहीं है, बल्कि पूरे गंगा के मैदान तक फैली है। प्रदूषण का एक बड़ा बादल पूरे उत्तर भारत को धुंध से ढक लेता है। किसान साल में दो बार पराली जलाते हैं- गर्मियों में और सर्दियों की शुरुआत में। जब वे गर्मियों में ऐसा करते हैं, तो गर्म हवा इसे जल्दी से बिखेर देती है। लेकिन दूसरी बार, अक्तूबर और नवंबर में गिरते तापमान और कम हवा की गति से धुआं दूर-दूर तक फैल जाता है।

पराली जलाने के संकट ने बड़े पैमाने पर सार्वजनिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां पैदा कर दी हैं। इसका धुंआ उत्तर भारत के बड़े हिस्से को प्रदूषित करता है और इससे करोड़ों लोगों का स्वास्थ्य प्रभावित होता है। वायु प्रदूषण लोगों को अन्य संक्रमणों के प्रति अधिक संवेदनशील बनाता है और उनके स्वास्थ्य में सुधार को धीमा कर देता है। पुआल को जलाने से निकलने वाली गर्मी एक सेंटीमीटर तक मिट्टी में प्रवेश करती है। यह उपजाऊ मिट्टी की ऊपरी परत में मौजूद सूक्ष्म जीवों के साथ-साथ इसकी जैविक गुणवत्ता को भी नुकसान पहुंचाती है। मित्र कीटों के नष्ट होने से शत्रु कीटों का प्रकोप बढ़ जाता है जिसके फलस्वरूप फसलों में रोग की संभावना अधिक होती है। मिट्टी की ऊपरी परतों की घुलनशीलता भी कम हो जाती है।

पराली संकट से निपटने के लिए पिछले कुछ वर्षों में केंद्र और राज्य सरकारों ने कई कदम उठाए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस संकट को लेकर जिस तरह की सक्रियता दिखाई है और समय-समय पर सरकारों को जो निर्देश दिए हैं, उससे इस संकट की गंभीरता का अंदाजा लगाया जा सकता है। लेकिन इतना सब कुछ होने के बाद भी हालात में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं आया है।

हालांकि राज्यों ने पराली जलाने पर प्रतिबंध लगाने, किसानों पर जुर्माना लगाने जैसे कदम उठाए, पर इन कदमों का कोई ठोस नतीजा देखने में आया नहीं। हालांकि सरकारों का दावा है कि पराली जलाने की घटनाओं में पहले के मुकाबले कमी आई है, लेकिन वास्तविकता तो यही है कि अभी भी बड़ी संख्या में किसान पराली जला ही रहे हैं, भले ही उन्हें जुर्माना और सजा का सामना क्यों न करना पड़े।

केंद्रीय कृषि मंत्रालय ने फसल अवशेषों के प्रबंधन के लिए वर्ष 2014 में राष्ट्रीय नीति का गठन किया, जिसमें प्रौद्योगिकी के उपयोग के साथ पराली के प्रबंधन के लिए कई उद्देश्य निर्धारित किए थे। लेकिन इस मोर्चे पर अभी तक कोई खास प्रगति नहीं हुई है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने 10 दिसंबर, 2015 को राजस्थान, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब राज्यों में पराली जलाने पर प्रतिबंध लगा दिया था।

फसल अवशेष जलाना भारतीय दंड संहिता (आइपीसी) की धारा 188 और वायु प्रदूषण नियंत्रण अधिनियम 1981 के तहत एक अपराध है। 2019 में, सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को हर उस किसान को 2,400 रुपए प्रति एकड़ देने का आदेश दिया, जिसने पराली नहीं जलाने का फैसला किया था। पंजाब सरकार ने स्वीकार किया कि वह इतने किसानों का भुगतान नहीं कर सकती। चूंकि किसान एक महत्त्वपूर्ण वोट बैंक हैं, इसलिए प्रतिबंध और भारी जुर्माने लगाने में सरकारों ने दिलचस्पी नहीं दिखाई।

केंद्र सरकार ने दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में वायु प्रदूषण पर अंकुश लगाने के लिए एक अध्यादेश के माध्यम से एक नया कानून पेश किया। इस अध्यादेश के जरिए पर्यावरण प्रदूषण (रोकथाम और नियंत्रण) प्राधिकरण (ईपीसीए) को भंग कर दिया और इसके स्थान पर बीस से अधिक सदस्यों के साथ एक नया आयोग बनाया गया। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग अधिनियम, इस साल अगस्त में संसद द्वारा पारित किया गया था। अधिनियम केंद्र को राजधानी में और उसके आसपास वायु गुणवत्ता की निगरानी के लिए एक आयोग बनाने का अधिकार देता है।

वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग सुप्रीम कोर्ट की निगरानी वाले पर्यावरण प्रदूषण प्राधिकरण सहित इसके तहत सभी निकायों को समेकित करता है। आयोग ने खेतों में पराली को काटने के लिए करीब डेढ़ लाख मशीनें खरीदी हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा विकसित एक जैव-अपघटक ‘पूसा डीकंपोजर’ फसल के अवशेषों को पंद्रह से बीस दिनों में खाद में बदल देता है। इस डीकंपोजर में बीस रुपए की लागत वाले चार कैप्सूल का एक पैकेट होता है जो धान के भूसे के घटकों पर कार्य करने की क्षमता रखने वाले एंजाइम का उत्पादन करता है। सक्रिय कवक के साथ पुआल पच्चीस दिन में विघटित हो जाता है।

लेकिन कुछ किसानों का कहना है कि उनके पास फसलों के बीच इतना समय नहीं है, इसलिए पराली जलाने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। आयोग ने दिल्ली के तीन सौ किलोमीटर के दायरे में ग्यारह ताप विद्युत संयंत्रों को फसल अवशेषों को ईंधन के रूप में इस्तेमाल करने का निर्देश दिया है। यह स्ट्रा-बुलेट के रूप में होगा जिसमें कोयले की खपत को दस फीसद तक कम करने की क्षमता है। पर मूल सवाल यह है कि धान की पराली का संग्रहण कैसे किया जाए और आपूर्ति शृंखला कैसे बनाई जाए।

पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश ने देश की हरित क्रांति का नेतृत्व किया है। इन राज्यों ने आधुनिक तकनीक और बीजों की उच्च पैदावार देने वाली किस्मों को अपना कर फसल उत्पादन बढ़ाया है। उत्तर भारत में गेहूं और चावल ने अन्य मोटे अनाजों की जगह ले ली है। उत्तर भारत में इतना धान उगाना हमेशा समस्या का कारण बनता है।

इसकी स्थलाकृति फसल के अनुकूल नहीं है। धान उगाने में बहुत पानी लगता है। इसे उच्च भूजल वाले क्षेत्रों में उगाया जाना चाहिए, जो पंजाब के पास नहीं है। इस तरह की सघन खेती से न केवल वायु प्रदूषण हुआ है, बल्कि इसके अन्य विनाशकारी परिणाम भी आए हैं। इन राज्यों में जल स्तर तेजी से गिर रहा है। ऐसे में एकमात्र तरीका यही है कि गेहूं और धान के चक्र से बाहर निकलने के लिए किसान फसलों के विविधीकरण को अपनाएं। तभी पराली संकट का रास्ता निकल पाएगा। इसके लिए भारत को एक और कृषि क्रांति की जरूरत है।

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